जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा के सामाजिक सरोकार-2     Posted: March 1, 2023

शिक्षा-जगत् का समाज मनोविज्ञान

यदि उत्तरदायित्व का पालन किया जाए, तो शिक्षक का कार्य सर्वाधिक कठिन है। शिक्षक के कार्य को अन्य व्यवसाय या नौकरी की तरह नहीं देखा जा सकता । एक माता/ पिता अपनी 2-3 सन्तान को बिगाड़ते या सँवारते हैं।  यदि अच्छा और समर्पित शिक्षक हुआ तो वह अपने शिक्षण -काल में न जाने कितने अभिभावकों की सन्तान को सही दिशा देकर समाज के निर्माण में महती भूमिका निभा सकता है। यदि केवल नौकरी करने और समय व्यतीत करके केवल पैसा कमाने के उद्देश्य से शिक्षक व्यवसाय में आया है, तो वह एक पूरी पीढ़ी को बरबाद कर सकता है। जो विद्यार्थी के मनोविज्ञान को नहीं जानता, वह कितना भी बड़ा विद्वान् क्यों न हो, बच्चों को सही दिशा नहीं दे सकता। छात्रों के प्रति अपनत्व का भाव न हो , तो शिक्षक उनके अन्तर्मन तक अपनी पैठ नहीं बना सकता। बिना पैठ बनाए किसी कक्षा के सभी बच्चों को एक ही लाठी से हाँकना कहाँ तक तर्क -संगत है।

सुकेश साहनी की लघुकथा -‘मैं कैसे पढ़ूँ’ की मानसिक व्यथा और दशा को समझना पड़ेगा। शुचि ने सफ़ेद कपड़े में लिपटे अपने छोटे भाई गुड्डे  के शव को  हाथों में उठाए पिताजी को पहली बार रोते देखा था। कक्षा में गुड्डे की वह छवि उसकी आँखों से नहीं हट रही थी। मन विचलित होने के कारण वह न प्रश्न समझ पा रही थी, न सही उत्तर दे पा रही थी। शिक्षिका शुचि को दण्डित करने के उद्देश्य से बैंच पर खड़ा कर देती है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे एक ग्रामीण ने एक बार चूड़ी बेचने वाले के फेंछे (पोटली) पर डण्डा मारकर  पूछा कि इस फेंचे  में क्या  है? मनिहार बोला पहले इसमें चूड़ियाँ थीं। अब तुम्हारे डण्डा मारने के बाद इसमें क्या बचा है, नहीं  बता सकता। आज के युग में ऐसे शिक्षकों की कमी नहीं है। यह लघुकथा प्रत्येक शिक्षक  को पढ़नी चाहिए। शिक्षा में माता-पिता की महती भूमिका होती है। जब वे बाल मनोविज्ञान से परिचित न होने पर शिक्षक की भूमिका में आ जाते हैं, तो बच्चे के लिए घातक सिद्ध होते हैं। ग्रहण (सुकेश साहनी)का विक्की पिता की रूढ़िवादी  शैक्षिक अज्ञानता का शिकार होता है। बाहर सूर्य-ग्रहण हो रहा है , जिसे देखने की या उसके बारे में बात करने की उसको अनुमति नहीं। वही विक्की घर के भीतर पिता की डाँट के साथ ग्रहण के बारे में रट्टा लगा रहा है।

शिक्षा-जगत् के ज्वलंत प्रश्नों को चित्रित करती सुकेश साहनी की लघुकथाएँ (शिक्षाकाल, शिक्षाकाल-2, मैं कैसे पढ़ूँ, बैल, पिंजरे, बोंजाई, ग्रहण ) के सन्दर्भ में डॉ कविता भट्ट जी का कहना है-‘वस्तुतः आधुनिक शिक्षा पद्धति की विकृतियों एवं विसंगतियों का गूढ़ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं। वे अपनी छोटी से छोटी लघुकथा द्वारा शिक्षा जगत् में विद्यमान शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की बड़ी से बड़ी चुनौती को चित्रित करते हैं। वे यहीं नहीं रुकते; अपितु उसके समाधान स्वरूप ऐसे तथ्य भी प्रस्तुत करते हैं; जिनके समक्ष बड़े से बड़े शिक्षाविद् भी नतमस्तक हो सकते हैं।’  व्यावहारिक जीवनानुभव के लिए यह पूरा संसार ही स्कूल है। सुकेश साहनी की बहुचर्चित लघुकथा ‘स्कूल’  उस संघर्ष की सार्थक प्रस्तुति है, जो जीवन के लिए अनिवार्य घटक है।

