जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा के बड़े आकार में संरचनाएँ     Posted: April 1, 2026

         

संरचना की दृष्टि से लघुकथाओं का विश्लेषण करना हो तो उसे तीन भागों में देखा जाना जरूरी है। हिंदी लघुकथाओं का सामान्य आकार लगभग एक पृष्ठ या कहें कि ढाई-तीन सौ शब्दों के आसपास रहता है। यह आकार नए रचनाकारों के अर्धचेतन में घर करके रूढ़ न हो जाए,इसलिए इससे छोटे और बड़े आकार की श्रेष्ठ लघुकथाओं का संरचनात्मक अध्ययन करके उनकी रचनात्मक पूर्णता और विशिष्टता को रखांकित किया जाना आवश्यक है। मूल प्रश्न यह है कि सामाजिक यथार्थ के कितने आयाम लघुकथा में व्यक्त हो सकते हैं? इस दृष्टि से लघुकथा के छोटे आकार, या कहें कि लगभग सौ-सवा सौ शब्दों की कथा-रचना के भीतर लेखकीय कौशल से बड़ा स्पेस बनाना यथार्थ की अभिव्यक्ति के दायरे को बढाने का ही उपक्रम है। यदि लेखक चार-पाँच सौ से लगभग एक हजार शब्दों तक के स्पेस में लेखकीय कौशल से अभिव्यक्ति की सामर्थ्य को बढ़ा लेता है, तो लघुकथा-साहित्य यथार्थ की अभिव्यक्ति की दृष्टि से और अधिक उपयोगी हो जाएगा। कोई भी हिंदी कहानी हजार-बारह सौ शब्दों से छोटी नहीं मिलती। प्रेमचंद की ‘ठाकुर का कुआँ’,जयशंकर प्रसाद की  ‘गूदड़ सांई’, यशपाल की ‘फूलो का कुरता’ आदि छोटी कहानियाँ हजार-बारह सौ शब्दों से आगे जाती हैं। विष्णु नागर की इससे छोटे आकार की कहानियाँ लघुकथाएँ ही हैं। माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरी-भर मिट्टी’ अवश्य लगभग पाँच सौ शब्दों की कथा-रचना है,किन्तु वह आधुनिक कहानी की अपेक्षा आधुनिक लघुकथा के अधिक निकट है। तो लघुकथा-लेखक इस एक हजार शब्दों के स्पेस का यदि इस प्रकार उपयोग करें कि उसमें संश्लिष्टता के साथ कहानीपन का भी गुण हो,तो इससे लघुकथा एक ओर यथार्थ का बड़ा भाग व्यक्त करने की क्षमता हासिल कर लेगी,दूसरी ओर अपनी संश्लिष्टता और अर्थगर्भिता के कारण अपने दिख रहे आकार का अतिक्रमण कर प्रभाव-क्षमता को भी बढ़ा लेगी। इतने आकार में लघुकथा में स्थिति-विशेष के विस्तार करने की गुंजाइश निकल आती है। हिंदी में ऐसी लघुकथाओं की बड़ी संख्या पहले से ही विद्यमान है। अभी लेखकों और आलोचकों ने इन लघुकथाओं को इन संभावनाओं और खूबियों के साथ नहीं देखा है। अभी तो ‘लम्बी लघुकथा’ नामक प्रत्यय से ही कई कथित रचनाकार नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं,जबकि रचनाकार को तो अभिव्यक्ति कि नई संभावनाएँ नितन्तर खोजते रहना चाहिए।  अनोखे रचनाकार रावी ने ‘मेरे कथा-गुरु का कहना है’(भाग एक,1958) लघुकथा-संग्रह में लिखा है –“रूपक की शृंखला  का दूर तक निर्वाह किया जा सके,तो लघुकथा लम्बी भी हो सकती है।” यहाँ 500 से 1000 शब्दों तक की ऐसी कथा-रचनाओं पर विचार करना अपेक्षित है, जो अपनी संरचना में लघुकथा हैं। 

समकालीन हिन्दी लघुकथा में अनेक वरिष्ठ और नए लेखकों की कई श्रेष्ठ लघुकथाएँ ‘लम्बी लघुकथा’ के अन्तर्गत आती हैं-हमारा उद्देश्य केवल इस तथ्य को रेखांकित करना है। वास्तव में यथार्थ के अनेक आयाम लघुकथा लेखक से इसलिए भी छूट जाते हैं कि वह अपने अर्धचेतन में इसके आकार की सीमा को तय किए बैठा है। इस उपक्रम में कई लघुकथाएँ तो आकार के दायरे से बाहर की मानकर लिखी ही नहीं जाती और कई लघुकथाओं को शीघ्र समाप्त करने का अकारण दबाव उसे कृत्रिम और कंकाल-मात्र बना डालता है। दोनों स्थितियों में हानि रचनात्मकता की ही होती है।

