जून 2026

पाठकीयलघुकथा डॉट कॉम     Posted: January 20, 2019


फ़िलवक़्त लघुकथा विधा पर केन्द्रित जितनी भी वेब मैगज़ीन प्रकाशित हो रही है , उनमें गत एक दशक से निरंतर प्रकाशित होने वाली ऑनलाइन पत्रिका ‘लघुकथा डॉट कॉम’ श्रेष्ठ है — इसमें मतभिन्नता की कोई गुंजाइश नहीं | कुछ स्थायी स्तंभों के जरिये विधा विषयक विविध पठनीय सामग्री को सुव्यवस्थित ढंग से पूरी समग्रता और गंभीरता के साथ प्रस्तुत करने वाली इस पत्रिका की सृजनरत लघुकथाकारों (नए -पुराने ) , समीक्षकों, हितैषियों को अधीरतापूर्वक प्रतीक्षा रहती है | लघुकथा से इतर साहित्य की अन्यान्य विधाओं में सृजनरत रचनाकर्मियों की भी यह एक चहेती पत्रिका है | यही एकमात्र ऐसी ई-पत्रिका है जिसके प्रत्येक अंक की विषय सूची ‘हंस’ और ‘कथादेश’ जैसी हिंदी की अग्रणी पत्रिकाओं में विज्ञापित हो जाती है | इसकी जबर्दश्त स्वीकार्यता कहें या ‘क्रेज’ ऐसी कि एक  मर्तबा इसमें स्थान पाने की उत्कट इच्छा विधा से जुड़े रचनाकर्मी अवश्य पाले हुए रखता है | बावजूद इसके , जहाँ तक मेरी जानकारी है , सोशल मीडिया के किसी भी साइट पर इसके पाठक अपनी पाठकीय अभिमतों से अवगत नहीं कराते |विधा के उन्नयन , समृद्धि और इसकी विकास-यात्रा में महती भूमिका निभाने वाली इस पत्रिका के किसी अंक के ‘खट्टे-मीठे’ ज़ायके की गाहे-बगाहे चर्चा न करना क्या यह विधा के पैरोकारों का कृतघ्नता , घोर उदासीनता और असाहित्यिक आचरण नहीं है ?
इस प्लेटफार्म पर माह के मध्य या अंत में अंक की विषय सूची पोस्ट होते ही बधाई और शुभकामना -संदेशों का ताँता लग जाता है ,अच्छी बात है ; लेकिन अंक प्रकाशित होने के बाद इसकी पठन -सामग्री पर कोई पाठकीय प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती | हाँ , इतना अवश्य होता है कि रचनाकार बन्धु अपनी -अपनी प्रकाशित रचनाओं को , सम्पादक द्वय का आभार जताते हुए इस मंच पर ‘चेप’ देते हैं | बस!
इस संदर्भ में संपादक द्वय ( भाई सुकेशजी और रामेश्वरजी ) को विनम्र सुझाव देने की धृष्टता करूँगा कि मुद्रित पत्रिकाओं की तरह इस पत्रिका में भी ‘पाठकीय’ नाम से एक स्तम्भ की शुरुआत की जाय |

चलिए , ‘लघुकथा डॉट कॉम’ के जनवरी ,19 अंक की थोड़ी चर्चा कर लेते हैं | लघुकथा विषयक विवेचनात्मक आलेखों वाला स्तम्भ ‘अध्ययन कक्ष’ की उपादेयता स्वयंसिद्ध है | अध्ययन , चिंतन , मनन ,विश्लेषण , विवेचन करने और कराने वाले इस कक्ष में इस बार सुकेश साहनी की रचनाधर्मिता से पुनः एक बार परिचित के निमित्त हमें ले जाया गया है |

किसी रचनाकार की चुनिंदा रचनाओं के ही आधार पर उसके रचनाकर्म का गहनता के साथ सम्यक अवलोकन किया जा सकता है — इसे सिद्ध कर दिखाया है भाई शिवनारायणजी ने अपने आलेख ‘ सुकेश साहनी की लघुकथाओं में समकालीन संकट ‘ में | शिवनारायणजी ( संपादक : ‘नयी धारा’) की लेखनी पर लघुकथा आलोचक का लेबल चस्पाँ नहीं है ,इसलिए इस विधा पर उन्होंने कम ही लिखा है ; लेकिन इस आलेख में इन्होंने स्वयं को एक उच्चकोटि के अध्येयता होने का सबूत देते हुए सुकेशजी की रचनाधर्मिता की गहन पड़ताल कर मौजूदा लघुकथा आलोचकों की ‘दृष्टि’ को पूर्वापेक्षा और भी व्यापक , परिमार्जित ,संवर्द्धित ,विस्तरित करने का संकेत दिया है | विधा की ‘समझ’ की पैनी , अंतर्दृष्टि , उच्चकोटि की उपयुक्त समर्थ आलोचकीय भाषा में शीर्ष पांक्तेय के लघुकथा शिल्पी के सृजनकर्म की पड़ताल करता यह आलेख सचमुच मील का पत्थर है |

लघुकथा डॉट कॉम के इस अंक के स्थायी स्तम्भ ‘मेरी पसंद’ में प्रो.स्मृति शुक्ल ने ‘कथादेश’ मासिक पत्रिका द्वारा आयोजित हिंदी लघुकथा प्रतियोगिता ,18 की दो पुरस्कृत लघुकथाओं ( ‘कोशिश’ – मीना गुप्ता और ‘तिलिस्म’ -सविता इंद्र गुप्ता ) का चयन कर संक्षिप्त ,सारगर्भित और सटीक टिप्पणी करते हुए अपनी पसंदगी की ज़रूरी वज़हों का बड़े शिद्दत से ज़िक्र किया है । उनकी पसंदगी की वज़ह सबकी हो सकती है , हालाँकि भाई सुकेशजी ने ‘कथादेश’ के अगस्त ,18 अंक में पुरस्कृत लघुकथाओं पर अपने आलेख में उपर्युक्त दोनों लघुकथाओं की विस्तारपूर्वक चर्चा की है ।

‘देश’ स्तम्भ के अंतर्गत अलग -अलग जायके की कुल 6 लघुकथाएँ प्रस्तुत की गई  हैं । नवागतों की भीड़ में कुछ अलग- सा रचकर तेज़ी से अपनी ज़गह बनाती लघुकथाकार जानकी वाही ‘चार हाथ’ में सिर्फ़ पात्रानुकूल संवादों के ज़रिये दंगे का बर्बर और नेस्तानाबूदी चेहरा दिखाने के बाद सद्भाव और समरसता का तृप्तिदायक भाव पैदा करने में कामयाब रही है । कसावट , बुनावट और प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से यह एक उत्कृष्ट रचना है ।
‘शुक्रिया माँ’ ( डा.आरती स्मित ) एक तलस्पर्शी रचना है । सुगठित , प्रभावकारी भाषा में मन-मस्तिष्क के समस्त तंतुओं को झंकृत कर आर्द्र करते हुए ‘फीमेल बेबी’ की हत्या जैसी अमानुषिक , घोर असामाजिक कुकृत्य के प्रति प्रबल वितृष्णा का भाव पैदा किया गया है । निःसंदेह यह एक मानस-पटल पर अमित छाप छोड़ने वाली पठनीय रचना है ।

‘तर्क-कुतर्क’ (संजीव ठाकुर) – संजीवजी अगर अन्यथा न लें ,तो यह कहने की धृष्टता करूँगा कि यह एक कमज़ोर और साधारण रचना है । आप एक क्षमतावान् रचनाकार हैं । इसे थोड़ा ‘माँज’ कर और क्रिएटिव टच देकर प्रभाव पैदा कर सकते थे ।

‘मीठा नीम’ ( सुनील वर्मा ) – दिवंगत पति की वास्तविक अनुपस्थिति के बावजूद उनकी मौजूदगी का एहसास पत्नी के एकाकीपन को मजबूत संबल देता है – रचना की यही आधारभूमि है । घटनाविहीन , लीक से हटकर नए कलेवर में ऐसी भावप्रवण ,मर्मस्पर्शी रचनाओं का स्वागत होना चाहिए । लेखन की ऐसी प्रवृतियां विधा के उन्नयन में मददगार सिद्ध होंगी ।

‘देश’ (योगेन्द्र शर्मा ) यह भी संवाद आधारित एक लघुकथा है । एक रिक्शेवाले और संभवतः पुलिसकर्मी के दरम्यान वार्तालाप के जरिये ‘कथा’ कहने का प्रयास किया गया है ,परन्तु न तो इसके शीर्षक से और न कहन-भंगिमा से रचनाकार का कोई अभिप्राय स्पष्ट हो पाया है ।

‘उत्तर आधुनिक’ (अमरीक सिंह ‘दीप’ ) – भाई अमरीकजी समकालीन कथाजगत् के स्थापित और प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं । इन्होंने अपनी कई सशक्त लघुकथाओं से लघुकथा जगत को भी समृद्ध किया है ; लेकिन प्रस्तुत लघुकथा पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे किसी कहानी का सारांश परोस दिया गया हो ।

स्तम्भ ‘दस्तावेज़’ — पिछले कई अंकों से निरंतर प्रकाशित होने वाला यह स्तम्भ दरअसल गंभीर विमर्श वाला मंच है ।किसी एक दस्तावेज़ी लघुकथा पर बीते समय में सम्पन्न गोष्ठियों में विधा की बेहतर समझ रखने वाले विचारकों के मतों- अभिमतों की पुनर्प्रस्तुति रचनारत लघुकथाकारों को बेहतर तरीके से दिशा-निर्देश करती है । इस बार भाई बलराम अग्रवाल की प्रतिनिधि लघुकथा ‘गोभोजन’ पर संक्षिप्त किन्तु विचारोत्तेजक विमर्श की प्रस्तुति हुई है । वैसे भी , इसमें दो राय नहीं कि बलरामजी की यह लघुकथा उत्कृष्टता के मानकों , पैमानों की तमाम सरहदों पर फ़तह हासिल करने वाली कालजयी रचना है ।

स्तम्भ ‘संचयन’ – इस स्तम्भ की निरंतरता बनाए रखने की पीठिका में सम्पादकीय टीम की यही मंशा रही होगी कि प्रत्येक अंक में किसी एक लघुकथाकार की ऐसी श्रेष्ठ , चुनिंदा लघुकथाओं को प्रमुखता से पेश किया जाए जो लेखक विशेष की उत्कृष्ट लेखन -कला , कौशल की बानगी हो । इस बार हरीश कुमार अमित ‘संचयन’ में उपस्थित हैं अपनी 6 लघुकथाओं के साथ । निःसंदेह हरीशजी एक सामर्थ्यवान् रचनाकार हैं । हाल ही में एक नामचीन प्रकाशन-गृह से सम्मानित हो चुके हैं । लेकिन संचयन में उनकी दो लघुकथाओं – ‘अपना अपना ईमान’ और ‘अपने अपने संस्कार’ को छोड़कर अन्य लघुकथाओं से उनके उत्कृष्ट लेखन -कौशल का परिचय नहीं मिलता ।

विकसित तकनीकी माध्यमों को अंगीकार करते हुए लघुकथाओं का दृश्य-श्रव्य आस्वादन कराने के क्रम में रणजीत टाडा की लघुकथा ‘सहारा’ को ऋतु कौशिक के सुमधुर स्वर में सुनना सुखकर रहा । ***

मार्टिन जॉन *

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