1- जहरीली हवा

कॉलेज आए हुए उसे कुछ ही दिन हुए थे। शिक्षक कम थे शिक्षार्थी ज्यादा। ऐसे में कई पीरियड्स रिक्त ही चले जाते। अपने इस खाली समय की उत्पादकता को बनाए रखने के लिए वह लाइब्रेरी से किताबें निकालकर पढ़ता रहता।
कॉलेज़ में चल रही राजनीतिक गतिविधियाँ, जो इन दिनों चरम पर थीं। उसका दूर – दूर तक कोई नाता नहीं था।
ऐसे ही किसी दिन, जब वह बाकी छात्रों के बेकार की गपशप से दूर किसी किताब में गहरे डूबा हुआ था, उसे अपने गाल पर जोर के तमाचे की झनझनाहट महसूस हुई। नज़र उठा कर देखा तो चार-पांच लड़के उसे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे थे।
“अरे रे ! क्या हुआ भाई ! आप सब मुझे मार क्यों रहे हैं?”
एक और थप्पड़. … एक और… एक और…
“अबे ! गुरु घंटाल ! हम मार नहीं रहे… हम तो बजा रहे हैं…. नेता बनेगा ? गुरु बनने चला है….! ऐसे गुरु घंटाल को बजाना तो पड़ेगा ही… हमारा फार्म बर्बाद करेगा ?
हाथों व मुँह दोनों से ज़हर उगलकर पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद वे लोग चले गए।
अपने बाहर भीतर दोनों चोटों को सहलाता वह सोचने लगा… सच ही तो लिखा था, फिर… ?
दो दिन पहले की ही बात है। सर्वे के नाम पर क्लास में कुछ फार्म वितरित किए गए थे। जिसे हाथों हाथ भरकर वापस करना था। कई व्यक्तिगत प्रश्नों की सूची में कुछ प्रश्न ऐसे थे, जिसका उत्तर उसे मालूम ही नहीं था। अपने उच्चशिक्षित अन्तर्राजीय मातापिता से अब तक जो कुछ भी सुना जाना था उसी आधार पर उसने फार्म के कुछ कॉलम इस प्रकार भरे :
जाति : मनुष्य
धर्म : मानवता
राज्य : धर्मनिरपेक्ष भारत।
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2- आखिरी बेड़ी
दरवाज़ा खोलते ही उसने अपना सूटकेस एक ओर धकेला और “पापा !” कहते हुए मुझसे लिपट गई ।
उसकी सिसकियों ने सबकुछ बता दिया था कि वह अपनी नन्हीं- सी बेटी और बसा-बसाया घर छोड़कर क्यों आ गई है। मैं परेशान हो उठा; लेकिन कहा कुछ नहीं। सिर्फ़ दामाद को चुपके से मैसेज कर दिया कि वह भी बिटिया को लेकर यहीं आ जाए।
बिना किसी वार्तालाप के सबने अपना-अपना डिनर निपटाया। बेटी अपनी नन्ही- सी जान को लेकर सुलाने चली गई। हम दोनों अपना-अपना ड्रिंक लेकर टेरेस पर आ गए।
“पापा! आपने देखा न ! मैं दसों बार सॉरी बोल चुका हूँ … फिर भी … ? दोस्तों ने जिद की तो मैं पार्टी से लिए मना नहीं कर पाया। मुझे पहले से पता होता कि पीहू का बुखार बढ़ गया है, तो जाता क्या ?”
