जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा की विधागत शास्त्रीयता     Posted: December 1, 2025

 लघुकथा की कहानी–विधा में अंतभु‍र्क्त कर निश्चिंत हो जाते हैं। अधिक प्रसन्न होने पर वे इतना जरूर कहते हैं कि लघुकथा कहानी का आधुनिकतम रूप और विकास है। बस, और कुछ नहीं। यह स्थापना ही भ्रांतियुक्त है कि ‘लघुकथा’ कहानी–विधा के भीतर व्यवस्थाप्य है। जैसा कि मैंने निवेदन किया कि लघुकथा साहित्य की स्वतंत्र विधा है। ‘कथा’ शब्द–प्रयोग के कारण जो भ्रांतियाँ हुई हैं, उनके निराकरण के लिए ही ‘कथा’ शब्द पर पुनराख्यान अनिवार्य बना है।

मैंने एक स्थापना यह उपस्थित की कि साहित्य की सभी विधाओं के मूल में कथा है। कहानी, उपन्यास, एकांकी और नाटक को स्पष्ट रूप से कथा की संज्ञा दी गई। जीवनी और आत्मकथा, संस्मरण तथा यात्रा–वृत्तांत भी कथा या कथाधारित हुए बिना विधासिद्ध नहीं हो सकते। प्रगीत, खण्डकाव्य और महाकाव्य में सर्वथा कथाधार होता है। रिपोतार्ज और ललित निबंध, साहित्येतिहास एवं साहित्यालोचन सभी कथाधारित साहित्य–विधाएँ हैं। इसी प्रकार साहित्य की शेष सभी विधाएँ (संख्या में 35) कथामूलीय और कथाधारित हैं। यहाँ प्रत्येक साहित्य–विधा के साथ ‘कथा–तत्व’ की अपरिहार्य एवं अनंशनीय आधार–शिला–शीलता के विश्लेषण का अवकाश नहीं है, इसलिए केवल विचारसूत्र रखा गया। यहाँ समर्थन में यह विचार भी असमीचीन नहीं होगा कि प्रत्येक ‘शब्द’ भूमिखंड और कथा–प्रांगण है। इसीलिए आधुनिक भाषा विज्ञानी और साहित्यशास्त्री ने ‘शब्द–भूगोल’ और ‘शब्द–कथा’ पर अनेक गंभीर ग्रंथ लिखे हैं। अर्थ की तरंग की महत्ता के बावजूद शब्द प्राथमिक और अनिवार्य है। कथा की भूमिका शब्द की तरह है। राजशेखर शब्दार्थ–चिंतन–प्रसंग में जिस अर्थसंप्रेषणीय को ‘सुविचारित मुग्ध’ और ‘अविचारित रमणीय’ कहते हैं, वे शब्द से ऊपर उठते चले गए हैं, परन्तु उनकी विदुषी पत्नी अवंतिसुंदरी कहती हैं कि यह सच है कि शब्द से ऊपर उठ जाता है, परन्तु वहाँ फिर अर्थ के मस्तक पर उस शब्द का मुकुट बैठ जाता है, तभी वह अर्थ संवेद्य और सनातन सिद्ध हो सकता है। शब्द आरम्भ और अंत दोनों ही है। वही अथेति है। बीच में अर्थ की तरंग शब्द और शब्दशक्ति से अनुशासित और शोभनीय बनती है। अर्थवत् ‘कथ्य’ शब्दवत् कथा से ही उत्पन्न होता है।

लघुकथा में यह ‘शब्दार्थ’–तत्व, जिसे हम यहाँ ‘कथाकथ्य’ कहना अधिक समीचन और सार्थक समझते हैं, जिस अर्धनारीश्वर–भाव से विद्यमान होता है, वह अन्यत्र कठिनतर है।

कहानी में कथा और कथ्य साफ–साफ दीखते हैं, शब्द और अर्थ की तरह भूमिखंड और इतिहास के कालबोध की तरह, पर लघुकथा में संपूर्ण कथा ही कथ्य बन जाती है अथवा संपूर्ण कथ्य ही कथरूप ले लेता है। ऐसी अविभाज्यता, परस्पराश्रयण, अर्धनारीश्वरता तथा संधि–समस्त–पद–अर्थ–शय्या–शीलता अन्यत्र दुर्लभ है।