व्यावहारिक जीवनानुभव के लिए यह पूरा संसार ही स्कूल है। सुकेश साहनी की बहुचर्चित लघुकथा ‘स्कूल’  उस संघर्ष की सार्थक प्रस्तुति है, जो जीवन का अनिवार्य घटक है।

स्कूल आकर्षण के केन्द्र होने चाहिए, न कि भय के। हसरत भरी नज़र कोयल पर डालकर मरी-मरी चाल से अपनी कक्षा की ओर चल देने वाले बालक (पिंजरे-सुकेश साहनी) के लिए स्कूल एक ऐसा पिंजरा है, जिसकी ओर बढ़ते ही उसकी सारी खुशी नदारद हो जाती है।  सपना (डॉ. अशोक भाटिया) का बच्चा  ‘पढ़ाई-पढ़ाई’ – सुबह और शाम, खेल का उसके जीवन में कोई काम नहीं। ऐसी क्रूर पढ़ाई बच्चों की मुस्कान, उनका नैसर्गिक बचपन छीन लेती है। उससे बेहतर तो चिड़िया है, जो घूमती है, जहाँ-तहाँ उड़ती है, पानी में किल्लोल करती है। पढ़ते समय भी उसका ध्यान अपने खिलौनों की तरफ़ लगा हुआ था। स्कूल जाने से बच्चे का यह कहना-‘‘माँ, जब मैं यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी कर लूँगा, उसके बाद मैं खूब खेलूँगा और कोई काम नहीं करूँगा।’’ मन को व्यथित करता है। श्याम सुन्दर अग्रवाल की लघुकथा  ‘स्कूल’ का तीन साल का बंटी  स्कूल जाने के चाव में ‘पिछले सप्ताह ही वह खरगोश की शक्ल वाले सुन्दर बस्ते में पुस्तक डाले फिर रहा था।’ स्कूल जाने के बाद से वह इतना आतंकित है कि ज्वरग्रस्त हो गया और स्कूल न जाना पड़े, तो उस कोठरी में जाकर छुप गया, जहाँ जाने से भी वह डरता था। अर्थात् स्कूल उसके लिए  डरावनी कोठरी से भी अधिक भयाक्रान्त करने वाली जगह है।

सुरेश अवस्थी की लघुकथा ‘स्कूल’ में  दीपू पहले जब शैतानी करता था , तो सब हँस देते थे; लेकिन अव वह पाँच साल का हो गया , तो   उसके  देर से जागने पर  पापा, गमले से फूल तोड़ने पर आण्टी स्कूल में भर्ती कराने का डर दिखाते हैं। भय का यह मनोविज्ञान बच्चे के मन में शिक्षा के प्रति वितृष्णा पैदा कर देता है। जब उसे एक दिन स्कूल जाना पड़ा, तो उसने जो देखा , वह उसके कोमल मन में भय के बीज बो गया । उसकी पहली दिनचर्या यह रही-‘उसने स्कूल में प्रवेश करते ही कान पकड़े। उठक –बैठक लगाते हमउम्र बच्चों को देखा। वह सहमा-सहमा रहा और जब उसके पापा उसे छोड़कर चले गए वह चुपके – से भाग खड़ा हुआ ,अकेले।’ मैं शिक्षा -जगत् से चालीस साल जुड़ा रहा हूँ।  हमारे शिक्षा -जगत् में बच्चों के कोमल मन को रौंदने वाले विकृत मानसिकता वाले शिक्षकों का अभाव नहीं है।

