
जीवन एक पुस्तक है, वह पुस्तक, जिसके हर संस्करण में आवश्यकता एवं परिस्थिति के कारण कुछ अध्याय जुड़ते जाते हैं, कुछ अध्याय समयातीत होने के कारण हटाए भी जाते हैं। नई पीढ़ी का जीवन पाँच दशक पहले जैसा सीधा- सपाट नहीं रह गया है। वैश्विक परिस्थितियाँ निरन्तर बदल रही हैं। घटनाक्रम इतनी तीव्रता से बदल रहे हैं कि व्यक्तिगत जीवन में सामंजस्य बिठाना सरल न होकर और अधिक जटिल हो गया है। आज वह युग नहीं रह गया कि बच्चे माता- पिता या किसी अन्य की डाँट खाकर चुपचाप बैठ जाएँ। बच्चों की कोमल भावनाओं को समझना बहुत ज़रूरी है।
अनिता ललित की लघुकथा ‘दहशत’ में माता पिता की चिन्ता और उनके मन की आशंका का कारण है पेपर खराब होने पर पुत्र को डाँट देना। माँ रीना की आँखों में आँसू हैं और मन में डर है– ‘बेटा अट्ठारह वर्ष का हो रहा है, गर्म ख़ून है! भगवान न करे! कहीं कुछ उल्टा– सीधा कर बैठा तो’। अखबार में छपने वाली आए दिन की आत्महत्या की सुर्खियाँ और भी डराती हैं। बेटे रिंकू को फ़ोन मिलाया; मगर फ़ोन अभी भी स्विच ऑफ था’। फोन का स्विच ऑफ़ होना, दोनों को और डराता है। रवि सोचते हैं कि दोस्तों के साथ व्यस्त होगा। उन्हें नई पीढ़ी से और भी शिकायते हैं- लापरवाही, आलस्य, आराम तलब होना, धैर्य और सहनशीलता का न होना।
कार हॉस्टल के सामने पहुँची ही थी कि सामने से रिंकू एक बैग लिए हुए आता दिखा! रीना दौड़कर उसके पास पहुँची और उससे लिपट गई! रिंकू अचकचा गया! वह हैरान था, माँ के इस अप्रत्याशित व्यवहार से।
रिंकू एक सेमिनार में गया था, इसलिए फ़ोन स्विच ऑफ था! उसने पापा की डाँट का बुरा माना ही नहीं। उसने पापा को गले लगाते हुए कहा- “आय एम सॉरी पापा! आपका बेटा हूँ, कुछ ग़लत नहीं करूँगा! मुझपर भरोसा कीजिए!”
इस लघुकथा का एक- एक वाक्य सधा हुआ है। कथा में रीना और रवि के अन्तर्द्वन्द्व को बहुत कुशलता से चित्रित किया है। यह लघुकथा पाठक को आद्यन्त अपने साथ बहा ले जाती है।
परिवार, माता- पिता से लेकर सन्तान तक भावनात्मक संरक्षण का आधार है, आत्मीयता की शक्ति है, सम्मान और प्रेम इसको अभिसिंचित करने वाला निर्मल जल है। आनन्द हर्षुल की लघुकथा ‘बेटी का क़द’ में इसकी उष्मा को अनुभव किया जा सकता है। माँ का एड़ी उठाना, पिता का घुटने मोड़कर बेटी के कद को बढ़ाना, केवल क़द तक सीमित नहीं , बल्कि उस रूढ़ि को तोड़ना है, जो बेटी के महत्त्व को नकारती रही है। गहन आत्मीयता की अन्तर्धारा परिवार की शक्ति है। परिवार की शक्ति के बिना समाज सुदृढ़ नहीं होता। आत्मीयता का यह संस्पर्श पूरे घर को इस प्रकार सुरभित और प्रभावित करता है-
‘जहाँ वे थे एक दूसरे से कद का खेल खेलते– खेलते वही फर्श पर ढेर से फूल खिल आए थे अचानक, बिना मिट्टी और पानी के– सुंदर फूल।’ आनन्द हर्षुल लघुकथा- जगत् के उन गिने- चुने लेखकों में से एक है, जिन्होंने इस विधा की गरिमा और अभिव्यक्ति को ऊँचाई प्रदान की है।
बेटी की महत्ता और सामाजिक एवं पारिवारिक चेतना के लिए रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की ‘नवजन्मा’ भी देखी जा सकती है।
तीसरे व्यक्ति की भूमिका परिवार को जोड़ने और तोड़ने का काम करती है। यह उस तीसरे व्यक्ति के सोच पर निर्भर है कि वह परिवार का हितचिन्तक है या नहीं। बदलते दृष्टिकोण, संस्कार और हैप्पी मदर्स डे ऐसी ही लघुकथाएँ हैं। तीसरा व्यक्ति जोड़ता भी है और कभी दरार भी पैदा करता है; लेकिन कभी सफल होता है, कभी नहीं हो पाता।
जब कोई लड़की वधू बनकर ससुराल आती है, तो उसे परिवार के साथ सामंजस्य बिठाने में समय लगता है। कारण है- मायके और ससुराल के अलग- अलग तौर तरीके और जीवन- शैली। ससुराल वाले चाहते हैं कि बहू केवल उनके अनुसार चले। उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं रह जाती। तनाव का कारण बनता है पति और अन्य लोगों में से किसकी बात को वह प्राथमिकता दे। डॉ.उपमा शर्मा की ‘बदलते दृष्टिकोण’ लघुकथा पारिवारिक इसी द्वन्द्व पर आधारित है। सासू माँ के गुस्से का कारण है विलम्ब से चाय लाना और उसमें भी चीनी कम। मीनू ने जब भाभी से पूछा , तो बताया कि माँ जी की चाय में ज्यादा चीनी डालने पर आपके भाई नाराज होते हैं। माँ को शुगर है न।’’ भाभी के इस तर्क पर सासू माँ और नाराज़ हो उठती है और इसे बेटे के विरुद्ध भड़काने की बात कह जाती है। मीनू भाभी के कार्य का समर्थन करती है, तो सासू माँ अपने लिए सब्जी में नमक, मसाले और तेल कम डालने का आरोप लगाती है? बेटी मीनू का यह कहना- “हृदय रोगी हो आप और ये सब नुकसान देता है आपको।’’
