!-एक्सीडेंट
नींद खुलते ही नीतीश का ध्यान हमेशा की तरह घड़ी पर चला गया। दोपहर के 12:00 बज रहे थे।
नितेश फैक्ट्री में शिफ्ट इंचार्ज था और वीणा प्राइवेट कंपनी में प्रशासनिक अधिकारी। नितीश की फैक्ट्री घर से 40 किलोमीटर दूर थी और वीणा का दफ्तर 25 किलोमीटर ।महानगर का व्यस्त जीवन ,उस पर नाइट ड्यूटी और ओवरटाइम….उफ! नीतीश ने करवट बदल कर पुनः आंखें बंद कर ली। रात की घटनाएं उसके मस्तिष्क में घूमने लगी थी…. लोकल ट्रेन का एक्सीडेंट हो जाने के कारण उसे कल टैक्सी पकड़नी पड़ी थी। टैक्सी में बैठे-बैठे उसने सोच लिया था कि वीणा का अवकाश होने के कारण वह छह-सात घंटे उसके साथ बिताएगा और सप्ताह भर के एकाकीपन को दरकिनार कर देगा। वीणा से मिलने के कल वाले अनेक ख्याल उसके दिमाग में घूमने लगे थे, जिनकी गुदगुदाहट ,वह अपने हृदय में अभी भी महसूस कर रहा था। इस बार पूरे 7 दिन हो गए थे, उसे वीणा से बातें किए हुए… उससे मिले हुए…. विवाह के इन 12 वर्षों में इतनी लंबी संवादहीनता कभी नहीं हुई थी।
नीतीश ने बिस्तर पर बैठे-बैठे सिगरेट सुलगई। उसके मन में वीणा पुनः दस्तक देने लगी। उसने आहट ली…. पास के कमरे में आया कहानी सुना कर प्रियंका को सुला रही थी…. वीणा कहां है? बाथरूम का दरवाजा बंद देख कर उसे लगा कि वीणा अंदर है ।एक लंबा कश खींचकर उसने सिगरेट एश ट्रे में बुझाई और वह ड्राइंग रूम की ओर बढ़ा।
उसने टेबल पर रखे अखबार को उठाया। मुख्य पृष्ठ पर लोकल ट्रेन के एक्सीडेंट और घायलों के चित्र देखकर उसका मन खिन्न हो गया ।अखबार को टेबल पर रखा तभी उसका ध्यान पेपरवेट के नीचे रखे कागज पर चला गया, वह उसे पढ़ने लगा- “आज बहुत जरूरी मीटिंग है, इसलिए अवकाश होने पर भी जाना पड़ रहा है ,मुझे भी बहुत बुरा लग रहा है मगर मजबूरी है, खाना बना दिया है खा लीजिएगा।”
वह हाथ में कागज लिए चुपचाप खड़ा था। उसका चेहरा पीला पड़ गया था। वह मन ही मन महसूस कर रहा था कि एक ‘एक्सीडेंट ‘ उसके घर में भी हो गया है….. जिसमें वह लहूलुहान हो गया है, पर यह खबर कोई नहीं जान पाएगा।
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2-बेचारी तख्तियाँ
कार्यालय के उस कोने वाले कक्ष में जहां टूटी फूटी चीजें रखी जाती थी , वे वहीं रखी रहतीं।
आज उस कक्ष का ताला खुला हुआ था ,उन्हें बाहर निकाला गया और झाड़- पोंछ कर सभागार के चारों ओर लगा दिया गया।
कार्यक्रम शुरू होने में अभी समय था ।बड़े साहब व्यवस्था देखने वहां आए। अधिकारी उन्हें खुश करने के लिए बोला-“सर! महापुरुषों के मातृभाषा संबंधी उद् गारों से सजी इन तख्तियों के दीवार पर लगते ही सभागार खिल उठा।”बड़े साहब ने प्रशंसात्मक दृष्टि से उसे देखा और बोले-“यू आर वेरी स्मार्ट!”
