1-छवियाँ ऐसे भी बनती हैं …
यह हमारा नया खेल था। पिताजी के बाहर जाते ही माँ पिता बन जाती थी। माँ पिता के कपड़े पहन कमरे से बाहर निकलती तो हम तालियाँ पीटने लगते। पिता बनी माँ के कंधों पर झूल जाते। जेबों में हाथ डाल टॉफियाँ ढूँढते। गोद में मचलते।…….कि एक दिन ऐन खेल के वक्त पिता घर वापस आ गए। अपने कपड़ों में माँ को देख बिफर पड़े। हमारी परवाह किए बिना माँ के कपड़े उतार दिए। माँ के पैरों में पिता के जूते भर बचे थे। हम सब आश्चर्य में बिंधे थे। हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि हमारी नजरों में माँ नहीं, क्यों नंगे हो रहे थे पिता !
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2- लाख टाकार झूली
पूरा कमरा तो नहीं,एक कोने को बना लिया था मैंने अपना कोना। माँ हँसकर कह देती बैठी होगी अपने कोने में। …और सहेलियाँ आकर बाँट लेतीं थोड़ा-थोड़ा कोना। सहेलियाँ ले आती थीं फुलकारियों के नमूने, अचार की रेसिपी, गुनगुनी धूप की कतरनें,हँसी-ठिठोली के गुच्छे और हमारे होने के आश्वासन! बचपन से समेटती आई थी यह सब। इकट्ठा किये और संजोये हुये सामानों का एक खजाना सा बन गया था मेरे पास। मोती-सितारे टाँक बना लिया था एक झोला। मेरे खजाने का भंडार। एक सुंदर सा लाल झोला,जो स्मृतियों के भार संभाल सकता था। सहेज सकता था सौंदर्य के छिट-पुट नमूने। इस साजो-सामान में सब शामिल था छोटी-बड़ी सीपें और मोतियाँ,रंग-बिरंगे पंख, ग्रीटिंग कार्ड्स, सूखी हुई पत्तियाँ और फूल,तरह-तरह के पत्थर और एक तराशा हुआ काँच का टुकड़ा। लाख टके की झोली मेरे कोने में टँगी रहती। ‘ लाख टाकार झूली!!’ पापा मेरा साज-बाज देख हँसते हुए कहते-”मेरी लाख टके की झोली तो तुम हो बिटिया!”…. और मैं दुपट्टे में लिपटी छोटी-सी गठरी बन गई। सलमा-सितारों,गहनों से लदी-फदी,गोटों की किनारी वाली झोली बन ससुराल पहुँच गई। भाग-दौड़ और हो-हल्ले के बीच लाख टके की झोली कोने में ही टंगी रह गई। मैं आधी ही ससुराल पहुँची थी। महीने भर बाद वापस आई तो मेरा कोना कहीं नहीं था। झोली भी नहीं थी। मैंने घर भर का कोना-कोना छान मारा। मेरी झोली कहीं नहीं थी। मैं कहीं नहीं थी। मेरी झूली खो गई थी। मैं भी खो गई थी। मेरी स्मृतियाँ, मोती, पंख,फूल सब मेरी आँखों से आँसू बन झर रहे थे। महीने भर पहले नहीं ,मैं आज इस घर से विदा हो रही थी। यकीन जानिये बेटियाँ तब तक विदा नहीं होतीं ,जब तक बचाए रखते हैं हम उनका कोना !! नंदलाल बसु अपने पास एक झोला रखते थे, जिसमें वो अपने पसंद की चीजें रखा करते और उसे ‘ लाख टाकार झूली’ कहते थे।
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3-चाँद के उस पार
सब सो रहे थे। धरती और आकाश के बीच बैठी पामेला जाग रही थी।
-”शहर की सबसे ऊँची इमारत में रहती अकेली लड़की! क्या तुम्हें डर नहीं लगता??? ”
छोटे-छोटे शहरों से वाबस्ता उसके यार-दोस्त अधिक ऊंचाई से नीचे गिर जाने का अंजाम जानते थे। यह भी कि इस तरह अचानक से कभी भी फिसल जाने का डर तब और भी खतरनाक हो जाता है जबकि ऊंचाई वर्चुअल हो ! आभासी !!! सचमुच नहीं !!!