” बेटा! परेशान मत हो! सब ठीक हो जाएगा। औरतें बहुत ही भावुक होती हैं! जितनी जल्दी नाराज होती हैं, उतनी ही जल्दी माफ भी कर देती हैं। बस थोड़ा ध्यान से हैंडल करना आना चाहिए ।”
इस बात की परवाह किए बगैर कि इस वक्त मेरी बेटी को भी मेरे सपोर्ट कि बहुत ज्यादा जरूरत है। मैं घंटों दामाद को साथ बातें करता रहा।
सुबह पीहू के रोने की आवाज सुनकर, जब नींद खुली, तो मेरे करीब एक नोट इंतजार कर रहा था।
“पापा! औरत कोई काँच का बरतन नहीं, जिसे हैंडल किया जाए। आज मुझे समझ में आया कि संतुलित आहार लेने के बावजूद भी मम्मा का कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ता ही रहा। वे हमें असमय ही छोड़ कर चली गईं। मैं भी जा रही हूँ। मरने नहीं! बल्कि, अपनी नई ज़मीन बनाने! हाँ! पीहू को आप दोनों से लिए छोड़कर जा रही हूँ। उम्मीद है कि आप दोनों अच्छी माँ साबित होंगे।”
रोती हुई पीहू को सँभालने का असफल प्रयास करते हुए हम एक दूसरे से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे। मेरी नज़र खिड़की से बाहर एक सूखे पेड़ पर जा टिकी, जो मेरी लापरवाही की वजह से दरख्त न बन सका। भीतर बस एक ही सवाल तैर रहा था। क्या आखिरी बेड़ी भी टूट गई ?
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3. बापू का सबक
घर पर भतीजे की शादी तैयारियाँ चल रही थी। मैंने भी कुछ नई साड़ियाँ खरीद ली थी। अब बारी थी, उन पर पिको फॉल करवाने की ब्लाउज आदि बनवाने की। मैंने सबसे नजदीक के दर्जी से सम्पर्क करके साड़ियाँ सौंप दी। साथ ही समझा दिया कि कहाँ कैसे डिजाइन बनानी है।
दर्जी द्वारा दिए गए समय पर जब कपड़े लेने पहुँची, तो देखा दुकान बंद थी। ऐसा कई बार हुआ। आखिर में शादी ठीक दो दिन पहले उसकी दुकान खुली मिली। मैं पहले से ही गुस्से में थी। उसका कुछ भी सुने बगैर मैं उस पर बरस पड़ी। वह सुनता रहा। कुछ नहीं बोला। जब मैं चुप हुई तब उसने कहा- “मैडम आपके पास मौका है। आप जो चाहे कह सकते हैं। मैं कुछ नहीं कहूँगा। गलती की है तो सुनना तो पड़ेगा ही।”
उसके इतना कहते ही मेरा गुस्सा जाता रहा। अब कुछ कहते नहीं बन रहा था। कुछ क्षण पहले की मेरी उत्तेजित आवाज धीमी हो गई थी। मैंने शादी में जाने की कैफियत देते हुए धीरे से पूछा- “आखिर इतने दिनों तक दुकान बंद क्यों रखी थी?”
“मैडम! मेरे घर पर गमी हो गई थी।” बहुत उदास होकर उसने कहा।
“किसकी ?”
“मेरी अम्मी की … … !”
मुझे याद नहीं इसके पहले कभी मैं इतनी शर्मिंदगी महसूस की हो…!
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4-दृष्टि
अवकाश- प्राप्ति के बाद वे अक्सर पुस्तकालय जाकर समय बिताया करते थे। एक दिन पुस्तकालय से लौटते वक्त ऑटोरिक्शा में बैठे ही थे कि अत्याधुनिक कपड़े पहने एक युवती उनके बिल्कुल पास आकर बैठ गई।
वे असहज हो उठे . पहले तो उन्होंने मन-ही-मन जमाने और उसके माता-पिता को कोसा, जो इस तरह के कपड़े पहनने की इजाजत देते हैं, फिर मन-ही-मन प्रार्थना-स्तुति करने लगे, ताकि अपना ध्यान वहाँ से हटा सकें। बावजूद इसके वे असहज ही बने रहे।
तभी सामने वाली सीट पर एक युवक आकर बैठा और अपना बैग टटोलने लगा। कुछ परेशान-सा दिखा, फिर उसने युवती से पूछा ” क्या आपके पास ईयरफोन है ?”