कार्यक्रम संपन्न होते ही बड़े साहब ने उस अधिकारी से कहा -“इन तख्तियों को वहीं हिफाजत से रखवा देना… अगले 14 सितंबर को फिर उनकी जरूरत पड़ेगी।” अधिकारी ने तुरंत उनके आदेश का पालन किया ।उन्हें वहीं रखवा कर उस कक्ष का ताला लगवा दिया।
ऐसा लग रहा था कि उन्हें ‘ पैरोल ‘पर कुछ घंटों के लिए ही बाहर निकाला गया हो।
बेचारी तख्तियाँ!
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3-कर्मयोगी
मेले- फटे कपड़े… सांवला रंग… बगल में एक छोटा झोला और हाथ में बांसुरी लिए वह जैसे ही उस डब्बे में चढ़ा, एक युवक से टकरा गया।
“अंधे हो क्या? देख कर नहीं चल सकते!”
“भाई साहब! मुझे माफ कर दीजिए, मैं सूरदास हूं।जरा मुझे आगे पहुंचा दीजिए, भगवान आपका भला करेगा।”
उस आदमी ने तरस खाकर उसका हाथ पकड़ा और डब्बे के बीचो-बीच खड़ा कर दिया। उसने बांसुरी होठों पर लगाई और धुन निकालनी शुरू कर दी।
“चाहे जहां खड़े हो जाते हैं साले भीख मांगने के लिए।”
“अरे! यह बहुत ढोंगी होते हैं, मौका मिलते ही सामान लेकर भाग खड़े होते हैं!”
“इन लोगों की गैंग चलती है… सावधान रहना!”
उसके कानों में पड़ने वाले यह जुमले उसकी साधना को भंग नहीं कर पाए और वह तन्मयता से बांसुरी बजाता रहा।लोग मंत्रमुग्ध हो गए। जैसे ही बांसुरी के स्वर बंद हुए, लोग ‘ वाह-वाह ‘ करते हुए उसे पैसे देने लगे।
“बाबू साहब! मैं सूरदास हूं ,भिखारी नहीं! मैं तो बांसुरी बना -बना कर बेचता हूं।”
उसकी बात सुनकर सभी की आंखें फटी रह गई।
उसकी दो बांसुरी बिकीं।
चारों ओर घूम कर उसने हाथ जोड़े। गाड़ी रुकते ही वह उतरा और कर्म का पाठ पढ़ाने दूसरे डब्बे में चढ़ गया।
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4-भूत
कलेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए लाहोटी जी प्रतिदिन सैर पर जाया करते थे। आज उन्हें कुछ विलंब हो गया था, इसलिए पब्लिक स्कूल का प्रांगण बच्चों से भरा दिखाई दे रहा था। बच्चे कोट ,पेंट ,टाई पहने पंक्तिबद्ध होकर ‘प्रेयर’ गा रहे थे ।यही ‘प्रेयर’ बाल्यकाल में वह भी गाया करते थे ,वह उसे सुनकर झूम उठे।
झाड़ियों की खरखराहट से उनका ध्यान टूटा।… उनके सामने सिर पर हैट लगाए, हाथ में छड़ी लिए एक विचित्र विदेशी खड़ा था।
“कितने क्रूर हो तुम … बच्चे बोझ से दबे जा रहे हैं और तुम प्रसन्न हो रहे हो ! धिक्कार है तुम पर…! ”
उसकी बात सुनकर लहोटी जी क्रोध से तमतमा उठे।
” कौन हैं आप …?फिजूल की बातें किए जा रहे हैं !”यह कहकर वे आगे बढ़ गए।
वह बूढ़ा उनके पीछे चलता हुआ बड़बड़ाने लगा-” अंग्रेजीयत की स्थापना के लिए जो प्रयोग मैंने किया था ,उसे तुम लोगों ने सफल कर दिया। तुम भारतीय धन्य हो… तुमने मुझे अमर कर दिया… मैकाले अमर हो गया.. हा… हा… हा…!”