गुलाब, रजनीगंधा व कमल में लताएँ और फूल अलग–अलग दिखते हैं। कुछ ऐसी लता, पौधे या वृक्ष हैं, जो अपने वनस्पतित्व में ही पुष्प और पुष्पत्व में ही वनस्पति हैं। गुलमुहर के वृक्ष में अलग से फल नहीं लगते। वह पूरा–का–पूरा वृक्ष ही फूल बन जाता है। हरियाली अचानक लाली में बदल जाती है। फूल ही पेड़ ओर पेड़ ही फूल बन जाता है। दोनों का पृथक्करण नहीं हो सकता। दोनों का अद्वैत अस्तित्व उसका विरल और विलक्षण सौंदर्य बन जाता है। लघुकथा साहित्य की ऐसी विधा है, जहाँ प्रत्येक शब्द अक्षर बन जाता है और संपूर्ण लघुकथा एक शब्द। उच्छिलोंध मशरूम की तरह। लघुकथा में लक्ष्यैकचक्षुष्कता होती है। एक ओर किसी एक ही विन्दु पर त्राटकीय संकेंद्रण होता है। कहानी के लिए जो शास्त्रीय संविधान उपस्थित किया गया, वहाँ ‘सिंगुलैरिटी ऑव क्रायसिस’ कहा गया है। उसे ही लघुकथा के आलोचना–शास्त्र में हम ‘लक्ष्यैकचक्षुष्कता’ कहना चाहेंगे। परीक्षा के क्षण अर्जुन को अब वृक्ष नहीं दिख रहा। उसे अब पक्षी भी नहीं दिख रहा। उसे तो प्रत्यंचित बाणाग्र के समक्ष पक्षी का नेत्र–बिन्दु ही दिख रहा है। पक्षी का तन और वृक्ष का फैलाव है सब कुछ, पर इस संघान–साधना में सब कुछ अदृश्य हो गया है। लघुकथा में उत्तप्त क्षण–विशेष का एकतान ताप दीपशिखा की तरह है। अंधकार के पट्ट पर भास्वर एकाक्षर की तरह यह दीप–शिखा कहीं से खंडनीय नहीं होती। तात्पर्य यह कि लघुकथा में कहीं से कुछ भी पृथक्भाव से महत्वपूर्ण नहीं होता। सभी तत्व और भाव, कथा और कथ्य, शिल्प और सौष्ठव, स्थापत्य और उपस्थापत्य, भाषा और शैली, पद और शय्या एकात्मक अद्वैत हो जाते हैं। यह तने हुए रस्से पर बाजीगर की तरह बिना किसी सहारे के चलने जैसा है। जरा–सी चूक हुई कि गिरे।

लघुकथा में एटम का जो स्फोट–तत्व सन्निहित और सन्निविष्ट होता है, वह अपनी पठन–यात्रा के अंत में विस्फोट करता है। यह विस्फोट बिल्कुल वर्टिकल होता है। एक निर्दिष्ट और रिमोट–कंट्रोल्ड ऊँचाई पर जाकर धमाका होता है। फिर सब कुछ शांत। यह ग्राफ नहीं बन सकता।

अपने असरदार अंदाज के लिए लघुकथा को अलकेमी की वाष्पीकरण–प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसी प्रक्रिया के कारण होमियोपैथी की एक छोटी–सी गोली में लाख का पावर भर दिया जाता है। इस गोली में बेहिसाब असर होता है। लघुकथा के क्षणबोध की लघिमा में काल को बोध की तरह महिमा चमत्कृत हो सकती है। स्वप्नदर्शन की तरह काल या तो ठहर जाता है, या पिकासो की पेंटिंग की तरह आयामों में पिघल जाता है। पर वहाँ हर हालत में रहता है, क्षण ही। क्षण अपने उबलते तापमान में वाष्प बनकर आकाश भी घेर सकता है, पर अभी तो वह क्षण ही है।

लघुकथा को मैंने ‘प्रथमदर्शन–प्रेम’ या ‘फर्स्ट साइट लव’ के रूप में देखा है। प्यार साहचर्य का उत्तर–परिणम है। साहचर्य की दीर्घता या गुरुता का लघुकथा में कहीं कोई अवकाश नहीं। यहाँ तो देखा और प्यार!! इसीलिए लघुकथा को सुंदरी ही नहीं त्रिपुरसुंदरी होना होगा। इसमें शृंगारण और सम्मोहन का ऐसा सुशिल्पन होना चाहिए कि जिसे देखते ही दिल दे बैठें। देखते ही जो अपनी हो जाए या अपना बना ले। फिर गंधर्व–विवाह। लघुकथा एक गंधर्व–विवाह है। यह कहानी की तरह प्रकल्पित प्रेमविवाह भी नहीं है, न हो उपन्यास की तरह ऐरेंज्ड मैरेज। यहाँ तो सब कुछ शीघ्रता में होता है। हाँ आधार–भूत तत्व में सम्मोहन आसक्ति होनी चाहिए। मूल में क्षण का वही उत्तप्त ताप है। बुद्ध ने इस क्षणबोध को पहचाना था। उन्होंने कहा था–’सब्बं खनिकं’ (सर्व क्षणिकम्)। लघुकथा क्षण में अनंत का शिल्पित संस्थापन है। यही काल का ध्यानयोग है। एक में अनेक। यही एक का अनेक में आवंटन है। अनेक में एक।

