लघुकथा समय की सही नब्ज़ पकड़ने के साथ ही ‘लघुकथा कलश’ के यशस्वी सम्पादक योगराज प्रभाकर ने अपनी राष्ट्रव्यापी लघुकथा आधारित अद्र्धवार्षिक पत्रिका ‘लघुकथा कलश’ का ग्यारहवाँ अंक ‘प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक’ के रूप में नए तेवर, नई चुनौती और नई सोच की त्रिगुणी धारा के रूप में जारी किया। प्रस्तुत अंक के प्रकाशित होने के पूर्व इस अंक के प्रकाशन की घोषणा के साथ ही लघुकथा के लेखकों के बीच प्रयोगधर्मी लघुकथा लिखने के तारतम्य में बड़ी हलचल पैदा हुईं। मतलब साफ था कि परम्परा से हटकर प्रयोगधर्मी लघुकथा लिखने के जोखिम भरे काम को आखिर उसके निष्कर्ष तक कैसे और किस तरह हल किया जाए, जिसके परिणामों से ‘लघुकथा कलश’ के ‘प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक’ में अपने स्थान निर्धारित किए जा सकें।
‘लघुकथा कलश’ के ‘प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक’ की घोषणा लघुकथा के लेखकों के मध्य संक्रमण-काल का अर्थ लेकर प्रकट हुईं। संक्रमण-काल यानी ‘वह समय जब कोई पहले रुप से बदलकर दूसरे रूप में आ रहा हो।’ लघुकथा लेखन की आम धारणा से दूर प्रयोगात्मक लघुकथा लिखने के व्यावहारिक तौर-तरीकों को समझने के लिए फेसबुक और व्हाट्सएप पर चर्चा-परिचर्चाओं के कई-कई दौर चलने लगे। दिमाग की घण्टियाँ बजने लगीं। बड़ा शोर उठने लगा। इस शोर का एकबारगी असर ‘लघुकथा कलश’ के सम्पादक योगराज प्रभाकर के सम्पादकीय कक्ष तक भी जा पहुँचा। स्वयं योगराज प्रभाकर को लगने लगा था कि ‘प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक‘ निकालने के तारतम्य में लघुकथा लेखकों के बीच आए दिन की खलबली कहीं उनके लघुकथा के प्रति विकासात्मक रूख को गति-शून्य न कर दे; लेकिन जहाँ साध्य और साधन पवित्र होते हैं, वहाँ संकल्प उठाकर की गई यात्रा कभी खण्डित नहीं हो सकती।
‘लघुकथा कलश’ के सम्पादक की टेबल पर अन्ततोगत्वा चामत्कारिक रुप में देश के कोने-कोने में प्रयोगधर्मी लघुकथाओं की विस्फोटक आमद शुरू हो गईं। इतनी कि स्वयं सम्पादक को अपने घोषित अंक के लिए प्रयोगात्मक लघुकथाओं को अपनी गहन अन्वेषी दृष्टि के माध्यम से अंक की सीमा के हिसाब में ज्यादा लघुकथाएँ चयनित करनी पड़ी। यह एक रिकॉर्ड है।
आखिर वह समय भी आ गया जब ‘लघुकथा कलश’ का ‘प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक’ (जनवरी-जून 2023) प्रकाशित होकर यथासमय अंक में शामिल लेखकों में वितरित किया गया। अंक को हाथो-हाथ लिया गया। अंक के सिलसिले में लघुकथाकारों की ओर से अच्छा प्रतिसाद मिलने लगा और आज यह स्थिति है कि अंक की प्रभावी चर्चा से जुड़कर कभी न लघुकथा लिखने वाले सहृदय पाठक भी अंक के संपादकीय कार्यालय से अंकों की माँग करने लगे।
इस बीच ‘लघुकथा.कॉम’ के संपादक और सुप्रसिद्ध लघुकथाकार सुकेश साहनी ने अपनी ‘फेसबुक-वॉल’ पर प्रस्तुत ‘प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक’ को लेकर अपने गवेषणात्मक अध्ययन का लेखा-जोखा जारी किया। इस तारतम्य में उन्होंने प्रस्तुत अंक में प्रकाशित 120 लघुकथाओं में से अपनी पसन्द की 41 लघुकथाओं का तटस्थ भाव से जिक्र किया (जिसका अवलोकन श्री सुकेश साहनी की फेसबुक वाल पर किया जा सकता है।) यानी साहनीजी ने अंक में जमा कुल लघुकथाओं में से 34.16 प्रतिशत लघुकथाओं को एक पाठक के रूप मंे अपनी पसन्द के करीब ठहराया। आज के समय में यह बड़ी दिक्कत की बात है कि विभिन्न लघुकथाकारों की ओर से समय-समय पर आने वाले लघुकथाओं के संग्रहों में उनकी श्रेष्ठ लघुकथाओं की गणना इतने उच्चांक पर नहीं होती। यानी प्रतिशत की जितनी बड़ी प्रशस्ति ‘लघुकथा कलश’ को बतौर सुकेश साहनी की पसंद के जरिए सामने आई है। यह निष्कर्ष स्वयं सम्पादक योगराज प्रभाकर के निर्णयों को पोषित करने वाला और अंक के प्रकाशन विषयक आश्वस्ति प्रदान करने वाला है।
लेकिन अंत में यह सवाल है कि स्वयं सुकेश साहनी की दो लघुकथाएँ क्रमशः ‘कोलाज’ और ‘आधे अधूरे’ अंक में सम्मिलित है। ऐसे में सुकेश साहनी ने स्वयं को अपनी पसंद के 41 लघुकथाकारों की लघुकथाओं के मापदण्ड से दूर रखा। इस प्रक्रिया से सन्नद्ध होकर मैं बतौर अन्वेषी सुकेश साहनी की अंक में मौजूदगी को लेकर सुकेश साहनी की पसंद के साथ अपनी (पाठकीय) पसंद को जोड़कर अंक में मेरी पसंद के 42 लघुकथाकारों को उनकी लघुकथाओं के साथ सश्लिष्ट करने में अपना सार्थक अभिमत प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसके पीछे मेरा एक बड़ा तर्क यह भी रहेगा कि सुकेश साहनी शादी की दावत में तो उपस्थित हुए; लेकिन बिना खाना-खाए दुल्हे को लिफाफा पकड़ाकर बाहर हो गए। मगर ‘प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक’ की प्रशस्ति में लघुकथाकार सुकेश साहनी को जोड़ते हुए 41 के स्थान पर 42 लघुकथाकारों की लघुकथाओं को चिह्नित कर अंक के वजन को 34.16 प्रतिशत के अनुपात में 35 प्रतिशत के रूप में बढ़ा हुआ पाएँगे।
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