एक और लघुकथा है ‘चटसार’(पंकज कुमार चौधरी) यानी गाँव की बदहाल  प्राथमिक पाठशाला, जिसके दरवाजे और खिड़कियाँ कब के निकल चुके थे। एक आदमी सूअर के बच्चे की पिछली टाँग बाँधकर लाठी से टाँगे हुए जा रहा था। सूअर के बच्चे( पाहुर) के चिल्लाने/ रोने  पर बच्चे कई तरह के अनुमान लगाते हैं। लाठी से टाँगने का दर्द, उसकी माँ के पास से दूसरी जगह ले जाना,  अभी तक कुछ खाने को न मिलना। पर सभी बच्चे सहमत नहीं होते।  अन्त में चौथा बच्चा गंभीर होकर बताता है-‘ अरे ! वह डोम पढ़ाने के लिए उसे स्कूल ले जा रहा था। उसी डर से वह रो रहा था। एकाएक सब बच्चे चिल्ला पड़े–हाँ… हाँ सही बात! सही बात!!’ इस  कथन ने अव्यावहारिक शिक्षा की सारी पोल पट्टी खोल दी है।

बहुत से स्कूलों की हालत यह है कि शिक्षकों  का ढेर सारा समय गैर शैक्षिक गतिविधियों में नष्ट होता है। इसे अशोक भाटिया की लगा हुआ स्कूल में देख सकते हैं। तमाम जाग्रति और प्रशासन के जागरूक होने पर भी रामगढ़ गाँव के  सरकारी हाई स्कूल  जैसे  बहुत से स्कूल हैं,  जहाँ पढ़ाई के अलावा सब कार्य होते हैं। शिक्षा के नाम पर की गई लीपापोती एक पूरी पीढ़ी के भविष्य को अन्धे कुएँ में धकेल रही है।

संसार में ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को अलग और विशिष्ट बनाया है। कक्षा के सभी छात्र एक समान नहीं हो सकते। यह आवश्यक नहीं कि 90 प्रतिशत अंक लाने वाला जीवन  में भी पूरी तरह सफल होगा और 60 प्रतिशत अंक लाने वाला असफल। सफलता का आधार व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति और जिजीविषा में  निहित है। अभिभावकों में यह गलत धारणा घर कर गई कि उनका बच्चा कक्षा या विद्यालय  में सर्वाधिक अंक लाने  वाला हो। बच्चा मशीन नहीं , इंसान  है। मंजुश्री गुप्ता  की लघुकथा ‘चिन्ता’  में  मनीषा अपने  बेटे रोहन का छठी कक्षा का रिपोर्ट कार्ड देखकर चिल्लाती है और बाद में रो पड़ती है; क्योंकि वह तीन विषयों में सी–ग्रेड  लाया है। इस परेशानी का कारण है प्रिया की बेटी को हर विषय में ‘ए’ ग्रेड मिला है। यही उसका तनाव है। अगले दिन पाँच साल बाद  पुरानी सहेली नीता को भी अपनी परेशानी बताती  है और उसके बच्चों के बारे में पूछती है।

नीता ने कहा– ‘‘मेरा एक ही बेटा है 10 साल का !मगर वह मानसिक रूप से विक्षिप्त है। हमारी बहुत कोशिशों और इलाज के बाद कल उसने पहली बार –मुझे ‘मम्मा’ कहा ! इसलिए मैं इतना खुश हूँ।’’

अभिभावकों को अपने बच्चों पर अपनी इच्छाएँ और धारणाएँ नहीं थोपनी चाहिए। बच्चों के सहज विकास को ही प्राथमिकता देनी चाहिए।