-”आज की रात चांद देखा क्या?'” पामेला के कमरे की इकलौती खिड़की सीधी उसकी गोद में खुलती थी। खिड़की के चौखटे फ्रेम से झांकता सुशांत पूछ रहा था। उसके पीछे ऊंघता हुआ शहर जगमगा रहा था। निरभ्र आकाश में चमकता गोल चांद अपनी छटा बिखेर रहा था और हाथों में खीर का कटोरा लिये वह खड़ा था।
— ”हाँ ! देखा,एक साथ तीन चांद देखे। आकाश में टंगा एक चांद। तुम्हारी चाँद-सी सूरत और हाथों में चाँद का कटोरा।” पामेला हँसी।
—”माँ कहती है आज की रात चांद से अमृत बरसता है। क्या पता ऐसी ही किसी चाँद -रात को एक -दो अमृत बूँदें हमारी प्यालियों में भी बरस जाएँ।”सुशांत बोला।
– ”मरने से डरते हो सुश? ”पामेला ने पूछा।
– ”नहीं,लेकिन मरने से पहले बस एक बार तुम्हारे चेहरे का चांद अपनी हथेलियों में भरकर चूमना चाहता हूँ। आओ ! यह अमृत प्याली आधी-आधी बाँट लें। ”
‘यह क्या कह दिया सुशांत ने? हमारी दोस्ती इस मुकाम तक कब पहुँच गई।’पामेला अचकचाई। आसमान में चमकते चाँद को बादलों ने जैसे ढँक-सा लिया।
नीम अँधेरे में सुशांत कहीं खो गया। फोटोशॉप में तराशी गई पामेला की चाँद सी तस्वीर विंडोस्क्रीन पर छा गई। पामेला की बरसों पुरानी इक तस्वीर! जबकि उसने अपने लिए इस आभासी दुनिया को चुना था। अवास्तविक प्रोफाइल ! नकली स्टेटस !
झूठे अपडेट्स और उसके वजूद को नकारता एक नाम – पामेला !
— ”हाँ ! मुझे अधिक ऊंचाई से डर लगता हैssss . ”अपनी गोद में खुलती इकलौती खिड़की से झाँकती पामेला चीखी। छोटे-छोटे शहरों से वाबस्ता उसके दोस्तों तक यह आवाज नहीं पहुँची। छोटे -छोटे शहरों से वाबस्ता उसके दोस्त असली पामेला को पहचानते थे। लेकिन इतनी ऊँचाई से आ रही आवाज
कहाँ सुन सकते थे भला ! अलग-अलग नामों से उसकी फ्रेंड लिस्ट में शुमार सुशांत भी सो चुका था। दर्जनों अभिव्यक्तियों को बयाँ करता एक नाम -सुश !
अचानक ही माउस पैड पर रेंगते पामेला की कलाई में एक तेज झनझनाहट-सी हुई। उँगलियों से कंधे तक गुजरती उसके मस्तिष्क तक पहुँची और उसे चीर-सी गई। पामेला ने अपनी कलाई पर पिंक बैंडेज बाँधा। उसकी हड्डियाँ,नसें और मांसपेशियाँ कमजोर हो रही थीं। दिन -ब -दिन बुढ़ाती जाती त्वचा में एक-दो झुर्रीदार लकीरें जैसे रोज ही बढ़ती जा रही थीं। लेकिन उम्र-दर-उम्र साथ गुजरते रहने के बाद भी सुशांत वैसा ही था। जवां और खूबसूरत। डिजिटल भी !!!
सब सो रहे थे। दरो-दरख़्त और चिड़ियाँ -चुग्गे,पास- पड़ोस कुत्ते -बिल्लियों तक। गहराती कालिमा में घुलता-मिलता पामेला का गहरा रंग और शादी की उम्र तक।
—–”हाँ ! सुश ! मरने से पहले तुम्हारी अमृत प्याली चखना चाहती हूँ। पर,काश ! कि इस डिजिटल दुनिया में बिताए और जिए गए पल भी वर्चुअल हो सकते !
