कई बार सवाल है कि श्रेष्ठ लघुकथा का स्वरूप कैसा हो? इसका दूसरा पक्ष यह भी है की लघुकथा की समीक्षा का मानदंड क्या है? मैं लिख भी दूँ कि कुछ शास्त्रनुमा लक्षण ,मगर अगले ही क्षण मुझे कहना पड़ेगा- नहीं नहीं ,यही अंतिम नहीं है । यह भी हो सकता है,वह भी हो सकता है। शास्त्रीय स्वरूप तो लक्षणों की सीढ़ी है वह कुछ सहायक हो सकती है । पर लघुकथा में जो युगीन संवेदनाएँ, वैचारिकी, प्रयोगी शिल्प नई नई कला -मेधाओं से सृजित होते हैं,तो शास्त्र को भी बदलना पड़ते हैं। न बदले तो शास्त्र कालातीत हो जाता है। इसीलिए लघुकथा हो या अन्य विधा; इदमित्थम् यानी ऐसी ही हो,यह कहना नाहक लक्ष्मण रेखा खींचना है। आज की भाषामें कहें तो कलात्मक सृजन हमेशा चौखट, खाँचे, इकहरे स्वरूप को तोड़कर ही बनता है। कोई तयशुदा फॉर्मेट नहीं। कालिदास ने हमेशा ही प्रयोगविज्ञान की वकालत की। और सही भी है। कहानी का शास्त्रीय पाठ पढ़ाते समय हम छह तत्वों की बात करते हैं। पर कहानी में ये छह तत्व हों तो कहानी श्रेष्ठ बन जाती है? और नई कहानी में कई बार देशकाल ही कहानी का परिदृश्य बन जाता है ,फिर भी कहानी रेखांकित होती है ।
अब आप कहेंगे मूल सवाल से कन्नी काट रहे हैं !मैं कन्नी नहीं काट रहा । बल्कि बात करुँगा उन तत्वों की,जो नौसीखियों लिए सीढ़ी बन सकते हैं। और वे भी स्थायी आधार वाले कतई नहीं । क्योंकि संस्कृत काव्यशास्त्र में रचना को नियतिकृतनियमरहिताम् अर्थात नियति के नियमों से रहित और रचना को रचयिता की स्वायत्तता या स्वतंत्रता से मंडित किया गया है । और खासकर इस जमाने में जब आर्थिकी, अनेक दिशाओं वाली वैचारिकी, मनोविज्ञान ,राजनैतिक परिप्रेक्ष्य ,यथार्थ की प्रतिष्ठा ,उपदेशात्मबोध से दूरी, कला के फेंटेसी -चित्र- स्केच जैसे प्रयोग सर्जक की चेतना के अंग बन चुके हैं। यह भी कि संवेदन के स्वानुभूत को किस शिल्प में ढ़ाला जाए, इसका भी प्रयोग -तंत्र बहुत विकसित है ।
खैर ,मूल बात पर आ जाएँ। आज भी कथानक ,पात्र ,संवाद, देशकाल ,भाषा शैली और उद्देश्य से किसी न किसी रूप में टकराना ही पड़ता है । तो कथानक नरेटिव न हो। कथाकथन का खेल पुराना है । पर उसमें भी शैली गत निखार प्रयोग के आधार पर । इतना जरूर है कि कथातत्व संवेदन के उस नुकीले अंत तक पहुँच जाए, बिखरे नहीं। उसमें मोड़ हों ,यति- गति हो, टकराहट हो, पर उनका अंतर्ग्रथन इतना अच्छा हो कि पाठक भी उस उतार-चढ़ाव का सहयात्री बने और उसी नुकीले अंत तक पहुँचे। हाँ, यह कथानक अपने समय का हो ,पुराने कथानक में भी व्यंजना समकाल की हो। यह भी कि लघुकथा होने के कारण रचना का पहला वाक्य अपने अंतिम छोर तक इस तरह रिश्ता रखता हो कि उसमें से किसी एक वाक्य या शब्द को हटाना मुश्किल हो जाए। लघुकथा में चरित्र का विकास इतना महत्वपूर्ण नहीं है ,जितना चरमान्त के लिए उस चरित्र की सिद्धि । फिर भी वे विशेषताएँ तो आएँगी ही ,जो चरमांत की सिद्धि के लिए द्वंद्व बन जाती हैं। ये चरित्र फेंटेसीनुमा या पंचतंत्र की शैली में भी हो सकते हैं । पर अपने समय से जरूर टकराते हों। यह चरित्र आदर्शों ,उपदेशों या तथाकथित सकारात्मकता से जबरिया संबोध से संपोषित न होकर उदात्त भाव या भाव संवेदन की प्रभावात्मकता से जुड़े हों। तय है, यथार्थ तो होगा ही पर टकराहट की दिशा भी व्यंजित होगी ।