खुली खिड़की- बन्द खिड़की

वर्त्तमान काल में सामाजिक बोध आत्मीय सम्बन्धों से हटकर आभासी दुनिया की ओर मुड़ गया है, जिसमें कर्मकाण्ड अधिक और सत्कर्म कम या नगण्य होता जा रहा है। नाम-प्रदर्शन और यश की भूख जो भी करा ले जाए, कम है। खिड़की का काम होता है, बाहर की ताज़ा हवा को भीतर आने देना और भीतर की घुटन को बाहर का रास्ता दिखाना यानी उससे मुक्ति पाना। यथार्थ में ऐसा न होकर इसके ठीक विपरीत  हो रहा है। व्यक्ति बाहरी समाज से घर के भीतर घुटन लेकर आता है और फिर उसी घुटन में साँस लेता है। डॉ छवि निगम की लघुकथा ‘खिड़की’ इस तथ्य को बखूबी उद्घाटित करती है। लघुकथा का प्रारम्भ इन पंक्तियों से होता है-‘शाम की खिड़की खुली। ट्रे सजाकर कमरे के अंदर लेकर आती विभा के हाथ अचानक काँप गए। ऑफिस से लौटकर सोफे पर पसरे अजय के हाथों में इस वक्त विभा का ही फ़ोन था, जिसकी स्क्रीन पर नज़रें  गड़ाए  उसकी त्यौरियाँ चढ़ती चली जा रही थीं।’ विभा के फोन के स्क्रीन पर अजय का नज़रें गड़ाकर देखना और त्यौरियाँ चढ़ना शंका को हवा देता है। बात बस इतनी -सी है कि विभा की कविता की पोस्ट पर कुछ ने प्रशंसा में वाह वाह !! लिख दिया था। विभा का मुस्कुराने का प्रयास पति की चिल्लाहट में गायब हो गया। ट्रे से कपों  के फर्श पर गिरने की खनक या चिल्लाहट कौन-सी आवाज़ तेज थी , कहना कठिन था। अजय अपने फोन का पासवर्ड विभा को नहीं बताता, लेकिन उसके फोन को खँगालने में पीछे नहीं है। तकनीक की दुनिया में जीने वाले लोगों के दोहरे चरित्र आत्मीय सम्बन्धों को और भी जटिल बना दे रहे हैं। यह आभासी दुनिया व्यक्ति को आत्मकेन्द्रित करके उसे आत्ममुग्धता के जाल में उलझाती जा रही है। ताज़ा हवा के लिए जो खिड़की खुली थी, वह फिर बन्द हो गई। छवि निगम की इस लघुकथा का  पहला वाक्य है-‘ शाम की खिड़की खुली’, और अन्तिम वाक्य है- ‘खिड़की बन्द हो चुकी थी।’ खिड़की शीर्षक से बेहतर इसका कोई  शीर्षक नहीं हो सकता। खिड़की का खुलना और बन्द होना बहुत गहरी व्यंजना लिये हुए है। गिनी-चुनी लघुकथा लिखने वाली छवि निगम इस विधा को विषयवस्तु, भाषा शिल्प एवं विशिष्ट शैली से सुदृढ़ बनाने में महती भूमिका निभा रही है।

आभासी दुनिया ने आज के आभासी समाज को इस तरह अपनी गुंजलक में कस लिया है कि वह हमारे लिए व्यसन बनती जा रही। यह व्यसन हमारे वास्तविक और आत्मीय सम्बन्धों के लिए घातक होता जा रहा है। पति-पत्नी के सम्बन्ध इसी विकारग्रस्त मानसिकता के कारण अविश्वनीय होते जा रहे हैं। सुकेश साहनी  ने ‘फ़ेस टाइम’  लघुकथा में इस अन्तर्द्वन्द्व को बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से और सूक्ष्मता से  प्रस्तुत किया  हैं। पति नाम का प्राणी स्वयं भले ही इस वायवी सम्बन्ध के मकड़जाल में दिन रात उलझा रहे; लेकिन पत्नी का किसी से सम्पर्क करना उसे बेचैन कर देता है।  अपनी महिला मित्र की उत्तेजक प्रोफाइल पिक्चर को वह बड़ा करके बहुत देर तक देखता रहता है। बैट्री लो होने पर जब बैडरूम में आता है, तो पत्नी को फोन में व्यस्त देखकर भड़क जाता है। पत्नी उसकी बात को अनसुना करके मुस्कुराते हुए कुछ टाइप करने लगती है। पति चिल्लाकर कहता है- ‘‘फोन रखो। मुझे सोना है।’’

