जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: September 1, 2022

कुलदीप जैन (03-01-1953 – 31-07-2022) की पुण्य स्मृति में

 1-शोषण-मुक्ति

पिता ने बीड़ी का आखिरी कश लेकर धुआँ निकालना चाहा, लेकिन वह बुझ चुकी थी। लिहाजा हाथ बढ़ाकर उन्होंने बीड़ी के टुकड़े को बेरहमी से मसल दिया और कुछ कहने का उपक्रम करने लगे। वह पिता की इस हरकत को बड़े गौर से देखता रहा। ‘‘लल्लू कह रहा था, तूने सिगरेट पीनी शुरू कर दी है।’’ इसके तुरंत बाद पिता तेजी से खाँसने लगते हैं।

‘‘पीनी शुरू कर दी है तो क्या हुआ, कमाता नहीं हूँ ।’’ उसके जी में आया कि वह पिता के सामने अगला-पिछला अभी तय कर ले। आखिर इस तरह टोकने की जरूरत क्या है। बड़े भाई से तो कुछ भी नहीं कह पाते, जो शराब, जुआ, गांजा, पता नहीं क्या-क्या ऐब करता है। खुद तो कुछ करता नहीं, उल्टा अपनी पत्नी के माध्यम से माँ-पिता को तरह-तरह से सताता है। उसके सामने पिताजी भीगी बिल्ली क्यों बन जाते हैं। आखिर वह नौकरी क्यों नहीं करना चाहता। वह पहले ही व्यापार में घाटा दे चुका है।

‘‘बेटे, तुम तो घर की हालत देख रहे हो। तुम खुद जिम्मेदार-समझदार हो। तेरे बड़े भाई से तो कुछ आशा नहीं। हम तुझे पीने-खाने को मना नहीं करते पर, ये यारी-दोस्ती बस पैसे की होती है। सब साले मतलब के याद हैं। कभी इन लोगो ने भी तुझ पर एक पैसा खर्च किया है। तू कब तक इन लोगों को सिनेमा दिखाएगा। आखिर तेरी जवान बहन भी बैठी है, उसके बारे में तेरे बड़े भाई ने तो जवाब दे दिया है।’’

उसके जी में आया कि वह पिता से चिल्लाकर कह दे-‘‘मैं तुम्हारी किसी बात में नहीं आने वाला। ये रोने-धोने वाले लटके अब मैं खूब पहचानता हूँ। बहन की शादी का बोझ अकेले मैं नहीं उठाऊँगा।’’

‘पिताजी’, वह धीरे से बोला और सोचने लगा कि वह अपने निर्णय की शुरूआत किन शब्दों से करे। पिता बोले,‘‘हाँ, तो तुम मेरे पास कुछ कहने आए थे।’’

‘‘मेरा ट्रांसफर हो गया है।’’ वह इतना ही कह पाता है। पिता उसके इस वाक्य से एकबारगी चौंक जाते हैं, लेकिन सोडा वाटर के उफान की तरह शान्त होकर खाट में लेट जाते हैं। वह इत्मीनान से उठा और गली में से होता सड़क पर आ गया। पान वाले की दुकान से एक सिगरेट लेकर उसने बेफिक्री का धुआँ उड़ाया और मन-ही-मन दोस्त को धन्यवाद दिया, जिसकी सलाह पर उसने अपना ट्रांसफर कराया था।

उसे खुद पर अचंभा हुआ कि उसने लगातार पाँच साल तक अपना शोषण क्यों होने दिया। ट्रांसफर वाली बात उसके दिमाग में इतनी देर से क्यों आई?

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2-विद्रोही मन

 

जब मैं उठने को हुआ तो वह बोले, ‘‘तुम आ जाते हो तो लगता है जैसे मेरा बेटा आ गया हो। मैं तुम दोनों में कोई भेद नहीं समझता। सुनील इतना निष्ठुर क्यों हो गया है रे। विदेश जाकर बाप को इस तरह भुला देना। शायद उसे मेरे बारे में गलतफहमी है।’’

‘‘नहीं ऐसा तो कोई बात नहीं चाचाजी, दरअसल वह इस देश में सर्विस करना ही नहीं चाहता।’’ मैं सरासर झूठ बोल रहा था।

