मिन्नी कहानियों के संसार को खँगालता, लघुकथा कलश पंजाबी लघुकथा महाविशेषांक।
बात आरंभ करते हैं हिंदी लघुकथा से। निःसन्देह हिंदी लघुकथा वर्तमान में अपनी प्रसिद्धि के शिखर पर है और कमोबेश लघुकथा से जुड़ीं सभी हिंदी पत्रिकाएँ समय-समय पर विभिन्न विषयक विशेषांक निकालती रही हैं। लेकिन हिंदी लघुकथा में किसी क्षेत्रीय भाषा के लघुकथा साहित्य को हिंदी-भाषी पाठकों तक पहुँचाने का कार्य या विशेषांक-रूप में सामने लाने का कोई विशेष प्रयास शायद कम ही हुआ है; और यह विशेष प्रयास हमेशा की तरह, कुछ नया करने वाली और लघुकथा साहित्य में नक्षत्र की भांति चमकने वाली पत्रिका कलश ने हाल ही (जुलाई २०२४) में प्रकाशित अंक में कर दिखाया है, जो सहज ही सराहनीय है।
बहरहाल बीते छह वर्षों की अपनी वैभवशाली यात्रा में लघुकथा कलश का यह अंक (जुलाई-दिसंबर २०२३-अंक १२) भले ही अपेक्षाकृत कुछ विलंब से सामने आया; लेकिन इस महाविशेषांक की महत्ता का आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक के लघुकथा इतिहास में हिन्दी भाषा साहित्य में किसी क्षेत्रीय भाषा को संभवतः इतने विस्तृत एवं भव्य स्तर पर किसी विशेषांक में स्थान नहीं दिया गया। वस्तुतः ‘पंजाबी लघुकथाकार महाविशेषांक’ के रूप में प्रकाशित यह अंक पूर्ण रूप से पंजाबी लघुकथा को समर्पित है तथा पंजाबी लघुकथा साहित्य को पत्रिका में पूर्ण रूप से समेटने का प्रयास भी हुआ है।
पत्रिका पिछले अंकों की भाँति ‘स्मार्ट’ आकार-प्रकार में प्रकाशित तथा गेहूँ की सुनहरी बालियों (पंजाब की मुख्य फ़सल) के सुंदर आवरण से सुसज्जित है। पत्रिका के भीतरी, प्रथम फ्लैप पर पंजाबी के एकल लघुकथा- संग्रह के रचयिता स्वर्गीय सतवंत कैथ साहब का चित्र और अंतिम फ्लैप पर श्रीमती स्नेह गोस्वामी, डॉ. शील कौशिक, श्री हरभजन सिंह खेमकरणी को दिए गए, ‘लघुकथा कलश सम्मान २०२२’ के चित्रों को स्थान दिया गया है।
बात यदि पत्रिका में शामिल सामग्री की करें< तो सर्वप्रथम बात करते हैं पत्रिका के संपादकीय की। निःसन्देह किसी भी पत्रिका का संपादकीय पत्रिका के आधारित विषय का आईना होता है: लेकिन संपादकीय ‘विषय विशेष’ का संक्षिप्त शोध भी होता है, यह कलश के इस अंक को पढ़कर जाना जा सकता है।
पंजाबी लघुकथाओं के प्रसिद्ध मूल नाम ‘मिन्नी कहाणियाँ’ के आरंभ से लेकर उनकी वर्तमान साहित्य जगत् में स्थिति तक को संपादकीय में समेट लिया गया है। इतना ही नहीं, मिन्नी कहानी कही जाने वाली पंजाबी लघुकथा के प्रचलित पाकिस्तानी नाम ‘अफसांचा’ की जानकारी के साथ-साथ, संभवतः दो लिपियों में लिखी जाने वाली एकमात्र भाषा (पाकिस्तान में फ़ारसी लिपि एवं भारत में गुरमुखी या शाहमुखी लिपि) की जानकारी देना भी इस संपादकीय को विशेष बना देता है। इसके अतिरिक्त पंजाबी लघुकथा के विषय में ये जानना वाक़ई दिलचस्प और याद रखने वाला है, कि जिस प्रकार हिंदी लघुकथाओं का आरंभ पंचतंत्र या जातक कथाओं के मूल में जाना जाता है, ठीक उसी प्रकार पंजाबी लघुकथाओं का आरंभ गुरु नानक देव जी की रचित ‘साखियों’ से जुड़ा माना जाता है। और केवल इतना ही नहीं, वरन यह संपादकीय ‘हिंदी वर्सेस पंजाबी’ लघुकथा के बीच के तुलनात्मक अध्ययन के साथ-साथ; हिंदी और पंजाबी लघुकथाओं के बीच की कमियों-खूबियों आदि की चर्चा करते हुए पंजाबी लघुकथा-इतिहास सहित पंजाबी लघुकथा के प्रथम एकल संग्रह (सतवंत कैथ रचित बर्फ़ी दा टुकड़ा) का ग़ौरतलब विवरण भी सहज ही सामने रख देता है, जो संपादकीय का आकर्षण कई गुना बड़ा देता है।