आभासी —–!!!”
धरती और आकाश के बीच बैठी पामेला अब भी जाग रही थी।
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4-चंदा नाच उठी
यह कोई चाँदनी रात नहीं थी!
वन..टू…थ्री…
… बीड़ी जलइले …जिगर से पिया…..जिगर मा बड़ी आग है….डांग डिंग डांग डांग डिंग डांग….
क्या गाना था!सम्मोहन-सा! चंदा खिड़की पर भागी चली आई।
ऑर्केस्ट्रा बैंड का गवैया हाथ में माइक पकड़े गाए जा रहा था।उसका गाना बारातियों और घरातियों के बीच जादू बनकर उन्हें नचवाता जा रहा था। इस वक्त, इस पल में बस दो शाश्वत सत्य बचे थे-नाचना और गाना।गवैया और नचनिया! चंदा हँसी-“देखो तो ,कइसे नाच रहे हैं सबके सब अकेले इस गायक के इशारों पे। जइसे कि वह कोई बिधाता हो।” चंदा ने उसाँस भरी। ऐसे न जाने कितने ही गानों पर तो नाचती आई थी वह! एक-एक कर गाने बजते जाते और चंदा नाचती जाती। नाचती जाती। नाचते-नाचते नृत्य-संगीत और चंदा एकाकार हो जाते। जैसे कि जीवन! टूटकर नाचती और बिखरकर शांत हो जाती।कोई उसे स्टेज की रानी कहता तो कोई दिल की।कोई नोटों की बौछार करता तो कोई उधार के चुंबनों की बौछार। इन सबसे परे आदमियों के बीच नाचती एक अकेली नचनिया चंदा स्टेज पर चुपचाप खड़ी रहती।मृत सी! कोई छुए तो जी उठे शायद।गालियों,चुंबनों,नोटों की बरसात के बीच।जैसे नाच खत्म तो जिंदगी खत्म।
लेकिन जब से बड़े साहब उसे उठाकर ले आए हैं उसने नाचा ही नहीं। कभी नाचा भी था तो किसी न किसी के इशारों पे। किसी न किसी के लिए: लेकिन आज तो जैसे गाने की आवाज उसे मदहोश सी करने लगी। नाचने की इच्छा बलवती होने लगी। उसके मन में एक हूक सी उठी। पैसों के लिए नहीं,नाचने के लिए नाचती थी वह!उसके लिए नाचना जैसे कोई छलावा और भुलावा हो जिंदगी की रुस्वाइयों का। आज वह नाचेगी!अपने लिए। अपने ही इशारों पर। सुध-बुध खोई सी दरवाजे की ओर लपकी। दोमंजिला मकान की सीढ़ियाँ उतर भीड़ में शामिल हो गई। नाचती रही!नाचती रही ! नाचते-नाचते अचानक उसकी नजर बड़े साहब पर पड़ी। आज तो मार ही डालेंगे! कोई डर नहीं! जी भर नाच लेने के बाद बचती कहाँ है चंदा!
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5-चिट-चैट
1
-“जाने कैसा तो समय आ गया है और कैसी-कैसी तो बीमारियाँ!”
-“हाँ, देखो न एक-दूसरे को मिल भी नहीं सकते। जैसे जीते जी मर रहे हैं हम।”
-“क्यों न एक दिन के लिए ऐसा मान लें जैसे सचमुच ही मर चुके हों हम।”
-“हाँ ! और अपनी हर एक बात एक-दूसरे को आत्माओं की तरह बताएँ जो हम आदमी रहते नहीं बता पाएँ।”
-“हाँ, अपना हर एक रहस्य।”
-“रहस्य!!”
-“मेरी दिलचस्पी बढ़ रही है। मैं दुनिया का हर रहस्य जान लेना चाहता हूँ; अपने जीते जी।”
-“फिर तो मैं नहीं बताने वाली।”
-“क्यों ?”