पत्नी उसकी हर बात का प्रतिकार करती है, लेकिन फोन बन्द नहीं करती। कुछ टाइप करने लगती है पत्नी ‘फेसटाइम’ वीडियो पर थी। स्क्रीन की लाइट में उसका चेहरा मोहक मुस्कान से चमक रहा था। पति के दिमाग़ में सन्देह की सुई उभरती है कि इसका जरूर किसी से कोई चक्कर से चल रहा है…। सन्देह ने उसको इतना बिचलित और उद्वेलित  कर दिया कि उसे ‘अंगारों पर लोटने’ जैसी छटपटाहट  की अनुभूति होने लगी। छोटी-सी लघुकथा में इस तथ्य को बहुत विश्वसनीयता से प्रस्तुत किया गया है।

            अनिता ललित की लघुकथा (खास आपके लिए) में गुझिया बनाकर उसे फ़ेसबुक पोस्ट के हवाले करने का सुख सब पर भारी पड़ता है। बेटा चिन्टू अगर गुजिया की प्लेट पर झपटता है, तो थप्पड़ खाता है। सासू माँ भगवान को भोग लगाने के लिए गुजिया लाने को कहती है तो बहू झुँझलाती है- ‘सबको अपनी ही पड़ी है! हुँह!’  गुजिया की प्लेट की फोटो फ़ेस बुक पर लगाकर लाइक्स, कमेण्ट बटोरना  महत्त्वपूर्ण हो गया। जिस उद्देश्य से गुजिया बनाई, वह कहीं पीछे छूट गया। इसे युगीन विडम्बना ही कहा  जाएगा।

आभासी दुनिया का एक चेहरा दिखाई देता है नेटवर्क (महेश शर्मा ) लघुकथा में। सभी साधन या संसाधन अच्छे हैं यदि उनके प्रयोग की ‘अति’  से बचा जाए। सोशल नेटवर्क पर ज़्यादा लाइक्स और कमेंट्स न मिलने पर स्टेटस में ‘‘डाउन विद हाई फीवर’’ का ब्रहमास्त्र चलाया। तरह-तरह के लाइक्स और कमेण्ट्स आते रहे-…’गेट वेल सून’,…‘‘ओ बेबी ख्याल रखो अपना’’,…..‘‘अबे, क्या हो गया कमीने’’ आदि-आदि। शाम तक यही सिलसिला चलता रहा। झपकी आ गई। शाम हो गई है, तो सामने रहने वाले व्यक्ति ने दरवाजा खटखटाया और  ससंकोच पूछा- ‘‘वो तुम सुबह से अपने कमरे से बाहर नहीं निकले तो सोचा कि पूछ लूँ,…”  आभासी दुनिया के लिए छद्म सुख में डूबे व्यक्ति का नेटवर्क इतना कमज़ोर है कि उसे सामने के फ्लैट में रहने वाले व्यक्ति को भी नहीं जानता। इस आभासी दुनिया ने इस अजनबीयत को और बढ़ाया है। संवेदना और अपनत्व की खिड़की को और भी अधिक कसकर बन्द कर दिया है।

इसी आभासी दुनिया की एक और लघुकथा है मीनू खरे की ‘चिप’। चैटिंग में जड़ने वाली लच्छेदार भाषा, इमोजी के साथ ‘प्लेटोनिक लव ओनली! पवित्र…पॉयस.. दोस्तीनुमा प्रेम’ आदि की छद्म शब्दावली देखिए-

“तुमसे बात करता हूँ, तो किसी दूसरी ही दुनिया में चला जाता हूँ! मन करता है तुम्हें चिप बनाकर फ़िट कर लूँ अपने आप में..जब चाहूँ चिप ऑन,चैट शुरू …”

“चिप बेशक बना लो; लेकिन जैसे आज स्टाफ़ रूम में मुझे देख रहे थे, सबके सामने वैसी गहरी निगाहों से मत देखा करो प्लीज़! मेरा दिल धड़कने लगता है!”

