जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: January 1, 2025

1-शांति–मार्ग

धोबी का कुत्ता घर का, न घाट का। इस मुहावरे पर बहस हो रही थी। एक ने कहा, ‘‘धोबी के कुत्ते की नियति पर हँसने वाले हम कौन?’’

दूसरे ने कहा, ‘‘हाँ, हम कौन? हम भी तो कुत्ते–से हैं।’’

तीसरे ने कहा, ‘‘कुत्ते–से मत कहो। कुत्ते हैं, कुत्ते। और धोबी के ही हैं।’’ इस पर सब हँस पड़े और अपने–अपने घर चले गए और उस रात सब मजे से सो गए।

अगले दिन फिर मिले। एक ने दूसरे को छेड़ दिया, ‘‘और कुत्ते? मेरा मतलब धोबी के कुत्ते।’’ इतना कहना था कि वह उस पर लात–घूंसों से पिल पड़ा। उसे मार–मार कर अधमरा कर दिया, हालांकि वह उनका मित्र था।

और हुआ यह कि सबने एक–दूसरे से मिलना बंद कर दिया। सबने माना कि सुख–शांति से रहने का यही एकमात्र उपाय है।

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2-झूठी औरत

एक

‘‘मैं तंग आ गई हूँ इन बच्चों से। जान ले लूँगी इनकी।’’ यह कहने वाली माँ अभी–अभी अपने पति से झगड़ रही थी, ‘‘बिना बच्चों के अकेले कहीं नहीं जाऊँगी। मेरा मन इनके बिना नहीं लगता है।’’

दो

‘‘लोग तो एक–एक पैसे के लिए जान छोड़ते हैं। हमीं क्यों छोड़ें अपने दस रुपए। बिना मांगे पड़ोसी देनेवाले नहीं। हमें बेशर्म होकर माँगना पड़ेगा।’’

यही औरत थोड़ी देर पहले अपने पति से कह रही थी, ‘‘बिचारों की हालत खस्ता है। मुझसे तो देखा नहीं जाता हम और तो क्या कर सकते हैं? उसके बच्चों को किसी न किसी बहाने घर बुलाकर खाना खिला देती हूँ।’’

तीन

‘‘तुमने दस की फिजूलखर्ची की, मैं बीस की करूँगी। मैं अब चौदह रुपये की सड़ी चप्पलें नहीं लाने वाली। चालीस–पचास की लाऊँगी।’’

यही औरत सुबह कह रही थी, ‘‘मुझसे नहीं होती तुम्हारे जैसी फिजूलखर्ची। मैं नई चप्पल कतई नहीं लानेवाली। दो कीलें लगवा लूँगी तो यह चप्पल महीने–दो महीने तो और चल जाएगी।’’

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3-हाथी के दाँत

हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और, लेकिन बच्चों को उसके खिलौने के दाँत प्रिय थे, क्योंकि वे सुंदर थे। बड़ों को भी वे प्रिय थे, क्योंकि कीमती थे। एक बार बच्चे हाथी के पास गए। उन्होंने कहा, ‘‘हाथी दादा, हाथी दादा, अपने दाँत हमें दे दो।’’

हाथी ने कहा, ‘‘खाने के तो दे नहीं सकता। दिखाने के चाहो तो ले लो।’’

‘‘हाँ–हाँ, हमें दिखाने के ही चाहिए। बड़े सुंदर हैं। हम इनसे खेलेंगे।’’ बच्चों ने एक स्वर से कहा।

‘‘लेकिन बड़े तुम्हें खेलने देंगे?’’ हाथी ने कहा।

बच्चों ने कहा, ‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं? बड़ों को हमारे खेलने से कोई एतराज नहीं है। वे तो बस इतना चाहते हैं कि हम खतरनाक चीजों से न खेलें।’’

हाथी ने व्यंग्य से मुस्कराकर कहा, ‘‘ये भी खतरनाक हैं।’’

‘‘नहीं, आप झूठ बोलते हैं। खतरनाक नहीं है।’’ बच्चों ने उत्तर दिया। हाथी ने कुछ सोचकर कहा, ‘‘अच्छा चलो, ले जाओ मेरे दांत। बड़े जब मेरे दाँत मांगें तो कहना, हाथी से सावधान, हाथी की पूँछ भले ही छोटी हो, उसके पाँव बहुत भारी होते हैं। वे आदमी को कुचल सकते हैं। फिर भी वे माँगें दाँत तो कहना, सावधान, हाथी को अपने दिखाने के दाँतों से भी उतना ही प्यार होता है, जितना खाने के दाँतों से, और हाथी दूर भी नहीं है। यहीं–कहीं है।’’

बच्चे घर आए। हाथी के दाँत लाए। बड़ों ने देखे। बड़े बच्चों के लिए बड़े–बड़े तोहफे, सुंदर–सुंदर खिलौने लाए। उन्हें सैर के लिए ले गए। बच्चे हाथी के दाँतों को भूल गए। बड़े गुपचुप उन्हें ले गए और उन्होंने अपना काम कर लिया।

उधर हाथी बहुत खुश रहा करता कि बच्चे उसके दाँतों से खेल रहे होंगे। और एक दिन, जब वह बच्चों की खुशी का अंदाजा लेने आया, तो बच्चे बड़े हो चुके थे।

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4-चोर और कोतवाल

एक बड़ा चोर था। अपनी पेशेवर जिम्मेदारियाँ पूरी करने वह घर से निकला था। अचानक चारों तरफ से उसे पुलिस ने घेर लिया।

चेर पहले तो घबराया। फिर उसने देखा कि कोतवाल उसे सैल्यूट कर रहा है तो उसका विश्वास लौटा। चोर ने कोतवाल को डांटते हुए कहा : ‘क्यों कोतवाल साहब, हमारी हैसियत तुम्हें नहीं मालूम? हमें गिरफ्तार करोगे, इतनी हिम्मत बढ़ गई है तुम्हारी?’

