रमेश कुमार संतोष
1-अपना खून
लड़की होने के समाचार ने सबके चेहरों पर उदासी ला दी। सब एक दूसरे को उदास चेहरे से देख रहे थे । फोन की घण्टियाँ बजने लगी ।
लड़की…वह भी दूसरी….वह भी आप्रेशन से…इतनी तकलीफ़ के पश्चात फिर से लड़की…..,,,!!
‘‘हाय … क्या लिखा है…. इसके भाग्य में… खैर जो हो गया उसे स्वीकार करो… आखिर किया भी क्या जा सकता है…. भगवान के आगे किस की चलीं है..” आश्वासन के शब्द उसे ओर रुला जाते…।
आप्रेशन थियेटर में जब माँ को पता चला, तो उसकी आँखों में जैसे गंगा यमुना बह गई हो… डाक्टर भी थोड़ी देर के लिए खामोश हो गई ।
फिर धीरे – धीरे सब सामान्य होने लगे…. लड़की को पिता ने उठाया… फिर दादी ने…वह हाथ पाँव हिलाकर एकटक दादी को देख रही थी… जैसे कह रही हो..
“मेरा कसूर क्या है…”
अचानक दादी के मुँह से निकला- “देख कितनी प्यारी है….”
वह फिर से पिता की गोद में आ गई। फिर अस्पताल में आए दूसरे रिश्तेदारों की गोद में… ।
लड़की के रोने पर झट से दादी ने उसे उठाया फिर अपने बेटे से बोली- “जा शहद लेकर आ… इसे भूख लगी है… देख.. देख जीभ निकाल रही है…।
आप्रेशन थियटर में लड़की की माँ अब भी रोए जा रही है… डॉक्टर ने उसके आँसू देखकर सांत्वना देते हुए उसे कहा-
” क्या कोई आर्थिक समस्या है..?”
“नहीं .. ऐसी कोई बात नहीं…”
“फिर यह सब क्यों…?”
“कुछ नहीं.. बस यूँ ही. लड़का हो जाता तो…!”
लड़की को माँ की गोद में दिया गया. … उसे देख कर उस के आँसू ओर ज्यादा बहने लगे…।
माँ को रोते देख कर डॉक्टर ने उसे एक सुझाव दिया- “तुम को लड़का चाहिए…?”
“जी अगर हो जाता तो? “
“लाओ इसे… मुझे दे दो… मैं तुम्हें लड़का लाकर देती हूँ।”
“कहाँ से?”
“वह दूसरी पेशेंट है न… उसको लड़की चाहिए. उसके…दूसरा बेटा हुआ है ..मैं उस से बात करती हूँ।”
“न… नहीं… ऐसा नहीं हो सकता…” माँ ने बेटी को अपनी छाती से लगा लिया।
“यह मेरा खून है. मेरा अपना खून. इसे मैं दूसरे को नहीं दे सकती।”
माँ लड़की को चूमने लगी। उसकी आँखों से आँसू अब भी बह रहे थे। सब उसकी ममता के आगे नतमस्तक थे। अपना खून अपना ही होता है वह चाहे लड़का हो या लड़की….।
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2-लोकतंत्र
“कहां रह गई इतने दिन?”
” क्या बताऊँ बीबी जी घरवाला गिर गया था”
” वह कैसे …? ज्यादा तो नहीं लगी…”
” चोट तो बहुत लगी है … सिर पर .. चार दिन अस्पताल में लगा कर आयें है …”
” यह कैसे हो गया..”
” बस डफ (पी) कर आ रहा था…. मुफ्त की थी …बस…पी गया…”
“कोई पार्टी बगैरा थी..”
” वहीं इलेकशन वालों ने पिलाई थी । पर बाद में कौन आया… पता लेने .. कोई भी तो नहीं. सब मतलब के है “
“तुम भी तो झण्डा उठाकर जाती थी। “
“बीबी जी, आप से क्या छिपाना, हम तो मेहनत करने वाले हैं। कितने घरों का काम करती हूँ… वह भी तो काम ही है…”
” कितनी दिहाड़ी मिलती है…”
” छोडो बीबी जी मुझे काम कर लेने दो… दूसरे घरों में भी जाना है…”
” वोट के कितने पैसे मिले थे…”
” मिले थे…सब ने लिए थे पूरे मुहल्ले वालों ने…”
” पर कोई फायदा नहीं हुआ सारा लग गया…”
“अब क्या हाल है…! ठीक है?”