XXX

“अब फ़ोन रखो”

“नहीं तुम रखो”

“क्यों?”

“तुमसे दूर होता हूँ, तो लगता है जान निकल जाएगी! टुकड़ों में नहीं अब तुम्हें पाना चाहता हूँ पूरा!”

XXX

“इतनी इंटिमेसी में यह दूरी ठीक है?”

“यही तो ठीक है! तुम मैरिड हो !”

XXX

“तुम इतनी देर चैट करते हो, तो मिसेज़ कुछ कहती नही?”

“वो सो गई हैं।”

“क्या उन्हें हमारे बारे में सब बता दिया है?”

“नहीं तो! क्या है ही हमारे बीच जो किसी को बताऊँ!”

इसके बाद क्या होता? ‘प्लेटोनिक लव ओनली! पवित्र…पॉयस.. दोस्तीनुमा प्रेम’ सब हवा हो जाता है। क्यों? मीनू खरे ‘चिप’  लघुकथा का समापन इस वाक्य से करती हैं-

आगे कभी चैट नही हो सकी। चिप करप्ट हो गई थी।

इस लघुकथा के संवाद बहुत छोटे और चुटीले हैं। रचनाकार को बीच में कूदने की, उपदेश या उपसंहार देने की कोई गलती नहीं करनी पड़ती। ‘चैटिंग’ के प्रेम को सत्य समझने वालों को इससे झटका लग सकता है।  लेखिका ने एक बात और सिद्ध कर दी है कि सधी हुई , संश्लिष्ट भाषा, सन्तुलित संवाद, सार्थक शीर्षक और कथ्य पर पकड़ एक छोटे से प्रसंग / घटना को कैसे कथा में बदल सकते हैं, यह कौशल एक दिन की उपलब्धि नहीं ; बल्कि भाषा के विशिष्ट संस्कार और साधना का प्रतिफलन है।

पूरी दुनिया का एक ‘विश्वग्राम’ में रूपान्तरण सचमुच में क्रान्तिकारी है। डॉ. कमल चोपड़ा की लघुकथा ‘इतनी दूर’  का यह वाक्य-मोबाइल एस.एम.एस और नेट ने सब कुछ पास- पास कर दिया है।’ क्या इसकी वास्तविकता का प्रदिपादन करता है? प्रत्यक्ष रूप में प्रतीत होता है कि विज्ञान के इन साधनों ने हमको निकट ला दिया है; परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं। संयुक्त परिवार की संरचना ध्वस्त होने पर पारिवारिक निकटता और आत्मीयता कम हुई है। मन की दूरियाँ बढ़ी हैं। इतनी दूर’ के पिताजी ग्राउण्ड फ़्लोर पर रहते हैं। पुत्र और पुत्रवधू  तीसरे तल पर। इकलौते भाई के विदेश जाने पर वह चिन्तित होती है, तो पति कहता है- ‘हम थर्ड फ्लोर पर फिर भी बापू को कई कई दिन बाद मिलना हो पाता है।’

एक ही शहर में रहते हुए भी रोज- रोज कहाँ मिलना हो पाता है? XXX फोन के लिए अब कहीं कुछ क्या दूर। फोन पर बात करके मिले बराबर हो जाता है। मुझे देखो मेरा एक भाई कनाडा में है और बहन यू.एस.ए. । सारी दुनिया एक गाँव बन चुकी है इसलिए तुम्हारी उदासी का कोई मतलब नहीं। बस एक क्लिक और दूरियाँ खत्म….. हा हा!!

