जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा की गुणवत्ता और लेखन की प्रतिबद्धता     Posted: March 1, 2021

वर्तमान समय में लघुकथा का एक लंबा इतिहास उसके पीछे आकर खड़ा हो गया है। लघुकथा ही एक ऐसी विधा हो गई है, जो सर्वाधिक लोकप्रिय भी है, जिसमें सर्वाधिक काम हो रहा है और जिसमें निरंतर कई नए और पुराने लेखक जुड़ते जा रहे हैं। इसके पीछे उसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता और उसका बढ़ता हुआ पाठक वर्ग है। लेकिन इसके साथ ही यह बात भी बड़ी सत्य है कि लघुकथाओं में सार्थक लेखन की कमी हो गई है। लघुकथाओं का अत्याधिक लेखन उसकी गुणवत्ता में भी कमी लाने लगा है। मेरा यहां पर यह तात्पर्य नहीं है कि, जो लोग अधिक लिख रहे हैं, वह गुणवत्ता विहीन लघुकथाएँ रच रहे हैं ।कम लिखने वालों की रचनाएँ भी कमजोर होती हैं, लेकिन यह सामान्यत: देखा जा रहा है कि, लघुकथा में विषय का दोहराव और लघुकथा के शिल्प का कमजोर होना ,उसे पुनः कई सारे प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर रहा है।

आज के समय में लघुकथा को लेकर एक और दुखद बात जो हो रही है ,उसकी और  भी मैं आपका ध्यान आकर्षित करना  चाह रहा हूं। मेरी सबसे बड़ी चिंता लघुकथा के उस स्वरूप को लेकर हो रही है जो,  इन दिनों कुछ समाचार पत्रों में छापा जा रहा है । पिछले दिनों लगातार कई समाचार पत्रों/पत्रिकाओं में लघुकथा के नाम पर या तो संस्मरण छापे जा रहे हैं या कोई घटना का विवरण छापा जा रहा है, अथवा किसी कल्पित विचार को लघुकथा के नाम से प्रकाशित किया जा रहा है। इसके लिए समाचार पत्रों के साथ वह लघुकथा लेखक भी दोषी हैं, जो इस तरह की कच्ची पक्की रचनाओं को प्रकाशन के लिए तुरंत भेज देते हैं । इसलिए सार्थक लघुकथाओं का सृजन किया जाना आज के समय की पहली सबसे बड़ी जरूरत है।

लघुकथा को लेकर मेरा दूसरा विचार यह है कि उसमें उद्देश्यपरकता होना चाहिए ।यदि लघुकथा किसी उद्देश्य को लेकर लिखी गई है, तो वह समाज में  उचित रूप से संप्रेषित होगी और समाज उससे प्रभावित होगा। लेकिन  यदि कोई लघुकथा बिना किसी उद्देश्य के रची गई है, तो फिर  उसकी सार्थकता भी समाप्त हो जाएगी।  समाज  में परिवर्तन के लिए उसका कोई उपयोग नहीं होगा ।अभी जो समय कोरोना का चल रहा है ,उस कोरोना काल में इस लॉकडाउन की विसंगतियों, विडंबनाओं, इसके दुख, इसके दर्द को लेकर बहुत सारी लघुकथाओं का सृजन हुआ है। बहुत सारी लघुकथाएँ किताबों के रूप में भी आई हैं ।यह उनकी उद्देश्यपरकता है और इसलिए ऐसी लघुकथाओं को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने , समाचार पत्रों ने तथा पाठकों ने हाथों हाथ ग्रहण किया है। कई संपादकों के द्वारा विभिन्न समय में विभिन्न विषयों को लेकर पुस्तके संपादित कर निकाली गई है ।पिछले दिनों एक संग्रह किसानों के दुख दर्द को लेकर सामने आया था ।इसके पूर्व किन्नरों की तकलीफों पर भी लघुकथाएँ सामने आई ।सुकेश साहनी ने देह व्यापार पर केंद्रित लघुकथाएँ पुस्तक के रूप में निकाली। उनका निरंतर कार्य लघुकथा विधा को समृद्ध कर रहा है। स्वर्गीय सुरेश शर्मा ने बुजुर्ग जीवन पर केंद्रित लघुकथाओं को पुस्तक के रूप में निकाला था।

