अनिल मकरिया
1- ऑनर किलिंग

भालचंद्र मिश्रा और सैयद शब्बीर ने आज वे दोनों वृक्ष कटवा दिए; क्योंकि वे पेड़ अब सरहदें तोड़ने लगे थे ।
मिश्राजी और सैयद साहब के आँगन में लगे वृक्षों की डालियाँ जब भी दीवार रूपी साझा सरहद को पार करने लगतीं, तो दोनों घरों में से किसी एक घर से जोर की आवाज आती ।
“अपने झाड़ को सँभालो! उसके पत्ते हमारे आंगन में नही गिरने चाहिए।”
उस आवाज के तत्काल प्रभाव से वृक्ष का मालिक अपने पेड़ की दोषी डालियाँ छाँट डालता।
दोनों वृक्षों में से किसी का भी फल दीवार के उस तरफ न गिरा, न गिरने दिया गया, फिर भी गाहे-बगाहे दोनों वृक्षों की डालियाँ गलबहियाँ करने को तैयार हो ही जातीं, लेकिन अब तो प्यार की पींगे बढ़ाने वाले वे दोनों वृक्ष रहे ही नहीं !
रह गयी है, तो बस जमीन के नीचे न दिखने वाली आपस में गुँथी हुई उनकी जड़ें ।
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2- नमक ,मिर्च और शक्कर
मैं लोगों की बेस्वाद-सी जिंदगी में स्वाद घोलता हूँ। छोटी-सी कढ़ाई में छनछनाती पानी और तेल की बूँदों में मैने अदरक और लहसुन का पेस्ट झोंका ही था कि, “मिस्टर और मिसेज बत्रा का आर्डर है… हमेशा की तरह तीखा कम और नमक बिलकुल… नहीं !” ‘नहीं’ शब्द को चबाता हुआ वेटर आर्डर की पर्ची टेबल पिन में खोंसकर बोला।
बुढ़ापे में पति-पत्नी के रिश्ते में अगर नमक बढ़ जाता है, तो शरीर के नमक का संतुलन बनाये रखने के लिए खाने में से नमक को कम करना पड़ता है।
और तीखापन !
वह तो शादी के कुछ सालों बाद ही इतना बढ़ जाता है कि खाने में तीखापन सिर्फ आपसी नोकझोंक जितना ही लिया जाता है ।
“मिस्टर और मिसेज बत्रा का आर्डर तैयार है ।” मैं अगले आर्डर की तैयारी करता हुआ बोला ।
“तेरे को मालूम है ?…वेटरों में होड़ लगी रहती है, बत्रा दंपती को अपनी टेबल की ओर आकर्षित करके सर्व करने की !” मेरा सहकर्मी सब्जियाँ काटते हुए मुझे बताने लगा।
कई बार केवल भाप सूँघकर पता लगाया जा सकता है कि डिश में नमक और मिर्च का प्रमाण सही है अथवा नहीं ?
मैंने अपनी नाक शोरबे से निकलती हुई भाप की ओर स्थिर करके जोर की साँस लेते हुए पूछा, “क्यों ?”
“शायद वे बुजुर्ग दंपती बेहद पैसेवाले हैं… जब भी तेरी बनाई हुई डिश खाते हैं, तो वेटर को हजार रूपये टिप देकर ही जाते हैं।”
यह बताकर सहकर्मी मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने के लिए मेरी ओर देखने लगा।
“कभी ये दोनों इस जगमगाते शहर के नामी वकील थे और चाहते थे कि इनकी इकलौती औलाद भी इनके ही नक्शेकदम पर चले; लेकिन, इनके इसी जुनून की वजह से इनकी संतान ने घर छोड़ दिया।” मैंने भी उसके मन में छिपी जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश की ।
“तो अब इस कहानी में यह तीन सितारा होटल और हजार रुपये की टिप कहाँ फिट बैठते हैं ?”