” काम पर जाने लगा है…।…. बीबी जी बातें छोड़ो … मुझे चाय बना दो… थक गई हूँ अभी चार घरों का काम बाकी है….।”
उस के हाथ तेजी से पोंछा लगाने लगे…।
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3-व्यवहार
वह इस बात से संतुष्ट है कि मित्र की शादी में अकेले ही आए है .. नही तो पत्नी की नजरो में मजाक बन कर रह जाते । वहां पर उन का किसी से अधिक परिचय भी नही है, इसलिए मित्र से बस हाथ मिलाकर बाहर आ गए है .। जैसे जैसे समय बीत रहा है..वह बेचैन होने लगे है । बारात को लड़की के घर तक पहुँचने में अभी दो से तीन घण्टे लग जाने है । इतनी देर तक अकेले वह कैसे काटेंगे..?
बार बार यही सोच रहे है.. । भूख भी लगने लगी है…तभी उन्होने कुछ निर्णय लिया..भीड़ से हट कर उन्होने शगुन के लिफाफ मे रखे दो सौ सौ के नोट मे से एक नोट निकाल लिया और एक नोट लिफाफे मे ही रहने दिया..। फिर से मित्र को मिलने के लिये अन्दर कमरे मे आ गये फोटो ग्राफी चल रही थी मित्र को शगुन का लिफाफा पकडाते हुयें बधाई दे कर बाहर आ गये..। घर लौटते समय रास्ते में कुन्दन डाबे में बैठ कर शगुन से बचाये सौ रूपयें का बढि़याँ खाना खाया ताकि घर में यह पता न चले कि वह बिना बारात में शामिल हुये ही लौट आयें है…।
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4-कटौती
पांच तारीख को ही बिलों का भुगतान करने के पश्चात पति जी की जेब में जब दस का नोट बचा तो वह परेशान हो गए .। पत्नी को बुलाया और हिसाब लगाने लगे..। पिछले तीन महीनों में ही जो बैंक में जमा था वह निकलवा चुके हैं…।
“क्या करें…” पति ने पत्नी की ओर देखते हुए कहा ।
“क्यों… क्या हो गया है ।” पूछा पत्नी ने ।
” बस यही बचा है…” दस का नोट दिखाते हुए पति ने कहा ।
” क्यों बाकी का क्या हुआ…”
” पता नही क्या होता जा रहा है… वेतन से कुछ बनता ही नहीं है…”
“अब तो कोई फजूल खर्च भी नहीं करते ..”
” यही सिलसिला रहा तो अगले एक दो महीनों में हम करजाई हो जाएँगे…हमें अभी से सोच कर कदम उठाने होंगे”
” बात तो आप की ठीक है परन्तु किस खर्च को कम किया जाए…।”
” सोचो तो सही “
” क्या सोचूँ….. अखबार तो पहले ही बन्द करवा चुके हैं … बेटी को प्राइवेट स्कूल से हटवा कर सरकारी स्कूल में दाखिल करवा दिया है…दूध भी तो अब बस आधा किलो ही लेते हैं…. फिल्म के लिए भी खर्चा बन्द कर चुके हैं… घूमने के लिए भी अब कहीं भी नहीं जाते… घर में काम करने वाली को भी हटाया जा चुका है…. अब मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा…”
” प्लीज़ कुछ तो सोचो…”
” मेरी तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा..”
” आखिर कुछ तो करना ही होगा …”
“रोटी खाना छोड़ देते हैं…” अब पत्नी की आवाज में तल्खी थी..।
” तुम मुझे गलत समझ रही हो… मेरा मतलब कुछ तो….! मुझे समझने की कोशिश करो…।”
“कब से कह रही हूँ… कुछ पार्ट टाइम काम कर लो या मुझे ही कहीं नौकरी पर लगवा दो…. मेरी तो कोई बात सुनते ही नहीं…”
” ओह..हो… तुम तो नाराज हो गई हो…. यह बातें तो बाद की है…. “
‘ मुझे कुछ समझ नहीं आता जैसे कहो गे वैसे ही कर लूं गी ….”