बेटी के समझने पर माँ आहत होती है- ‘‘यह भी बता… और तू कब से इसकी इतनी तरफ़दारी करने लगी! कल तक तो मेरी हाँ में हाँ मिलाती थी!” माँ ने आश्चर्य से बेटी को देखते हुए कहा।
मीनू ने नजरें झुकाकर जबाब दिया, ‘‘तब मैं किसी की भाभी नहीं थी माँ।’’
मीनू का यह कथन पारिवारिक सामंजस्य का सूत्र है। मीनू अपने घर और ससुराल के दोनों परिवार के अनुभवों के कारण व्यावहारिक अन्तर को समझ चुकी है।
आशु बेटे के पुत्री का जन्म हुआ, तो माँ शीला को बुलावे का इन्तज़ार है। सहेली बिना का यह कहना- “उसे माँ की नहीं, आया की याद आई है। मैंने भी दुनिया देखी है” गुमराह करता है। ॠता शेखर ‘मधु’ ने ‘संस्कार’ लघुकथा में परिवार में तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप को चिह्नित किया है। शीला बेटे के पास न जाने का मन बना लेती है।
‘‘माँ, किस दिन का टिकट ले लूँ?” आशु के पूछने पर- ‘‘बेटा, अभी कुछ दिन के लिए रहने दे। कुछ काम आ गया है’’ कहकर टालना चाहती है।
‘‘किन्तु कल तक तो आप तैयार थीं, आज अचानक क्या हो गया।’’ आशु ने माँ की चुप्पी ताड़ ली- “माँ, यदि आप यह समझ रही हैं कि मैं आपको काम के लिए बुला रहा हूँ, तो आप गलत हैं। मेरे घर में बाई, कुक और आया, सभी हैं। फिर भी कुछ कमी है।’’
“क्या,” शीला असमंजस भरी आवाज़ में बोली।
‘‘परमात्मा वाली नज़र गुड़िया के लिए चाहिए माँ,” कहते हुए आशु भावुक हो गया।
“कल की टिकट ले– ले बेटा,” शीला ने सहज भाव से कहा।
तीसरे व्यक्ति के रूप में निशा की भूमिका- कृष्णा वर्मा की ‘हैप्पी मदर्स डे’ में भी मतभेद का बीज वपन करने का प्रयास करती है। उद्विग्नता के कारण रमा भी उससे मिलना चाहती है। मिलने पर वह रमा जी से पूछ बैठतीहै- “आज आप भी कुछ उखड़ी– उखड़ी– सी लग रही हैं। सब ठीक तो है? तबीयत तो ठीक है ना?’’
कुरेदकर पूछते ही रमा अपनी बहू अनु के बारे में बता देती है- ‘‘आज तो अनु ने हद ही कर दी। घर का काम यूँ ही फैला छोड़कर इतनी जल्दी चली गई कि मेरे उठने का इंतज़ार भी नहीं किया। ऐसा तो पहले कभी हुआ नहीं। इतना भी नहीं कि एक फोन ही कर दे। बस यही सोच मन खिन्न– सा हो गया था। सोचा, तुम से ही बातचीत करके मन हलका कर लूँ। अनु को क्या चिंता, मैं हूँ ना सब काम देखने के लिए।’’
इसी बीच गुड़िया जाग गई। दरवाज़े की घंटी बजी, तो निशा ने दरवाज़ा खोला, तो सामने अनु खड़ी थी। रमा भी गुड़िया को लेकर आ गई, तो उसे आश्चर्य हुआ- “अरे अनु–आज इतनी जल्दी घर?”
“मम्मी जी, आज से मैंने सोमवार के व्रत शुरू किए हैं। सुबह जल्दी निकल गई थी कि मंदिर दर्शन करके समय से दफ़्तर पहुँच जाऊँ। आपकी नींद खराब न हो, सो आपको सुबह उठाना उचित नहीं समझा; इसलिए नवीन से कह गई थी कि आप को बता दें।’’
हाथ में पकड़ा लिफाफा सासू माँ के आगे बढ़ाती हुई बोली, “हैप्पी मदर्स डे मम्मी जी!” आज शाम आपको खाने के लिए बाहर ले जा सकूँ; इसलिए ही जल्दी आई हूँ।
रमा के मन में जो शंका थी, वह निर्मूल सिद्ध हुई। आशंका का जो तूफ़ान सिर उठाने लगा था, शमित हो गया। रमा के पास स्वयं को धिक्कारने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा था। परिवार सन्तुलित रहे, इसलिए आपसी सद्भाव को सचेतन रखना आवश्यक है।
ठीक इसके विपरीत शशि पाधा की ‘घर’ लघुकथा है, जिसमें तीसरे का हस्तक्षेप नहीं है। नई बहू लता ने अपनी सुशीलता और मृदुभाषिता से उसने सब का दिल जीत लिया था। उसकी सास ‘मीरा‘ भी उसे इस घर के नए परिवेश में ढल जाने के लिए सहायक थीं। मीरा ने देखा पास वाले स्टोर रूम में लता के खाली सूटकेसों के पास ब्राउन कागज़ में लिपटा पैकेट पड़ा था। वह पैकेट खोला नहीं गया; क्योंकि उसमें बहू के मम्मी–पापा की तस्वीर थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि इसे कहाँ रखूँ।’’
