1- पुलिस मंत्री का पुतला
एक राज्य में एक शहर के लोगों पर पुलिस जुल्म हुआ तो लोगों ने तय किया कि पुलिस-मंत्री का पुतला जलाएँगे ।
पुतला बड़ा कद्दावर और भयानक चेहरेवाला बनाया गया। पर दफा 144 लग गई और पुतला पुलिस ने जब्त कर लिया।
अब पुलिस के सामने यह समस्या आ गई कि पुतले का किया क्या जाए। पुलिसवालों ने बड़े अफसरों से पूछा, “साहब, यह पुतला जगह रोके कब तक. पड़ा रहेगा? इसे जला दें या नष्ट कर दें ?”
अफसरों ने कहा, “गजब करते हो। मंत्री का पुतला है। उसे हम कैसे जलाएंगे ? नौकरी खोना है क्या ?”
इतने में रामलीला का मौसम आ गया। एक बड़े पुलिस अफसर को ‘नवेव’ आ गई। उसने रामलीलावालों को बुलाकर कहा, “तुम्हें दशहरे पर जलाने को रावण का पुतला चाहिए न ? इसे ले जाओ। इसमें सिर्फ नौ सिर कम हैं, सो लगा लेना।”
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2 आजादी की घास
हम तीन मित्र थे। हम पढ़ते थे, जब सन् 42 का अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन चला । हमारे नेता ने हमें ललकारा। वे नारा देते थे-गुलामी के घी से आजादी की घास अच्छी है। हम उत्साही थे ही। आंदोलन में जोर-शोर से हिस्सा लिया। जेल गए। हमारे नेता का नारा था- गुलामी के घी से आजादी की घास अच्छी।
जेल से छूटे। पढ़ाई पूरी की। आजादी आ गई। हम डिग्रियाँ लिये शहर के चक्कर लगाने लगे ।
हमारे नेता अब मंत्री हो गए थे। एक दिन हम उनके बँगले के सामने से निकले। देखा, बँगले के अहाते में बहुत अच्छी घास हवा में हिलोरें ले रही थी। देशी और विलायती बढ़िया घास ! हमारा जी ललचाने लगा। आजादी की घास कितनी अच्छी होती है।
हम बँगले में घुस गए। हमने उन्हें याद दिलाया कि हम उनके नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़े थे। हमने नारे लगाए थे-गुलामी के घी से आजादी की घास अच्छी होती है।
मंत्री जी ने कहा, “ठीक है, ठीक है। तुम कैसे आए? क्या चाहते हो ?” हमने कहा, “आपके अहाते में इतनी बढ़िया आजादी की घास लगी है। हम थोड़ी-सी खाना चाहते हैं।’
मंत्री जी ने कहा, “तुम्हें वह घास नहीं मिलेगी। वह मेरे पालतू गधों के खाने के लिए है। “
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3-अफसर कवि
एक कवि थे । वे राज्य सरकार के अफसर भी थे। अफसर जब छुट्टी पर चला जाता, तब वे कवि हो जाते और कवि जब छुट्टी पर चला जाता, तब अफसर हो जाते ।
एक बार पुलिस की गोली चली और दस-बारह मारे गए। उनके भीतर का अफसर तब छुट्टी चला गया, और कवि इस कांड से क्षुब्ध हुआ। उन्होंने एक कविता लिखी और छपवाई। कविता में इस कांड की और मुख्यमंत्री की निंदा की ।
किसी ने मुख्यमंत्री को यह कविता पढ़ा दी। अफसर तब तक छुट्टी से लौटकर आ गया। उसे मालूम हुआ तो वह घबड़ाया और उसने कवि को छुट्टी पर भेज दिया।
अफसर कवि ने एक प्रभावशाली नेता को पकड़ा। कहा-मुझे मुख्यमंत्री जी के पास ले चलिए। उनसे क्षमा दिला दीजिए। नेता उन्हें मुख्यमंत्री के पास ले गए। उन्होंने परिचय दिया ही था कि कवि ने मुख्यमंत्री के चरणों पर सिर रख दिया। मुख्यमंत्री ने कहा- यह वह कवि नहीं हो सकते जिन्होंने वह कविता लिखी
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4-यस सर
एक काफी अच्छे लेखक थे। वे राजधानी गए। एक समारोह में उनकी मुख्यमंत्री से भेंट हो गई । मुख्यमंत्री से उनका परिचय पहले से था। मुख्यमंत्री ने उनसे कहा-आप मजे में तो हैं। कोई कष्ट तो नहीं है ? लेखक ने कह दिया – कष्ट बहुत मामूली है। मकान का कष्ट। अच्छा-सा मकान मिल जाए, तो कुछ ढंग से लिखना-पढ़ना हो।
मुख्यमंत्री ने कहा-मैं चीफ सेक्रेटरी से कह देता हूँ। मकान आपको ‘एलाट’ हो जाएगा।
मुख्यमंत्री ने चीफ सेक्रेटरी से कह दिया कि अमुक लेखक को मकान ‘एलाट’ करा दो।
चीफ सेक्रेटरी ने कहा- यस सर !