यही काल का द्रवीकरण और संघनन–सिद्धान्त है।

बीसवीं शताब्दी के नवें दशक के अंतिम चरण तक आते–आते ‘लघुकथा’ ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली है। कथा विधा के अंतर्गत लघुकथा का अस्तित्व स्वावलंबी और सर्वस्व लोकप्रिय होने लगा है। लघुकथा के संग्रह और संकलन प्रकाशित होने लगे हैं। इस विधा पर परिचर्चाएँ आयोजित हुई हैं और पत्र–पत्रिकाओं में इसके समीक्षण के अनेक लक्षण उपलब्ध एकत्र होने लगे हैं। फिर भी, यह सत्य है कि हिंदी–में लघुकथा का आलोचना नियम अभी तक सुनिश्चित नहीं हुआ। कथा के उपलब्ध समीक्षा–शास्त्र से लघुकथा का मूल्यांकन नहीं हो सकता।

‘लघुकथा’ के संग्रह–संकलन भी हिन्दी में कम नहीं हैं। कुछ पत्रिकाओं ने साहस कर लघुकथा–विशेषांक अवश्य निकाले हैं सामान्य पत्रिका तथा कथा–पत्रिकाओं के बीच–बीच में लघुकथाएँ व्यवस्थित की जाती रही हैं। इस प्रकार किसी पृष्ठ के छूटे हुए हिस्से पर पूर्ति–परक–क्षेपक–रूप में लघुकथा को छापने की परम्परा रही है। कथा–दौड़ का यह सातवाँ लघुकथा–रूप–पीछे–पीछे चला हुआ, उपेक्षित रहकर भी कालांतर में अब शेष कथाविधाओं के समानांतर चलने लगा है, कई–कई बार कहीं–कहीं तो अरबी घोड़ी (ताजी घोड़ी) पर सवार यह लघुकथारूप आगे निकल गया है।

‘गम्भीर घाव’ करनेवाला यह ‘नावक का तीर’ अब ध्यानाकर्षण करने लगा है। कथा–साहित्य का यह वामनावतार अब तीनों लोक नापने को चुनौतियाँ देने लगा है। बीसवीं शताब्दी के अंतिम चरणों में यह हिंदीसाहित्येतिहास की मूल्यांकनीय उपलब्धि है।

‘लघुकथा’ छोटी कहानी (शॉर्ट स्टोरी) नहीं है। यह चुटकुला और लतीफा भी नहीं है। यह दिल्लगी और हँसी–मजाक भी नहीं, न ही ठठ्ठ और ठिठोरी है। यह अवांतर–कथा, दृष्टांत–कथा या उपदेश–कथा भी नहीं है। यह कोई कहावती मुहावरा या मुहावरेदार कहावत भी नहीं है। यह कोई प्रसंगकथा अथवा एनैक्डोट्स भी नहीं। न तो यह नल–दमयंती,उर्वशी–पुरूरवा–परंपरा की प्राचीन लघुकथा–व्यवस्थित विधा है, न ही पंचतंत्र की ‘अभिमंजूषित’ शृंखला–कथा (एम्बॉक्स्ड स्टोरीज) यह परीकथा और परिकथा भी नहीं है। न तो यह ईसप् नीतिकथा–परम्परा में है, न ही किसी हितोपदेश परम्परा में। इसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व और सत्ता है, व्यक्तित्व और महत्ता है। ऊपर जिन साहित्य–रूपों को सामने रखकर उन्हें नकार दिया गया है, उसका औचित्य–प्रसंग इतना है कि अकसर इन विधाओं और साहित्यरूपों से वर्तमान ‘लघुकथा’ को उपमित किया जाता है। अथवा यह कहा जाता है कि ‘लघुकथा’ का वर्तमान व्यक्तित्व इन्हीं इतिहास–नीधियों में गुजर–भटक कर बना है। बाहर से देखने में थोड़ी देर के लिए यह बात सत्य या सत्यांशवत् प्रतीत भी होने लगती है, पर बात ऐसी है नहीं।

‘लघुकथा’ की काया बड़ी छोटी होती है। यह एक स्वीकृत बात है। इसी कारण ‘लघुकथा’ को उपरिविवेचित साहित्य–परम्पराओं का आधुनिक संस्करण, उनका रूपांतर, उनसे उपजात, उनका मिश्रण अथवा उस परम्परा में उनका सांप्रतिक स्वरूप मान लिया जाता है। सारी गड़बड़ी काया–साम्य के कारण है। काया का संबंध देश–काल–नियंत्रित स्थापत्य–संविधान से है। यह बहिर्व्यवस्था है। साहित्य के अंतर्गत विधात्मक स्थान की स्वीकृति के लिए यह पहली शर्त है कि यह प्राणप्रतिष्ठित है या नहीं।

