अभी कुछ ही दिनों पूर्व मैंने कही पढ़ा कि साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने चार लघुकथा–लेखकों से उनकी लघुकथाओं का पाठ कराया और पठित लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ भी हुई। यह पढ़कर मुझे अच्छा लगा। पुन: कल सुना कि हिन्दी अकादमी ने भी कुछ लघुकथाकारों को सादर आमंत्रित करके उनकी लघुकथाएँ सुनीं। मुझे अतीव प्रसन्नता हुई। इस प्रसन्नता का कारण है कि वरिष्ठ लघुकथाकारों ने लघुकथा के अस्तित्व को मनवाने हेतु जो आन्दोलन विगत चार दशकों से चला रखा था ,उसकी मान्यता प्राय: अब प्रत्येक उस स्तर पर प्राप्त हो चुकी है ;जो स्थापित विधाओं को हुआ करती है, या प्राप्त है। तात्पर्य यह है कि लघुकथा अपने समय के साथ–साथ कदम–ताल मिलाकर विकास के नित्य –नये प्रतिमान स्थापित करती जा रही है। उसी विकास–यात्रा का एक पड़ाव लघुकथा अनवरत है जिसका संपादन–कार्य चर्चित लघुकथाकार द्वय सुकेश साहनी एवं रामेश्वर काम्बोज हिमांशु ने किया है, जिस का प्रकाशन अयन प्रकाशन, नई दिल्ली से 2016 के जनवरी माह में हुआ है। इस साफ–सुथरे एवं श्रेष्ठ संकलन में 64 चर्चित एवं नव्य लघुकथाकारों की लघुकथाएँ शामिल की गई हैं। प्रत्येक लेखक को अधिकतम चार पृष्ठ आबंटित किए है । उनमें उनका सचित्र परिचय एवं लघुकथाएँ दी गई हैं। कहना न होगा चर्चित लघुकथाकार जो अपनी रचनाओं के माध्यम आज भी स्वयं को सिद्ध करते हैं, उनमें सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, श्याम सुन्दर अग्रवाल, बलराम अग्रवाल, मधुदीप , डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र, डॉ कमल चोपड़ा, सुभाष नीरव, राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’ इत्यादि प्रमुख हैं। इन सभी लघुकथाकारों की कथाओं की विशेषता यह है कि इनकी लघुकथाओं में संवेदना का पुट इस स्तर तक प्रभावी है कि पढ़ते पाठक भावुकता की सीमा का स्पर्श करने लगता है। अब सुकेश साहनी की ‘मास्टर’ लघुकथा को देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त हिमांशु की ‘कालचिड़ी’ श्यामसुन्दर अग्रवाल की ‘चमत्कार’, डॉ मिथिलेश कुमार मिश्र की ‘मैं एक माँ हूँ’, कमल चोपड़ा की ‘इतनी दूर’, राजेन्द्र मोहन त्रिावेदी ‘बन्धु’ की ‘लिफ़ट’ इत्यादि लघुकथा ही देखा–परखा जा सकता है।
कुछ वरिष्ठ लघुकथा–लेखकों की लघुकथाएँ अपनी श्रेष्ठ प्रस्तुति के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं।
उनमें भी जो लघुकथाएँ अपने प्रति कारण उद्धरणीय बन गई है। इन लघुकथाओं में डॉ श्यामसुन्दर ‘दीप्ति’ की ‘उड़ान’, सुभाष नीरव की ‘जानवर’, बलराम अग्रवाल की ‘कीड़ा’ मधुदीप की ‘हिस्से का दूध’, सुदर्शन रत्नाकर की ‘दूरियाँ’ इत्यादि महत्त्वपूर्ण है। वस्तुत: श्रेष्ठ लघुकथाएँ परखने हेतु जहाँ संवेदना का स्तर एवं उनका प्रतिपादन महत्त्वपूर्ण है वहीं पात्रों का संघर्ष, संवादों की भाषा–शैली और लघुकथा की गहराई को प्रत्यक्ष करना शीर्षक भी महत्त्वपूर्ण हैं। मुझे प्रसन्नता है कि इन दोनों संपादकों ने अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए प्राय: सभी लघुकथाओं में इन अनिवार्य अवयवों पर गंभीरता से विचार करते हुए लघुकथाओं का चुनाव किया है। यही कारण है कि अपेक्षाकृत कम चर्चित या अपेक्षाकृत कापफी नये लेखकों ने भी इन अवयवों को ध्यान में रखकर अपनी प्रतिभा को सिद्ध करने में पर्याप्त सपफलता प्राप्त की है। उदाहरणार्थ डॉ ध्रुवकुमार की ‘माँ’, विभारश्मि की ‘कंगाल’, कमल कपूर की ‘सभ्य लोग’, प्रियंका गुप्ता की ‘भूंकम्प’, हरदीप कौर ‘सन्धु’ की ‘खूबसूरत हाथ’, अनिता ललित की ‘सांमजस्य’, पवित्रा अग्रवाल की ‘श्रद्धाजलि’, शशिपाधा की ‘अपनी–अपनी सोच’ ,छवि निगम की ‘लिहाफ़’ को देखा–परखा जा सकता है।
इस संकलन की सभी लघुकथाओं में जो एक बात ‘कॉमन’ है वह है इनका ‘कथ्य’ यानी लेखक जो अपनी बात कहना चाहता है , जो लेखक का उद्देश्य है सभी लघुकथाओं का उद्देश्य मानवोत्थान है। यानी मानव के उत्थान हेतु रचना का सृजन मेरी ऐसी मान्यता है जिस रचना का उद्देश्य मानवीय न हो वस्तुत: वह साहित्य है ही नहीं किन्तु लघुकथा अनवरत में संपादक इस दृष्टि से भी पूरी तरह सतर्क रहे हैं। यही कारण है कि इस संकलन की प्रत्येक रचना अपने उद्देश्य में सफल है ; किन्तु जो लघुकथाएँ इस दृष्टि से बरबस पाठकों की ओर यान आकर्षित करती हैं उनमें दीपक मशाल की ‘बँटवारा’ रचना श्रीवास्तव की ‘निरुत्तर’ नीलिमा शर्मा की ‘पाचन–शक्ति, कृष्णा वर्मा की ‘मज़हब’, सुधाकर आशावादी की ‘सुसंस्कार’, सीमा स्मृति की ‘भविष्य’, अचर्ना तिवारी की ‘गिद्ध ’ इत्यादि प्रमुख है। कुल मिलाकर मैं यह कहने की स्थिति में हूँ कि लघुकथा अनवरत में चयनित लघुकथाएँ पाठकों एवं लेखकों से सीध संवाद करते हुए बहुत कुछ कह जाती हैं और उनसे एक सहज आत्मीय सम्बन्ध भी बना ले ही किसी भी संकलन की सफलता का मानक निकष है।
रचनाकाल : 29–03–2016
सतीशराज पुष्करणा
‘लघुकथानगर ’ महेन्द्रू
पटना : 800006