मेरे इस सहकर्मी की एक कमजोरी थी कि वह पकने से पहले ही किसी भी व्यंजन के स्वाद का अंदाजा लगाने की कोशिश करने लगता था।
कभी-कभी नमक और तीखेपन का संतुलन बनाने के लिए शक्कर की जरूरत पड़ती है । मिस्टर और मिसेज बत्रा की जिंदगी से शक्कर गायब थी ।
“इनकी इकलौती औलाद मैं ही हूँ ।”
मैंने शोरबे में कुछ दाने शक्कर के डाल दिए।
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3- पशु आचरण
नज़र खुले हुए अख़बार के पार गई ।
एक नर श्वान काम के वशीभूत होकर मादा श्वान के पास आया।
मादा की गंध उसके नथुनों से टकराई , तनिक किंकयाता वह मादा से दूर हो गया ।
नज़र अब पुन: अखबार की सुर्खी पर टिक गई ।
‘गर्भवती के साथ सामूहिक बलात्कार ।’
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4- आसान शिकार
मुझे कुत्तों से डर लगता था; किंतु जब से मुझे पता चला कि कुत्ते डर को सूँघ लेते है और उसी पर हमला करते हैं, जो उनसे डरता है।
तब से मैं कुत्तों से भागने की अपेक्षा अपने डर को वश में करके निर्भय होकर उनके सामने खड़ी रहती थी।
मेरी निर्भयता को देखकर कुछ ही पलों में खूँखार कुत्ते दाएँ-बाएँ हो जाते।
मुझे लगने लगा था कि अब हम इन कुत्तों से सुरक्षित हो गए हैं; लेकिन यह मेरा वहम था और जिस दिन इस खबर पर नज़र पड़ी वह भी टूट गया ।
‘छह साल की बच्ची के साथ बलात्कार।’
कुत्तों ने अपनी प्रवृति नही शिकार बदल दिया है ।
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5- त्रिकालदर्शी
उसमें अद्भुत क्षमता थी। किसी का भी चहेरा देखकर वह अपनी डायरी उठाता और उसके बीते हुए कल की हुबहू तस्वीर शब्दों में उकेर देता लेकिन वह आज तक अपने काली नोक वाले नश्तर से सफ़ेद भविष्य का पर्दा नहीं फाड़ पाया था।
केवल काला भूतकाल ही डायरी के उजले पन्नों पर उकेर पाता था।
कई लोग अपना या अपनों का भूतकाल जानने उसके पास आते या फिर उनका जिनके स्याह पन्नों को जानने की ख़्वाहिश उनके दिलो-दिमाग में कुलबुलाया करती थी।
बस यही अद्भुत विद्या ही उसकी उजरत का साधन थी। वह रोज सैंकड़ों लोगों का भूतकाल अपनी ऐनक के पीछे की दो आँखों से देखता और निःशब्द डायरी पर उकेर देता। फ़रियादी पढ़ता और कुछ पैसे छोड़कर चला जाता ।
सफ़ेद साड़ी में लिपटी अधेड़ महिला के साथ एक सात-आठ साल की बच्ची थी, जिसके भूतकाल में वह झाँक रहा था। काली नोक वाली कलम चली और रुक गई।
“बाबा इसका माज़ी मैं जानती हूँ , मुझे पढ़ने की ज़रूरत नहीं। इसके दिल में छेद है और डॉक्टर इसकी शल्यक्रिया के लिए छह लाख माँग रहा है।”
माई बोलते-बोलते रुक गई और वह अपनी ऐनक के पीछे कुछ नमी महसूस कर रहा था।
“…..मुझे तो इसका भविष्य जानना है कि यह बिना शल्यक्रिया और कितना वक्त जी सकती है ? क्योंकि यह किसी डॉक्टर को नहीं पता।”
माई की आँखें बरसने को बेकरार थीं ।
उसने अपनी डायरी उठाई। हर बार की तरह तीक्ष्ण नोक फिर सफ़ेद सीने को चाक़ करने की खातिर उठी; पर अब काली नोक को नश्तर की तरह इस्तेमाल करने वाले के हाथ काँप रहे थे ।
काली नोक क्षीरसागर में शेषनाग के मानिंद सर्पिल आकृतियाँ गढ़ रही थी। कुछ पलों के गुज़रने के बाद काँपते हाथ थम गए।