लघुकथा का अर्धचेतन में बना यह ढाई-तीन सौ शब्दों का आकार कहाँ से आया? ‘सारिका’ के 1973 के लघुकथांक ने जाने-अनजाने इस आकार को आधार दे दिया था। हम 1974 के चर्चित लघुकथा-संकलन ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ की लघुकथाएँ देखें तो वे भी उसी आकार के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। फिर 1978 में ‘समग्र’ के ऐतिहासिक लघुकथा विशेषांक में कहीं-कहीं उस आकार से आगे बढ़ने का उपक्रम है। तो इसके आकार का एक ट्रैंड बन गया था, जो प्रकारांतर से यथार्थ के आयामों के उद्घाटन की सीमाएँ बनाने वाला था। सन् 1988 में पटना के लघुकथा-सम्मेलन में इस आकार पर भी चर्चा हुई। बाद में डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी ने आकारगत खुलेपन के विरोध में मुझे पत्र लिखकर कहा-“अब समय आ गया है, जब ढाई सौ शब्दों से बड़ी रचना को लघुकथा के दायरे से बाहर किया जाए।’’ यह इसलिए कि लघुकथाएँ इस साँचे से आगे निकलने लगी थीं, जो बड़ा स्वाभाविक था। धीरे-धीरे पाँच सौ शब्दों तक की लघुकथा की बात की जाने लगी। सन् 2000 के बरेली सम्मेलन में लघुकथा के आकारगत अतिक्रमण और इसके आयामों पर मैंने विस्तार से बात रखी थी ।

अब ज़रा पिछले पन्द्रह-बीस वर्षों की प्रतिनिधि लघुकथाओं पर नजर दौड़ाएँ। इनमें अनेक लघुकथाएँ साढ़े पाँच सौ से आठ-नौ सौ शब्दों तक यात्रा करती हैं और लोकप्रिय, श्रेष्ठ तथा लगभग सर्वस्वीकृत कथाएँ हैं। वे लघुकथा के स्वरूप में ही हैं, उनमें एकान्विति है, एकतानता है। इन लघुकथाओं में व्यक्त यथार्थ के आयामों पर विचार करने की आवश्यकता है। इन्हें एक साथ पढ़ने पर पाठक का नए अनुभव से साक्षात्कार होगा। ये लघुकथाएँ बाह्य आकार का अतिक्रमण न करतीं, तो पाठक-वर्ग इस अनुभव से वंचित रह जाता।

यहाँ चार प्रतिष्ठित साहित्यकारों की एक-एक ऐसी ही लघुकथा की चर्चा करते हैं। विष्णु प्रभाकर की ‘तर्क का बोझ’ 700 से अधिक शब्दों की लघुकथा है जो उनके लघुकथा-संग्रह ‘सम्पूर्ण लघुकथाएँ’ (2008) में संकलित हैं। द्वन्द्व को सहज कथा-प्रवाह के साथ कैसे उभारा जाता है-इस दृष्टि से यह प्रतिमानक लघुकथा है। द्वन्द्व इस रचना की आन्तरिक जरूरत है। द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया के बिना तर्क का बोझ न बनता और रचना का सौन्दर्य भी जाता रहता। इस लघुकथा का ‘मैं’ नामक पात्र, रोते हुए निर्धन बालक की कहानी के झूठा-सच्चा होने में उलझा रहता है। जब उसे विश्वास हो जाता है, तब तक एक और गरीब मजदूर उसकी सहायता कर देता है ।क्या इस उलझन को जानबूझकर संक्षिप्त करना रचनात्मक कवायद कही जाती ? इस द्वन्द्व को कहीं से भी आकार में छोटा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें जिन्दगी साक्षात् धड़क रही है। विष्णु प्रभाकर ने ‘तर्क का बोझ’ रचना को ‘लघुकथा’ विधा में रखा है। इसमें लगे हाथ तमाशबीन लोगों के नाकारापन और बुद्धिजीवी वर्ग की अव्यावहारिकता की ओर भी संकेत कर दिया है । लघुकथा में त्वरा (तीव्र-गति) की अनिवार्यता के पक्षधर अपने सिद्धान्त पर पुनर्विचार करें।