XX

तभी कालबैल बजी तो नीचे आया। पड़ोसी को यू.एस.ए. से उसकी बहन का फोन आया कि पापा का फोन नहीं मिल रहा।

दरवाजा अन्दर से बन्द था। कामवाली भी आ गई। उसके चेहरे पर भी चिंता थी। कल उसकी छुट्टी थी। बेटा पास रहते हुए भी बाबू जी की सुध नहीं ले सका था। बाबू की खुली हुई आँखें दरवाजे की ओर ताक रही थीं, जैसे किसी का इंतजार कर रही हों। तकनीक की सुलभता ने अपनापन छीन लिया । डॉ. कमल चोपड़ा की यह लघुकथा मार्मिकता से इस समस्या को प्रस्तुत करती है।

मीडियातन्त्र और सामाजिक सरोकार

            हमारी संवेदना की खिड़की खुलने की बजाय निरन्तर बन्द होती जा रही है। मीडिया के हो- हल्ले में असली समाचार, घटनाएँ, सामाजिक सत्य विलुप्त होते जा रहे हैं। अगर झूठ का प्रचार करना हो, तो दस बार झूठ बोल दो। वह सत्य पर इतना भारी पडेगा कि सत्य को गर्दन उठाने का भी अवसर नहीं मिलेगा। मीडिया अपने उत्तरदायित्व से भटक जा रहा है। उसका काम जन-सेवा नहीं बल्कि टी आर पी बढ़ाने की गलाकाट प्रतियोगिता ही है। ब्रेकिंग न्यूज- (डॉ. सुषमा गुप्ता) में इस सत्य को उजागर किया गया है। आग लगने से कार कोयला हो गई। आदमी का शरीर भी पूरी तरह जल गया। इंस्पेकटर के पूछने पर भीड़ में से एक व्यक्ति का यह बोलना- “सर कुछ क्या सब कुछ देखा। दस मिनट में तो पूरी तरह से सब जलकर राख हो गया। हम पाँचों यहीं थे तब।”
“आप क्या कर रहे थे पाँचों यहाँ। आपने कोशिश नहीं की आग बुझाने की?”
“सर हम आग कैसे बुझाते?”
“तो आप सब खड़े देखते रहे?”
“नहीं सर! हमने वीडियो बनाई है न। अलग-अलग ऐंगल से। आजकल बहुत डिमांड है ऐसे वीडियो की मीडिया में।”

पाँच व्यक्तियों में से किसी ने भी जलते हुए व्यक्ति को बचाने का प्रयास नहीं किया। मीडिया की डिमाण्ड पर अलग-अलग एंगल से वीडियो बनाना अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया। व्यक्ति, उसकी संवेदना, जो उसे मानव बनाती है, कहीं दूर छिटक गई! डॉ. सुषमा गुप्ता ने कम से कम शब्दों में नष्ट होती संवेदना और बढ़ती हृदयहीनता का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। छोटे-छोटे  सटीक संवादों के माध्यम से लेखिका ने जो कुछ कहा , उससे अधिक संकेत मात्र से कह दिया है।

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सन्दर्भ:

1-मैं कैसे पढ़ूँ, ग्रहण, स्कूल, पिंजरे, फ़ेस टाइम: सुकेश साहनी-(गद्यकोश)

2- शिक्षा-जगत् की लघुकथाएँ: डॉ. कविता भट्ट –(अक्तुबर लघुकथा डॉट कॉम, 2019,  गद्यकोश)

3-सपना, लगा हुआ स्कूल: डॉ.अशोक भाटिया- गद्यकोश

4- ब्रेकिंग न्यूज़-डॉ.  सुषमा गुप्ता (लघुकथा डॉट कॉम, गद्यकोश)

5-स्कूल: सुरेश अवस्थी, स्कूल: श्याम सुन्दर अग्रवाल, चटसार: पंकज कुमार चौधरी– (लघुकथा डॉट कॉम-विगत अंक- http://old.laghukatha.com/)

6- चिन्ता:मंजुश्री गुप्ता,  इतनी दूर: डॉ. कमल चोपड़ा (लघुकथा डॉट कॉम)

7-खिड़की-छवि निगम, खास आपके लिए :अनिता ललित,नेटवर्क-महेश शर्मा, चिप-मीनू खरे (महानगर की लघुकथाएँ: सम्पादक -सुकेश साहनी, लघुकथा डॉट कॉम)

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