यह अपने पैर पर चलनेवाला स्वावलंबी स्वरूप है अथवा दृष्टांत–कथादि की तरह परोपजीवी अमरलतावत् सावधिक सरस प्राण। इसीलिए जब लघुकथा की आत्मा और उसके ‘कर्त्ता स्वतंत्र:’ आचरण पर विचार करते हैं तो स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि चुटकुला, लतीफा,हितोपदेश, अवांतर–कथादि की तरह वर्तमान ‘लघुकथा’ परोपजीवी, पराश्रित और यंत्रसंचालित नहीं, वरन् एक स्वतंत्र और स्वावलंबी साहित्य–विधा है। किसी सूक्तिसुभाषित को संपुष्टि में उपस्थापित दृष्टांत–कथा या हितोपदेश–कथा चाबी–दी–गई गुडि़या की तरह है, जो उसी समय तक चलती–नाचती है, जब तक चाबी की वृत्त–आवृत्तियों का प्रभाव रहता है। दीपक है, तभी दर्पण उसे प्रतिबिंवित–प्रतिसारित करेगा। दीपक ही नही तो दर्पण व्यर्थ सिद्ध हो जाता है। दृष्टांत या हितोपदेश की कथा सूक्ति–सुभाषित से आश्रित है। कथाकोविद गुणाढ्य की कथापरम्परा अथवा लोककथा–परम्परा में जिस तरह पिंजरे में पड़े तोते के प्राण कहीं और होते हैं। दूर कहीं कोई रिमोट कंट्रोल्ड चीज दबाई गई और तोते के प्राण उड़ गए। या जैसे कठपुतली की डोर नचानेवाले के हाथों होती है। यही कारण है कि ये साहित्य–रूप स्वतंत्र विधा–स्वरूप ग्रहण नहीं कर सके।

‘लघुकथा’ में प्रमुख और प्रभावकारी तेवर के साथ एक परोक्ष एवं शिल्पित संदेश होता है। यह संदेश उपदेश–कथन या दृष्टांत–कथा की तरह प्रत्यक्ष और दिगंबर नहीं होता। फिर भी पैनापन, चुटीलापन, सुईचुभन,जोरदार असर तो कुछ इस तरह होता है कि शल्यचिकित्सा के पहले सूई देकर एक–दो तीन गिनते–गिनते मरीज बेहोश हो जाए जैसे। या कि टूटती हुई साँस के मरीज को कोरामिन का इंजेक्शन दिया जाए और वह उठ बैठे, बातें करने लग जाए। यह ‘देखन में छोटन लगै’ अवश्य है, पर असर घाव ‘करे गंभीर’ इसका अंजाम बनता है।

आज जिस युग में हम जी रहे हैं, उसे समय की ह्रस्वता, बीमार शीघ्रता, द्विधाचित्रता और व्यवस्तता का युग कहा जाता है। हर चीज छोटी होती चली गई है। अब लालकिला, कुतुबमीनार और ताजमहल का जमाना नहीं रहा अब तो छोटे–छोटे प्लेट्स का युग है। अचकन–पचकन और लहँगा–साड़ी की जगह मुख्तसर शर्टपैंट और स्कर्ट–शर्ट ने ले ली है। बड़े–बड़े रेडियो की जगह पॉकेट ट्रांजिस्टर ने ले ली है। चुनावदार जड़ाऊ जूते–जूतियों की जगह हवाई चप्पल का प्रचलन हो चला है। जमीन की हदबंदी, दौलतकी हदबंदी, बच्चों पर पाबंदी सब जगह संक्षिप्तता आ गई। ड्वार्फ़ पेड़ और पौधे लगाए जाते हैं। सब कुछ छोटा–छोटा और जल्दी–जल्दी होना चाहिए। विडंबना और विरोधाभाव यह भी है कि शक्ति का संकेंद्रण होता चला गया । कुछ की मुट्ठियों में ही तमाम दुनिया की ताकत सिमटती चली गई। दहशत दस्तकें देने लगी है। किसी के पास समय नहीं रहा कि महाकाव्य, महाकाव्यात्मक उपन्यास या पौराणिक विशालवाङ्मय में अवगाहन कर सके। एक जीवन केवल व्याकरण पढ़ने में व्यतीत करने का दर्शन अब समाप्त हो गया है। लोकांतर और पुनर्जन्म की आस्था को भी भौतिकतावादी एवं अर्थ–नियंत्रित जीवनदर्शन के कारण गहरा आघात लगा है। जो कुछ है, बस उपस्थित वर्तमान और वह भी संघर्ष–संकुल और ह्रस्वतापहृत। इसलिए लघुकथा का अस्तित्ववान् हो जाना न तो असमीचीन है, न ही आश्चर्यजनक। लघुकथा का आविर्भाव सहज, स्वाभाविक और सामयिक है। इस विधा का स्वागत भी इसी मानसिकता के साथ व्यापक और लोकस्वीकृत हुआ।