हरिशंकर परसाई की 77 लघुकथाएँ परसाई रचनावली (1985) के दूसरे खंड में इसी शीर्षक के अन्तर्गत संकलित हैं। लगभग 650 शब्दों की रचना ‘बदचलन’ में एक अफसर की धूर्त मानसिकता को उजागर किया गया है, जो इससे छोटे आकार में सम्भव नहीं थी । एक बाड़े में रह रहे 13 किरायेदारों के बीच जब डिप्टी साहब रहने आते हैं तो वे जानते हैं कि उनकी चरित्रहीनता का यहाँ पता लग चुका है। वे कुछ दिन बाद मुहल्ले के पुरुषों-स्त्रियों की बदचलनी की अफवाहें उड़ाने लगे और इस कवायद में उनकी गर्दन क्रमशः ऊँची होने लगी। इस रचना में दो पात्र सामने हैं और चार पात्र पार्श्व में। कोई पन्द्रह दिन की अवधि में दोनों पात्रों की पाँच अलग-अलग समयों पर मुलाकातों का जिक्र है। इन सबसे रचना की स्वाभाविकता और प्रभाव-दोनों बढ़े हैं। तभी रचना का अन्त इस कदर विस्फोटक हो पाया है। लघुकथा के अंतिम भाग में ‘मैं’ पात्र उन्हें अपने बीवी-बच्चों को ले आने को कहता है, तो उनका कथन है- ‘‘अरे साहब, शरीफों के मुहल्ले में मकान मिले, तभी तो लाऊँगा बीबी-बच्चों को।’’ परसाई सिद्धहस्त साहित्यकार हैं, तमाम सजगता व कसावट के बावजूद इस रचना का फैलाव यहाँ तक हुआ है। यह रचना लघुकथा-क्षेत्र में नियमावली की लाल किताब लेकर घूमने वाले अ-लेखकों की ‘काल-दोष’ की बीमारी का भी इलाज कर देती है, क्योंकि इसमें कई दिन के प्रसंगों का जिक्र है।

चित्रा मुद्गल समकालीन हिन्दी लघुकथा के संघर्ष और विकास की साक्षी हैं। ‘बयान’ (2004) लघुकथा-संग्रह के अलावा भारतीय ज्ञानपीठ से ही छपे उनके कहानी-संग्रह ‘लपटें’ (2002) में सात कहानियों के बाद ‘लघुकथा’ शीर्षक के अन्तर्गत चार लघुकथाएँ भी हैं। इनमें एक है-पाठ’ प्रतिनिधि कहानीकार होने के नाते उनकी लघुकथाओं में कहानीपन, कथा-रस तो रहता ही है, जो उसकी सम्प्रेषण-शक्ति को बढ़ाता है। ‘पाठ’ लघुकथा में एक जनसेवक चुनावों को निकट जान स्कूलों के दौरे शुरू करता है। सबको साबुन व अँगोछा देता है। महीने-भर बाद फिर आकर उसे वस्तुस्थिति का भान होता है, कि वे चीजें तो बाजार में बेच दी गईं। ‘क्यों’ का उत्तर एक छात्र देता है -‘‘माई कहत रही, बट्टी अऊर अँगोछा के दाम से दू रोज का पिसान आएगा। तू नहाएगा कि रोटी खाएगा?’’

बात इतनी है, लेकिन कई आयाम खोलती है। बच्चों को कैसे सामान दिया, बच्चों को कैसा महसूस हुआ, माह-भर बाद आकर कैसे दिखावटी स्नेह से सवाल पूछे, बच्चे क्यों चुप रहे… आदि। यह सब तो इस रचना की प्राण-शक्ति है। तो करीब 800 शब्दों की इस रचना को श्रेष्ठ लघुकथा बनाने वाली चित्रा मुद्गल पर क्या लघुकथा के तथाकथित महारथी शब्दों की बन्दिश लगाएँगे? लघुकथा का प्रकार ही उसका आकार निर्धारित करेगा। इस रचना में जनसेवक का माह-भर बाद आना ही रचना को बनाता है, इससे ‘कालदोष’ का वायरस नहीं आता, जो कई कथित लघुकथा लेखकों के दिमाग में अकारण भय बनकर घुसा बैठा है। यह रचना उच्च और मध्यमवर्ग को निर्धन-वर्ग की जमीनी हकीकत बताने के लिए उत्प्रेरक का काम भी करती है। इस लघुकथा की बुनावट में जनसेवक, बच्चों व उनके अभिभावकों की सोच और व्यवहार का मजबूत ताना-बाना है, जिसे कहीं से भी हटाना उसकी मांस-मज्जा को अलग करने जैसा होगा। तब फिर न रचना बचेगी, न उसके प्राण। यदि लघुकथा पर शब्दों की बन्दिश लगाई जाए, तो फिर लेखक वस्तु और शिल्प यानी रचनात्मकता पर विचार करेगा या शब्दों की सीमा पर?