“दरअसल इस वक्त एफ.एम पर एक कार्यक्रम आता है जिसे मैं कभी मिस नहीं करता, लेकिन आज मैं अपना ईयरफोन दफ्तर में ही भूल गया। घर पहुँचते-पहुँचते तो कार्यक्रम समाप्त भी हो जाएगा। क्या आप अपना ईयरफोन कुछ देर के लिए देंगी?”
“ओह ! श्योर ! लीजिए न !”
युवती ने अपने हैंडबैग से ईयरफोन निकालकर दे दिया।
“मेरी बहन काव्या बहुत अच्छी आर.जे. है , आप भी सुनिए न !” युवक ने आग्रह किया।
“ओह ! रियली? तब तो मैं जरूर सुनना चाहूँगी।”
युवती ने युवक के बिल्कुल पास बैठकर अपने एक कान में ईयरपीस लगा लिया।
बड़े ही सहज भाव से दोनों रेडियो सुन रहे थे, और वे बस उज़बक से दोनों को देखते रह गए !!!!!
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5-पानी का रंग
छप्पाक ! उद्दंड पहियों ने गँदले पानी के छींटों से नहला दिया था मुझे ! ऊफ्फ़ !!! गुर्राती- सी चीख निकल गई थी मेरे मुँह से।
मुझे अंदाजा ही नहीं था कि शहर की गलियों में बचते बचाते हुए चलने के बावजूद मेरे कपड़े खराब हो जाएँगे। सड़क किनारे पानी के पाइप में लिकेज की वजह से सड़क पर एक अच्छा खासा चहबच्चा बन गया था। सैंकड़ों लीटर पानी की बर्बादी देख पलभर पहले आए गुस्से की जगह दिल में एक हूक- सी उठी थी।
जब हम बच्चे थे, हमारे घर में न तो कुँआ था, न ही नलकूप। सुबह-शाम हम दोनों भाई-बहन सरकारी नल से पानी भरने के लिए लम्बी लाइन लगाया करते थे। कई बार तो झगड़े और मारपीट भी हो जाती। माँ बहुत परेशान रहा करती थी। थोड़े से रुपये जमा हुए, तो माँ ने घर के आँगन में कुँआ खुदवाने के लिए मजदूरों को बुलवाया। हम बड़ी उत्सुकता से देखने लगे। मजदूरों ने पहले एक गोल घेरा बनाया। फिर खोदना शुरू किया। मिट्टी के नीचे से राख, टूटी चूड़ियाँ, काँच के टुकड़े , घड़े के टुकड़े निकलते। हमारे लिए यह सब देखना बहुत ही रहस्यमय था। पहले काली, फिर लाल मिट्टी निकलने लगी। मजदूरों के जाने के बाद हम उस गढ्ढे में कूद-कूदकर खेलते। गढ्ढा हर रोज थोड़ा और गहरा हो जाता। हम उसके भीतर ऐसे झाँकते मानो कोई खजाना निकलने वाला हो। पाँच फुट… दस फुट… बीस… चालीस … पचास फुट…
गहराई के साथ-साथ मिट्टी भी रंग बदल रही थी … पहले काली… फिर लाल… फिर भूरी… फिर सफ़ेद … भुरभुरी…
हर रोज मजदूरी देते हुए माँ थोड़ा और चिंतित हो उठती। पचास फुट तक जाते-जाते भुरभुरी मिट्टी ने मजदूरों को भयभीत कर दिया था। उनलोगों ने हाथ जोड़ दिए।
अब हम कुँए के भीतर नहीं बल्कि, माँ की आँखों के भीतर झाँक रहे थे… जहाँ पानी ही पानी था… !
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6– प्रेम
“मुझे नीला आसमान बहुत पसंद है !”
“मुझे भी!”
“मुझे नारंगी सूरज देखना भी बहुत पसंद है!”
“मुझे भी !”
“और चिड़िया?”
“चिड़िया तो मुझे बहुत ही ज्यादा पसंद है! लेकिन…
“लेकिन क्या ?”