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बहरहाल संपादकीय के बाद, बात यदि लघुकथाओं की करें, तो पत्रिका के आरंभ में पंजाबी लघुकथा के प्रारंभिक दौर के कुल ७५ लेखकों की लघुकथाओं के बीच ‘अजन्मा बच्चा’ (प्रीतम सिंह पंछी), ‘बर्फ़ी का टुकड़ा’ (सतवंत कैंथ), ‘अंतर’ (सुरिंदर कैले), ‘नग्न स्त्री’ (अमरीक बमराह), ‘वसीयतनामा’ (गुरमीत पलाही), ‘नास्तिक’ (श्याम सुंदर अग्रवाल), ‘वो भारत’ (योगराज प्रभाकर) और ‘महान भारत’ (जसवंत सिंह विरदी) जैसी श्रेष्ठ लघुकथाओं को पढ़ा जा सकता है।
इनके साथ ही समकालीन लघुकथा साहित्य में कुल 67 लेखकों की लघुकथाओं को शामिल किया गया है, जिनमें लघुकथा ‘कंबल’ (कर्मजीत नडाल), ‘नई माँ’ (गुरप्रीत सिंह भंवर), ‘जी बी रोड़’ (गोबिंदर सिंह ढींढसा), ‘दीक्षा’ (श्याम सुंदर दीप्ति), ‘बंधन’ (सतिपाल खुल्लर), ‘फेयर एंड लवली’ (राजवंत बाजवा), ‘रिश्तों की नाव’ (जगदीश राय कुलरिया), रिश्तों का नामकरण (दिलीप सिंह वासन), ‘मशाल’ (बलविंदर भंडाल) और ‘टूटे सपने’ (महिंदर पाल बरेटा) जैसी बेहतरीन और हिंदी पाठकों के लिए उपहार सरीख़ी लघुकथाओं को भी शामिल किया गया है।
अधिकतर लघुकथाओं के साथ उन पत्रिकाओं या संग्रह के नाम भी दिए गए हैं, जहाँ से इन्हें लिया गया है। जहाँ तक लघुकथाओं आदि के अनुवाद की बात है, रचनाओं के मूल भाव में किसी परिवर्तन जैसा प्रभाव महसूस नहीं होता। वैसे भी इस विषय पर आम पाठक की दृष्टि बहुत अधिक गहराई में नहीं जा सकती, जब तक कि पाठक ने रचना के मूल पाठ को पहले से न पढ़ा हुआ हो।
पत्रिका में शामिल रचनाओं की विशेष बात यह है कि अधिकतर लघुकथाएँ कथ्य और शैली के स्तर पर भिन्नता लिए हुए हैं, जिससे पंजाबी लघुकथाओं की समग्र विचारधारा का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हालाँकि ये संभव है कि अंक में शामिल कई प्रसिद्ध लघुकथाओं को साहित्य प्रेमी पहले भी पढ़ चुके हों; क्योंकि पंजाबी के कई प्रसिद्ध साहित्यकारों की मूल रचनाओं के हिंदी अनुवाद समय-समय पर कई वरिष्ठ साहित्यकारों (श्याम सुंदर अग्रवाल जी, श्याम सुंदर दीप्ति जी, योगराज प्रभाकर जी) द्वारा किया जाता रहा है।
जैसा कि पहले ही जिक्र हो चुका है, पंजाबी लघुकथा साहित्य और सरहद पार के साहित्य का अच्छा ख़ासा संबंध रहा है; ऐसे में पत्रिका में सरहद पार के लेखकों का समावेश न हो, ये संभव नहीं लगता। सरहद पार के रचनाकारों में शामिल १८ लेखकों की जिन रचनाओं का समावेश हुआ है, निःसन्देह उनके चुनाव में पूरी गंभीरता बरती गई है; तभी तो ‘ज़रूरत’ (अख़लाक़ हैदराबादी), ‘मैं और कहानी’ (अफ़ज़ल अहसान रंधावा) और कुत्ते, मध्यम वर्ग (एम अशरफ सुहेल) जैसी बेहतरीन लघुकथाओं का समावेश इस अंक में हुआ है।
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किसी भी पत्रिका का आलेख स्तम्भ ही उसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष होता है, जो सहज ही शोधकर्ताओं के लिए भी एक उत्सुकता का पर्याय होता है। कलश के इस अंक में ‘आलेख माला’ के अंतर्गत कुल छह विभिन्न विषयक महत्वपूर्ण शोधपरक आलेखों को शामिल किया गया है। इनमें जहाँ लघुकथा विधा-पक्ष पर आधारित चार आलेख सहज ही पंजाबी लघुकथा साहित्य पर अतीत से लेकर वर्तमान तक उसके स्वरूप, उपलब्धियों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करते हैं। वहीं शेष दो आलेखों में, एक में तृप्त भट्टी की छह लघुकथाओं पर डॉ. पुरषोत्तम दुबे द्वारा बेहतरीन विस्तृत समीक्षा की गई है और दूसरे में पंजाबी लघुकथाओं की चर्चित त्रैमासिक पत्रिका ‘मिन्नी’ पर जगदीश राय कुलरियाँ द्वारा पत्रिका के अब तक के छत्तीस वर्षीय इतिहास पर सविस्तार सारगर्भिता लिए वैचारिक चर्चा की गई है।