असगर वजाहत लघुकथाओं में रूपक रचने में माहिर हैं। इनके ‘मुश्किल काम’ (2010) लघुकथा-संग्रह की एक रचना है -शेर। शेर सत्ता का प्रतीक है और अनेक जानवर शेर के मुँह में घास का मैदान, रोजगार का दफ्तर, स्वर्ग आदि होने का विश्वास लिये वहाँ समाते जा रहे हैं। गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठा, अहिंसा और सह-अस्तित्ववाद का कथित समर्थक वह शेर उनके झूठ को उघाड़ने वाले को जिन्दा नहीं छोड़ता। इस भ्रम से परदा हटाने में लगभग 650 शब्दों की यह रचना पूर्ण सक्षम है। वर्तमान भारतीय राजनीति की ओर नजर दौड़ाएँ, तो इस रचना में लेखक की पकड़ और गहराई का पता चलता है ।

उपर्युक्त चारों साहित्यकार लब्ध-प्रतिष्ठ हैं और अपनी इन रचनाओं को लघुकथा कहते हैं। इन सभी लघुकथाओं को छोटा या बड़ा नहीं किया जा सकता ।

‘कथादेश’ के फरवरी 2007 अंक में ‘छोटी कहानियाँ’ नाम से दस रचनाएँ प्रस्तुत की गईं। इनमें रवीन्द्र वर्मा की ‘दिल्ली में लँगोट’ साढ़े सात सौ से अधिक शब्दों में विचलन, किस्सागोई का अद्भुत उदाहरण है। गहन अर्थगर्भी इस रचना के बीच-बीच में मानो टाइम बम रख दिए हैं, सजग करने के लिए।

किस्सागोई का अपना रास्ता होता है, कोई और रास्ता उसे रास नहीं आता। यहीं मुकेश वर्मा की ‘आग’ और ‘मुक्त करो’ लघुकथाओं की भाषा और शिल्प की बुनावट पर गौर करना जरूरी है। इनके ‘इस्तगासा’ (2005) कहानी-संग्रह की लगभग पच्चीस रचनाएँ लघुकथा की श्रेणी में आती हैं। इनकी समृद्धि और आर्किटेक्चर हिन्दी की प्रचलित लघुकथाओं से सर्वथा भिन्न है। करीब 650 शब्दों की रचना ‘आग’ में पिता की जलती चिता को देखते हुए कथावाचक की मानसिक यात्रा शुरू होती है। पारिवारिक अभावों, अपमानों के बीच से होती हुई, मन की आग जल जाने की परिणति तक पहुँचती यह रचना पाठक के मन पर अमिट प्रभाव छोड़ती है। मुकेश वर्मा की ही ‘मुक्त करो’ को व्यंग्य की महीन बुनावट से बुना गया है। पाठक को हतप्रभ कर देने वाली शैली में रचित इस कथा में एक धनी के नजरिए से एक अत्यन्त निर्धन लड़के का खाका इस तरह खींचा गया है कि वह धनी व्यक्ति पर सहज व्यंग्य की रचना बनकर सामने आता है। विभिन्न दृश्यबन्धों को जोड़ने की कला का भी कमाल है यह रचना। मुकेश वर्मा की ये दोनों लघुकथाएँ वर्णन-विवरण की प्रचलित पद्धति से अलग वैचारिक संवेदना से संचरित हैं, जिस कारण ये अपनी राह खुद बनाती हैं।

लघुकथा के वे विचारक, जो इसे एक स्थिति से अनिवार्य रूप से जोड़कर देखते हैं, आकार की सीमा के प्रति अनावश्यक रूप से सजग लगते हैं। एक स्थिति तो कितनी भी लम्बी हो सकती है। प्रेमचन्द की लघुकथा (तब ‘कहानी’ शब्द ही प्रचलित था) ‘बाबाजी का भोग’ लगभग 600 शब्दों में एक ही स्थिति का विस्तार है, जो अन्त में एक विडम्बना को उभारती है। यह रचना भाषा, चरित्र-विन्यास, व्यावहारिक पक्ष-हर दृष्टि से एक श्रेष्ठ लघुकथा का उदाहरण है। ज़रा चतुरा बाबाजी की चुस्त शब्दावली का अध्ययन करके देखें। ये सभी रचनाएँ वास्तव में लघुकथा-क्षेत्र में फैली आकारगत रेडिमेड मान्यताओं से अलग, उन पर भारी पड़ती हैं। इन्हें ‘शॉर्ट कट’ में लिखना वास्तव में जिन्दगी को शॉर्ट कट से जीने के दुराग्रह के समान है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की ‘एजेंडा’ लघुकथा प्रशासन-तंत्र में होने वाली बैठकों की अकर्मक क्रियाओं का सजग रचनात्मक रूपांतरण है। तीन अफसरों के हवाई वक्तव्य तो उदाहरण हैं, शेष भाषणों का पाठक अनुमान लगाएँ । बैठक के आवश्यक पक्षों को तीव्र-गतिकता से उभारकर भी रचना साढ़े छह सौ शब्दों की यात्रा करती है। अरुण मिश्र की रचना ‘पावर विंडो’ (लगभग 1000 शब्द) की शक्ति इसकी स्थिति के आवश्यक विस्तार और चरम परिणति में है। साहब और उनके अमले द्वारा चने का खेत उजाड़ा जाने की प्रक्रिया को दिखाया जाना उनकी धौंसपट्टी और मानसिकता दर्शाने के लिए जरूरी था। तभी तो खेत के रखवाले शिवधारी का यह वाक्य उन पर भारी पड़ गया -‘‘हुजूर कह देंगे, रात में नींद लग गई जंगली सुअर खाय गए।’’ रविप्रभाकर की ‘कठघरे’ (लगभग 600 शब्द) लघुकथा पूर्वार्ध में राम-सीता की आवश्यक पृष्ठभूमि को लेखक बड़ी शिद्दत से तैयार करता है। इसलिए उत्तरार्ध में अग्निदेव के तर्क-बाण पाठक की चेतना को बेंध पाते हैं। ऐसे में लघुकथा की लम्बाई पर हाए-तौबा मचाना बेमानी है। स्नेह गोस्वामी की ‘वह जो नहीं कहा’ लघुकथा पति की अनुपस्थिति में उसकी मानसिकता और व्यवहार को डायरी शैली में जिस खूबसूरती से सामने लाती है, उसके सामने इसकी शब्द संख्या (लगभग 800 शब्द) का जिक्र बेमानी लगता है। इस रचना में घर की तरफ खुलने वाली छह खिड़कियाँ हैं, जिनमें से परिदृश्य की पूर्णता के लिए कोई खिड़की बन्द नहीं की जा सकती। उपमा शर्मा की ‘गिद्ध’ भारतीय परिवारों में बढ़ रही संवेदनहीनता और स्वार्थ की दस्तावेजी लघुकथा है। लगभग 600 शब्दों की यह रचना खुशवंत सिंह की कहानी ‘पॉस्थ्यूमस’ और स्टैनले हॉटन के नाटक, डियर डिपार्टेड, (ज्ीम कमंत क्मचंतजमक) का स्मरण कराती है।

