1- अजनबी
रात के नौ बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर खाना सज चुका था। घर के चारों सदस्य मौजूद थे, लेकिन वहाँ ‘बातचीत’ की जगह सिर्फ बर्तनों के टकराने की आवाजें और मोबाइल के ‘नोटिफिकेशन’ का शोर था।
अनिल अपनी कंपनी के ई-मेल्स का जवाब दे रहे थे। उनके चेहरे पर काम का तनाव साफ झलक रहा था। उनके लिए परिवार के साथ डिनर भी एक मल्टीटास्किंग का हिस्सा था।
सुनीता खाने का स्वाद चखने से पहले उसकी एक ‘परफेक्ट’ तस्वीर लेने में व्यस्त थीं। उसे इंस्टाग्राम पर पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा— “फैमिली डिनर टाइम। विडंबना यह थी कि उस वक्त उन्होंने अपने बगल में बैठे पति से पानी तक नहीं मांगा था।
रोहन के कानों में शोर रद्द करने वाले हेडफ़ोन थे। वह किसी वर्चुअल गेमिंग की दुनिया में खोया हुआ था। वह शारीरिक रूप से वहाँ था, लेकिन मानसिक रूप से सात समंदर पार अपने ‘ऑनलाइन फ्रेंड्स’ के साथ युद्ध लड़ रहा था।
बीच में बैठे दादाजी चुपचाप अपनी दाल-रोटी के टुकड़े तोड़ रहे थे। आज उनके बचपन के सबसे पुराने दोस्त का देहांत हो गया था। उनका मन भारी था, वे अपनी यादें साझा करना चाहते थे। वे बताना चाहते थे कि कैसे उन्होंने और उनके दोस्त ने मिलकर गांव के उस पुराने बरगद के नीचे घंटों बिताए थे।
उन्होंने गला साफ किया और कहा, “सुनो, आज बनवारी चला गया…”
अनिल ने बिना सिर उठाए टाइप करना जारी रखा और सिर्फ “हम्म…” कहा। सुनीता अपने पोस्ट पर आने वाले ‘लाइक’ गिन रही थीं, और रोहन को तो कुछ सुनाई ही नहीं दिया।
दादाजी ने एक बार फिर कोशिश की, “अनिल, तुम्हें याद है? बचपन में बनवारी तुम्हें अपने कंधे पर बैठाकर मेला दिखाने ले जाता था…”
अनिल ने झुंझलाकर फ़ोन नीचे रखा और कहा, “पापा, प्लीज! मैं एक बहुत जरूरी डील फाइनल कर रहा हूं। ये पुरानी बातें बाद में नहीं हो सकतीं?”
दादाजी चुप हो गए। उन्होंने देखा कि कमरे में हाई-स्पीड वाई-फाई तो था, लेकिन भावनाओं के आदान-प्रदान के लिए कोई ‘सिग्नल’ नहीं बचा था।
अचानक, घर की बिजली गुल हो गई। वाई-फाई का राउटर बंद हो गया और चारों तरफ सन्नाटा छा गया। रोहन चिल्लाया, “ओह शिट! मेरा गेम डिस्कनेक्ट हो गया!” सुनीता परेशान हो गईं; क्योंकि उनकी स्टोरी अपलोड नहीं हुई थी।
अंधेरे में, मोबाइल की स्क्रीन की रोशनी में सबके चेहरे अजीब और डरावने लग रहे थे। कुछ पलों के लिए सब एक-दूसरे के सामने थे; लेकिन किसी के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे। वे एक-दूसरे के लिए अजनबी बन चुके थे।
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2- सन्नाटा
सात साल के आरव के लिए उसका घर किसी आलीशान महल से कम नहीं था। उसके पास दुनिया के बेहतरीन खिलौने थे, लेटेस्ट गेमिंग कंसोल था और एक अलग कमरा भी। लेकिन उस कमरे की दीवारों पर छाई खामोशी अक्सर उसे डराती थी।
आज आरव बहुत खुश था। स्कूल में हुई चित्रकला प्रतियोगिता में उसे प्रथम पुरस्कार मिला था। उसने एक बहुत सुंदर चित्र बनाया था— “मेरा सुखी परिवार”। उस चित्र में आरव ने अपने मम्मी और पापा का हाथ थाम रखा था और तीनों के चेहरों पर बड़ी सी मुस्कान थी।
आरव दौड़ता हुआ घर पहुँचा। उसे उम्मीद थी कि आज तो मम्मी उसे गले लगा लेंगी।
मम्मी: सोफे पर बैठी थीं, लेकिन उनका ध्यान फ़ोन पर था। वह अपने ‘पेरेंटिंग व्लॉग’ के लिए एक वीडियो एडिट कर रही थीं, जिसका शीर्षक था— “बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम कैसे बिताएं?”