मीरा ने वह तस्वीर बैठक की कोने वाली मेज़ पर करीने से रख दी। 50 वर्ष पहले मीरा ने अपने लिए भी ऐसा ही सोचा था; किन्तु तब वह हिम्मत नहीं जुटा पाई थी।
अब बैठक की उस मेज पर मीरा और उसके पति की तस्वीर के साथ, लता के माता–पिता की तस्वीर भी सजी थी।
बहू के साथ यदि सभी ऐसा व्यवहार करें, तो घर एक आत्मीय सुगन्ध से सुरभित हो सकता है।
परिवार में पिता वह सदस्य है, जिसकी तरफ़ बहुत कम ध्यान जाता है। जैसे किसी पौधे को हवा- पानी चाहिए उसी प्रकार पिता को भी आत्मीयता की ऊष्मा की आवश्यकता है। ‘प्रेम’ चन्द्रेश कुमार छतलानी की वैसी ही अभिभूत करने वाली लघुकथा है। बेटा दस वर्षों के बाद विदेश से लौटा है। लोग दबी ज़ुबान से आक्षेप लगाते ही हैं। पिता के बचने की आशा नहीं है। चिकित्सक ने ‘ना’ की मुद्रा में सिर हिला दिया। पुत्र को आया देखकर पिता ने संकेत किया और मन्द स्वर में कहा- “एक बार…अपनी गोद का सिराहना दे दे।’’ पिता ने गहरी और सन्तुष्टि- भारी साँस लेकर आँखें मूँद लीं।
वह अपने पिता के चेहरे से नजरें नहीं हटा पाया, कुछ क्षणों तक देखने के बाद उसे एकाएक याद आया कि उसके पिता पहली बार उसकी गोद में लेटे थे और वह न जाने कितनी बार।
इस लघुकथा के ताने- बाने पर ध्यान देना होगा। कोरा कथन लघुकथा के लिए कोई अर्थवत्ता नहीं रखता। इस तरह का कथन लघुकथा की संजीवनी बन सकता है। कुछ नए- पुराने लेखक निष्प्राण और निरुद्देश्य कथन द्वारा बलात् लघुकथा गढ़ने के लिए प्रयासरत हैं। ऐसे लेखकों को चन्द्रेश कुमार छतलानी की इस लघुकथा को ध्यान से पढ़ना चाहिए। संवेदना की ऊष्मा के कारण ‘प्रेम’ लघुकथा पाठक के हृदय को छू लेती है। यह केवल समापन पर नहीं रुकती, बल्कि उससे आगे प्रवासी सन्तानों को भी सजग करती है। ‘उसके पिता पहली बार उसकी गोद में लेटे थे और वह न जाने कितनी बार’ यह अनुभूति द्रवित कर देती है।
मृत्यु शय्या पर लेटे एक और पिता की व्यथा- कथा है- ज्ञानदेव मुकेश की ‘मुक्ति’, जिनके प्राण किसी उधेड़बुन में उलझे हुए हैं। उन्होंने कई गरीबों को कर्ज दिया और कर्जदारों से छोटे- छोटे पुर्जे बनवाकर रख लिये थे। उन्होंने एक दिन बेटे से पूछा, “बेटा, कर्ज के वे पुर्जे कहाँ हैं?” बेटे ने कर्ज के वे सारे पुर्जे लाकर उनके सिरहाने के नीचे रख दिए। बेटे ने इसे मोह समझा।
पिता ने बेटे से बीड़ी पीने की इच्छा जताई। बेटा पिता को माचिस और कुछ बीड़ी थमाकर चला गया।
अगली सुबह पिता नश्वर शरीर का परित्याग कर चुके थे। बेटे ने वे पुर्जे खोजे; पर सिरहाने के नीचे नहीं मिले। ज़मीदार पिता ने वे पुर्ज़े जला दिए थे। वे सभी गरीबों को कर्ज से मुक्त करके, खुद भी मुक्त हो गए थे। कर्ज़ वसूल करना उनको व्यथित करता रहा। अब उनके चेहरे पर दोष- मुक्ति के भाव थे।
प्रियंका गुप्ता की ‘भूकम्प’ लघुकथा में वह पिता हैं , जिनकी ज़िन्दगी की अहमियत अब रह ही कितनी गई है। वैसे भी उनका गू– मूत करते– करते थक चुका था वो…और उसकी पत्नी भी…। ऐसे में अगर भूकंप में वो खुद ही भगवान को प्यारे हो जाएँ, तो उस पर कोई इलज़ाम भी नहीं आएगा। यह पुत्र की निम्न कोटि का सोच है। बाऊ जी तो न चल पाने के कारण घर में छूट गए, लेकिन हड़बड़ी में दुधमुँहा बच्चा अपने पालने में ही रह गया था। अंदर की ओर भागते उसके कदम वहीं थम गए। वह गिरते– गिरते बच गया था। एक हाथ से व्हील चेयर चलाते बाहर आ चुके पिता की गोद में उसका लाल था।
जाने भूकंप का दूसरा तेज़ झटका था या कुछ और …पर वह गिरते– गिरते बच गया था।
यह भूकम्प का दूसरा झटका ही था कि जिस पिता की मरण- कामना कर रहे थे, वही अशक्त पिता उस बच्चे को गोद में लिये हुए थे। प्रियंका ने भूकम्प के द्विअर्थी शीर्षक के माध्यम से लघुकथा के कथ्य को सार्थक रूप से सम्प्रेषित किया है।