धीरे–धीरे यह सत्य स्वीकृत होता चला गया कि ‘साहित्य’ ही एकमात्र संयोजक और समाहारक तत्व है। शेष सभी शास्त्र अपने को शेष से पृथक् कर लेते हैं। केवल साहित्य के प्रांगण में ही सबों का समन्वय–समीकरण, समागम–समाहरण होता है। साहित्य की अंतभूमि इसीलिए संधि और समास की रही है, विग्रह और विन्यास की नहीं। दूसरी बात निष्कर्ष बनकर यह आई कि साहित्य का लक्ष्य आनंद–वितरण है। इसी आनंद के साथ विनोद, मनोरंजन, विरेचन जैसी भावभूमियाँ जुड़ी हुई हैं। आजकल साहित्य की सार्थकता व्यंग्य, विनोद और मनोरंजन के पृष्ठाधार पर ही परीक्षित होने लगी है। इस वर्तमान दृष्टि और दृष्टिकोण को आधार–मान लें तो ‘लघुकथा’ का रूप–रंग और गंध–स्वाद सब कुछ सर्वथा अनुकूल और समीचीन सिद्ध होता है।

लघुकथा के साथ एक भ्रांति जुड़ी रही है कि इसका मुख्य स्वर हास्य या व्यंग्य का ही होता है, या हो सकता है। यह निपू‍र्ल है। चुटकुले और लतीफों में यह बात होती है। फिर लघुकथा को चुटकुले–लतीफों के साथ रख परीक्षित करने से यह भ्रांति पैदा हुई है। लघुकथा हास्य, व्यंग्य, विनोद की उत्पाद–भूमि हो सकती है, बिल्कुल हो सकती है, किन्तु इसकी सीमा यहीं समाप्त हो जाती है, यह स्थापना एवं धारणा गलत है। लघुकथा में करूण, शृंगार, शांत इत्यादि सभी रसों का परिपाक संभव है। इसकी स्वायत्तता में संपूर्ण समाज और उसकी संपूर्ण मनोभूमि है।

लघुकथा भोजन–निर्माण के पूर्व की विस्तृत आयोजन–प्रक्रिया नहीं है, जैसी कहानी में होती है। जैसे चूल्हे के पास जलावन का रखना, चूल्हे पर पतीली रखना, पतीली में पानी डालकर उसे खौलाना, फिर उसमें चावल धोकर डालना, पकने पर उसे उतार लेना है। इसी प्रकार दाल और सब्जियों का पकना–पकाना है। यह सब कुछ लघुकथा में नहीं होता। यह तो कुकर में दाल, भात सब्जी इत्यादि सभी खाद्य–पदार्थों का सजाकर रखना और दो–चार सीटियों पर दो–चार मिनटों में उतार लेना है। खाना तैयार । संपूर्ण दृष्टि भोजन की आस्वाघता पर है। भूख भी लगी है। हम ज्यादा देर तक इंतजार भी नहीं कर सकती। इस तरह लघुकथा एक प्रकार से कुक्डफूड, प्रीपेयर्ड फूड, पैकेट फूड या टिंड फूड हैं अथवा हद–से–हद सिटी मारता कुकर–फूड है। हम डायनिंग टेबुल पर बैठे हैं जबतक प्लेट, चम्मच, ग्लास, पानी सजाया गया, खाना तैयार। हम खाकर संतुष्ट हो जाते है। ऐसा ही शील स्वभाव और क्रिया–प्रक्रिया लघुकथा की है। उपन्यास में तो प्रक्रिया और लंबी हो जाती है। चावल बनना है तो धनरोपनी से शुरू करते हैं। चूल्हे पर हाँड़ी चढ़ानी है तो कुम्हार के घर आवा लगाने को कह आतें हैं। इसी तरह जलावन के लिए पेड़–पेड़ चढ़ते और सूखी लकडि़याँ तोड़ते हैं। उपन्यास में देश और काल का फलक विस्तृत और दीर्घ होता है। काहनी में यह देशकाल–बोध सिमट जाता है। फिर लघुकथा में यह देश और काल कण और क्षण बनकर रह जाता है। इसीलिए लघुकथा एक ओर कण–दर्शन है तो दूसरी ओर क्षण–बोध। कण और क्षण की अन्विति से जो एक खूबसूरत चीज पैदा हुई, वह लघुकथा है।