इस प्रकार लघुकथाओं में समाज की विभिन्न चिंताओं पर केंद्रित लघुकथाओं का अलग-अलग पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया जाकर, समाज में उस विषय में जागरूकता पैदा करने का काम किया गया है। श्री राम कुमार घोटड ने भी इस तरह का काम किया है। कमल चोपड़ा ,अशोक जैन,  रूप देवगुण  ,उमेश महादोषी,अशोक भाटिया, कांता राय,  योगराज प्रभाकर ने भी  इस तरह के कार्यों को प्राथमिकता दी है।  अभी-अभी लघुकथा कलश का राष्ट्रीय चेतना से संबंधित लघुकथाओं पर केंद्रित अंक प्रकाशित हुआ है। स्वर्गीय पारस दासोत ने किसी समय में विभिन्न विषयों पर लघुकथाएँ रच कर इस विधा को बहुत समृद्ध किया है। लेखन का बीज जब बिना चिंतन रूपी खाद पानी के अंकुरित होता है ,तब वह एक पुष्ट और स्वस्थ पौधे के रूप में हमारे सामने नहीं आता।  भीड़तंत्र की लघुकथाएँ  दृष्टि संपन्नता के साथ लिखी गई लघुकथाएँ नहीं  होती हैं ।उद्देश्य विहीन रचनाओं का  लेखन दिशा भ्रम पैदा करने वाला लेखन होता है ,इसलिए लघुकथा में एक उद्देश्य लेकर किया गया लेखन किया जाना आवश्यक होता है। लघुकथा के भीतर संस्कार और उसकी संवेदना का होना भी जरूरी होता है।

लघुकथा की विकास यात्रा में  एक निरंतर  प्रयोगधर्मिता बनी हुई है । आकार भिन्नता के कारण लघुकथा में वर्णित  संवेदना  की प्रभावगत  क्षमता एवम तीक्ष्णता  बड़ी ही तेजी के साथ सामने आई है ।

लघुकथा को रचा जाना किसी भी प्रकार के जड़त्व की बात नहीं है ,यह चैतन्यता की बात है, सजगता की बात है। लेखक ही एक ऐसा व्यक्ति होता है ,जो अपने आसपास के वातावरण के प्रति अधिक संवेदनशील ,अधिक जागरूक , अधिक चैतन्य होता है। मूलत: प्रत्येक साहित्यकार में यह विशेषताएँ विद्यमान रहती हैं। लघुकथा के प्रारंभिक परिदृश्य को जब हम उठा कर  देखते हैं ,तो यह पाते हैं कि ,उस समय का कालखंड, उस समय का सामाजिक वातावरण, उस समय की राजनीतिक स्थितियां, उस समय की शोषण की  स्थितियां ,समाज में व्याप्त ऊंच-नीच यह सब लेखकों के चिंतन में बने रहने के कारण उनके रचनाकर्म के विषय रहे हैं । कोई विषय किसी लेखक के मस्तिष्क में कब जागृत होगा, इसका कोई समय निर्धारित नहीं होता। एक  वैचारिक कौंध उसके मन में ,उसके मस्तिष्क में आती है और रचना का  उसके माध्यम से जन्म हो जाता है।

लघुकथा को आज संस्कार की जरूरत है । उसे सुसंस्कृत करना और लघुकथा लेखकों को पढ़ने की आदत डाल कर लघुकथा के मूलभूत संस्कार से परिचित करवाना, आज की सबसे बड़ी जरूरत लग रही है।  लघुकथा की रचना और रचना प्रक्रिया की तथा उसके संस्कारों की, उसकी प्रस्तुति की ,उसके विचार पक्ष की बात की जाना अब जरूरी लग रहा है। एक और सबसे महत्वपूर्ण बात लघुकथा की रचना प्रक्रिया को लेकर हैं। इसे लेखक को बड़ी ही गहराई के साथ समझना पड़ेगा। लघुकथा का विचार पक्ष तभी मजबूत होगा ,जब किसी विषय को लेकर लेखक का चिंतन उसकी रचना प्रक्रिया में जुड़ेगा और मजबूती के साथ रचना का जन्म होगा।

यहां पर एक सामान्य प्रश्न यह उठता है कि, घटनाएँ तो सभी के सामने घटती हैं , तो फिर उसकी कौंध सिर्फ लेखक के मन में ही क्यों आती है। इसका मूल  उसके भीतर रची बसी संवेदना की ओर इंगित करता है। जहां पर संवेदना होती है वहां पर चैतन्यता भी आती है, चिंता भी आती है ,और जड़त्व को परिवर्तन करने का साहस भी सामने आता है ।