“मम्मी! देखो मुझे गोल्ड मेडल मिला!” आरव चिल्लाया।
मम्मी ने बिना नजरें ऊपर उठाए कहा, “अरे वाह! बहुत अच्छे बेटा। उसे टेबल पर रख दो। और देखो, मेडल के साथ एक अच्छी सी फोटो खिंचवा लो, मुझे अपने फॉलोअर्स के साथ शेयर करनी है। बस दो मिनट, मेरा रेंडर (Render) खत्म हो जाए।”
आरव का उत्साह थोड़ा कम हुआ। वह पापा के स्टडी रूम की तरफ भागा।
पापा: लैपटॉप के सामने बैठे एक इंटरनेशनल क्लाइंट के साथ ज़ूम कॉल पर थे। आरव ने जैसे ही दरवाजा खोला, पापा ने होंठों पर उंगली रखकर उसे शांत रहने का इशारा किया और गुस्से में दरवाजा बंद करने का संकेत दिया।
आरव वापस अपने कमरे में आ गया। उसने उस मेडल को देखा, जिसकी चमक अब उसे फीकी लग रही थी। उसने अपनी उस ड्राइंग को निकाला जिसे वह गर्व से दिखाना चाहता था।
उसने गौर किया कि उस चित्र में उसने सबके हाथ तो जोड़े थे, लेकिन असलियत में उसके मम्मी-पापा के हाथ हमेशा ‘फ़ोन’ से जुड़े रहते थे।
तभी मम्मी कमरे में आईं। “चलो आरव, अब मेडल पहनो। एक अच्छी रील बनानी है। मुस्कुराओ और बोलो—“थैंक यू मम्मी फॉर योर सपोर्ट’!”
आरव ने मेडल पहना, कैमरे की तरफ देखकर नकली मुस्कान दी और स्क्रिप्टेड लाइन बोल दी। मम्मी खुश होकर दूसरे कमरे में चली गईं, ताकि उसे ‘पोस्ट’ कर सकें।
रात को जब मम्मी-पापा सो गए, आरव ने अपनी उस ड्राइंग को निकाला। उसने काले रंग का स्केच पेन लिया और चित्र में मम्मी और पापा के हाथों के बीच से अपना हाथ मिटा दिया। अब उस ड्राइंग में मम्मी अपने फ़ोन के साथ थीं, पापा अपने लैपटॉप के साथ, और आरव एक कोने में बिल्कुल अकेला।
उसने चित्र के नीचे बड़े अक्षरों में लिखा—“मम्मी, क्या मुझे भी ‘लाइक’ पाने के लिए स्क्रीन के अंदर जाना होगा?”