संवादिता लघुकथा की वर्णनात्मक जड़ता को नाट्यपरक और विजुअल बनाती है। चरित्र भी खुलता है और कथानक भी। वैचारिक दिशा भी टकराहट के साथ संवेदनीय भूमि को विकसित करती है ,जो इन संवादों में निहित है । पर संवाद में लेखक पात्रों में छुपकर न बोले, रट्टू तोते की तरह। ये लघुकथा के भीतर से उपजे हों। देशकाल तो यथार्थ भूमि है ,जिसके बीच से पात्र घटनाएँ ,संवेदना और रचनात्मक टकराहट उभरती है। लघु कथा के सीमित फलक में कथानक, पात्र और मुख्यतः लघुकथा के चरमांत या संवेदन में सहायक है ,तो उतना ही उसके लिए अवकाश है । भाषा -शैली के संदर्भ में इतना ही कथनीय है कि कोई भी रचना भाषा के तमाम तत्वों का संदर्भ विशेष में सुनिश्चित चयन है । इसलिए ‘तो’ जैसे निपात से लेकर अँग्रेजी या आंचलिक भाषा -बोली के शब्दों के प्रयोग में सतर्कता जरूरी है। संस्कृत काव्यशास्त्र में कहा गया है -न कम शब्द,न अधिक; उतने ही शब्द,जिनसे रचना मनोहारी हो जाए । अब मनोहारी की बात नहीं ,बल्कि शीर्ष संवेदन की संप्रेषणीयता के लिए भाषा के तमाम घटक यदि यथार्थ के नुकीले शीर्ष तक ले जाएँ, भाव तरलता में रूपांतरित करें, नये तर्क से पाठक की चौखट को खटखटाएँ, नये शिल्प में प्रभावक बनें, पुराने शिल्प में नई संवेदना के संवाहक बनें , तो लघुकथा पाठक की पूँजी बन जाती है । यही बात शैलीगत भी है। न जाने कितने शैलीगत प्रयोग हुए हैं । शरद जोशी की” मैं वही भगीरथ हूँ” लघुकथा किस ऐतिहासिक काल से कुछ संवादों में आज तक चली आती है । पंचतंत्र की शैली हो या डायरी -आत्मकथा ;अनेक प्रयोग हुए हैं। सवाल यही है कि संवेदना का कथानकीय रचाव किस शिल्प में सिद्धि पा सकता है । उद्देश्य तो अब आदर्शवाला रहा ही नहीं । कोई तर्क, कोई संवेदना, यथार्थ का कोई सिरा तीर की तरह अपनी राह चीरता हुआ पाठक तक पहुँच जाए। और उसके हृदय या मस्तिष्क में टन्न बजा दे। इसीलिए आदर्शात्मकता आजकल सकारात्मक शब्द में उतर आई है। पर मैं सकारात्मक शब्द को भी तरजीह नहीं देता। बल्कि पाठकीय चेतना में द्वंद्व या तर्क के उभार ,नये-पुराने की टकराहट के साथ बदलाव ,भावतरलता, उदात्तता या यथार्थ का कसैलापन भी तो उभार दे तो असरदार हो जाता है लघु कथा का उद्देश्य ।
ये सारी बातें तो पुरानी भी हैं और कुछ कुछ नयी सी भी । पर कुछ अच्छी लघुकथाओं के आधार पर कहूँगा कि सावयविक अंर्तग्रथन ( ऑर्गेनिक युनिटी)जरूरी है बुनावट में। यह संवेदन और भाषा के बीच जितना जरूरी है, उतने उसके नाट्य और विजुअल रूप में। कई बार उसके भीतर यथार्थ का पठार और गद्यगीत भी गड्डमड्ड हो जाते हैं। और कभी दोनों विधाओं का संक्रमण असरदार भी। यह प्रयोग के कौशल पर निर्भर है। कई बार