छोटी कहानी में जो विस्फोट–क्षण (ब्लास्टिंग प्वायंट) होता है, उसे ही लक्ष्यैक–चक्षुष्कता कहते हैं। लघुकथा में यह बिन्दु यथावत् घटित होता है। परिवेश और चरित्र–निर्माण, संघर्ष और द्वन्द्व में छोटी कहानी जितना समय व्यतीत करती है, उसके लिए लघुकथा में अवकाश नहीं होता। इसीतिए परिवेश और चरित्र–निर्माण तथा द्वन्द्व और संघर्ष–उपस्थापना में लघुकथा को संक्षेपण कला–कौशल से काम लेना होता है। व्याकारण–शास्त्र संक्षेपण को व्याख्या से कही ज्यादा कठिन कर्म कहता है। लघुकथा का यह संक्षेपण–व्यापार भी बहुत सरल नहीं है। इसीलिए इसका गद्य संघनन और श्लेष के धरातल पर कविता के संघनन और श्लेष्ज्ञ के निकट पहुँच जाता है। इसीलिए लघुकथा में बिम्ब और प्रतीक की महत्ता हो गई। पूरी दृष्टि तो बाण के उस सुतीक्ष्ण अग्रभाग पर और तनी हुई प्रत्यंचा से छोड़े जाने के बाद उसके तत्काल लक्ष्यवेघ एवं उसकी चुभन पर हैं शेष के लिए अवकाश कहाँ? लघुकथा किसी कपोती के चंचुपुट में समो सकने लायक कागज के छोटे–से टुकड़े पर लिखा गया व्याकुल और तात्कालिक संदेशपत्र है। किसी हाथी के हौदे पर बैठकर औपन्यासिक संदेश पहुँचाया जा सकता है अथवा घोड़े की पीठ पर बैठकर कहानी का वाक्यदूत बना जा सकता है। संदेशवाहन यहाँ भी है, पर एक नन्हीं–सी कपोती के चंचुपुट में संपुटित लघुसंदेश–पत्र। यही लघुकथा।

लघुकथा को आलोचकों ने ‘उपविधा’ कहकर संतोष की साँस ले ली है। कहानी, छोटी कहानी, समांतर कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी जैसी विकास–यात्रा की आधुनिक ओर अगली कड़ी के रूप में ‘लघुकथा’ नहीं है। लघुकथा का अस्तित्व स्वतंत्र है।

जेठ की दुपहरी में पसीने से तर किसी पेड़ की छाँव में कोई बर्फ भी छोटी–सी उली दे जाए। इससे न तो प्यास बुझ सकती है, न ही हम नहा पाते हैं। हम इस डली को हथेली पर रखकर मुट्ठी बाँध लेते हैं। हथेली की नसों की माफ‍र्त भीतर ही भीतर शीतलता पूरे शरीर में फैलने लगती है। इधर मुट्ठी में दबी बफ‍र् बूँद–बूँद पानी बन टपकती जा रही है। आँखें बंदकर हम शीतलता का अनुभव करते होते हैं कि तबतक बफ‍र् की डली गल चुकी होती है। पर करतल शीतल हो चुका होता है। हम इस शीतल करतल से अपने धूप–तपे मुखमंडल का स्पर्श–आलेपन कर लेते हैं। एक सूकून मिल जाता है। फिर कुछ दूर तक चल लेने की हिम्मत हमारी हो जाती है।

लघुकथा की अंत: प्रकृति और उसका प्रकृत स्वर हास्य, व्यंग्य, विनोद, मनोरंजन, विडंबन और चमत्कार की ओर अधिक है। केवल हास्य हल्का हो जाता है। केवल व्यंग्य गंभीर और प्रहारात्मक हो जाता है। हास्य और व्यंग्य के मिश्रण से विडंबन बनता है। इसका उद्भव विसंगतियों से होता है। हास्य में स्थायीभाव हास होता है, जबकि व्यंग्य का स्थाई भाव शोक में उपलब्ध हो जाता है। हास्य रस और करूण रस में संबंध नहीं होता। दोनों ध्रुवांतर पर स्थित हैं, परंतु विडंबन में दोनों नीरक्षीर–न्यारा से मिल जाते हैं और इनका तीसरा–रूप निखर आता है। लघुकथा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विसंगतियों का कलात्मक भांडा–फोड़ शिल्प है। ये विसंगतियाँ उरेवीपन [धूर्त्तता] असामंजस्य, अन्याय, कुरूपता, विदूपता, क्रूरता, अमानवीयता, अस्वाभाविकता के परिसर से संबंद्ध हैं। व्यंग्य–बोध इन्हीं विसंगतियों पर चोट करता है। कभी–कभी हास्य का तेवर प्रमुख होने से लघुकथा की संप्रेषणीयता सहज और त्वरित हो जाती है। व्यंग्य में तीक्षणता होती है। व्यंग्य का बाण के साथ मैत्री समास बनता है। हास्य रसों के बीच सबसे अधिक फुर्तीला है। इसका असर तात्कालिक होता है। हास्य संक्रामक भी है। इसके पटाखे तुरंत फूटते हैं। लघुकथा लघुकाय कथाविधा है। समारोह के संपूर्ण आयोजन के पूरा हो जाने पर उद्घाटन के लिए रेशमी फीता बाँधा जाता है। कैंची से फीता कटता है और तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गूँज उठता है। उद्घाटन संपन्न समझ लिया जाता है।