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3- गड्ढा
शहर के वार्ड नंबर 42 में चुनावी हलचल तेज थी। गलियों में झंडे लहरा रहे थे और चाय की दुकानों पर चर्चाओं का बाजार गर्म था। मोहल्ले की मुख्य सड़क पर एक विशाल ‘चुनावी गड्डा’ था, जो पिछले तीन सालों से हर मानसून में एक छोटे तालाब का रूप ले लेता था।
रोहन, एक युवा और जोश से भरा नया कार्यकर्ता, अपने नेता ‘खन्ना जी’ के पास पहुँचा। खन्ना जी पिछले दस सालों से पार्षद थे और इस बार फिर से अपनी दावेदारी ठोक रहे थे।
रोहन: “खन्ना जी, इस बार जनता बहुत गुस्से में है। कल उस गड्ढे की वजह से एक बुजुर्ग गिर गए। क्यों न हम चुनाव से हफ्ता भर पहले इसे चुपचाप भरवा दें? लोगों को लगेगा कि आपने काम शुरू करवा दिया है।”
खन्ना जी ने अपनी सफेद खादी की आस्तीन चढ़ाई, चश्मा नाक पर टिकाया और एक गहरी मुस्कान के साथ बोले, “बेटा, तुम अभी राजनीति की वर्णमाला सीख रहे हो। अगर गड्डा आज भर गया, तो कल लोग उसे भूल जाएंगे।”
रोहन: “लेकिन सर, विकास ही तो सबसे बड़ा मुद्दा है?”
खन्ना जी: “गलत! राजनीति में मुद्दा सुलझाने के लिए नहीं, जिंदा रखने के लिए होता है। अगर गड्डा भर गया, तो मैं कल वहाँ खड़े होकर भाषण किस पर दूँगा? नगर निगम की लापरवाही पर किसे कोसूँगा? और जनता को ‘जीतने के बाद मखमली सड़क’ का सपना कैसे दिखाऊँगा?”
चुनाव से दो दिन पहले खन्ना जी उसी गड्ढे के पास अपने समर्थकों के साथ धरने पर बैठ गए। स्थानीय अखबारों में फोटो छपी— “जनता के लिए सड़क पर उतरे खन्ना जी”। उन्होंने विपक्ष पर बजट डकारने का आरोप लगाया और भावुक होकर वादा किया कि शपथ लेने के अगले 24 घंटे के भीतर यहाँ सड़क नहीं, ‘शीशा’ चमकेगा।
परिणाम: चुनाव हुए। खन्ना जी भारी मतों से जीत गए। जीत का जुलूस उसी गड्ढे के बगल से निकला, बस फर्क इतना था कि इस बार गड्ढे के ऊपर खन्ना जी के ‘विजयी होने पर आभार’ वाला भारी-भरकम होर्डिंग लगा था।
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4- दूरी
वर्मा जी का घर शहर की सबसे आलीशान सोसाइटी की 15वीं मंजिल पर था। घर ‘स्मार्ट’ था—दरवाजे आवाज से खुलते थे, लाइटें सेंसर से जलती थीं और रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर फर्श साफ करता रहता था। लेकिन उस 4-BHK के घर में एक चीज़ की भारी कमी थी—आवाज की।
उनके बेटे समीर और बहू तान्या दोनों मल्टीनेशनल कंपनी में बड़े पदों पर थे। पोता, आरव, स्कूल से आने के बाद सीधे अपने कमरे में जाकर वीडियो गेम्स और ऑनलाइन दुनिया में खो जाता।
एक शाम, वर्मा जी ने डाइनिंग टेबल पर सबको साथ देखा। उन्होंने उत्साह से कहा, “आज खाने के बाद हम सब पुराने फोटो एलबम देखेंगे क्या? वह तुम्हारे बचपन वाली…”
समीर ने फ़ोन से नजरें हटाए बिना कहा, “पापा, एलबम की क्या जरूरत है? सब कुछ क्लाउड पर सेव है, जब मन करे देख लीजिए। अभी मुझे एक कॉन्फ़्रेंस कॉल अटेंड करनी है।”
तान्या ने भी अपनी स्मार्टवॉच देखते हुए कहा, “सॉरी पापा, मेरा कल प्रेजेंटेशन है, मुझे तैयारी करनी है।” आरव तो अपने हेडफ़ोन लगाए पहले ही अपने कमरे की ओर बढ़ चुका था।