बात आलेखों पर की जाए, तो जहाँ आलेख ‘पंजाबी-लघुकथा की उत्पत्ति’ में डॉ. मेहताब-उद्-दीन ने पंजाबी लघुकथा के आरंभिक उद्द्भव सहित मिन्नी कहानी (यानी लघुकथा या शॉर्ट स्टोरी) की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन किया है। वहीं आलेख ‘पंजाबी लघुकथा : प्राप्तियाँ और संभावनाएँ’ में डॉ. अमर कोमल द्वारा पंजाबी लघुकथा साहित्य की अब तक की उपलब्धियों सहित भविष्य की संभावनाओं पर भी विचार किया गया है।
‘पहुँचे हैं किस मुक़ाम पर’ इस बेहतरीन शीर्षक से रचित आलेख में डॉ. गुरदीप सिंह ढिल्लों ने बहुत ही अद्भुत ढंग से पंजाबी लघुकथा के इतिहास की लाज़वाब पड़ताल की है। ठीक इसी तरह आलेख ‘पंजाबी लघुकथा में प्रयोग’ में सुरिंदर कैले जी ने लघुकथा से जुड़े प्रयोगात्मक तथ्यों पर अपनी बात रखी है। विशेषकर आलेख में ही वर्णित विशुद्ब काल्पनिक कथ्य की चर्चा पर आलेख में वर्णित एक लघुकथा ‘करिश्मा कुदरत का’ के कथ्य और उसकी प्रयोगात्मक प्रस्तुति (जिसे रचना के मुख्य शीर्षक सहित पाँच उप शीर्षकों के साथ लिखा गया है) पर बेहतरीन मंथन किया है।
साक्षात्कार रूपी वार्तालाप (खुंढ चर्चा) के अंतर्गत आधी सदी से भी अधिक पंजाबी लघुकथा के साक्षी रहे सुरिंदर कैले जी से योगराज प्रभाकर जी का वार्तालाप इस अंक का सर्वश्रेष्ठ आकर्षण है, जो पूरी तरह से पंजाबी लघुकथा के अतीत वर्तमान और भविष्य को खँगाल देता है। इसी वार्तालाप में योगराज जी द्वारा पाकिस्तानी और भारतीय पंजाबी लघुकथा के बीच के अंतर को पूछे जाने पर< सुरिंदर कैले जी का दिया गया विस्तृत उत्तर< न केवल पंजाबी भाषी लघुकथाकार के लिए महत्त्वपूर्ण है, बल्कि हिंदी भाषा सहित अन्य क्षेत्रियों भाषा के लघुकथाकारों के लिए भी ‘मार्केबल’ कहा जा सकता है।
और अंत में साहित्यिक गतिविधियों में मिन्नी लघुकथा सम्मेलन (अमृतसर), अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन (सिरसा) और कमल चंद वर्मा सम्मान समारोह (इंदौर) आदि की रिपोर्ट्स को स्थान दिया गया है; जिन्हें क्रमशः जगदीश राय कुलरियाँ, डॉ. शील कौशिक, सोनाली खरे द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
बहरहाल यदि समग्र रूप से इस अंक पर कुछ शब्द कहें, तो निश्चित रूप से यह अंक हिंदी लघुकथा पाठकों के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा; क्योंकि अधिकतम हिंदी-लघुकथा लेखकों के लिए इस अंक में शामिल लघुकथाएँ (या शामिल लघुकथाकार) पूरी तरह से पहली बार पढ़ी जाने वाली ही होंगी।
वैसे यदि इस अंक में बीती आधी सदी के पंजाबी लघुकथाओं के संग्रहों (एकल और सांझा) का सिलसिलेवार डाटाबेस भी शामिल कर लिया जाता और यह अंक हिंदी के साथ-साथ पंजाबी में भी प्रकाशित कर दिया जाता, तो पंजाबी भाषी लोगों के लिए यह सहज ही सोने में सुगन्ध वाली बात भी होती।
कलश समूह को हार्दिक साधुवाद के साथ. . . !
-0-विरेंदर ‘वीर’ मेहता, 09818675207