माता- पिता को बोझ समझने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। ऐसी परिस्थितियों मेंसविता मिश्रा ‘अक्षजा’ की लघुकथा ‘तोहफ़ा’ लू- लपट में शीतल बयार की तरह है।रामसिंह पोस्टकार्ड और एक लिफ़ाफ़ा, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था– ‘वृद्धाश्रम’ लिखा था, पाकर हतप्रभ और सन्तप्त होकर पत्नी को आवाज़ देते हैं- “सुनती हो बब्बू की अम्मा, देख तेरे लाड़ले ने क्या हसीन तोहफ़ा भेजा है!” पिता कभी अपने पुत्र से खुश नहीं रहे। शायद इस सोच के पीछे यह सोच हो। लिफ़ाफ़ा खोला, तो उसमें नए घर का चित्र था। लिफ़ाफ़े में और नीचे लिखा था- ‘’बाबा, आप अपने वृद्धाश्रम में अपने बेटे– बहू को भी आश्रय देंगे न।’’
पढ़कर रामसिंह और उनकी पत्नी सरोजा के आँखों से झर– झर आँसू एक बार फिर बह निकलें।
इस तरह के उदाहरण कम ही होते हैं, लेकिन होने चाहिए , ताकि टूटते परिवारों को जोड़ने का प्रयास जारी रहे
डॉ. मधु सन्धु की ‘अभिसारिका’ लघुकथा उन वयोवृद्ध दम्पती की व्यथा का फोटोग्राफ़िक चित्रण है, जो अपने छोटे और बड़े बेटे के पास अलग- अलग रह रहे हैं। कोई एक बेटा दोनों को एक साथ नहीं रखता। माता- पिता का भी छोटे और बड़े बेटे ने बँटवारा कर रखा है। जो स्वर्णिम दिनों में एक साथ रहे हों, उनको अलग- अलग रखना मानसिक क्रूरता है। मधु सन्धु जी ने दोनों के मिलन को नए जोड़े की तरह ही उत्सुक दिखाया। दोनों ने ‘टखनों– घुटनों, वात– पित्त– कफ एवं दाँतों– मसूड़ों पर चर्चा की। गुनगुनी धूप में चाट का मज़ा लिया, घड़ी देखी और फिर अलग– अलग रास्तों पर चल दिए।‘ यह लघुकथा करुणा से ओतप्रोत है।
परिवार की बढ़ती उपेक्षा कितना असहाय बना देती है, इसे रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा ‘स्पेस’ में भी देखा जा सकता है।
‘ प्रेम’ परिवार की सुरक्षा का वह घेरा है, जो बुज़ुर्गों को आश्वस्त करता है। पौत्र ध्रुव के माध्यम से शशि पाधा ने ‘मंजिलें लाँघता दर्द’ लघुकथा में इस संवेदना का बल प्रदान करती हैं। ध्रुव ब्लॉक जोड़कर ‘बड़ी सी बिल्डिंग’ बना रहा है, कई मंज़िला।कारण- “इसमें हम सब मिलकर रहेंगे। चाचा, मासी और मेरे सारे कज़िन्स। कितना मजा आएगा न दादी।’’
दादी के घुटनों में दर्द है । वह घुटनों पर दवाई लगा रही है। कुछ देर बाद सोचकर ध्रुव ने बिल्डिंग की ऊपरी मंज़िलों से ब्लाक्स निकाल दिए। अचानक ध्रुव ने उनकी कुर्सी के पास आकर बड़े प्यार से कहा, “दादीमाँ! देखिए न,अब मैंने केवल एक ही मंजिल का घर बनाया है। लिफ़्ट खराब होने पर आप को सीढ़ियाँ चढ़ने में दर्द होता है न; इसीलिए यह बड़ा– सा घर बनाया है। सब यहीं रहेंगे। सभीईईईई ——–।’’
और दादी माँ का दर्द कई मंजिलें लाँघता हुआ कहीं दूर उड़ गया।
बच्चे के माध्यम से लेखिका ने जिस एहसास और संस्कार की बात की है, वह सुखी परिवार के लिए अपरिहार्य और अनिवार्य है।
ससुराल पक्ष के कुछ ऐसे भी विवाद होते हैं, जिनको मायके वाले हवा देते हैं। कुछ तो उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर बेटी का घर उजाड़ने में पीछे नहीं रहते । शशि बंसल की लघुकथा ‘विकल्प’ में इला और कमल में आपसी मतभेद रहता है। माँ के यहाँ पहुँचकर इला शिकायत करती है और हमेशा के लिए माँ के यहाँ आकर रहना चाहती है। माँ का यह कहना- “तेरे पापा से पूछती हूँ”- लता को विचार बदलने को बाध्य करता है। वह- “इसकी ज़रूरत नहीं”- व्यंग्य मिश्रित मुस्कान फेंक इला पर्स उठाकर बाहर निकल गई।
यहाँ लेखिका का मन्तव्य है कि पति- पत्नी को अपने मतभेद स्वयं सुलझाने चाहिए। तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति, दाम्पत्य सम्बन्धों में सहायक नहीं हो सकती।
आज के युग में भला आदमी होने की नियति है, सबके शोषण का शिकार होना , मूक बनकर रहना, प्रतिकार न करना। घर- परिवार में यह सामान्य बात है। मंजरी इस समझदारी शब्द के पीछे छिपे शोषण में केवल मूक द्रष्टा बनी रही है। इस नियति को सीमा सिंह की लघुकथा ‘समझदार’ में देखा जा सकता है। चाहे दूध का सन्दर्भ हो, चाहे पढ़ाई का या शादी का । ससुराल में आकर भी समझदारी का यह तमगा भ्रूण परीक्षण तक पहुँचता है, ताकि वंश चलाने के लिए लड़के का जन्म सुनिश्चित किया जा सके। ‘‘तुम तो समझदार हो, सोचो अगर तुझे भी बेटी हुई, तो वंश आगे कैसे चलेगा’’- सासू ने कहा था और साथ ही पति ने भी पूछा- ‘’तो क्या सोचा मंजरी?’’