हम इस बात को ऐसे समझ लें कि, एक सूखा मिट्टी का ढेला पड़ा हुआ है, तो वह किसी भी काम का नहीं है । हम उसे हाथ लगाएँगे वह बिखर जाएगा, फैल जाएगा, आकार विहीन हो कर इधर उधर बिखर जाएगा। लेकिन उसी मिट्टी के ढेले पर जब संवेदना का पानी पड़ जाता है, चिंतन के दो हाथ उसे गूँधने लगते हैं, और शिल्प की उंगलियां उसे आकार देने लगती हैं , तो मिट्टी का वह ढेला किसी खूबसूरत वस्तु का आकार प्राप्त कर लेता है। रचना के साथ भी यही सब होता है। जब लेखक के मन में पत्थर की तरह पड़े हुए किसी विचार  तन्तु पर संवेदना का पानी गिरता है ,तो उसका चैतन्य, उस विचार के पत्थर को गला  कर, रचना के आकार में सामने लाकर रख देता है। लघुकथा  की लोक स्वीकार्यता के पीछे सृजन की यही भीतरी नमी है, जो पाठक के मन तक पहुंचती है।

इस रचनात्मकता को व्याख्यायित करते हुए विष्णु प्रभाकर ने, लघुकथा को जीवन का यथार्थ अंकित कर सूत्र रूप में जीवन की व्याख्या करने वाली विधि बताया है। डॉ श्याम सुंदर व्यास ने इसे जीवन महाकाव्य का छोटा सा छंद बताया है। शंकर पुणतांबेकर ने चेतना स्पन्दित करने वाली विधा बताया है। डॉक्टर कमल किशोर गोयनका ने इसे जीवन की आलोचना कहा है। डॉ श्याम गोविंद ने इसे कलेवर में छोटी मगर सरोकार में बहुत दूर तक जाने वाली कथा कहा है। प्रोफ़ेसर बी एल आच्छा ने लिखा है कि, लघुकथा ऐसी लगती है ,जैसे खोलते तेल में पानी की बूंद, जैसे आलपिन की चुभन, जैसे आवेग का चरम क्षण, जैसे भाव की तात्कालिक प्रतिक्रिया या फिर गीत का पहला छंद।

मेरा ऐसा मानना है कि लघुकथा जीवन के मर्मान्तक बिंदुओं को सीधे-सीधे स्पर्श करती है। इसे रचना इतना सीधा कार्य नहीं है जितना कि समझा जा रहा है। यह एक जटिल प्रक्रिया है। जीवन के यथार्थ चित्रों को योग्य शिल्प एवं भाषा के साथ कम शब्दों में पाठक के मन पर दस्तक देने वाले स्वरूप के साथ प्रस्तुत करना बड़ा ही श्रम साध्य कार्य है ,और जहां पर उसकी इस मारक शक्ति को पहचाना नहीं जाता, वहां पर लघुकथा दस्तक विहीन होकर मर जाती है ।पाठक की अंतरात्मा को छूने वाली लघुकथाएँ ही शाश्वत औऱ सार्थक लघुकथा बनती है।

लघुकथा की रचना प्रक्रिया को समझने के लिए हमें कुछ महत्वपूर्ण लघुकथाओं को देखना जरूरी है ।पद्मश्री राम नारायण जी उपाध्याय की एक लघुकथा है ।

शेर ने बकरी से पूछा,’ क्यों री बकरी मांस खाएगी।’

बकरी ने कहा, ‘मेरा ही बच जाए तो बहुत है।’

यहां पर शोषक और शोषित को लेकर एक जबरदस्त व्यंजना प्रस्तुत की गई है ।

चंद्रशेखर दुबे की एक लघुकथा है।

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी। खिड़की खोल कर एक सूट बूट वाले  बाबू साहब ने आवाज लगाई ,’ऐ  केला ! इधर आना ।’

उसी समय एक ग्रामीण महिला ने अपनी खिड़की खोल कर पुकारा ,’ओ केले वाले भैया ! जरा इधर आ जाना ।’

यहां पर दो पंक्तियों में दो भिन्न संस्कृतियों को चित्रित किया गया है।

लघुकथा की यही ताकत उसे सबसे आगे लाकर खड़ा करती है और एक मजबूत साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करती है।

-0-सतीश राठी, आर 451 महालक्ष्मी नगर, इंदौर 10

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine