जून 2026

पुस्तकलघुकथा को जानने समझने का महत्त्वपूर्ण प्रयास     Posted: March 1, 2020

प्रत्येक विधा अपने सृजनात्मक पक्ष के साथ-साथ अपना आलोचनात्मक पक्ष भी रखती है। सृजन और समीक्षा, साहित्य के दो पहलू कहे जा सकते हैं। किसी विधा की समीक्षा-समालोचना की कलम जितनी पैनी और धारदार होगी, सृजन को उतनी ही अधिक सार्थक दिशा और ऊर्जा प्राप्त होगी। कविता-उपन्यास कहानी-गीत जैसी विधाओं के उत्तरोत्तर विकास की यात्रा में समीक्षा के सोपान, इन विधाओं को नई ऊँचाइयों पर ले गए हैं। लघुकथा के संदर्भ में भी यह बात उतनी ही सत्य है। सन् 1970 के बाद से लघुकथा ने विशिष्ट प्रगति की है। नये आयामों को स्थापित करते हुए कथ्य और शिल्प की दिशा में लघुकथा का विराट रूप अचंभित भी करता है और आनंदित भी। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थों को भरकर नवीन भावबोध को सामने लाने में लघुकथाकारों ने खूब श्रम किया है। इनका यह श्रम सार्थक होता दिखता भी है। इसी क्रम में लघुकथा के सृजन पक्ष पर भी चिंतन किया गया है। शिल्प और भावपक्ष को सामने रखकर लघुकथा पर बड़ा काम होता रहा है। स्वयं जाने माने लघुकथाकार भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण काम करते नज़र आते हैं।

            माधव नागदा की पुस्तक ’समकालीन हिन्दी लघुकथा और आज का यथार्थ‘ लघुकथा की नब्ज को टटोलने जानने का एक महत्वपूर्ण और सार्थक प्रयास कही जा सकती है। तेरह आलेखों, ग्यारह समीक्षाओं और चार साक्षात्कारों के माध्यम से प्रस्तुत पुस्तक लघुकथा की त्रिविध विवेचना करती है। माधव नागदा स्वयं भी सजग लघुकथाकार हैं। अपने दो लघुकथा संग्रहों के माध्यम से आपने अपने सार्थक सृजन की धाक जमायी है। प्रस्तुत पुस्तक में लघुकथा के परिदृश्य पर चिंतनपरक आलेखों में माधव नागदा ने लघुकथा सृजन की प्रक्रिया, उसकी कथावस्तु, वर्तमान दौर में लघुकथा की प्रासंगिकता जैसे विषयों पर गहराई से विचार किया है। अपने आलेख ’शिल्पः रचनाकार का आंतरिक लोकतंत्र‘ में लेखक ने शिल्प का महत्व दर्शाया है। लघुकथा समाज के अनेक देखे-अनदेखे अनुभवों को शब्दायित करती है। ’लघुकथा में विषय वैविध्य’ आलेख इन्हीं वैविध्यपूर्ण विषयांे की पड़ताल है। एक ही विषय पर लिखी लघुकथाएँ  कथ्य वैभिन्नय और प्रस्तुति के आधार पर अपनी अलग पहचान बना लेती हैं। इसी क्रम में लघुकथा की भाषा पर भी विचार महत्वपूर्ण हैं। पात्रानुकूल भाषा का अपना महत्व है। लघुकथा जैसी लघुकाय विधा के लिए तो भाषायी संस्कार और उसका अनुभव संस्कार बहुत मायने रखता है।

            ’लघुकथा कुछ स्फुट विचार’ एक महत्वपूर्ण आलेख है। इसमें माधव नागदा अपने लघुकथा सम्बन्धी अनुभवों को शब्दायित करते हैं। लघुकथा लेखन की आवश्यकता, उसके सामाजिक सरोकार, सम्प्रेषणीयता, संवेदनात्मक गहराई, कालखण्ड की महत्ता, कथ्य का प्रस्तुतिकरण, कलात्मक संतुलन जैसे महत्त्वपूर्ण तथ्यों की ओर विद्वान लेखन ने परिश्रमपूर्वक लिखकर पाठकों का ध्यान आकर्र्शित किया है।लघुकथा के सिद्धान्तों पर इस आलेख में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। ’भूमंडलीकरण और हिन्दी लघुकथा‘ आलेख बदलते परिवेश में लघुकथा में आये परिवर्तनों का विवरण देता है। बाजारवाद और उपभोक्तावाद पर आधारित लघुकथाओं की उल्लेखनीय प्रस्तुति यहाँ द्रष्टव्य है। ’हिन्दी लघुकथाओं में प्रेम‘ आलेख प्रेम विषयक लघुकथाओं की पड़ताल है। लेखक को मलाल है कि वर्तमान समय में प्रेम विषयक लघुकथाएँ  बहुत कम लिखी जा रही हैं। प्रेम का स्थान आज देह ने ले लिया है। माधव नागदा राजस्थान के निवासी हैं। ‘राजस्थान की हिन्दी लघुकथा में सामाजिक सरोकार‘ आलेख में वे राजस्थान के महत्वपूर्ण हिन्दी लधुकथाकारों का परीक्षण प्रस्ततु करते हैं।