सुनकर बरसों का दबा आक्रोश एक साथ फूट पड़ता है- “नहीं चाहिए मुझे, ये समझदारी का तमगा, जो मुझे अजन्मे की हत्या में भागीदार बनाता हो ।”
इस प्रतिकार से उसने स्वयं को बहुत हल्का महसूस किया।
अपनी उन्नति के लिए दूसरे का चरित्र हनन आज की परिपाटी बन गई है। राजनीति, साहित्य , समाजसेवा, न्याय , प्रशासन , मीडिया, विज्ञापन आदि क्षेत्रों में इसे देखा जा सकता है। अपने डूबते करियर को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए घटिया उत्पाद को बढ़िया बताना तथा अच्छे उत्पाद को घटिया बताकर प्रचारित करना, ओछी हरकत ही कही जाएगी। अर्चना राय ने ‘सीढ़ी’ लघुकथा में चुस्त संवादों के माध्यम से इसे सफलतापूर्वक अभिव्यक्त किया है। प्रायः देखा गया है कि प्रतिष्ठित व्यक्ति को निशाना बनाया जाता है ए, ताकि अपना स्वार्थ सिद्ध हो सके। विज्ञापन में काम करने वाले नायक का कथन कितना घातक और शर्मनाक है–
“वह क्या है न सर? बेईमान को बेईमान कहने से वह पब्लिसिटी नहीं मिलती, जो ईमानदार को बेईमान…”– कहते हुए वह ढिठाई से हँसने लगा।
समाज का चौथा स्तम्भ कहलाने वाले मीडिया का असली रूप सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘भीतर की आग में दिखाई देता है। समाचार– पत्र जिस पवित्रता की दुहाई देकर अच्छा बनना चाहते हैं, उसके भीतर का सच कुछ और ही है। जिसमें सही काम करने की आग है, उसका जीवन कुछ और ही है। सुदीप को अखबार का सम्पादक व्यावहारिक होने के लिए कहता है। यही व्यावहारिकता दुनियादारी है। सुदीप को यह दुनियादारी स्वीकार नहीं है। यही कारण है कि उसे यहाँ की नौकरी छोड़कर किसी दूसरे अखबार का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा। वर्त्तमान कालखण्ड को देखें, तो मीडिया ऐसे लोगों से भरा है, जो पैसे लेकर देश के विरोध में भी लिखने को तैयार है। उन पत्रकारों के लिए निजी हित और स्वार्थ ही सर्वोपरि हैं।
हमारा समाज परम्पराओं में इतना जकड़ा है कि लोभवृत्ति के कारण शोषण को भी महिमामण्डित किया जाताहै। कितने भी कानून बन जाएँ, दहेज के लोभी कोई न कोई मार्ग ढूँढ ही लेते हैं। कमल चोपड़ा ‘ डाका’ लघुकथा में इस जड़ परम्परा पर कड़ा प्रहार करते हैं। लेखक ने ब्रजनाथ के यहाँ दहेज की लूट और सेठ मदन लाल के यहाँ डकैती की लूट में जो साम्य प्रस्तुत किया है, उससे पुराने विषय को भी धारदार बना दिया है। दहेज लेने वाले भी नगदी , बर्तन, कपड़ा आदि समेट रहे हैं और उसी समय डाका डालने वाले भी वही काम कर रहे हैं। दोनों लुटे परिवारों की एक- सी स्थिति है, लेकिन लेखक का यह कथन देखिए, जो लघुकथा को अनुप्राणित कर देता है- थोड़ी ही देर में गाँव में पुलिस आ गई; लेकिन न जाने क्यों पुलिस का एक भी आदमी ब्रजनाथ जी के घर नहीं आया था।
इस लघुकथा में कोई संवाद नहीं, हैं तो केवल कुछ कथन। कथ्य में किसी कथन से कोई गतिरोध उत्पन्न नहीं होता, बल्कि कथ्य का विकास होता है। प्रत्येक कथ्य ‘डाका’ लघुकथा को एक त्वरा प्रदान करता है। कारण, प्रत्येक कथन की सार्थकता और पारस्परिक निबद्धता। सपाट और निरर्थक कथन को घसीटकर लघुकथा गढ़ने वाले इस कथा की संरचना से सीख ले सकते हैं।
मानवीयता वह गुण है, जो केवल मानव मात्र के लिए ही नहीं, वरन् प्रत्येक जीव के लिए हृदय में दया और करुणा- भाव को प्रश्रय देता है। कुत्ते का सन्दर्भ किसी को गर्हित सिद्ध करने के लिए दिया जाता है, जबकि वह अपने पालक के लिए जान भी जोखिम में डाल देता है। मेरी मँझली बहन की शादी के समय बढ़िया भोजन परोसने पर भी हमारे कुत्ते ने छुआ तक नहीं। फेरों की रस्म पूरा होने तक माँ और कुछ अन्य लोगों का भी उपवास था। बहन जब पहली बार ससुराल गई, तो कुत्ता भी हमारे ताँगे के साथ ही गया। बहन की ससुराल में मक्का की रोटी मिली, तो उसने नहीं खाई, ससुराल वालों ने मज़ाक किया कि तेरा यह भाई बहुत नखरेवाला है। तुम्हारे यहाँ इसे गेहूँ की रोटी मिलती है। बहन ने कुत्ते को डाँटा कि तू मेरी बेइज्जती करा रहा है। यहाँ से चला जा। वह वहाँ से तुरन्त चल दिया। रास्ते के कुत्तों से लड़ता- झगड़ता लहूलुहान होकर 12 किमी दूर हमारे घर पहुँचा। इसी तरह मध्य प्रदेश में22 मई, 1997 को सुबह लगभग चार बजे भयंकर भूकम्प आया। घर की पालतू कुतिया रोमा भौंककर भूकम्प की आहट से जगाती रही। मैंने उठकर उसे डाँटा और फिर लेट गया। वह शान्त नहीं हुई। इसके बाद हम कोई अनहोनी सोचकर जागे कि सारा घर हिलने लगा। हम सब घर से बाहर निकल आए। क्या प्रकृति आपदा का पूर्वानुमान करने की संवेदन शक्ति मनुष्य में है? उत्तर होगा, नहीं। मनुष्य का धर्म है कि जीवों के लिए अपने हृदय में करुणा और मानवीयता का भाव पोषित करे।