लघुकथा में लघु श्लेषार्थी विशेषण है। लघु अर्थात् छोटा, लघु अर्थात् हल्का (निर्भार,अगरिष्ठ), लघु अर्थात् त्वरित, क्षिप्त। लघुकाय (छोटी काया), लघुभोेजन (हल्का भोजन), लघुहस्त (शीघ्रलेखन)–इन प्रयोगों में लघु के मुख्य रूप से तीन अर्थ लक्षित हैं। लघुकथा में समस्त पद ‘लघु’ इन सभी अर्थों में चरितार्थ है। लघुकथा छोटी–कथा है। लघुकथा सुपाच्यकथा है। लघुकथा सद्य: प्रभावशली त्वरितत्कथा है। लघुकथा के इस त्रिशिर–दर्शन में इसकी अंत: प्रकृति व्याख्यात होती है। गुणादय की ‘बृहत्कथा’ का विलोम जहाँ शिल्पित होता है, वहाँ ‘लघुकथा’ स्व–रूप ग्रहण करती है। लघुकथा समय की ह्रस्वता की मांग है। झटके और झटिति के इस युग की अनुकूलता में, संक्षेपण–कला में नान्यधोपाय निपुण इस उपस्थित वर्तमान की आवश्यकता में और पाठकों की रसज्ञता के प्रति आश्वस्ति की मानसिकता में लघुकथा का जन्मोत्सव एक आवश्यक और प्रतीक्षित ‘कुमार–संभव’ है। इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। यह जीवन और जगत् के यथार्थ और जरूरत की क्षतिपूर्ति है।

संपत्ति की विशालता लघु सिक्कों में सिमट आई है। कथा की कथनीयता लघुकथा में व्यवस्थित–व्यक्त होने लगी है। तांत्रिक प्रक्रिया में जैसे तंत्र (तनाति इति तंत्र: =विस्तार) वह सिमट और सिकुड़कर यंत्र (यम इति यंत्र: =संकोच) हो जाता है। मंत्र दोनों के बीच संयोजक–तत्व बनता है। आज लघुकथा भी बृहत्त्कथा का यंत्ररूप है। इसमें संदेश (संवाद असंवाद दोनों स्थितियों में ) मंत्रमय सिद्ध होता है। लघुकथा बृहत्त्कथा की तरह स्तवन, स्तुति और गाथा नहीं, वरन् वीजाक्षर–तत्व है। इसीलिए इसमें स्फोटशक्ति और स्फोट–दर्शन का अनुसंधान किया जाता है। यहाँ क्षण–विस्फोट होता है।

लघुकथा मनोरंजन तो है ही, विनोद भी है। मनोरंजन में सामान्य मनस्विता है तो विनोद में वेदुष्य–मंडित सात्विक आनंद। फिर ‘चमत्कार’ लघुकथा का अन्यतम अंतरतम है। चमत्कार मूलत: तंत्र के त्रिक्दर्शन का पारिभाषिक शब्द है, किन्तु सामान्य प्रयोग में यह शब्द प्रभाव की जिस जादूगरी तक पहुँच आया है, वह जादू और जादूगरी भी लघुकथा का प्रभाव–कल्प है। लघुकथा बिना विस्तार–बोध के, पुरश्चरणहित शावर (सावर) मंत्र है। बिना लाम–काफ के, सीधी बात। यहाँ पत्रलेखन में ‘स्वस्तिश्री सर्वोपमायोग्य……..’ इत्यादि अलंकरण और विस्तारण के स्थान पर काम की सीधी बात है, पर इन बातों में ‘सतसैया के दोहरे’ का संघनन आवश्यक अभिसंधि है। कविता के प्रांगण में दोहा का जो स्थान है, कथाक्षेत्र में वही स्थान लघुकथा का है। गागर में सागर और बिंदु में सिंधु को समेट लेना मामूली बात नहीं है। इस कृच्छ्र क्रिया में बात बिगड़ भी सकती है। कोई एक स्खलन और अनवधानता लघुकथा को चुटकुले या जोक्स के पीठासन पर बिठा दे सकती है। फिर यह कलात्मक विनोद नहीं रहकर मसखरा और मनोरंजन मात्र रह जाएगा। लघुकथा इसीलिए जलती हुई आग पर बिना जले दौड़कर आर–पार हो जाना है। यह तने हुए रस्से पर चलने की बाजीगरी भी है।