लाहोटी जी दांत पीसते हुए उसे मारने के लिए पीछे मुड़े।
वे हतप्रभ थे!… वहां कोई नहीं था, सिर्फ वे शब्द हवा में गूँज रहे थे।
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5-बड़े गिद्ध
बड़ के पेड़ के नीचे सिर झुकाकर बैठे हुए उन आदिवासियों के नामों की सूची एक कार्यकर्ता ने जैसे ही नेताजी के हाथ में रखी, उनके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव उभर आए।
उन स्त्री- पुरुषों के चेहरे उनके फटे हाल जीवन की कहानी कह रहे थे।
पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन उन्हें घेर रखा था ।नेता जी ने संबोधित कर कहने लगे- “आपके तन पर कपड़े हों ,आपको दोनों समय रोटी मिले ,आपके पसीने की एक-एक बूंद की कीमत सही तरीके से आंकी जाए, यही मेरा सपना है… अपने इस सपने को पूरा करने के लिए मैं इस बार फिर चुनाव में खड़ा हुआ हूं, मैं आपका सच्चा सेवक हूं… आप खूब खाएं -पिएं… मैंने सभी इंतजाम कर दिए हैं… कल चुनाव है …आप अपनी झोपड़ी में बैठे-बैठे मुझे आशीर्वाद दे दें …आपके मत मुझे प्राप्त हो जाएंगे!”
“चलो सब लोग ताली बजाओ।” कार्यकर्ताओं ने उन आदिवासियों को आदेश दिया।
अचानक “…सर… सर …”की आवाज से बड़ के पत्ते हिल उठे।… सभी ने देखा, एक गिद्ध घबराया हुआ बाहर निकला और उसने तेजी से उड़ान भर ली।
6-आत्मकथा
उनकी गिनती रसूखदार लोगों में होती थी। नगर के अनेक अनाथालय , वृद्धाश्रम और गंदी बस्ती के विद्यालय उनके आर्थिक सहयोग से चल रहे थे।
एक दिन उनके अंतरंग मित्र ने उन्हें राय दी-“आपने बीस-पच्चीस वर्षों में व्यवसाय और समाज में जो ऊंचाइयां हासिल की वह काबिले तारीफ हैं, मेरी इच्छा है कि आप भी दूसरे बड़े आदमियों के समान आत्मकथा लिखें ताकि आपके जीवन से अन्य भी प्रेरणा ले सकें।”उसी क्षण उन्होंने मन ही मन आत्मकथा लिखने का फैसला कर लिया।
बचपन में विद्यालय की कक्षा में सर के द्वारा पढ़ाई गई अनेक बातें उन्हें अब तक याद थीं। उनमें से एक बात उनके दिमाग में उस समय आ जाती, जब वे स्टडी रूम में आत्मकथा लिखने बैठते। आज भी ऐसा ही हुआ। कुर्सी पर बैठकर उन्होंने जैसे ही दो-तीन पंक्तियां लिखी कि सोच में डूब गए…. आज महसूस हो रहा है कि इतने कम समय में आदमी ईमानदारी से सिर्फ अपने परिवार का लालन पालन कर सकता है और अधिक से अधिक एक मकान बना सकता है… इतना बड़ा साम्राज्य नहीं खड़ा कर सकता! झूठ ,फरेब और भ्रष्टाचार का सहारा लेकर मैंने इतनी ऊंचाइयां हासिल की… मेरी सामाजिक सेवा के पीछे मेरी काली कमाई है! इस सोच के साथ उन्हें सर की वह बात याद आ गई …….’आत्मकथा व्यक्ति के जीवन का आईना होती है ,इसमें झूठ नहीं लिखा जाता ।’ इस कथन के याद आते ही वह व्यथित हो उठे।……….’ उफ! कितना मुश्किल होता है अपने आप से ,पूरी सच्चाई के साथ रू-ब-रू होना! पहले लगता था कि जीवन पुस्तक लायक है, फिर लगा कि कुछ पृष्ठ लायक और अब लग रहा है कि जीवन कुछ पैराग्राफ तक ही सिमट कर रह गया! ‘ उन्होंने तुरंत फैसला कर लिया- ‘बेहतर होगा कि जो छवि समाज में बनी हुई है उसी से संतोष लिया जाए!’
उन्होंने लिखे कागजों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उनकी आत्मकथा रद्दी की शक्ल में ‘डस्टबिन’ में पहुंच गई।
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