कांता राय की ‘विचार और भावना’ लघुकथा में सफलता से एक प्रयोग करने का जोखिम उठाया गया है। उपन्यास पढ़ती एक महिला, नायक के कई प्रसंगों को अपने पति के प्रसंगों से जोड़कर देखती है। रचना में अन्याय के प्रतिकार, निन्दा और फटकार में भी एक परदादारी रखी गई है, जिसके अनेक निहितार्थ हैं। ‘कहन’ की यह कलात्मक प्रविधि रचना को गहरे तक प्रभावित करती और उसे सामर्थ्यवान बनाती है ।

विकेश निझावन की ‘आचार संहिता’ नामक लघुकथा माँ का इस्तेमाल करने वाली नयी पीढ़ी की बेटियों के एक वर्ग का शानदार प्रतिनिधित्व करती है। यह रचना लघुकथा-जगत में फैली कई जड़ताओं को तोड़ती है। केवल संवाद हैं, बेटी के एकपक्षीय संवाद। उन संवादों में सम्बन्धों का, स्थिति और तर्क का इस कदर दबाव है कि माँ को बोलने का अवसर ही नहीं मिल पाता- विदेश जाने, कुलीग से विवाह करने, माँ को बच्चे की सेवा के लिए बुलाने और फिर काम निकल जाने पर वापिस भेजने तक। माँ के लिए सारी सम्भावनाओं को समाप्त कर देने वाले तर्कों की यह सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते ‘पहल’ में आई कविता की पंक्तियाँ स्मरण हो आई हैं-

सारे अमरूद खा लिये हैं

जो लग सकते थे

इलाहाबाद के पेड़ों पर…

सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘काठ’ लघुकथा सूक्ष्म और घनीभूत संवेदना की दुर्लभ रचना है। बस में मचे हड़कम्प में सुमी का हाथ सहसा पुरुष के हाथ में चले जाने से अतीत की संवेदना-नदी कैसे बहती गई, लेकिन अन्त में, हाथ अलग होने पर, फिर काठ हो गई-वह सब देखते ही बनता है ।

फरीदा जमाल की ‘हुनर’ लघुकथा में चंदा के बचपन से निकाह तक की कहानी विशेष सन्दर्भ के साथ चलती है। लघुकथा अन्त में कई सवाल उठाती है। इस पर कहानी लिखी जाए, तो ये सवाल इतने तीखेपन से नहीं उभारे जा सकेंगे। जब यह रचना लघुकथात्मक रूप में पूर्ण और असरदार है, तो इस पर कहानी लिखी ही क्यों जाए।

ऋचा शर्मा की ‘मैडम! चलता है ये सब’ मात्र 650 शब्दों में स्त्री-संघर्ष की महागाथा है। एक महत्वाकांक्षी, जीवट वाली लड़की ससुराल में किन स्थितियों से दो-चार होती है-उन्हें सामान्यीकृत करके कथा में सलीके से बुना गया है। यदि लघुकथा का प्रचलित आकार इस लेखिका के मन में रहता, तो ऐसी सुन्दर रचना से हिन्दी लघुकथा वंचित रह जाती।