जो प्रतीक या चरित्र उभरते हैं, वे अपनी संपूर्णता में खुद को विकसित नहीं कर पाते। बल्कि मूल संघर्ष और उसकी परिणति के साधक नहीं बन पाते हैं । मैंने पहले जो कहा कि लेखकीय प्रवेश न हो,, तो यह भी अंतर्ग्रथन के लिए ही है । लेखक तो नेपथ्य में ही होता है, समूची संवेदना के साथ । पर वह रचना में अलक्षित और अव्यक्त होता है । व्यक्त होता है उसका संवेदन। इसलिए बिंब, प्रतीक, शब्द- चयन और शब्द में कथानक के अनुरूप देशज, विदेशज, तत्सम, तद्भव ,यहाँ तक कि दो भाषाओं की कोडमिक्सिंग वाले शब्द भी कथानक और संवेदना की संरचना के संवाहक बन जाएँ। कथाकथन की पद्धति में जो जड़ता थी और कथाकथन का उद्देश्य भी साफ होता था। पर आज की लघुकथा ऐसे मोड़ भी माँगती है ,जैसे किसी बेल में फूल या फल आने के पहले घुमावदार तंतु संघनित हो जाते हैं। अब यह तो कहने की जरूरत है ही नहीं कि लघुकथा में सामाजिक सरोकार हों या मनोवृत्तियों के संवेदन । यह कल्पना का सृजन भले ही करें ,पर यथार्थजीवी तो होंगे ही। संघर्ष और टकराहट से उभरे होंगे और पाठकीय मानस को संवेदना या बदलाव तक ले जाएँगे । जो लघुकथाएँ अपनी संवेदना से अपने समय से नहीं टकराती और बदलाव की सोच से भरीपूरी नहीं होतीं, वे कभी प्रभावी नहीं होती हैं। बुनावट के साथ एक बात और। यही कि शीर्षक एक खूँटी है ,जिस पर सारी रचना टँगी रहती है। इसलिए लघुकथा शुरू से आखिर तक उसी की व्यंजक बनी रहे। पल-पल वह शीर्षक अंत तक अपनी सार्थकता से धड़कता रहे ।
बात शिल्प की भी है। प्रतीक, बिंब, संकेत, व्यंजना- ये सभी कलात्मक तत्व कथाकथन ,संवाद,आत्मकथा डायरी, पंचतंत्र या अन्य किसी शैली में ;पर उनकी सार्थकता संवेदनात्मक चरमांत के पाठकीय प्रवेश में है। इसीलिए बहुत अधिक अमूर्त होकर यदि लघुकथा कही जाएगी तो वह कला फिल्म भले ही बन जाए ,पर पाठक में सहज सम्मूर्त नहीं हो सकेगी। यदि सपाटपन के साथ कही जाए तो पाठक की चौखट पर चित्त हो जाएगी। चाहे झनझनाए, तरल कर दे, उदात्त बनाए ,भावसंवेदी बनाए, तर्क खड़ा करें ,यथार्थ के किसी कोने को शीर्ष बनाए, नई मर्यादा गढ़े, पुरानी को खंडित करें,पर समकाल की संवेदना की वैचारिकी से भरीपूरी हों और रचाव में इतनी सिद्धि कि पाठक के लिए उसके किसी भी हिस्से को काटना नामुमकिन हो जाए।
इतना कहने के बाद भी यही कहूँगा कि अभी कुछ कह नहीं पाया कि लघुकथा ऐसी होती है… या वैसी होती है। शास्त्र परिभाषित करना जानता है। रचना परिभाषाओं का अतिक्रमण करके ही अपनी पहचान बनाती है। यह पहचान चाहे विरोधी रंगों की योजना से हो ,अतीत और वर्तमान की तकरार से हो, भाषा के दायरों से हो, नये प्रतीकों या शिल्पों से हो ,पर रचना की भाषागत बुनावटऔर संवेदना का तन्मयीकरण होतो रचना प्रभावी होती है । अब आकार तो लघु ही हो पर एक तीक्ष्ण संवेदन का समर्थ व्यंजक । एक तरह से अच्छी लघुकथा के दिशा संकेत भी हैं और लघुकथा की समीक्षा के भी धरातलीय बिंदु।
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