-“क्योंकि तुम जिंदा हो रहे हो।”
2
-“मैं एक ऐसी कलाकृति बनाना चाहता हूँ, जिसे देखकर लोग ठहरें। उसके सामने बैठने और बातें करने को मजबूर हो जाएँ।”
-“हाँ! जैसे कोई ईश्वरीय प्रतिमा।”
-“नहीं! ईश्वर नहीं, मानव जैसी।”
-“जाने कितने दिनों से तो कितनी ही औरतों की मूर्तियाँ गढ़ रहे थे तुम, फिर अचानक से सारी तोड़ क्यों दीं?”
-“उनमें से एक भी संपूर्ण नहीं बनी।”
-“इंसान ही कहाँ संपूर्ण होता है।”
“तभी तो मैं मूर्तियों में औरतों की संपूर्णता गढ़ना चाहता हूँ।”
-“लेकिन मूर्तियाँ औरतें नहीं होतीं।”
-“औरत जैसी तो होती हैं।”
“!”
6-यूँ ही नहीं चला जाता कोई …
माँ ने मुझे एकबारगी और अचानक से यूँ ही नहीं छोड़ दिया। बल्कि रोज-रोज और थोड़ा- थोड़ा छोड़ा। महज कि किसी एक दिन मुझे अपने कपड़े और बर्तन धोता हुआ अकेला छोड़ दिया तो किसी और दिन अजनबी रिश्तेदारों के बीच।एक दिन तो पार्क की एक बेंच पर मुझे अकेले बिठा घंटों गायब हो गई।दूसरे दिन मैं गिरा रोता रहा और उसने मुझे नहीं उठाया। अब समझ में आता है कि यह सब दरअसल अकेले रहने की मेरी ट्रेनिंग का हिस्सा थे।तभी तो आखिरी बार जब छुपन-छुपाई का खेल खेलते-खेलते माँ हमेशा के लिए मुझसे कहीं छुप गई तो मैं जरा भी परेशान नहीं हुआ।उसे ताउम्र ढूंढता रहा।इस बार माँ ने मुझे नहीं छोड़ा था।खुद छूट गई थी मेरे भीतर….!
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7- मृत्यूपरान्त
“का भाई बदरी ! कैसे गांधीवादी हो कि तुम्हारे पास एक खादी की सदरी भी नहीं”। किसी ने यूँ ही कह दिया,पर बात बद्रीनाथ को जम गई। लग गई ! आज ही बेटे से कहेंगे एक खादी की सदरी ला दे।- “इस बुढ़ौती में खादी की सदरी।” बेटा,ऐसे हँसा जैसे बद्री ने कोई अप्रत्याशित बात कह दी हो। अब तक की अपनी सारी जमा पूँजी उन्होंने बेटे के नाम कर दी। वृद्धा पेंशन के पैसे भी बेटा ही रखता है। सोच-सोचकर बद्रीनाथ रुआंसे होने लगे। सोचा बेटा सही ही कह रहा है, लेकिन खादी की सदरी इस कदर दिलो दिमाग पर छा गई कि धीरे-धीरे बद्री की संकल्प शक्ति को कम करने लगी। बेचैनी बनकर उनके बुढ़ाते शरीर को जीर्ण करने लगी। ना भूख लगे,ना प्यास। खादी की यह सदरी जैसे जिद बनकर दिन रात उनके इर्द-गिर्द छाई रहती। आखिर उन्होंने निर्णय ले लिया कि बेटा न सही दोस्तों से पैसे माँगेंगे और धीरे-धीरे चुका देंगे। लेकिन दोस्तों ने भी उनका मज़ाक बना दिया-“अरे! कब्र में पैर लटके हैं बुढ़ऊ।” अब तो बद्रीनाथ ने ठान लिया कि सदरी तो वे पहन के ही रहेंगे। बस फिर क्या था आते-जाते राह चलते सबसे सदरी का जिक्र करने लगे। पैसे उधार माँगने लगे। लेकिन हर जगह उन्हें निराशा ही हाथ लगती। उपहास अलग से। सदरी की चाह उनकी अंतिम इच्छा बन घुन की तरह उन्हें जर्जर करने लगी और सामान्य से असामान्य फिर रुग्ण हो बद्रीनाथ खादी की सदरी की चाह लिए इस आसार संसार से विदा हो गए। कहीं बाप की आत्मा अतृप्त ही न रह जाए !! इस डर से बेटे ने बाज़ार की सबसे महंगी खादी ले उनके लिए सदरी बनवाकर पहनाई तब चिता पर लेटाया। दोस्त-मित्र, पास-पड़ोसी ,नाते-रिश्तेदार जिस किसी से भी बद्री ने सदरी के लिए पैसे माँगे थे सब सदरी लेकर आये और बद्रीनाथ पर चढ़ाया। अब बद्री सदरियों से लदे-फदे श्मशान जा रहे थे। आत्मा की शांति के लिए यह जरुरी भी था। (!!!!!??????)