गजेन्द्र नामदेव की ‘जगह’ नामक रचना संवेदना से भरपूर लघुकथा है, जो गागर में सागर भरने का उपक्रम करती है। फ्लैशबैक पद्धति के बेहतरीन प्रयोग के जरिए माँ-बाप का बच्चे के प्रति लगाव, मोह और चिन्ता को दर्शाया गया है। विवाहित लड़का द्वन्द्व से निकल माँ-बाबूजी के लिए घर में जगह बनाता है। द्वन्द्व को संक्षिप्त नहीं किया जा सकता।

सुदर्शन वशिष्ठ की ‘पहाड़ पर कटहल’ लघुकथा कमलेश्वर की ‘पराया शहर’ कहानी का स्मरण करा देती है। कथा-नायक गाँव से शहर आ बसा, तो यहीं का हो गया। कहा भी है-“परिवेश तो जीवित रहता है परिजनों से। कौए, चिड़ियाँ तो जंगल में भी बोलते हैं।’’ शहर में कथानायक वैसे ही पनप नहीं पाता, जैसे मैदान से पहाड़ ले जाकर पिता द्वारा लगाया कटहल का पौधा । संवेदना और सहज प्रवाह में बहकर लेखक 788 शब्दों में लघुकथा पूरी कर पाता है।

भगीरथ की ‘जरूरी चर्चा’ इधर उभरे आक्रामक धर्मान्धता के दौर में भारत के स्वरूप पर समग्र रूप में तार्किक विवेक के साथ विचार करने को प्रेरित करती है। भाषा, धर्म, संस्कृति और नस्ल के आधार पर भारत हमें नहीं जोड़ता, बल्कि भौगोलिक सीमाओं और संविधान के आधार पर जोड़ता है। विद्यार्थियों द्वारा छह सत्रों में विषय विशेषज्ञ के साथ बातचीत का प्रयोग ही इस बड़े विषय को सामने ला सकता था। यह लघुकथा भ्रम और उन्माद के बादलों को हटाकर सच की नंगी धूप के दर्शन कराती है।

राजेन्द्र यादव की ‘हनीमून’ लघुकथा कहन-कला का विशिष्ट उदाहरण है। पचासेक वर्ष की प्रिंसिपल डॉ. (कुमारी) माधुरी अरोड़ा द्वारा अपनी नव-विवाहित पूर्व छात्रा व उसके पति को हनीमून के लिए चहल जाने को प्रेरित करना अच्छा लगता है। लेकिन वहाँ के भौगोलिक सौन्दर्य के साथ हनीमून का अन्तरंग वर्णन पाठक के सामने नये अर्थ खोल देता है।

अरुण कुमार की लघुकथा ‘गाली’ बताती है कि हम कुछ भी सोच लें, कर लें, बन जाएँ, कैसा भी कानून बना लें, लेकिन हमारी जाति नहीं जाती । कारण है, स्वार्थ और घृणा । बड़े बाबू द्वारा गाली देने पर चरणदास पुलिस-चौकी पहुँच जाता है। ड्रामेबाज बड़ा बाबू छूट तो गया- पर बाहर आकर सेवादार को कहता है-चरणदास… अब क्या तू ब्राह्मण हो गया है।” यही है सदियों का संताप, जो अब तक तमाम दावों के बावजूद कायम है।

सुकेश साहनी की ‘बालीवुड डेज’ नामक लघुकथा डायरी शैली और रोचक अंदाज में बताती है कि फिल्मी दुनिया युवा पीढ़ी के जीवन में किस कदर रची-बसी रहती है । हमारी सभ्यता, संबंध और कार्य-शैली फिल्मी हस्तियों से गहन रूप से प्रभावित रहते हैं।