वर्मा जी अपनी थाली लेकर बालकनी में आ गए। सामने हजारों रोशनियां जगमगा रही थीं, पर उन्हें अपना घर अंधेरा सा लगा। उनके पास बात करने के लिए ‘एलेक्सा’ तो थी, जिसे वह पूछ सकते थे कि “आज मौसम कैसा है?”, लेकिन उनके पास कोई ऐसा नहीं था जिससे वह कह सकें कि “आज मेरा मन उदास है।”
तभी आरव के कमरे से चिल्लाने की आवाज आई। वह ऑनलाइन गेम में किसी अनजान दोस्त से बात कर रहा था। वर्मा जी मुस्कुराए, पर उस मुस्कुराहट में दर्द था। लाखों की भीड़ वाले शहर और करोड़ों के इंटरनेट कनेक्शन वाले घर में भी, हर शख्स अपने-अपने टापू पर अकेला जी रहा था।
उन्होंने ठंडी साँस भरी और अँधेरे आसमान की ओर देखते हुए सोचा—”हम जुड़ तो पूरी दुनिया से गए हैं, बस अपनों से ही दूर हो गए।”
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5 अपलोड’ और ‘अपडेट’ का रिश्ता
शालिनी और मयंक की ‘सालगिरह’ (Anniversary) थी। शहर के सबसे महंगे रेस्तरां में टेबल बुक थी। शालिनी ने एक हफ्ता पहले ही अपनी ड्रेस पसंद की थी और मयंक ने भी ऑफिस से जल्दी छुट्टी ले ली थी।
रेस्तरां पहुँचते ही मयंक ने मेन्यू कार्ड बाद में उठाया, पहले अपनी जेब से लेटेस्ट मॉडल का फ़ोन निकाला। शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा, “मयंक, आज तो कम से कम फ़ोन साइड में रख दो।”
मयंक ने बिना देखे जवाब दिया, “अरे बस दो मिनट, एक चेक-इन डाल दूँ और तुम्हारी एक अच्छी सी फोटो ले लूँ, वरना लोगों को पता कैसे चलेगा कि हम सेलिब्रेट कर रहे हैं?”
शालिनी ने पोज दिया। फोटो खींची गई। मयंक अगले दस मिनट तक फिल्टर चुनने और एक ‘परफेक्ट’ कैप्शन लिखने में व्यस्त रहा— “My World, My Life, Anniversary Vibes!” जैसे ही फोटो अपलोड हुई, मयंक के फ़ोन पर नोटिफिकेशन की झड़ी लग गई। वह हर लाइक और कमेंट का जवाब देने में मशगूल हो गया। उधर शालिनी भी अपने फ़ोन पर सहेलियों के ‘विश’ (Wishes) का जवाब देने लगी।
मेज पर खाना आ गया था, जो अब ठंडा हो रहा था। दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं थी। बस बीच-बीच में मयंक कह देता, “देखना, रोहन ने क्या कमेंट किया है?” या शालिनी कहती, “मेरी इस फोटो पर 200 लाइक्स आ गए!”
तभी बगल वाली टेबल पर एक बुजुर्ग दंपत्ति आए। उनके पास कोई फ़ोन नहीं था। वे एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे, पुरानी बातें कर रहे थे और एक ही सूप के बाउल से हँसते हुए साझा कर रहे थे। मयंक ने उन्हें देखा और फिर अपने फ़ोन की स्क्रीन पर लौट आया।
रात को घर लौटते समय कार में सन्नाटा था। घर पहुँचकर शालिनी ने अपनी फोटो के नीचे आए 500 लाइक्स देखे और उसे लगा कि उसकी सालगिरह बहुत ‘सफल’ रही। लेकिन जैसे ही उसने फ़ोन चार्जिंग पर लगाया और सन्नाटा पसरा, उसे महसूस हुआ कि पूरे तीन घंटों में मयंक ने एक बार भी उसकी आँखों में देखकर यह नहीं कहा— “तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो और मैं तुम्हारे साथ खुश हूँ।”
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