कपिल शास्त्री की ‘आगंतुक’ इसी मानवीयता की पुष्टि करता है।जनवरी की कड़कड़ाती ठण्ड में पिल्ले को आश्रय देने से पत्नी का कोप– भाजन बनने की सम्भावना थी। उसकी आवभगत करने में व्हाट्सएप्प, फेसबुक, टी– वी– सीरियल सब भूल जाना उसके प्रति मानवीय भाव को उजागर करता है। पत्नी की शर्त है- ‘ले तो आए हो, अब तुम ही इसकी गन्दगी भी साफ करना ।’ पति और बेटी द्वारा सहर्ष स्वीकार कर लेना, इस लघुकथा को आद्यन्त अनुभूतिपरक एवं पठनीय बना देता है।
प्रियंका गुप्ता की लघुकथा ‘जानवर’ सड़क पर लावारिस घूमने वाले कुत्ते पर केन्द्रित है, जो दिनभर इधर- उधर भटकता; लेकिन सूरज डूबने से पहले अपने मुहल्ले में वापस आ जाता। मुहल्ले वाले बासी– तिबासी खाना उसके आगे डाल देते । डिनर लेने के बाद बचा– खुचा खाना बाहर आकर उसे खिलाना, माला का नियम बन गया था। एक दिन रसोई का काम समेटकर माला उसे खाना देने के लिए बाहर आई, दूसरे गेट की आड़ में खड़ा आवारा आदमी उसे दबोचकर घर के अन्दर ले जाने लगा। सन्नाटे- भरी रात में वह भीतर तक काँप गई। इसी बीच अपराधी चीखा । कुत्ते ने चुपके से उसके पैरों में दाँत गड़ा दिए थे। उसे भागने का मौका नहीं मिला। चीख सुनकर मुहल्ले वाले आ गए और उसे पुलिस को सौंप दिया। इस कथा के सन्दर्भ में लेखिका का यह कथन बहुत सार्थक है- लोगों की निगाह में यह कुत्ता एक जानवर है; पर असली कुत्ता तो वह था, जो आदमी के खोल में किसी जानवर से भी ज्यादा ख़तरनाक हो सकता था…।
आदमी रूपी जानवर से तो यह कुत्ता अधिक श्रेष्ठ है।
सुकेश साहनी की लघुकथा ‘दूसरा चेहरा’ बहुत चर्चित रही है और बरसों से पाठ्यक्रम का हिस्सा है। मिक्की द्वारा कुत्ते के पिल्ले को घर लाने और मुख्यतः दादी माँ के प्रतिरोध पर आधारित है, जो मानती हैं– ‘‘राम–राम! कुत्ता सोई, जो कुत्ता पाले।’’ मिक्की अपने दोस्त से पिल्ला माँग लाया था। इस पर माँ भी चिल्लाई थी। बस उसको एक रात रखने की इजाजत मिली थी। रात में जब पिल्ला दादी माँ की चारपाई पर चढ़ने का प्रयास करने लगा, तो उसने देखा- दादी ने दाएँ–बाएँ देखा…पिल्ले को उठाया और पायताने लिटाकर रजाई ओढ़ा दी।
कठोर चेहरे के पीछे दादी माँ का यह दूसरा चेहरा भी है, जो जीवों के प्रति करुणा से ओतप्रोत है। लेखक ने इस तथ्य को भी स्थापित किया है कि कठोर दिखने वाला हर व्यक्ति, कठोर नहीं होता।
मानव का जीवन बहुत ऊहापोह- भरा होता है। हमें जो नहीं मिल पाता, वही अभाव बनकर उद्वेलित करता है। जिसने संसार का परित्याग कर दिया, उसे संसार से अनुरक्ति होने लगती है। जो सांसारिक जीवन जी रहा है, उसे लगता है कि सारा जीवन यों ही व्यर्थ में व्यतीत कर दिया। वास्तव में जिसको जो नहीं मिला, उसे वही प्राप्य लगने लगता है। चित्रेश की लघुकथा ‘डुबकियाँ’ में जीवन के इसी सत्य की स्थापना होती है। कॉलेज छोड़ने के बाद आज करीब पचास साल बाद दो बूढ़े राधाकिशन और मूलचंद ट्रेन में मिलने पर एक दूसरे को पहचान जाते हैं। एक दूसरे के बारे में बात करते हैं। मूलचंद व्यापार में पूरी तरह डूब गया और राधाकिशन ने समाज सेवा और धर्म प्रचार से समय निकाल दिया। एक को अफ़सोस हो रहा सांसारिक जीवन में डूबकर धर्म से दूर होने का, तो दूसरा अफ़सोस कर रहा है कि उसने सांसारिक जीवन का आनन्द नहीं लिया। दोनों ही, जो न पा सके, उसी के लिए उद्विग्न हैं। सन्तुष्टि का न होना ही जीवन की डुबकियाँ हैं, जिसमें अधिकतम व्यक्ति गोता गाते रहते हैं।
जीवन के लिए प्रेम अमूल्य निधि है। जिसके जीवन में प्रेम नहीं, वह असामान्य होने के कारण किसी भी समय मानसिक विकृति का शिकार हो सकता है। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की प्रथम लघुकथा – ‘इन्तज़ार’ (रचना तिथि: 29 जून 1972) इस सन्दर्भ में देखी जा सकती है।