‘‘हाँ बेटा, यहाँ तो नेता, समाज, सब कोई सपोले हो गए हैं।’’ यह कहते ही उन्होंने बीड़ी का जोर का कश लिया। तुरंत धुएँ के अंबार के साथ उनकी हंकार वाली खाँसी शुरू हो गई। मुँह लाल हो गया और आँख से पानी निकलने लगा, ‘‘चाचाजी, तुम इतनी बीड़ी मत पिया करो। एक तो फेफड़े पहले ही कमजोर हैं।’’

‘‘अरे बेटा, इस जिंदगी से तो मरे भले। पर ये मौत भी तो माँगे नहीं मिलती। अब तुमसे क्या-क्या छिपाऊँ। उस अस्पताल की डॉक्टरनी ने पूरे हजार माँगे थे हमल (कच्चा गर्भ) गिराने के। मैं तो रेणु की शादी के लिए भी तैयार था, पर लड़का साफ मुकर गया कि रेणु का उसके साथ कोई वास्ता नहीं है। बाद में मोहल्ले वालों ने एक स्वर से कहा कि मैंने ही बेटी को मारा है। मेरे उससे नाजायज संबंध थे।’’

‘‘ये दुनिया बड़ी जालिम है चाचाजी। रेणु को लेकर मुझ पर भी कीचड़ उछाली गई थी, तभी तो मैंने इस घर में आना बंद किया था।’’

तभी दरवाजे पर ठकठक हुई मैंने आँगन में जाकर बाहर के किवाड़ खोले। भरी-पूरी तंदुरुस्त जवान लड़की । रंग साँवला और कसकर गूँथी गई चोटी को उसने आगे की ओर डाला हुआ था। मुझे देखते ही उसने अपनी पीली चुन्नी को वक्षस्थल पर फैला दिया और बिना हिचक अंदर दाखिल हुई।

‘‘कल्लो, जरा दो कप चाय बना लाना?’’ मास्टर ने नमस्ते करने के बाद उसे आदेश दिया। कल्लो उसी क्षण रसोई में चली गई। मैंने देखा, चाचाजी की आँखों में कोई चमक साकार हो उठी थी। वह बोले, ‘‘इसकी माँ भी चौका बरतन करती है। उसका आदमी नंबर एक जुआरी और शराबी है। उसने चार सौ रुपये में किसी आवारा आदमी के साथ बाँध दिया। उसके पहले ही एक बीवी थी। उसने कल्लो से धंधा कराना शुरू  कर दिया तो ये अपने माँ-बाप के पास भाग आई। अब इसके पास एक बच्चा है।’’ यह सब कहते-कहते उनकी धौंकनी चलने लगी थी। कुछ क्षण रुककर वह बोले,‘‘बेचारी बेसहारा है। आजकल मैं इसे पढ़ाने भी लगा हूँ । कुछ सीख लेगी तो अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी।’’

चाय पीकर मैं उठा तो चाचाजी मुझे दरवाजे तक छोड़ने आए और मेरे नमस्कार कहने पर सिर हिलाकर बोले, ‘‘आते रहा करो अजय।’’ तभी मैंने धड़ाक से दरवाजा बंद होने की आवाज सुनी।

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3-हादसे के बीच

 

स्टोव से महिला के जल जाने की खबर चिरांध की तरह पूरे मोहल्ले में फैल गई थी। दो बच्चों की माँ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया था। उस समय उसका पति स्कूल में था। जब वह लौटा तो पुलिस पूछताछ कर रही थी। पुलिस की छेड़छाड़ से वह इतना आतंकित हो गया कि चिल्ला पड़ा, ‘‘तुम्हें जो कुछ करना है करो, पर मेरी औरत की मिट्टी दिला दो।’’

पड़ोस की औरतें उन बच्चों के प्रति अपने बच्चों से अधिक लाड़ जता रही थीं।

‘‘बरबाद हो गया घर बेचारे का। च-च-च!’’

