श्री बख़्शी अभिवादन करने की मुद्रा में स्टाफ़रूम में घुसे। वहाँ बैठे दोनों अध्यापकों ने उनके अभिवादन का जवाब दिया और अपने काम में व्यस्त हो गए। श्री बख़्शी को इस विद्यालय में अध्यापक बनकर आए एक हफ़्ते के करीब हो रहा था। आवश्यकता से अधिक आत्मविश्वास, बड़बोलेपन और मुँहफट स्वभाव के होने के कारण समझदार लोग उनसे थोड़ा दूर ही रहने की कोशिश करते थे। चश्मे से झाँकती उनकी तीर जैसी नज़र हर चीज़ का एक्स-रे लेने को उत्सुक रहती थी। अचानक उनकी निगाह कोने पर पड़ी किसी चीज़ पर पड़ी। उन्होंने जाकर उसे उठाया, तो वह एक सोने की अँगूठी थी। उन्होंने लपककर उसे उठाया और वहाँ बैठे अध्यापकों से पूछा कि वह अँगूठी उनकी है क्या ! उन दोनों ने “ना” में सिर हिला दिया। इसपर श्री बख़्शी बोले,
“अजी !शुकर कीजिए कि मैंने देख लिया वरना सफ़ाई कर्मचारी तो अब तक इसपर अपने हाथ साफ़ कर गया होता। हम्म्म….”
उस दिन श्री बख़्शी ने हर मिलने वाले को अपना यह कार्य बढ़ा-चढ़ाके बताया, इस वाक्य के साथ कि अजी शुकर कीजिए कि मैंने देख लिया वरना सफ़ाई कर्मचारी तो अब तक इसपर अपने हाथ साफ़ कर गया होता। हम्म्म….।
अगले दिन जब वे सीना ताने स्टाफ़ रूम में प्रवेश करने लगे तो वहाँ एक लड़के को मेज़ का सामान ठीक करते हुए देखकर बोल पड़े,“क्या बात है भाई? कौन हो तुम और क्या ढूँढ रहे हो?”
इसपर वह लड़का बोला, “अपनी सोने की चेन खोज रहा हूँ, यहीं कहीं गिरी थी।”
इसपर बख़्शी जी बोले, “अरे कहाँ ! यहाँ तो केवल अँगूठी ही गिरी थी, जो मैंने कल लॉस्ट प्रॉपर्टीज़ में जमा करवा दी थी। शुकर करो मैंने देख लिया वरना…”
बीच में ही वह लड़का बोल पड़ा, “नहीं -नहीं ! चेन भी थी साथ में। आप कैसे कह रहे हैं?”
इस बात पर श्री बख़्शी को बहुत ज़ोर का ग़ुस्सा आया और वे बोले, “तुम्हारा मतलब क्या है? क्या मैंने वह चेन चुरा ली?”
लड़के ने बेधड़क होकर कहा,“अब मुझे क्या पता सर!”
अब तो श्री बख़्शी का मुँह तमतमा उठा वे चिंघाड़ उठे,“ख़बरदार ! तुम समझते क्या हो अपनेआप को? तुम मुझे जानते भी हो?”
इसपर वह लड़का बोला,“जी सर, यही तो मैं भी कहना चाहता हूँ!”
बख़्शी जी बोले, “क्या मतलब?”
लड़के ने कहा, “मतलब वही सर -जिस तरह मैं आपको नहीं जानता, उसी तरह आप भी मुझे कितना जानते हैं? मैं यहाँ का सफ़ाई कर्मचारी हूँ।”
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