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8-विस्थापन के स्वर
विस्थापन के स्वर बिहार-विस्थापितों के दर्द को बयाँ करते दृश्य चित्र हैं, पाठक इन्हें अपने- अपने मन की जगहों के साथ जोड़ सकते हैं।
1
-“सुनो! यह बंशी भी लिए जाता हूँ। विद्यापति के संगीत के साथ जमता है इसका सुर। फुरसत में बजा ही लिया करूँगा कभी। जब कभी याद आएगा सहरसा।”
-“अच्छा जी! बंशी तो खूब याद रही। …और मैं? दिल्ली जाकर कहाँ याद आता है सहरसा?”
-“अजी हाँ! बंशी ही तो लेकर जा रहा हूँ। उसकी तान तो यहीं है। हर शाम ढले वहाँ बजाऊँगा बंसरी। तुम यहाँ सुनना। यूँ इतना दूर भी नहीं है दिल्ली से सहरसा !”
2
जाने कैसा तो वीरान हो गया है यह गांव। गांव भर के लड़के और मरद चले गए हैं दिल्ली, बम्बई,कलकत्ता —। सारी रात सीवान में कुत्ते जैसे भूँ-भूँकर रोते हैं।
-“आओ बहनों,इस मनहूसियत को तोड़ें।” चाँद रात में बज उठे ढोलकी और झाँझ। ओहोहो! कि तभी ही बज उठा मीरा के ब्लाउज़ में रखा मोबाइल। झूमर गाते होंठ थम गए।
“फिर गाएँगे। जरा बतिया लेने दो मीरा को। देखो तो कैसे दिल के पास छुपा रखी है दिल्ली।”
3
“सुनो! अब तो अपना रिक्शा भी ले लिया है मैंने। अबकी आओ तो इसमें बैठा के तुम्हें घुमाऊंगा लालकिला।”
रिक्शा खींचते पति की चढ़ती-उतरती साँसों संग घूमना है लालकिला!
-“ना! ना! तुम ही हो मेरे लाल किला।”
4
पटना से दिल्ली आती ट्रेन में छूटता जाता पटना निहारती लड़की को देख अचानक ही याद आ गई सुनीता। बेगुसराय हाई स्कूल की खिड़की से बाहर झांकती। देखो तो! अभी-अभी घर में पीछे छोड़ आए बीवी-बच्चे याद नहीं आये और याद आ गई सुनीता! वह मुस्कुराया। यह ट्रेन नहीं जिंदगी हो जैसे !!
5
चौथी मंजिल तक सीढ़ियों से ईंटें पहुँचाता रघुबर अचानक थमा। “अरे! इ तो शम्भू है।” एक ही गाँव के तो हैं दोनों। लेकिन कैसे बतियाये। आज तक कभी बात ही नहीं की। वह ठहरा बाभन और शम्भू कहाँ….!
-“ऐ बिहारियों!”चीखती- सी आवाज से रघुबर का ध्यान बंटा। देखा तो शम्भू भी उसे ही निहार रहा था। काम खत्म होते ही हाल-चाल लेगा। यहाँ दोनों एक ही जात के हैं।
6
-“काश! कि मैं कोई बुलेट ट्रेन होती। सरपट दौड़ कर दिल्ली चली आती।”
-“काश! कि मैं कोई मालगाड़ी होता। हर स्टेशन पर देर तक रुकता -आरा,सासाराम,छपरा, मोतिहारी,मधुबनी,मुंगेर और पटना।”
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