1-आदमी का दर्द
धन्नो को याद आता है, ऐसा ही कुछ साल पहले भी हुआ था। रंग-बिरंगे झण्डे, ढेर सारे रिक्शे, जीपें और कारें! ऐलान करती, सरपट भागती। माइको से बतियाते, चीखते-चिंघाड़ते लोग।
‘‘अम्मा तुम वोट डालने जाओगी?’’ नन्हा गिट्ट् तालियाँ बजाकर माँ से पूछ बैठा।
धन्नो खोई-सी स्मृत निगाहों से बेटे को ताकती है। आँखें कहीं गहरे में डूबती है और चेहरे पर भीतर की जमी पीड़ा बाहर आती है…हाँ, ठीक ऐसा ही मौसम था, गाड़ी-पर्चे।…झण्डों पर दर्द फैला था।….गिट्ट् के पिता बिस्तर में थे, बीमार।….सरकारी अस्पताल का लाल पानी, दिया था एक पर्चा, ‘बाजार खरीद लेना।’ दवा की सूची दी थी डॉक्टर ने। पैसे? आते कहाँ से?..और गिट्ट् का बाप चल बसा।
फिर भी धन्नो गई थी वोट डालने।-सरकार बदलने के बाद की बात के लिए। वे जो पर्चों में लिखी थी-उसने सुनी थीं। माइक पर मोहल्ले की भीड़ के सामने बोलने वाला वह आदमी।…गरीबों का हमदर्द।….
गिट्ट् के रोने से ध्यान टूटता है। भूख…दिन भर की कमाई शाम के लिए पूरती नहीं और रात के बाद सुबह होती जरूर है। हाँ, भूख के एहसास के लिए सुख के लिए?
खचपचाई देहरी पर वह किसी बैनर की तरह खड़ी होती है। कच्ची खपरैलों की टूटन उधड़ी दीवालों की सारी दरारें उसकी देहरी पर फैल जाती हैं ।
उसकी आँखें स्थिर हैं-एक खौफ और फैसले के साथ। झटके से वह देहरी से गली में पहुँचती है। वह पालिका स्कूल की ओर रुख करती है। सदैव, वही स्कूल मतदान केन्द्र रहा है।
-0-
2-पेंशन
लम्बी-लम्बी साँसें भरती हाँफती हुई वह जमीन पर बैठ गई। पतला-दुबला शरीर, आँखें अन्दर को धँसी हुई, हाथों की उभरी हुई नसें। शरीर की सिकुड़ी त्वचा ऐसे, जैसे खींचकर अस्थिपंजर पर चढ़ाई गई हो। मैली चीकट धोती जो शायद कभी सफेद रही होगी, जगह-जगह से फटी हुई थी।
थोड़ा सुस्ताने के पश्चात् वृद्धा ने तार-तार साड़ी के पल्लू से चेहरे पर चुहचुहाए पसीने को पोंछा।
‘‘बाबू, हमार पेन्सन बना देव?, भूखन मरे की नौबत आय गई है। एक लड़िका रहै, वा बहुरिया का लैके अलग हुई गवा है, इहै पेन्सन हमार सहारा है।’’
कहकर उसने अपनी पनीली आँखों को पोंछा और स्वतः बढ़बड़ाने लगी है-‘‘भगवान, तु हमका ई कौन से दिन दिखाय रहा है? हमरे मरद के साथ तू हमहूँ का उठाय लेत तो अच्छा रहे।’’
‘‘तुम्हारे कागज पूरे नहीं हैं, कुछ कमी है।’’ बाबू ने कहा।
‘‘ई कमी कब पूरी हुईहै? हमका एक बरस हुई गवा दौड़त-दौड़त।’’
‘‘एक महने बाद आओ तब तक काम हो जाएगा।’’
वृद्धा बड़बड़ाती हुई वापस चली गई।
आज एक जवान विधवा बाबू के पास आई है। उम्र यही उन्नीस बीस वर्ष। तीखे नैन-नक्श। सलीके से बांधी गई सूती साड़ी, मोटी-मोटी गहरी आँखें, दर्द और अवसाद से भरी। एक ऐसा ठहराव उन आँखों में है, जो सौन्दर्यबोध के स्थान पर दहशत उत्पन्न करता है।
‘‘मेरी पेंशन कब तक फाइनल कर देंगे, मेरी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है। अगर आप जल्दी पेंशन फाइनल कर दे तो बड़ी कृपा होगी।’’
‘‘यही कोई पन्द्रह-बीस दिन बाद पता कर लें।’’ बाबू ने कहा। मैंने देखा लड़की की आँखों में तड़पकर एक सर्द लहर गुजरी, जिसने बीस आँखों में चार गुना उम्र जोड़ दी।
दुबारा आने के लिए कहकर लड़की चली गई।
मैंने पूछा, ‘‘इस लड़की की पेंशन कब तक फाइनल करोंगे?’’
‘‘इस लड़की की पेंशन आराम से फाइनल करूँगा, इसके आने से जरा रौनक आ जाती है।’’
‘‘और उस वृद्धा की पेंशन जो अभी-अभी गई है?’’
‘‘उसकी…यार! उसके पेपर्स अभी मैंने देखे ही कहाँ है।’’
कहकर हँसता हुआ वह बाहर चला गया।
-0-
3-पराया दर्द
‘‘आज आप फिर लेट हैं! समय से ऑफिस नहीं आ सकती हैं तो नौकरी क्यों करती हैं? समय से आ सकती हों तो बताएं!’’