इनके अतिरिक्त लघुकथा के बड़े आकार की अनिवार्यता की दृष्टि से रवीन्द्र वर्मा की ‘कोई अकेला नहीं है’ लू शुन की ‘एक घटना’, कुँवरनारायण की ‘मुआवजा’, काशीनाथ सिंह की ‘पानी’, सुधा अरोड़ा की ‘ताराबाई चाल’, सर्गी पैमीस (स्पेनिश) की ‘आखिरी स्टेशन’, एतगार के रेत (हिब्रू) की ‘दीक्षा’, जगदीश चन्द्र मिश्र की ‘गरीबी अमीरी’, जानकी वल्लभ शास्त्रकी की ‘पंडितजी’ स्वयं प्रकाश की ‘विचित्र इलाज’, उमेश महादोषी की ‘महिला विमर्श’, रतीलाल शाहीन की ‘दंगा’,  पुष्पा चिले की ‘यथार्थ’, उमेश महादोषी की ‘महिला विमर्श’ और ‘प्रेमकथा’, अशोक भाटिया की ‘लगा हुआ स्कूल’ और ‘राम राज्य’, कमल चोपड़ा की ‘मारा किसने’ और ‘कत्ल में शामिल’, सतीशराज पुष्करणा की ‘झूठा अहम्’, मार्टिन जॉन की ‘वजूद अपना-अपना’ और ‘ईश्वर की इच्छा’, सुकेश साहनी की ‘डूबते को किनारा’, रामकुमार आत्रेय की ‘काश! तूने झूठ बोला होता’, आनन्द की ‘धरोहर’, प्रताप सिंह सोढ़ी की ‘खजाना’, भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की पढ़े-लिखे’, संध्या तिवारी की ‘जन्म-जन्मान्तर’, छवि निगम की ‘लिहाफ़’, इंदिरा दांगी की ‘जब तक कविता बाकी है’, कांता राय की ‘केंचुल’, अर्चना वर्मा की ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’, राधेश्याम भारतीय की ‘डर’, संजीव वर्मा की ‘नंगा’, सूरजपाल चौहान की ‘उद्धार’, प्रेमसिंह बरनालवी की ‘अमानत’, श्याम सुन्दर दीप्ति की ‘शीशा’, प्रमोद कुमार दुबे की ‘अनोखे हेड’, मालचंद तिवाड़ी की ‘चेहरा’, मुरलीधर वैष्णव की ‘दया की माया’, विनायक की ‘चील’, कुमार शर्मा ‘अनिल’ की ‘तो क्या……?’, विजय अग्रवाल की ‘पराजय’, कमल गुप्त की ‘पागल हाथी’, राजेश उत्साही की ‘वे तीन’, सत्यदेव त्रिपाठी की ‘किसके लिए जीते हैं….?’, युगल की ‘दोजख’ और ‘रक्षा-गृह’, भरत कुमार चंदानी की ‘संग-तराश’, राजनारायण बोहरे की ‘भय’, सत्यनारायण की ‘सितम्बर में रात’, अनुपमा सरकार की ‘आधुनिकता’ के अलावा ‘सायरन’ (उदय प्रकाश), ‘जुगलबंदी’ (आइस केरी), ‘एक कफन और’ (कमल गुप्त), ‘दुख’ (अमरीक सिंह), ‘साक्षात्कार’ (विजय उपाध्याय), ‘कहाँ हैं राम?’ (कृष्णपाल परख), ‘साहित्य सेवा’ (डॉ. माहेश्वर), ‘हीर रांझा’ (जोगिंदर पाल ), ‘इच्छा’ (सुनील गज्जाणी), ‘पीर पराई नहीं’ (नीरज सुधांशु), ‘काला धन सफेद धन’ (संजय अय्या), ‘मन का उद्घोष (चन्द्रेश कुमार छतलानी), ‘अतिथि कक्ष’ (रामयतन यादव)  जैसी लघुकथाएँ प्रचलित आकार का अतिक्रमण कर, लघुकथात्मक संरचना में ही, वस्तु के अनुरूप रचनात्मक निर्वाह कर लघुकथा के नए गवाक्ष खोलती हैं। विस्तार-भय से यहाँ इनका विवेचन-विश्लेषण नहीं किया रहा।

कहानियों का फैलाव सामान्यतः चार-पाँच से दस-पंद्रहपृष्ठों तक होता है, जिनमें कथाकार अपनी बात मुकम्मल तरीके से कह पाता है। लघुकथा सामान्यतः एक-डेढ़ पृष्ठ तक की होती है। लेकिन बहुत-सी कहानियाँ बीस-तीस, यहाँ तक कि चालीस-पचास पृष्ठ तक भी पार कर जाती हैं। बीसेक पृष्ठों की अच्छी कहानियाँ हिन्दी में काफी संख्या में मिल जाएँगी। इधर की एक चर्चित कहानीकार किरण सिंह के ‘यीशू की कीलें’ संग्रह में ‘द्रौपदी पीक’ जैसी समर्थ कहानी करीब पचास पृष्ठों की है। उदय प्रकाश की ‘पीली छतरी वाली लड़की’ जैसी कुछ कहानियाँ इससे भी आगे जाती हैं। ‘पीली छतरी वाली लड़की’ सन् 2000 में ‘हंस’ के पाँच अंकों के 63 पृष्ठों में ‘लम्बी कहानी’ नाम से छपी थी। कहानी या कविता में ‘लंबी’ विशेषण से किसी को आपत्ति नहीं। सारी मुसीबत लघुकथा के क्षेत्र में ही होती है। यह जड़ता की स्वीकृति का ही प्रमाण है। यानी कहानी के पास विषय के मुताबिक खुलने की गुंजाइश है, जबकि लघुकथा के क्षेत्र में हमने ऐसा विचार अभी तक नहीं किया है। यदि हम लघुकथा को इस तरह से देखें कि इसके पास बाहरी स्पेस दो-ढाई पृष्ठ का तो है ही, तब रचनाकार की रचना-प्रक्रिया के समय भी उसके चेतन-अर्धचेतन में यह बात रहेगी और लघुकथा के गमले में अधिक और बड़े फूल खिलने की सम्भावनाएँ व्यवहार में उतर आएँगी। हाँ, वे लघुकथाएँ भी कहानी नहीं, लघुकथा के फार्मेट में ही लिखी होनी चाहिए।