लहंगा–साड़ी की जगह मिनी स्कर्ट के इस जमाने के अनुकूल लघुकथा मिनीस्टोरी है। लघुकथा शार्टस्टोरी नहीं मिनीस्टोरी हैं यह सज्जाकरण का इकेबाना है। लघुकथा भारी गहनों की जगह दुष्यंत की अंगूठी है। लघुकथा एक टिंडफूड है। कहानी या छोटी कहानी की तरह यह रसोई घर की संपूर्ण पाककला नहीं है। अँगरेजी की शार्ट स्टोरी लघुकथा नहीं है। लघुकथा की जमीन रेहन नहीं, केवाला है। लघुकथा किसी मिलन या विदाई के उत्तप्त क्षण की जमीन रेहन नहीं, केवाला है। लघुकथा किसी मिलन या विदाई के उत्तप्त क्षण का चुंबन–मात्र है। यह संपूर्ण मनुहार–कल्प और प्रभातपर्यत शय्या नहीं है। चुंबन पर ही सब कुछ अध्युषित है। इन सर्वों के बीच लघुकथा साहित्य के अंतर्गत व्यवस्थाप्य नहीं बन सकता, जबतक उसमें शिल्प और शैली, स्थापत्य और संदेश, भाषा और भाव–बोध, कथ्य और कथनभंगिमा का संतुलित सामंजस्य न हो। मर्म को छूने की बात बेमानी नहीं है। लघुकथा मर्मस्पर्श की त्वक्–चेतना है।

खुलती हुई गाड़ी से किसी ने प्लेटफार्म पर छोड़ते–दौड़ते खिड़कियों से कुछ बातें कहीं। और वे बातें पूरी यात्रा में गूँजती रहीं। यही है, लघुकथा। विस्तार और अलंकरण की कोई गुंजायश ही नहीं है यहाँ। लघुकथा एक कोड लेंग्वेज स्टोरी है। यहीं प्रतीकधर्मिता और रूपक–विधान भी है।

यथार्थ और आदर्श को लेकर साहित्य में काफी विवेचण हुआ है। विशेषकर कथाविधाओं का उल्लेख सर्वाधिक हुआ है। कभी यथार्थ को प्रमुख माना गया, कभी आदर्श को। इसी तरह कभी आदर्शों मुख यथार्थवाद और फिर कभी यथार्थोंन्मुख आदर्शवाद का उल्लेख हुआ है। लघुकथा–मूल्यांकन में भी इसका उल्लेख होता है, किन्तु लघुकथा के मूल्याकंन–शास्त्र के निर्माण–क्रम में ये शब्द आधुनिक युगचेतना का संवहन कर नहीं पाते हैं। इसीलिए इनके स्थान पर मैं दो शब्दों को प्रस्तावित कर रहा हूँ। वे हैं, यथार्थ के लिए ‘विश्वसनीय’ और आदर्श के लिए ‘सत्य’। अविश्वसनीय यथार्थ देवीघटना या व्यक्तिवैचित्र्य चित्रण के रूप में स्वीकार किया जाएगा, जिसका साधारणीकरण नहीं हो सकता। इसलिए ऐसे ‘यथार्थ’ मानव–समाज के लिए न तो संवेदनीय बन पाते हैं, न हीं, विश्वसनीय। विश्वसनीयता के बाद ही संवेदनीयता के साधारणीकरण नहीं हो सकता। और साधारणीकरण के पृष्ठाधार के निर्माण के बिना रसोपचिति नहीं होगी। इसी तरह आदर्श और सत्य का संबंध हैं जो आदर्श है, वह सत्य है, वह आदर्श नहीं भी हो सकता है। सत्य आदर्श से बड़ा होता है। आदर्श सनातन और निरपेक्ष होता है। इसका तात्पर्य हम यह कहेंगे कि विश्वसनीयता और सत्य अंतस् और बहिर् दोनों धरातलों पर संयुक्त् होंगे, क्रम–विक्रम दोनों रूपों से संयुक्त होंगे और फिर चार शब्द समाप्त बनेंगे–आत्मसत्य, युगसत्य, आत्मविश्वसनीयता एवं युगविश्वसनीयता। मेरी दृष्टि में लघुकथा में अभी जितने प्रयोग हुए और हो रहे हैं, उनको समझने के लिए विश्वसनीयता और सत्य के निकष पर मूल्यांकन आवश्यक है।

शेष अगले अंक में

[यह आधार-आलेख लघुकथा-लेखक –आलोचक –सम्मेलन , अप्रैल 1989 के अवसर पर पटना में प्रस्तुत किया गया । लेखक और सम्पादक की अनुमति के बिना इस लेख का उपयोग नहीं किया जा सकता।]

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