कलम खुली हुई डायरी के पास जा बैठी, जिस पर अभी-अभी उसने कुछ शब्द उकेरे थे।
काँपते हाथों ने चश्मा उतारा और उसे भी वहीं पटक दिया। माई ने गर्दन उठाई और उस डायरी पर लिखे शब्दों को पढ़ने लगी-‘तेरी बच्ची अपनी पूरी ज़िंदगी जिएगी। मैं जाने हुए भूतकाल से अर्जित किया हुआ धन, इसके आने वाले अनजाने भविष्य के लिए दे रहा हूँ।’
उसकी नम आँखे निर्लिप्त भाव से मुस्कुराती हुई उस बच्ची पर टिक गईं ।
अब वह भविष्य देख रहा था।
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6- जन्नतनशीं
मृत्यु की घोड़ागाड़ी धर्मयुद्ध में शहीद हुए विभिन्न धर्मों के जवानों की आत्माएँ लिये नियत स्थान की ओर चल पड़ीं ।
जन्नतनशीं होने की उम्मीद में आत्माएँ बेहद खुश थी ।
एक चौराहे पर गाड़ी रुकी और घोड़े विपरीत दिशाओं की ओर मुँह करके गाड़ी को खींचने लगे और बोलने लगे ।
“स्वर्ग”
“जन्नत”
“हेवन”
यह देखकर एक आत्मा ने मृत्यु से सवाल किया “क्या इन्हें सही रास्ता नहीं पता या फिर यह घोड़े मंजिल को लेकर एकमत नहीं हैं?”
मृत्यु ने रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया ।
“यह घोड़े भी धर्मयुद्ध में ही मारे गए थे।”
7- निर्मम भिक्षुक
वह रोज मेरे घर की चौखट पर आता और मेरी जिंदगी का एक दिवस ले जाता। कभी मैं उसे खुशी-खुशी अपना दिवस भेंट कर देता तो कभी दिवस को विदा करते हुए मेरी आँखों से आँसू बह निकलते। शाम को सूरज डूबते ही वह दिवस ले जाने मेरे दरवाजे पर आ खड़ा हुआ लेकिन आज पहलीबार वह उदास दिखा।
“अब तक तो तुम्हें भावहीन व निर्लिप्त ही देखा है फिर आज तुम्हारे चेहरे पर यह उदासी कैसी?”
मैंने कभी उसे सुना नहीं था, लेकिन आज जरूर उसे सुनना चाहता था।
“एक छोटा-सा परिवार था, जिसका मुखिया दिनभर काम करके भी अपना दिवस हमेशा हर्षोल्लास के साथ मुझे भेंट कर देता। उसकी पत्नी अपने छोटे बच्चों और गृहस्थी में वक्त खपाकर भी अपने बच्चों के लिए लम्बी आयु का आशीर्वाद माँगती हुई, मुझे अपना दिवस सौंप देती थी; लेकिन आज जब मैं उनके घर पहुँचा तो उनका घर जला हुआ था और वे मर चुके थे… बिना मुझे अपनी जिंदगी के बाकी दिवस सौंपे… !” उसका गला रुँध गया।
“… सुना है कि किसी दंगे की आग में जल गए।” उसने मेरे चेहरे की ओर देखा।
“किस धर्म या मज़हब के थे?” मैंने उससे पूछ ही लिया।
“घोंसला था चिड़िया का !… मुझे कभी इंसानों की मौत पर दुखी होते हुए देखा है?” हमेशा की तरह निर्लिप्त व भावहीन चेहरे से मेरा दिवस उठाकर वह चला गया। पहलीबार मुझे इंसानों के प्रति उसकी निर्ममता का अहसास हुआ।
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8- सोपान
याद है मुझे !
मैं अपने घर के आँगन में कंचे खेल रहा था और माँ हरबार की तरह घूँघट ओढ़े गुनगुनाते हुए बाजरा साफ कर रही थी और तभी पहलीबार मैंने उनकी गुनगुनाहट को ध्यान से सुनने की कोशिश की थी ।
“अरे… संसार संसार
जैसे तवा चूल्हे पर,
लगते हाथ को चटके
तब मिलती भाकर …”
यक़ीनन यह मेरे गाँव का कोई लोकगीत तो नहीं है और न ही गाँव के किसी स्कूल की किताब की कोई कविता जिसे बच्चे अमूमन गाते रहते हैं !