‘‘सर, मेरा बच्चा बीमार हो गया था!’’
दयनीय होकर सुप्रीता ने कहा। उसकी आँखों में बीमार, बुखार में तपता टिंकू का चेहरा घूम गया!
‘‘रोज-रोज बच्चा बीमार होता है…इस तरह के बहाने बनाना छोड़ दीजिए या नौकरी!’’
घर जाकर देखा-धन्नो दुपहर का काम करने नहीं आई थी। रिंकू को दवा देकर सुप्रीता घर के काम में जुट गई।
अगले दिन काँपते हुए धन्नो ने प्रवेश किया। सोचने लगी, मालकिन निकाल कर ही दम लेगी।
अवाक् रह गई धन्नो, मालकिन के चेहरे पर गुस्से का नामोनिशान नहीं था…..साहस जुटाकर बोली, ‘‘मालकिन, मेरा बच्चा बहुत बीमार है।’’
‘‘फिर तू आज क्यों आई है? यह ले कुछ रुपए। उसका अच्छी तरह इलाज करवाना। जब पूरी तरह बच्चा ठीक हो जाए, तब काम पर आना। मैं दूसरी नौकरानी नहीं रखूँगी।’’
प्यार से कहा सुप्रीता ने!
धन्नो कुछ समझ नहीं पाई। विचित्र निगाहों से मालकिन और हाथ में आए रुपयों को देखने लगी!
-0-
4-पहला कदम
उन्होंने नया-नया रीजनल डायरेक्टर का पद सँभाला था। नई उम्र का हकीकत में नया-नया जोश! आदर्श सिर चढ़कर बोलता हुआ! किताबों में पढ़ा सब कुछ उतारने को प्रतिबद्ध इच्छाएँ!
शराब पीकर तिवारी ने उनके चेम्बर में प्रवेश किया। हतप्रभ रह गए थे! दफ्तर में शराब पीना, जिस पर अफसर के चेम्बर में आकर गाली-गलौज, वह भी इसलिए कि दफ्तर देरी से आने के लिए तिवारी को ‘मीमो’ दिया गया था उनके हस्ताक्षर से!
सामने चमकते काले फोन के चोंगे को उठाया उन्होंने और तिवारी के विरूद्ध पुलिस में एफ0आई0आर0 लॉज करवा दिया।
चपरासी को बुलाकर तिवारी को चेम्बर से बाहर निकलवा कर चैन की सांस ली उन्होंने । एक बुराई को जड़ से हटाया। अब तिवारी कभी नहीं जुर्रत करेगा शराब पीकर दफ्तर आने की ओर हंगामा करने की!
कुछ दिनों बाद उन्हें कचहरी से सम्मन प्राप्त हुआ, कृपया अमुक दिनांक को कचहरी में उपस्थित हों। उन पर चार्ज था कि उन्होंने तिवारी को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया है।
डॉक्टरी रिपोर्ट के अनुसार तिवारी ‘उस दिन शराब नहीं पिए था!
-0-
5-कंगन
नैन्सी और वीना सरकारी दफ्तर में कई सालों से काम कर रही हैं। पिछले कई सालों से प्रतीक्षा की जाती है कि बोनस मिले तो दोनों सहेलियाँ एक साथ-साथ के जड़ाऊ कंगन लें, लेकिन हर साल कोई न कोई आवश्यक खर्च आ पड़ता और कंगन रह जाते। इस वर्ष वीना ने कहा,- नैन्सी, जो भी हो, इस बोनस में कंगन जरूर लिए जाएँगे, पिछले साल तुमने अपनी बहन की फीस भर दी थी, मैंने अपनी सास को दाँतों का सेट लगवा दिया था। कितने सालों से कंगन नहीं बन पा रहे हैं।
कड़े की मोहक डिजाइन और कल्पना में खोते हुए नैन्सी ने कहा-हाँ वीना, हम कंगन जरूर लेंगे , इस बार मैं स्वयं को , कंगन लेकर अवश्य दूँगी। मुझे स्वयं पर तरस आने लगता है, इच्छाओं को मारने की भी हद होती है।
तय हुआ कि कंगन दीपावली से पहले ले लिए जाएं।
काशी ज्वैलर्स की दुकान पर बहुत से कंगन देखे गए, लेकिन जो पसन्द आता, पहुँच से बाहर होता, जो बोनस के रुपयों में आ सकता, पसंद नहीं आता।
खीझकर दोनों दुकान से बाहर आ गई। वीना ने भेलपूरी खरीदी और नैन्सी के हाथ में थमाती हुई बोली-नैन्सी, तुम कह रही थी, तुम्हें किंचन में ‘लिण्टर’ डलवाना है!
-हाँ! और तुम कह रही थी कि छोटे भाई को कोई प्रोफेशनल कोर्स करवाना है। ऐसा करते हैें, मैं ‘लिण्टर डलवा देती हूँ, तुम भाई की फीस दे दो….कंगन, ‘आर्टीफिशियल’ ले लेते हैं, असली जैसे ही तो लगते हैं, लेकर-लॉकर में रखने से क्या फायदा।
एक थकी-हारी, गुमसुम निगाह से दोनों ने एक दूसरे को देखा और ठहाका लगाकर भेलपूरी खाने लगीं।