चीफ सेक्रेटरी ने कमिश्नर से कह दिया। कमिश्नर ने कहा-यस सर !
कमिश्नर ने कलेक्टर से कहा – अमुक लेखक को मकान ‘एलाट’ कर दो ।
कलेक्टर ने कहा- यस सर !
कलेक्टर ने रेंट कंट्रोलर से कह दिया। उसने कहा- यस सर !
रेंट कंट्रोलर ने रेंट इंसपेक्टर से कह दिया। उसने भी कहा, यस सर!
सब बाजाब्ता हुआ। पूरा प्रशासन मकान देने के काम में लग गया। साल-डेढ़ साल बाद फिर मुख्यमंत्री से लेखक की भेंट हो गई। मुख्यमंत्री को याद आया कि इनका कोई काम होना था। मकान ‘एलाट’ होना था ।
उन्होंने पूछा- कहिए, अब तो अच्छा मकान मिल गया होगा ?
लेखक ने कहा- नहीं मिला।
मुख्यमंत्री ने कहा- अरे, मैंने तो दूसरे ही दिन कह दिया था।
लेखक ने कहा- जी हाँ, ऊपर से नीचे तक ‘यस सर’ हो गया।
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5-अनुशासन
एक अध्यापक था । वह सरकारी नौकरी में था। मास्टर की पत्नी बीमार थी। अस्पताल में थी। तभी उसके तबादले का आर्डर हो गया। शिक्षा विभाग के बड़े साहब उसी मुहल्ले में रहते थे। उनका बंगला मास्टर के घर से दिखता था। वह उनके बंगले के सामने से निकलता तो उन्हें सादर ‘नमस्ते’ कर लेता। मास्टर ने सोचा, साहब से कहूं, तो वे फिलहाल मेरा तबादला रोक देंगे। वह साहब के घर गया। बरामदे में बड़े साहब ने पूछा- क्यों ? क्या बात है?
– साहब, एक प्रार्थना है ।
– बोलो।
– मेरी पत्नी अस्पताल में भर्ती है। वह बहुत बीमार है।
– तो?
– मेरा तबादले का आर्डर हो गया है।
-तो?
-सर, कृपा कर फिलहाल मेरा तबादला कैंसिल कर दें।
साहब नाराज हुए बोले- तुम्हें अनुशासन के नियम मालूम हैं? तुम सीधे मुझसे मिलने क्यों आ गए? तुम्हें आवेदन करना चाहिए ‘थ्रू प्रापर चेनल।’ तुम्हें अपने हेडमास्टर की लिखित अनुमति के साथ मुझसे मिलना चाहिए। जाओ, तबादला कैंसिल नहीं होगा। तुम्हें अनुशासन भंग करने के लिए डाँट भी पड़ेगी।
मास्टर को डाँट पड़ी। आइंदा साहब से सीधे नहीं मिलने की चेतावनी मिली। मास्टर ने दो महीने की छुट्टी ले ली।
एक शाम साहब के घर में आग लग गई। आसपास के लोग आग बुझा रहे थे।
मास्टर बरामदे में सड़े हुए देख रहे थे। आग बुझ गई अधिक नुकसान नहीं हुआ।
दूसरे दिन मास्टर निकले, तो साहब फाटक पर खड़े थे। साहब ने कहा-मास्टर साहब, कल शाम को मेरे घर में आग लगी थी, तो तुम खड़े-खड़े देखते रहे। बुझाने नहीं आए।
मास्टर ने नम्रता से कहा- सर, मैं मजबूर था। हेडमास्टर साहब बाहर गए है। उनकी लिखित अनुमति के बिना कैसे आता ? आपकी आग बुझाने के लिए
थ्रू प्रापर चैनल आना चाहिए न !
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6-अश्लील पुस्तकें
शहर में ऐसा शोर था कि अश्लील साहित्य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्लील पुस्तकें बिक रही हैं।
दस-बारह उत्साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा, हम ऐसे साहित्य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे ।
उन्होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीस-पच्चीस अश्लील पुस्तकें हाथों में कीं । हरेक के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा- आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्थान में इन्हें जलाएँगे । प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो । पुस्तकें मैं इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता । बीस-पच्चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे< तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना ।
दूसरे दिन शाम को सब मिले, पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा – किताबें दो, तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।
किताब कोई लाया नहीं था ।
एक ने कहा- कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।
दूसरे ने कहा- अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन दिन बाद जला देना ! अब तो किताबें जब्त ही कर लीं ।
उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।
तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया ।
एक ने कहा- अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।
दूसरे ने कहा- अकिल पढ़ लें, तब ले आऊँगा ।
तीसरे ने कहा- भाभी उठाकर ले गई। बोली कि दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी ।
चौथे ने कहा- अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिरी में उठा ले गईं। पढ़ लें, तो दो-तीन दिन में जला देंगे।
अश्लील पुस्तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।
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