“जब से मस्जिद की मीनार ऊँची हुई है, बालकनी से आम का पेड़ दिखाई नहीं देता! उस पर ढेर सारी चिड़िया बैठा करती थीं।”
“कोई बात नहीं ! तुम सण्डे को मेरे घर आना ! मेरे घर के पीछे बहुत सारे पेड़ हैं। उस पर किस्म-किस्म की चिड़िया आकर बैठती हैं। बुलबुल, मैना, पण्डुक, टिहुकी, मुनिया, रॉबिन और भी बहुत सारी !”
“सण्डे को क्यों ?”
“क्योंकि उस दिन शाम को मम्मा और दादी सत्संग सुनने चली जाती हैं।”
“ये सत्संग क्या होता है ?”
“तुम्हारी दादी ने नहीं बताया! मेरी दादी ने बताया कि भगवान की बातें होतीं हैं।”
“भगवान क्या होता है?”
“भगवान! वो होता है न! वो … वो… अरे छोड़ न! तुझे चिड़िया देखनी है न ! तो सण्डे को आना। अब मैं घर जाती हूँ होमवर्क करना है। नहीं तो मम्मा कल से पार्क में आने नहीं देंगी।”
“ठीक है ! मैं भी चलती हूँ अच्छा अपना नाम तो तूने बताया ही नहीं!”
“आत्मजा! और तेरा?”
“रूही! रूही अली!”
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7– डाकू
यह हमारे शहर का सबसे साफ-सुथरा और नामचीन अस्पताल है। चमचमाते ग्रेनाइट से सजे फर्श और दीवारों के शानदार रिशेप्शन की स्टील की कुर्सियों पर मैं पिछले पाँच घंटों से बैठी हूँ। पिछले छह दिनों के असफल प्रयास के बाद आज मुझसे कहा गया है कि मेरे बेटे को आज डिस्चार्ज कर दिया जाएगा।
यहाँ आने-जाने वाला हर चेहरा भयभीत, आशंकित और चिंतित है। रिसेप्शन पर बैठी वेलड्रेस्ड, स्मार्ट और वाकपटु लड़कियाँ पूरी कुशलता के साथ व्यस्त हैं बीच-बीच में चमचामाते जूते, हाईहील सैंडिल, हीरे की अँगूठियों से सुसज्जित चुस्त-दुरुस्त उच्च वेतनभोगी मैनेजमेंट स्टाफ का दिशा-निर्देश जारी है।
मेरे पास वाली कुर्सी पर एक दादी अपने चारवर्षीय पोते के साथ बैठी है। उनका बेटा बहू को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती को लेकर व्यस्त है। बच्चा अपनी माँ के पास जाने की जिद में है। दादी उसका ध्यान हटाने के प्रयास नए-नए प्रयोग में लगी हैं। दो वाक्य बोलते-बोलते वह टोक देता है- “नहीं ! ये वाली नहीं… नई वाली…”
अब दादी गब्बर सिंह की कहानी सुना रही हैं… बच्चे की जिज्ञासु आँखें चमकने लगती हैं… भयभीत गाँव… ठाकुर… बंदूक की ठाँय-ठाँय… जय वीरू की बहादुरी… बच्चा पूरी तरह से मगन है…
इतने में कैश काउंटर पर एक आदमी जोर-जोर से चिल्लाने लगता है। मैं साइन नहीं करूँगा… जब मैं आपकी सेवा से संतुष्ट नहीं हूँ, तो साइन क्यों करूँ ? … हमने जमीन बेचकर अब तक दस लाख रुपया जमा कराया… इतने में तो हम मुंबई से इलाज कराकर आ जाते… आज फिर से दो लाख चाहिए ! नही मेरा मरीज ठीक हुआ और न ही समय रहते आप लोगों ने सही जानकारी दी। उसकी आँखों में सबकुछ जला देने वाली आग धधक रही थी…
बच्चे को इन सब बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसे तो कहानी सुनने में मजा आ रहा है। वह दादी का ध्यान वापस कहानी की ओर खींच लाता है- “फिर क्या हुआ दादी माँ ! गब्बर मर गया?”