किसी कविता की किताब से पढ़े होने का भी कोई सवाल ही नहीं था; क्योंकि मेरे परिवार में उस समय तक मेरे अलावा सभी अनपढ़ ही थे । और …और मैं भी तो सातवीं कक्षा में था- मतलब तभी ढंग से लिखना-पढ़ना सीखा भर ही था । अब मैं हरबार अपनी माँ के घूँघट से आती गुनगुनाहट या महिलाओं के बीच बोली गई माँ की कविताओं को एक बही में दर्ज करने लगा । अपनी उम्र के पचास साल पार करने के चंद महीने पहले ही जब मैंने वह कविताएँ अपने गुरु को दिखाई, तो उनकी प्रतिक्रिया सुनकर मैं अवाक रह गया ।
“सोपान… यह कविताएँ नहीं, बल्कि ख़ालिस सोना है और तुमने इन्हें सालों तक लोगों से छिपाकर एक गुनाह ही किया है ।”
वाकई ! लोगों का ही नहीं बल्कि अपनी माँ का भी गुनाहगार ही था मैं… मृत्यु शय्या पर थी मेरी माँ, जब मैं उन्हें उनकी कविताओं के राज्यभर में प्रसिद्ध होने की खबर सुना रहा था और उनकी आँखों से खुशी के आँसू झर-झर बहे जा रहे थे ।
“माँ ! काश की तुम पढ़ी-लिखी होती … तो …तो बड़ी होकर तुम क्या बनती ?” मुझे नहीं सूझ रहा था कि माँ की उपलब्धि पर हुए गर्व का बखान कैसे करूँ ?
“एक कवयित्री !… जैसी अभी मैं हूँ, तुम्हारी वजह से… तुम्हारे शिक्षित होने की वजह से !”
अंतिम समय में मेरी माँ के चेहरे पर दर्द की लकीरें नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का तेज था ।
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9- रचयिता का धर्म
एक शिशु ने जन्म लेते ही देखा कि दसियों दानवाकार आकृतियाँ नवजात बच्चों के दिमाग में भावनाएँ भर रही हैं ।
उसने तुरंत रचयिता से सवाल किया ।
“यह दानवाकार आकृतियाँ कौन हैं ? पहले तो अपनी संतानों के दिमाग में संतुलित भावनाएँ डालने का काम तो आपका था न ?”
शिशु का सवाल सुनकर रचयिता मुस्कुराया और बोला-“इंसान इन आकृतियों को ‘धर्म’ कहता है। इन्हें इंसान ने ही बनाया है और अब उनके बच्चों में भावनाएँ डालने का काम यही आकृतियाँ करती हैं। मनुष्य ने जब से ये आकृतियाँ बनाई हैं… मुझे भूल चुका है ।”
“क्या यह आकृतियाँ सभी में समान दयाभाव, प्रेम अथवा अपनापन डालने में सक्षम हैं ?” शिशु ने पुनः एक प्रश्न उछाला ।
“विभिन्न समूहों के मनुष्यों द्वारा विभिन्न आकृतियों की रचना की गई है, जिस समूह की बनाई गई आकृति होगी, उन्हीं के द्वारा ईजाद भावनाओं का फार्मूला संबंधित समूह में पैदा बच्चों के दिमाग में डाला जाएगा ।”
इतना बोलकर रचयिता मौन हो गया।
“फिर तो मैं मानवजनित किसी भी आकृति के पास नही जाऊँगा ।” -नवजात शिशु ने रचयिता से कहा।
“जैसी तुम्हारी इच्छा।”
रचयिता ने आशीर्वाद दिया।
जब उन दानवाकार आकृतियों ने उस शिशु को खुद से दूर जाते देखा तो भिन्न-भिन्न स्वर उनके मुँह से निकलने लगे।
“……”
“अदिस्ट”
“मुल्हिद”
“नास्तिक”
“…….”
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