ऐसी लघुकथाओं को लेकर आई प्रतिक्रियाएँ रचनात्मक धरातल पर किसी भी हलचल को नकारने का ही प्रतिकर्म करती लगती हैं। ‘लंबी लघुकथा’ प्रत्यय पर विशेष आपत्ति की गई। इतिहास में लंबी कहानी और लंबी कविता नाम बिना आपत्ति के अब तक चल रहे हैं। बलराम अग्रवाल का मत है कि ‘अभी इस बात को उठाने का समय नहीं है।’ जब सौ के करीब बेहतर लघुकथाएँ इस प्रकार की उपलब्ध हैं, तो फिर किस बात की प्रतीक्षा की जाए ! लघुकथा-लेखकों के मन को खोलने वाली इस गुत्थी को क्यों न यथाशीघ्र सुलझाया जाए। सुभाष नीरव का कहना है कि ‘लघुकथा को लघुकथा ही रहने दिया जाए।’ कहानी को लम्बी कहानी और कविता को लम्बी कविता कहने से वे कहानी और कविता ही रहती हैं, कुछ और नहीं हो जातीं । ‘हंस’ में तो सन् 1986 से कहानियों से भिन्न ‘लम्बी कहानी’ शीर्षक देकर भी हर अंक में एक या दो लम्बी कहानियाँ राजेन्द्र यादव देते रहे। किसी ने कहानी या कविता-क्षेत्र में ऐसी आपत्ति नहीं की, क्योंकि यह विस्तार का एक आयाम है। मधुदीप का कथन है कि शब्द-संख्या को लेकर मर्यादा का पालन होना चाहिए, हालांकि वे प्रकारांतर से एक हजार शब्दों तक की लघुकथा को स्वीकार भी करते हैं । तीनों प्रतिक्रियाओं में लघुकथा की संरचना के स्तर पर कोई तर्क प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसा होता, तो विमर्श की गुंजाइश बनती। स्पष्ट है कि अपेक्षाकृत बड़े आकार की लघुकथाओं में विभिन्न प्रकार के ऐसे विषयों को वाणी देने की क्षमता रहती है, जो अन्यथा छोटे आकार की कथा-रचना में सम्भव न होता। विषय की जरूरत के मुताबिक इनमें वर्णन, विवरण, विश्लेषण, दृश्यबंध यानी विस्तार के लिए स्पेस रहता है। अनेक लघुकथाएँ व्यास शैली के पक्ष में भी खड़ी होकर बोलती हैं। यदि लघुकथा को अपने संसार को समृद्ध करना है, तो इस दिशा में बहुत सम्भावनाएँ मौजूद हैं।

लघुकथा पर होने वाली अधिकतर चर्चाएँ रचनात्मक कम और अकादमिक अधिक होती हैं। ऐसे में ये चुनिन्दा लम्बी लघुकथाएँ एक प्रकार से संकेत-दीप का कार्य कर सकती हैं। लीक से हटकर जो लघुकथाएँ कोई खतरा उठाकर भी यथार्थ के किसी पक्ष को सहज प्रवाह और समग्रता से सामने ला रही हैं, उन पर चर्चा करना आज ज्यादा जरूरी हो गया है।

रचना का सबसे बड़ा नियम यही होता है कि उसे लिखने का कोई नियम नहीं होता; स्व- अनुशासन तो होता ही है। जिस प्रकार उद्गम के पश्चात् नदी अपने दो किनारे स्वयं बनाती जाती है, इसी प्रकार रचना का वस्तु-जल अपना स्वरूप स्वयं निश्चित करता है। विश्व-साहित्य में शास्त्र सदा रचना के पीछे चला है। श्रेष्ठ रचनाएँ ही नए-नए प्रतिमान बनाया करती हैं और यह क्रम अनवरत चलता रहता है। रचना और जड़ता का भला क्या सम्बन्ध ! यहाँ लघुकथा के नियमों की पुड़िया बाँटने वालों के लिए अपनी कविता ‘उड़ान’ उद्धृत करना आवश्यक समझता हूँ-

उसने चिड़िया से पूछा-

कैसे उड़ोगी

किधर उड़ोगी

कितना उड़ोगी

कितनी दूर उड़ोगी

उड़ने की सीमा जानती हो !

चिड़िया बोली-

पंख मेरे

मन मेरा

आकाश मेरा

तुम्हें क्यों बताऊँ

देखना हो तो

मेरा उड़ना देखो

यह कह चिड़िया

 ‘फुर्र’ हो गई ….

(‘संरचना’वार्षिकी 2018 तथा ‘लघुकथा: आकार और प्रकार’ 2019 सं. अशोक भाटिया) संशोधित

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