‘‘पिछले साल ही मास्टर का जवान लड़का पुलिस की गोली से मरा था, शहर की हड़ताल में।’’

‘‘भगवान दुखी को और दुख देता है। ये मरे स्टोव तो जानलेवा हैं। इनको घर में रखना मौत को बुलावा देना है।’’

‘‘हाँ बहन, तू ठीक कहती है’’, एक बड़ी-बूढ़ी ने उसकी बात का समर्थन किया। इस प्रकार स्टोव की भयंकरता की कहानी हर औरत ने अपने ढंग से सुनाई।

शाम को भी ये औरतें अपने पतियों के सामने मास्टर की पत्नी की दर्दनाक मौत के किस्से बयान कर रही थीं।

‘‘भगवान ऐसी मौत किसी को न दे। बेचारी मास्टरनी तो हर शुक्रवार का व्रत रखती थी, किसी से न लड़ना,न झगड़ना….मरा ये स्टोव तो किसी का नहीं….ऐजी, कल इसका बर्नर बदलवा देना….यह कहकर वह स्टोव में तेजी से पंप मारने लगी।

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4-धंधा पानी

 

जब कर्फ्यू में दो घंटे की ढील दी गई तो गली-मोहल्लों में जादू भरी चहल-पहल शुरू हो गई। लोग पुलिस और सेना की उपस्थिति को नजरअंदाज करते हुए खरीद-फरोख्त कर रहे थे। दूकानदार मनमाने दाम वसूल कर रहे थे। यहाँ तक कि पुलिस वाले भी बढ़े हुए दाम देकर बीड़ी-सिगरेट खरीद रहे थे।

एक पुलिस वाला दूसरे से कह रहा था, ‘‘यार, इन आठ दिनों में मैंने ढाई हजार रुपया कमा लिया। काम बस इतना ही था कि अगर किसी ने सौ ग्राम दूध या बीड़ी का बंडल भी मँगवाना चाहा ,तो मैं हर फेरे में पाँच या दस रुपये वसूल कर लेता था।’’ ‘‘बस पाँच रुपये ही’’, दूसरे सिपाही ने आश्चर्य  से कहा, ‘‘मैंने तो अब तक छह हजार रुपये कमाए हैं। मैं तो अमीरों की कोठियों और पॉश कालोनियों में जाता था। वे लोग शराब आदि मँगवाते थे। मैं हर फेरे के सौ रुपये झाड़ लेता। भगवान ऐसे कर्फ्यू बार-बार लगवाए।’’

उनकी बातचीत को एक मिलिटरी मैन बड़े ध्यान से सुन रहा था। वह बोला, ‘‘दोस्तों, हस्तक्षेप के लिए माफी चाहता हूँ। तुमने जो ये कमाई की है, उसे उन गरीब-मजदूरों को बाँट देना, जिसके यहाँ दो जून का खाना मुश्किल से बनता है।’’

उन दोनों सिपाहियों ने मिलिटरी मैन को ऐसा देखा, जैसे वह कोई गुंडा हो।

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5-नैतिक

            वह अत्यन्त कठिनाई से उठी और फटी-फटी आँखों से कभी अपने फटे हुए कपड़े और कभी अपने टूटे हुए बदन की कसक पर आह भरती।

            घर जाने की अपेक्षा उसने नदी में छलांग लगाकर आत्म-हत्या करना बेहतर समझा। नदी की ओर जाते-जाते उसे ख्याल आया कि वह अपने घर की सबसे खूबसूरत व प्यारी बेटी थी। उसकी किसी भी इच्छा को तुरन्त पूरा किया जाता।

            अब वह पुल पर खड़ी हुई थी। छलांग लगाने से पहले उसे यह सोचकर आश्चर्य हुआ कि जिसे वह प्यार करती थी, आखिर उसे बलात्कार करने की क्या जरूरत थी? वह एक बार तो कहता, अपना सब कुछ उसे सौंप देती; पर राजन ऐसा क्रूर निकलेगा, वह सोच भी नहीं सकती थी।

‘‘कौन है, कौन है?’’ एक करारी आवाज उभरी तो वह सहम गई। उसने देखा एक बंदूकधारी सिपाही उसकी ओर बढ़ रहा था। वह भाग भी नहीं सकती थी।

            जब उसने सिपाही को बताया कि उसके क्लासफेलो ने उसकी इज्जत लूट ली है और वह उससे बदला लेना चाहती है, तो सिपाही ने उसके आगे एक प्रस्ताव रखा, ‘‘देखो, मैं तुम्हारे उसको गोली से उड़ा सकता हूँ ;लेकिन….’’