नहीं बेटा! गब्बर कहाँ मरते हैं! वे तो बस भेष बदल लेते हैं! बेबस और हताश दादी ने गहरी साँस लेते हुए कहा!
बच्चा सहमकर दादी के सीने से चिपक गया; लेकिन अगले ही पल कभी न खत्म होने वाली गोलियों की बौछार करने वाली बंदूक के सपने में खो जाता है… …
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8– फ़र्क
माँ बताया करती थीं कि, भैया जब चार साल के थे, तब उनके टखनों से घुटनों तक पीव भरे घाव हो गए थे। माँ उनके घावों को अपने आँसू से धोया करती थीं। उनके चीखों को हृदय में भर-भर कर, उनपर शीतल स्पर्श का मलहम लगाया करतीं थी। दसवीं की परीक्षा से लेकर नौकरी मिलने तक माँ भी आधी नींद सोतीं थी।
नौकरी मिली तो, माँ को लगा कि उनकी साधना पूरी हो गई। माँ से सैंकड़ों किलोमीटर दूर रहने वाले भैया, पहले हर तीन महीने में माँ से मिलने आया करते थे। फिर छह महीने में… फिर हरेक साल… फिर… … …
कई-कई बीमारियों से जूझती- हाँफती अकेली माँ को अपने पास रखकर मैं उनका इलाज करवाती, ख्याल रखती। स्वस्थ महसूसते ही माँ वापस चलीं जातीं।
एक बार मैंने माँ से पूछा- “माँ ! जब आपने मेरी पढ़ाई-लिखाई और बाकी परवरिश में, मुझमें और भैया में कोई फ़र्क नहीं किया तो, मेरे साथ रहने में आपको क्या तकलीफ़ है?”
“बेटा और बेटी में फ़र्क नहीं है तो क्या हुआ, बेटा और दामाद में तो है न ! मैं अपने दामाद के घर ज्यादा दिन तक कैसे रह सकती हूँ?”
“दामाद का घर ? फिर मेरा… ?”
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9–बिटिया है तू
उस बंगले के सामने खूबसूरत लॉन था। जिसमें, एक बूढ़ा माली पौधों की देखभाल किया करता था। क्यारियाँ बना-बनाकर मौसमी और रंग-बिरंगे गुलाबों के पौधे लगाता। एक दिन जब माली घास की सफाई कर रहा था, तभी उसने देखा कि लम्बे बेतरतबी से उग आए घास के बीच अमरूद का एक नन्हा- सा पौधा सहमा-सहमा झाँक रहा है। उसने घास के साथ-साथ उसे भी उखाड़ना चाहा; लेकिन एक अन्तर्ध्वनि ने उसके हाथ रोक दिए। मानो वह नन्हा पौधा कह रहा हो- ‘मुझे जीने दो!’
माली ने सोचा कि यह एक कोने में है, क्यों न इसे छोड़ दिया जाए ! नन्हा पौधा जीवनदान पाकर खुशी से झूम उठा। जल्द ही उसमें से शाखाएं फूटने लगीं और देखते-ही-देखते उसने छोटे से पेड़ का रूप धारण कर लिया
बंगले का मालिक सुबह-शाम बड़े ही गर्व के साथ लॉन में टहलता। एक दिन जब उनकी नज़र अमरूद के पेड़ पर पड़ी, तो उन्होंने उस पेड़ को तत्काल काटकर कुछ अच्छे फूलों के पौधे लगाने का आदेश दिया। लेकिन माली को न जाने उससे कैसा रिश्ता जुड़ गया था कि वह, उसे काट नहीं पाया। बस उसकी कुछ लम्बी शाखाओं को छाँट दिया।
कुछ महीने के बाद माली बीमार पड़ गया। लॉन की सफाई करने नहीं आ पाया। जब उसके पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा, तो उसने सोचा कि मैंने वर्षों से मालिक की सेवा की है। बीमारी की हालत में नहीं कर पाया, तो क्या मालिक मेरी सहायता नहीं करेंगे !