” सुबह का नाश्ता…. दोपहर का खाना…. फिर शाम की चाय… रात का खाना….” पति जी कुछ समय तक सोचते रहे…और फिर एक ही सांस में कह गए….।
” देखो सुबह परांठे के स्थान पर चपाती बना लिया करो या दो तीन पराठों के स्थान पर एक ही पराठे से काम चलायो….. सब्जी सुबह एक ही बार बना लो उसी से रात का काम चलाया जाये…. और….और शाम की चाय बन्द…”
” तो फिर क्या फर्क पडे़गा…”
” कुछ तो फर्क पड़ेगा…”
“ठीक…है.. जैसा कहते हो कर लेती हूॅं….कल को रात का खाना भी बन्द करवा देना….”
” प्लीज़… मुझे समझने की कोशिश करो…. यह स्थाई नहीं है… कुछ समय के लिए ही…।”
” आज तक कौन सी कटौती अस्थाई हुई है…”
कहती हुई पत्नी अन्दर चली गई… और पति उसे बेबस आंखों से देखता रह गया उसकी आंखें भीग गई है
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5-दुनियादारी
हर समय अन्धेरे और अकेले पन मे डूबे रहने वाले घर में एकाएक बहार आ गई रिश्ते दारो की । और आस पड़ोस के लोग जमे रहते।
इससे पहले तीन -तीन बेटों के होते हुए भी वह अकेली ही रहतीं थी । पति की मृत्यु के पश्चात पैंशन उनके खाते में ही आ जाती थी सफाई वाली सफाई कर जाती और कभी कभी खाना भी बना जाती अकेली जान थी
बनाने का आलस ही रहता गली के मौड पर बडे बैंच पर माता की रसोई से चार रोटी के साथ कभी कढ़ी कभी दाल ले आती चाय घर में बना लेती और मन होता तो चावल या खिचड़ी बना लेती ज्यादातर उस का दिन गली से लगते बरामदे में बैठकर बीत जाता। आते जाते बच्चों से बतियाँ लेती। वह किसी को भी कोई काम कहती कोई उसे मना नही करता था शाम के समय कई बार उस की हम उमर औरते आकर बात करने के लिए रुक जाती । बहुत सी औरते उन्हें बेटे के पास जाने की सलाह देती परन्तु वह हमेशा हँसकर टाल जाती । हां जब बेटी के बच्चों को छुट्टियाँ होती तो वह कुछ दिन रहने के लिए आ जाती थी । तब खूब रौनक लगतीं थी बेटी अपने साथ चलने के लिए कहती; परन्तु हर बार वह टाल जाती । ज्यादातर उस का समय अकेले ही बीत जाता था
और अब जब उस की मृत्यु हो गई, तो घर का नक्शा ही बदल गया है। सब कहते हैं-“किस्मत वाली थी परदादी और परनानी बनकर मरी सब कुछ भोगा है उसने ।”
लड़को के ससुराल वालों की तरफ से होड़ लगी थी खाना खिलाने की ।
रिवाज के अनुसार संस्कार के बाद खाना लडके के ससुराल वाले खिलाते है बेटे ज्यादा हो तो मिल कर खर्च कर लिया जाता है परन्तु बडे़ बेटे के ससुराल वाले कहने लगे नहीं यह हमारा बनता है और फिर दूसरे ने चौथे पर तीसरे ने दसवें में खाना खिलाने का निर्णय ले लिया और तेरहवीं में बेटों ने मिलकर मृत्यु भोज का निर्णय लिया गया । यह प्यार सतारवीं तक चला और उसके बाद घर के बँटवारे को लेकर खूब हो हल्ला हुआ और देर रात तक गाली गलौच और धमकियों की आवाजें गली में गूँजती रहीं।
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6-दिनचर्या
ढल रही उम्र से वह आज-कल परेशान रहने लगे हैं… । हर रात करवटों में ही बीत जाती है। एक दिन ज़िन्दगी में ओर कम हो गया । आखिर क्या किया उन्होंने अपनी इस लम्बी ज़िन्दगी में । एक ही दिनचर्या है… सुबह बच्चों को उठा कर स्कूल भिजवाने तक की किच किच … फिर ऑफिस समय पर पहुँचने की दौड़….सारा दिन वही काम…. वहीं लोग… वहीं बातें…. वहीं झगडे़…. आफिसर की डाँट… साथियों के साथ बिना कारण की किचकिच….. और शाम को पार्ट टाइम काम पर पहुँचने की टैंशन….लाख चाहने पर भी वह अपनी दिनचर्या को बदल नहीं पाए है…।