            जब वह निबट चुका, तो वह अपने को सम्भालते हुए बोली, ‘‘मैं घर जा रही हूँ। तुम राजन से कुछ मत कहना, मैं ही उससे निबट लूँगी।’’

इन पन्द्रह सालों में उसने पहली बार ऐसी खुशी महसूस की थी।

तभी उसने नदी में धड़ाम की एक जोरदार आवाज सुनी और घबराकर चैक पोस्ट सैल से बाहर भागा

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6-अवमूल्यन

            पटरी पर सस्ता माल बेचने वालों ने चादरें, टाट या तिरपाल बिछा कर बनियान, बटुओं व प्लास्टिक सामान के ढेर लगाए हुए थे। मध्यम परिवारों के लोग उनके ठीये को चारों ओर से घेरे हुए थे। दुकानदार बीस रुपये देने की बात कहता। काफी हील-हुज्जत के बाद दुकानदार कहता-‘‘बोहनी का टाइम है बाबू, अच्छा लाओ जल्दी करो और भी ग्राहक है।’’

            वह काफी देर से एक तरफ खड़ा इस तरह की खरीददारी देख रहा था। उसने जेब टटोली तो कुल आठ रुपये निकले। वह प्रेमिका के लिए वैनिटी बैग खरीदना चाहता था। उस औरत ने जिस वैनिटी बैग को पसंद किया, दुकानदार ने उसका मूल्य तेरह रुपये बताया, पर महिला पाँच रुपए से ज्यादा देने को तैयार न थी और दुकारदार आठ रुपये पर आकर ठहर गया था।

            कुछ निश्चय करके वह आगे बढ़ा और उसी पिंक-ग्रे कलर के वैनिटी बैग को उँगली में नचाते हुए सोचने लगा-प्रेमिका इसे पाकर कितनी खुश होगी। उसने भी दो बार उसे कीमती पेन और अपने भाई से जो डायरी ली थी, उसे ‘सुधा लव राजेश’ के रिमार्क के साथ दी थी।

            ‘‘हाँ भई ये वैनिटी सात रुपये का दोगे?’’

            दुकानदार ने एक मरगिल्ले से युवक को देखा, जिसके गाल पिचके हुए थे। कपड़े भी साधारण थे। ‘‘नहीं बाबूजी बारह रुपये से एक पैसा कम नहीं है। लेना हो तो लो….। और हिकारत से उसे देखते हुए दूसर ग्राहक से बातचीत करने लगा।

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7-कूटनीति

            बूढ़ी साँपनी अपनी युवा फुँकार लिये जवान बेटी को  हिदायत देती रहती कि वह उसे मदारी की बीन पर बेचैन न हुआ करे, जिनमें से बेसिर-पैर की आवाजें निकलती रहती है। बेटी को आश्चर्य था कि माँ को बीन की मादक तान क्यों नहीं सुनाई देती। जिसकी बीन ही इतनी मादक है, वह खुद कितना रसीला होगा-वह सोचा करती।

            बूढ़ी को वह नहीं मालूम था कि उसकी बेटी न केवल मदारी के गले में कई बार लिपटकर अठेखेलियाँ कर चुकी थी बल्कि उसकी पिटारी में जाकर रह भी आई थी। वह अक्सर माँ की इस बात पर खौल जाती कि उसे बांबी में ही रहना चाहिए।

            परेशान होकर बूढ़ी ने मदारी को मजा चखाने का निश्चय किया। एक दिन जब उसकी बेटी का दीवाना प्रेमी मीठी नींद में सोया हुआ था, उस बुजुर्ग साँपनी ने एक ही झटके में अपना तीखा दंश उसके  शरीर  में उतार दिया। बेचारा मदारी गहरी नींद में सोया रह गया।

            जब  साँपनी की बेटी को पता चला तो वह किसी तरह दौड़ी और अपने महबूब के नीले पड़ते शरीर का जहर चूसना शुरू  कर दिया। वह तब तक ऐसा करती रही, जब तक कि उस मदारी को होश नहीं आ गया।

            मदारी ने देखा कि बफादार साँपनी उसे पैरों में लेटी हुई फन से मक्खियाँ उड़ा रही थी। वह चिल्लाया-‘‘तू मुझे मार डालने का कुचक्र रच रही थी, तुरन्त दफा हो जा।’’

            जब युवा साँपनी मरी हुई गति से अपनी बांबी पहुँची तो बूढ़ी ने कहा-‘‘मैं कहती थी न, ये मदारी किसी के सगे नहीं होते। और जान छिड़क इन पर! मैं तुझे उसकी पिटारी से रहने को मना नहीं करती पर तू अपना हश्र देख ले, क्या हो गया!’’

            यह कहते ही उसने अपनी बदहवास बेटी को पुचकारना शुरू कर दिया।

(अलाव फूँकते हुए से साभार)

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