            पुस्तक के अंतिम तीन आलेख लघुकथाकारों सतीश दुबे, घनश्याम अग्रवाल और रूपसिंह चंदेल पर केंद्रित हैं। इन तीनों लघुकथाकारों के कृतित्व पर लेखक ने विस्तार से कलम चलाई है। आलेख खण्ड लघुकथा को अपनी परिपक्व अनुभव दृष्टि से देखने का एक सार्थक और सफल प्रयास है माधव नागदा का। विद्वान लेखक ने केवल अपना विचार ही नहीं रखा दिया है अपितु उसकी प्रतिपुष्टि में सम्बंधित लघुकथा और यथास्थान विभिन्न विद्वानों के संदर्भों को भी उल्लेखित किया है। यहाँ माधव नागदा का गहन स्वाध्याय और मर्मभेदी दृष्टि दर्शनीय है।

            पुस्तक के दूसरे भाग में कुल ग्यारह लघुकथा कृतियों की विशद समीक्षा प्रस्तुत की गई है। शब्दनिष्ठा सम्मान 2017 की 110 लघुकथाओं का संग्रह, डॉ. रामकुमार घोटड़ की ‘मेरी श्रेष्ठ लघुकथाएँ, वाणी दवे की ’अस्थायी चार दीवारी‘, डॉ. अशोक भाटिया की ‘समकालीन हिन्दी लघुकथा‘, त्रिलोक सिंह ठकुरेला की ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएँ’, डॉ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव की ‘जाने-अनजाने’ जैसी लघुकथा कृतियों पर माधव नागदा सम्यक् समीक्षा प्रस्तुत करते हैं। आँगन से राजपथ (पवित्रा अग्रवाल), माटी कहे (आभा सिंह), लघुकथा एक कोलाज (हरिशंकर शर्मा), अकथ (कमल चोपड़ा), सदाशिव कौतुक का लघुकथा संग्रह जैसी कृतियों को अपनी आलोचनात्मक दृष्टि से अवलोकित करते हुए माधव नागदा अपनी नीर-क्षीरविवेकी दृष्टि का परिचय देते है। यहाँ कथ्य, शिल्प, प्रभाव के समन्वय को माधव नागदा ने विशिष्टता से रेखांकित किया है।

            साक्षात्कार किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति के विचारों को जानने का प्रामाणिक माध्यम हैं। साक्षात्कार की प्रक्रिया में उत्तरदाता स्पष्ट रूप से अपने अंतर्मन को अपने उत्तरों के माध्यम से खोलता जाता है। माधव नागदा का नाम समकालीन लघुकथारों में बहुत ही आदर के साथ लिया जाता है। सृजन और समीक्षा के परिप्रेक्ष्य में आपके विचार सदैव महत्वपूर्ण होते हैं। कुँकँुवर प्रेमिल, हरिशंकर शर्मा, सीमा जैन और डॉ. लता अग्रवाल ने अपने प्रश्नों में माधव नागदा के समक्ष अनेक बातों को उठाया है और लधुकथा के रहस्यों को खोला है। एक प्रकार से ये चारों साक्षात्कार, लघुकथा के पिछले पचास वर्षो की सृजन यात्रा के मोड़ हैं। इनमें लघुकथा का आरम्भिक काल, विकास, वर्तमान काल और भविश्य-सभी का शब्दांकन हम नागदा के उत्तरों में पाते हैं।

            आलोच्य पुस्तक अपनी प्रस्तुति, सामग्री चयन, भाषा-शैली, बौद्धिकता और विषय वैविध्य के कारण सदैव समादृत की जाएगी। समकालीन लधुकथा को जानने समझने के लिए प्रस्तुत पुस्तक एक मार्गदर्शिका की तरह भी उपयोगी है। लघुकथा को समीक्षात्मक आलोक में देखने की मंत्रमयी दृष्टि प्रदान करने वाली, प्रस्तुत पुस्तक हेतु माधव नागदा को बधाई।

समकालीन हिन्दी लघुकथा और आज का यथार्थ :माधव नागदा,प्रकाशन:सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर,पृष्ठ:192,मूल्य :रु. 500

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