जीवन के कुछ ऐसे भी प्रसंग होते हैं, जिनको प्रेम का नाम नहीं दिया सकता, लेकिन अनुराग के वे पल किसी सुखद ऊष्मा से कम नहीं होते। सारिका भूषण की ‘एक स्पेस’ लघुकथा, मनोवैज्ञानिक लघुकथा है, जो मानव मन की गुह्यतम अनुभूति को विश्लेषित करती है। भ्रमण के समय मिस्टर वर्मा के मुख से ‘हैलो मिसेज फ्रेश’ ये तीन शब्द सुनकर न जाने कौन– सी नज़दीकियों का आभास होने लगा। … कुछ मीठी– मीठी– सी लगने लगी थी पार्क की हवा। पेड़ों से छनकर आती धूप भी गुदगुदाने लगी थी। सारिका भूषण ने अव्यक्त; लेकिन मर्यादित सम्बन्धों को इस प्रकार व्याख्यायित किया है- ‘शायद हर किसी को चाहे स्त्री हो या पुरुष अपने रिश्तों के बीच एक स्पेस चाहिए। रिश्ते बोझ न बनें, उनके दायरों में घुटन न लगे, इसके लिए शायद एक मर्यादित स्पेस चाहिए।’ जीवन के सूक्ष्म सम्बन्धों को सारिका भूषण ने अत्यन्त कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। घटाटोप लेखन के बीच इस प्रकार का रचनाकर्म विधा की शक्ति को प्रभासित करता है।
जीवन के विभिन्न सन्दर्भों को लेकर प्रतीकात्मक रूप से भी लघुकथाओं का सृजन हुआ है, जिनमें मानव- मन की कुण्ठा, ईर्ष्या, प्रतिशोधात्मक भावों की अभिव्यक्ति हुई है। यह अभिव्यक्ति सीधी- सपाट न होकर मनोविश्लेषण पर आधारित है। गहराई में उतरे बिना इसे हृदयंगम नहीं किया जा सकता।हिमांशु की ‘क्रौंच–वध’ और ‘चिरसंगिनी’ इसी तरह की रचनाएँ हैं।
गहन सकारात्मक संवेदना व्यक्ति की शक्ति बन सकती है। यह तब सम्भव है, जब हम औपचारिकताओं के केंचुल को उतारकर बाहर निकलें। अधिक जिम्मेदारियाँ ओढ़कर हम सामान्य नहीं हो सकते। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को ‘केंचुली’ लघुकथा में– सुदर्शन रत्नाकर ने बहुत ही सहजता से अभिव्यक्त किया है। अनुशासन की घिसीपिटी जीवन- चर्या को ताक पर रखकर स्कूल से लौटे बच्चों से मस्ती । सोसाइटी की हम उम्र महिलाओं के साथ गप- शप लगाना। पार्क में घूमी, एक साथ बैठकर रात का खाना खाया। मुक्त मन से सब काम किए, तो गहरी नींद आई। यही मुक्तभाव जीवन का सुख और सौन्दर्य है।
जीवन अनेक विषमताओं से भरा हुआ है। हम उन विषमताओं में स्वय को कितना ‘सम’ कितना सकारात्मक बनाए रखते हैं, इसी पर सब आश्रित है। जब व्यक्ति अकेला होता है, तो वह खुद से ही संघर्ष करता रहता है। उसका अन्तर्द्वन्द्व उसे बेचैन किए रता है। अकेलेपन के कवच को तोड़कर किसी व्यक्ति से जुड़ना, भले ही औपचारिक हो, शक्ति को रिजेनेरेट करना है, स्वयं को ऊर्जस्वित करना है। डॉ. सुषमा गुप्ता ने इस मनोवैज्ञानिक सत्य को अपनी लघुकथा ‘एक दिन..’ में सम्प्रेषित किया है।
जाने क्या सोचकर उसने बरसों बाद मैसेज भेजा– ‘‘तुम्हारे देश में लोग मर रहे हैं।’’
मुझे कुछ समय लगा यह समझने में कि मैसेज किसका है, फिर याद आया कि मैंने उसको स्विट्ज़रलैंड की ट्रेन में देखा था आखिरी बार।
मैंने रिप्लाई किया– “तुम्हारे देश के भी ।”
सन्देशों से बात आगे बढ़ती है, तो एक साथ कॉफी पीना तय होता है।
जीवन जब बहुत सारे अवरोधों और संकटों के बीच पिस रहा होता है, तब भी आशा की एक किरण बची रहती है। लेखिका ने यह तथ्य लघुकथा में इस रूप में अभिव्यक्त किया है-‘ज़िंदगी सहूलियतों के सहारे नहीं कटती। ज़िंदगी उम्मीद से कटती है। एक ऐसी उम्मीद, एक ऐसी जिजीविषा जो शरीर में जिंदगी भरती हो। हालात बुरे होंगे, बहुत बुरे होंगे, पर याद रखना, तुम्हारे अंदर की उम्मीद बची रहे सदा।’
जीवन में आशा बची रहे, मन के भीतर जिजीविषा रहे, तो एक दिन मन का भी आएगा।’
‘मन का एक दिन’ यही शक्ति का स्रोत है।
अपनी इस लघुकथा की मूल संवेदना के विषय में डॉ. सुषमा गुप्ता का कहना है- ‘अतीत पलटकर देखने पर दिखता तो है; पर कोई भी जख़्म आखिर पलटकर कब तक देखा जा सकता है! जीवन में बहुत बार महसूस होता है कि हम अकेले रह गए हैं, पर अकेला कौन नहीं है! किसी के सहारे से यूँ भी जिंदगी न कटती है, न आगे बढ़ती है। जीवन सिर्फ अपनी हिम्मत और अपनी जिजीविषा के बल पर ही आगे बढ़ता है और यही जीवन का अर्थ भी है और सार्थकता भी।