बचपन से जवानी…. जवानी से बुढ़ापे तक की सारी सोच….. सारे संकल्प….सिमट कर रह गए है …इस दिनचर्या के बीच…। कई बार चाहा है….कम से कम समाचार पत्र को ही देख लें… परन्तु समय ही नहीं मिलता…टी.वी.पर जब भी समाचार सुनने का मन हो तो उसी समय बच्चों के कार्टून का समय होता है… बच्चों से अगर उस को समय मिले तो बीवी के धारावाहिक शुरू हो जाते हैं….। और वह हँसते -हँसते अपने को अपने में समेट लेते हैं…। और रात भर सपनों में या करवटों में ही बीत जाती है सपने भी अजीब से होते हैं …कभी किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर….. भटकते रहे जाते हैं… वह कभी भी गाड़ी पकड़ नहीं पाते है … गाड़ियों के आकार भी अजीब अजीब से होते हैं या वह किसी शहर में फंस जाते हैं कहीं… भी रास्ता नहीं मिलता कभी ऐसा शहर होता है कीचड और पानी से भरा होता है और कई बार तो डर कर उन की चीख भी निकल जाती है और टूट गई नींद में उन का शरीर पसीने से भीगा होता है…..। पता नहीं क्यों उन्हें लगने लगा है कि एक दिन ऐसे ही वह मर जाएँगे बिना कुछ किए ही….
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7-फर्ज
जैसे ही मरीज को अस्पताल में लाया गया उथल पुथल सी मच गई। कुछ क्षणों में ही उन्हें एमरजेंसी में ले जाया गया। डॉक्टर साहब भी अपने कैबिन में से उठ कर वहां पहुंच गए। भाग-दौड़ देखकर साथ आई उनकी पत्नी घबरा गई। उस का पूरा शरीर पसीने से भीग गया। आवाज दबी की दबी रह गई । जल्दी से उन्हें पानी पिलाया गया । बेटे की टाँगें अभी भी काँप रही है। वह हाथ जोड़ें काँपती आवाज़ में कभी इधर कभी उधर कभी किसी से कभी कांउटर पर जा कर पूछ रहा है… क्या हुआ हमारे पिता जी को… कितना खर्च आ जाएगा कभी पड़ोस से मांग कर लायें रूपये को टटोलता है…वह बहुत ज्यादा घबराया हुआ है।
“डाक्टर साहब क्या हो गया है हमारे पिता जी को….?”
” देखो तुम बाहर जा कर बैठ जाओ। हमें अपना काम कर लेने दो….।”
वह लगभग रोने लगा
” देखो तुम इन्हें हमारे पास बचाने के लिए लेकर आए हो….हमारा पहला फर्ज है कि इन्हें बचाया जाए…।”
“जी डाक्टर साहब ख़र्च कितना आ जायेगा….”
” तुम्हारे से किसी ने कुछ माँगा है… नहीं न…”
” फिर भी डॉक्टर साहब…”
“देखो तुम विश्वास के साथ हमारे पास ले कर आए हो…हमारा फर्ज बनता है कि पहले इन्हें बचाया जाए । बाकी सब बाद में देख लेंगे…।”
“डॉक्टर साहब हम बहुत गरीब लोग हैं। “
उसके जुडे हाथ को अपने हाथ में लेते हुए डाक्टर साहब ने कहा-“बहुत सीरियस है…हम अपनी पूरी कोशिश करेंगे रही बात पैसों की, तुम जो भी दे सकते हो, दे देना। अगर नहीं होगें, तो मत देना….पर इस समय हमें अपना फर्ज निभाने दो…।”
वह हाथ जोड़ें आई. सी. यू. के बाहर आ कर बैठ गया ।
डॉक्टर साहब के दयालु होने के बारे में सुना था … परन्तु आज उन्हें देखकर ऐसा लगा जैसे खुद भगवान् धरती पर उतर आए हो….वह अभी भी उन के लिए हाथ जोड़ कर प्रार्थना कर रहा है…।
-0-रमेश कुमार संतोष, सम्पर्क 9876750370