केतवाल ने सैल्यूट करते ही करते कहा : ‘सर, आपको गलतफहमी हो गई है। गृहमंत्री का आदेश है कि आपकी जान को खतरा है, सो फौरन आपकी जेड सैक्यूरिटी का इंतजाम होना चाहिए। हुजूर, हम तो आपकी सेवा में आए हैं।’

चोर ने पूछा, ‘मगर ससुर, तुम साथ रहोगे तो हम चोरी कैसे करेंगे?’

कोतवाल ने जवाब दिया, ‘सर, हम अपना काम करेंगे, आप अपना काम करते रहिए। हम आपकी सुरक्षा देंगे और आप चोरी करते रहिए।’

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5-जीवनगाथा

मैं बहुत खाता था।

बहुत खाने से बहुत से रोग हो जाते हैं इसलिए सुबह और शाम दौड़ा करता था।

बहुत दौड़ने से बहुत थक जाता था इसलिए बहुत सोता था।

बहुत सोने से स्वास्थ्य बहुत अच्छा रहता है इसलिए बहुत खाता था।

और इस सबमें बहुत थक चला जाता था इसलिए कमाने का काम मैं अपने मजदूरों और क्लर्कों पर छोड़ दिया करता था।

और इस तरह एक दिन मैं मर गया। मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब मरा।

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6-खूनी कार

मेरे पास एक कार थी। उसकी खूबी यह थी कि वह पेट्रोल की बजाय आदमी के ताजे खून से चलती थी।

वह हवाई जहाज की गति से चलती थी और मैं जहाँ चाहूँ, वहाँ पहुँचाती थी, इसलिए मैं उसे पसंद भी खूब करता था। उसे छोड़ने का इरादा नहीं रखता था।

सवाल यह था कि उसके लिए रोज–रोज आदमी का खून कहाँ से लाऊँ?

एक ही तरीका था कि रोज दुर्घटना में लोगों को मारूँ और उनके बहते खून से कार की टंकी भरूँ।

मैंने सरकार को अपनी कार की विशेषताएं बताते हुए एक प्रार्थना पत्र दिया और निवेदन किया कि मुझे प्रतिदिन सड़क दुर्घटना में एक आदमी को मारने की इजाजत दी जाए।

सरकार की ओर से पत्र प्राप्त हुआ कि उसे मेरी प्रार्थना इस शर्त के साथ स्वीकार है कि कार को विदेशी सहयोग से देश में बनाने पर मुझे आपत्ति नहीं होगी।

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7-इलाज

एक माँ अपने छह साल के बच्चे को लेकर डॉक्टर के पास गई।

उसने डॉक्टर से कहा–वैसे तो मेरा बच्चा स्वस्थ–प्रसन्न है। खूब दूध पीता है, डटकर खाना खाता है, छककर मिठाई खाता है, मुट्ठी भर–भरकर नमकीन खाता है, जी भर खेलता है, मेहनत से पढ़ता है, रंग ला दो, तो ढेरों पेटिंग बनाकर रख देता है, सुरीला गाना गाता है, खूब खुश रहता है। लेकिन एक समस्या है। यह कोकाकोला–पेप्सी नहीं पीता, नेस्ले की चाकलेट नहीं खाता, होस्टेस की पोटेटो चिप्स नहीं खाता, लिओ के खिलौने नहीं खेलता, मैगी के नूडल्स नहीं खाता, डॉल्ट्स की आइसक्रीम नहीं खाता। पता नहीं इसे क्या बीमारी है? मैं बहुत परेशान हूँ डॉक्टर साहब।

डॉक्टर साहब भी चक्कर में। ऐसा केस पहले कभी नहीं आया था। उन्होंने बच्चे का सीना, पेट, पीठ, दाँत, मुँह, आँख, नाखून सब देख लिये। टट्टी- पेशाब का रंग भी पूछ लिया। दिन में कितनी बार जाता है, यह भी जान लिया। एक्सरे ले लिया। सब ठीक था। लेकिन आसामी बड़ा था। डॉक्टर मरीज को यों ही हाथ से जाने देना नहीं चाहता था।

वह सोचता रहा, सोचता रहा। अचानक उसने पूछा–‘यह टीवी और वीडियो देखता है?’

माँ ने कहा–‘डॉक्टर साहब, मैं हड़बड़ी में यह बताना ही भूल गई कि यह टीवी और वीडियो नहीं देखता। इस बात से तो मैं सबसे ज्यादा परेशान हूँ।’

डॉक्टर ने जवाब दिया, ‘चिंता मत कीजिए। मैं इसे टीवी और वीडियो देखने का सात दिन का कोर्स देता हूँ। आपको तीसरे दिन से बच्चे की हालत में सुधार नजर आएगा।’

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