कथ्य और शैली का वैविध्य किसी भी विधा के लिए प्रतिष्ठा की विषय है। आज के दिन तक बहुत से लेखक नवीन से नवीनतम विषयों के संधान में लगे हुए हैं। लघुकथा- शिल्प के लिए बहुत से सफल और असफल प्रयास हुए हैं। हिन्दी लघुकथा- जगत् में सुकेश साहनी एक ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने 1989 से आज तक (35 वर्षों में ) ‘गोश्त की गन्ध’ से लेकर ‘ चिड़िया’ लघुकथा तक सर्वाधिक नवीन प्रयोग किए हैं। ये प्रयोग किसी दिखावे या मनबहलाव के लिए नहीं रहे। इस तरह की लघुकथाओं को सतही अध्ययन करने वाले नहीं समझ सकते। न समझने का कारण है, पाठक का स्वयं को शब्दकोशीय अर्थ तक ही सीमित कर देना। भाषा के लाक्षणिक और व्यंजक रूप को भी समझना अनिवार्य है। इसको समझे बिना, अच्छी लघुकथा का सृजन सम्भव नहीं। घिसे- पिटे विषयों को ठोक- पीटकर, सपाटबयानी से बोझिल लघुकथाओं का रोज़ ढेर लगता जा रहा है। कोई लेखक रुष्ट न हो जाए, इस डर से ‘वाह- वाह’ कर दी जाती है। नए- पुराने सभी लेखकों के लिए यह प्रवृत्ति घातक है। बर्रे के छत्ते में कोई ढेला नहीं मार सकता है। आत्ममुग्ध रचनाकारों के लेखन पर ईमानदारी से टिप्पणी करने वाले भी इसलिए चुप्पी लगा जाते हैं।
विषयवस्तु और शिल्प की नवीनता दृष्टि सेसुकेश साहनी साहनी की लघुकथा ‘कोलाज़’ पर विचार करना आवश्यक है। नारी के लिए जनमानस में किस प्रकार का चिन्तन पल्ल्वित हो रहा है, इसके लिए अलग- अलग स्थानों की अलग- अलग सूचनाओं और प्रतिक्रियाओं को सँजोया गया है। यहाँ सूचना और प्रतिक्रियाओं को मिलाकर कथा का ताना- बाना तैयार किया गया है।क्या इस तरह की अलग- अलग सूचनाएँ और प्रतिकियाएँ लघुकथा बन सकती हैं ? उत्तर होगा- ‘ हाँ’‘। पहिए के अरे (स्पोक्स) और धुरी को समझना होगा। धुरी एक है, अर्थात् एक ही केन्द्रीय विषय है। सारी सूचनाएँ और मन्तव्य एक ही धुरी पर यानी ‘नारी की स्थिति’ पर, स्पोक्स की तरह केन्द्रित हैं। अरे छोटे- बड़े या किसी भी तरह से अलग आकार के नहीं हो सकते। आकारगत साम्य के कारण ही वे सब धुरी से जुड़कर पहिए को गतिशील बनाते हैं। सब मिलकर एक ही रूपाकार की सृष्टि करते हैं।इतना जान लेने पर ‘कोलाज़’लघुकथा को सही रूप में ग्रहण किया जा सकता है। ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा’ मिलाकर ऐसी लघुकथा नहीं रची जा सकती।
शैली विशेष की घोषणा होते ही, उसे समझे बिना ही कुछ लोगों में लघुकथा उगलने की होड़ लग जाती है। यह मारामारी किसी सुष्ठु रचना के लिए सही लक्षण नहीं। इस फर्राटा दौड़ में आगे निकलने की होड़ में अधिकतर लेखक अपनी अधकचरी रचना के साथ मुँह के बल गिरते हैं। लघुकथा को अनुभव और संवेदना की चाशनी में मद्धिम आँच पर पकाने की आवश्यकता है।
‘बीसवाँ कोड़ा’ हरभगवान चावला की लघुकथा में कोड़े को भावपरक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। इसी के साथ कोड़ा मारने वाले का मनोविज्ञान भी समझना होगा। नाबालिग राजकुमार अपने पालतू सफ़ेद कबूतर का पीछा करते हुए छोटी रानी के महल में दाख़िल हो गया। उस समय रानी वस्त्र बदल रही थी। राजकुमार, ऊपर से नाबालिग! न्याया का दिखावा करने के लिए प्रतीकात्मक दण्ड तो दिया ही जाएगा। राजकुमार जैसा रुई का पुतला बनाकर उस पुतले को बीस कोड़ों की सज़ा सुनाई गई। कोड़े पड़ते गए, राजकुमार ख़ामोश बना रहा। बीसवाँ कोड़ा पुतले पर पड़ते ही राजकुमार की चीख निकल गई ।
सब हैरान, ‘राजकुमार की पीठ पर एक धारी थी, जिसमें से लहू रिस रहा था।’ लहू रिसने का कारण जब पूछा गया, तो कोड़ा मारने वाला सिपाही वज़ीर से भयभीत नहीं हुआ। आँखों में आँखें डालकर बात केवल निर्भीक व्यक्ति ही कर सकता है। सिपाही का उत्तर चौंकाने वाला था, “मेरी राजधानी में युवाओं को बैल की जगह कोल्हू में जोता जाता है और जब कोई युवा कोल्हू को खींचते हुए बेदम होकर साँस लेने के लिए रुकता है, तो उस पर कोड़े बरसाए जाते हैं। कोल्हू में जुतने वाले युवाओं में एक मेरा भी बेटा है। वह रोज़ शाम को जब घर आता है, तो उसकी पीठ पर मैं धारियाँ देखता हूँ, जिनमें से लहू रिस रहा होता है। आज जब मैंने राजकुमार के पुतले पर कोड़े बरसाए, तो बरबस मुझे अपने बेटे की पीठ याद आ गई थी।’’
लेखक ने लहू रिसने की गहन कल्पना से लघुकथा को मार्मिक एवं सम्प्रेष्य बना दिया है। इस तरह की मार्मिक एवं सशक्त रचनाएँ गहन अनुभूति और सशक्त भाषा की माँग करती हैं, जिसका चावला जी ने बखूबी निर्वाह किया है।
लघुकथा- जगत् में नए लेखक निरन्तर जुड़ते जा रहे हैं और अपने सशक्त रचनाकर्म से चमत्कृत भी कर रहे हैं। स्थापित लेखकों का दायित्व है कि इनको उपयुक्त अवसर, मार्गदर्शन और स्थान दें, ताकि लघुकथा और अधिक प्रखरता से साहित्यिक ऊँचाई को स्पर्श कर सके। हड़बड़ाहट में कुछ भी लिख देना न लघुकथा है, न लघुकथा का शॉर्टकट। इस प्रवृति से बचना चाहिए। रचना अच्छी है या नहीं, उसे आने वाला समय निर्धारित करता है।
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