लेकिन उसकी उम्मीद पर तब पानी फिर गया जब मालिक उसे देखते ही आग-बबूला हो गया। और बोला, “कहाँ थे तुम इतने दिन? देखो क्या हालत हो गई है मेरे लॉन की? अगर तुमसे काम नहीं होता, तो मुझे दूसरे माली की व्यवस्था करनी पड़ेगी!”
जब मालिक ने उसके मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया, तो बूढ़ा माली हताश होकर अमरूद की छाँव में आकर बैठ गया और फूट-फूटकर रोने लगा। तभी, शीतल हवा का एक झोंका आया और कुछ पके हुए अमरूद उसके आसपास बिखर गए। बूढ़े माली ने सोचा, जिन गुलाबों की बेटों जैसी देखभाल की, वे सूख कर मुरझा गए, और जिसे खर-पतवार समझकर उखाड़ फेंकना चाहा, वही आज मेरी भूख मिटाने को आतुर है !
भावुक होकर बूढ़ा माली पेड़ से लिपट गया। उसके मुख से अनायास ही निकला- “तू तो बिटिया है री …!”
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10– रिवाज़
सिंह साहब के छोटे बेटे की शादी थी। रस्म शुरू होने से पहले सारे नाते-रिश्तेदारों ने नाश्ता किया। अब तमाम सेवक रसोइए नाश्ता कर रहे थे। तभी रामचन्दर ढोलकिया भी अपना ढोल लेकर पहुँचा। सिंह साहब की पत्नी ने देखा, तो अपनी बड़ी बहू से कहा-एक प्लेट उसे भी दे दो; लेकिन ध्यान रहे कि हाथ में नहीं देना। उसके सामने रख देना। उसके हाथ से छू जाने से फिर से नहाना पड़ेगा।”
“ऐसा क्या! फिर उन्हें बुलाया ही क्यों?” पढ़ी-लिखी इंजीनियर बहू ने आश्चर्य से पूछा।
“ऐसा है न बेटा! ऐसे लोगों को बुलाना हमारी मजबूरी है। वो क्या है न ! शादी-विवाह में कुम्हार, नाई, डोम सबकी जरूरत पड़ती है। इनके बिना हमारी रस्में पूरी ही नहीं होंगी। नहीं तो इन नीच जातों से जितना दूर रहो, वही ठीक है।”
हल्दी की रस्म शुरू करने से पहले श्रीमती सिंह, पूजा की थाल में चंदन,रोली आदि लेकर आईं और एक कोने में सिमट कर बैठे ढोलकिए से कहा- “बजाव हो बजाव! तहार ढोल पुजाई!”
रामचन्दर ढोल में थाप देने लगा। श्रीमती सिंह ढोलक में चंदन रोली लगाने लगी। आसपास खड़ी स्त्रियाँ गीत गाने लगीं। पाँच सुहागिनों को यह रस्म करना था। श्रीमती सिंह ने जब थाल बड़ी बहू की तरफ बढ़ाया तो, बहू ने पूजन का अनुसरण करने के बाद ढोलकिए के हाथ में बड़ी श्रद्धा से सगुन के रुपये रख दिए और हाथ को प्रणाम कर लिया।
श्रीमती सिंह का यह देखना था कि सबके सामने बहू पर चीख पड़ी- “ये क्या कर दिया तूने ! अब तो तुम्हें नहाना पड़ेगा!”
“नहीं मम्मी जी! नहाना क्यों पड़ेगा? जब मरे हुए जानवर के चमड़े से बने ढोल को छूने में कोई हर्ज़ नहीं तो, एक जीवित मनुष्य के चमड़े से इतना परहेज करना मुझे समझ में नहीं आता।”
आसपास के सन्नाटे के बीच बड़ी बहू को केवल रामचन्दर के चेहरे की मुस्कान और उसके जुड़े हाथ दिखाई दे रहे थे !!!!!
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