[ लघुकथा -सम्मेलन -पटना-21-11-1999, में पढ़ा गया आलेख]
कहा गया है कि संसार का सबसे पहला साहित्यकार कोई कहानीकार ही रहा होगा । इसीलिए ही साहित्य की अधिकतर विधाएँ कथा-कहानी का आश्रय’ लेकर ही अपने कलेवर का निर्माण करती हैं । साहित्य की सर्वाधिक भावप्रवण एवं हृदयस्पर्शी रागात्मक विधा ‘गीत’ भी वही मर्मस्पर्शी होता है, जिसमें कोई कहानी गुँथी होती है । रामायण, महाभारत कवित्व के कारण विद्वत् समाज में भले ही प्रतिष्ठित हो, सामान्यजन पर प्रभाव उनकी कहानी का ही है ।
कथ् धातु में ‘अड्.’ और ‘टाप्’प्रत्यय के संयोजन से व्युत्पन्न कथा के पाँच प्रकार अग्निपुराण में माने गए हैं- आख्यायिका, कथा, खंड कथा, परिकथा तथा कथानिका । हेमचंद्र ने इसके दस भेदों का वर्णन किया है- आख्यान, निदर्शन, प्रवह्लिका, मतत्लिका, मणिकुल्या, परिकथा, खंडकथा, सकलकथा, उपकथा तथा वृहत्कथा । कथा के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन यत्- किंचित भेद के साथ भागह, दण्डी, रुद्रट एवं पंडितराज विश्वनाथ ने भी किया है । किन्तु कथा के सामान्य स्वरूप के बारे में अधिकांश साहित्याचार्यों में मतैक्य है और वे सर्वस्वीकृत स्वरूप हैं -कथा, आख्यायिका, परिकथा तथा कथानिका । साहित्याचार्यों ने कथा के वर्ण्य विषय और कलेवर को संभवत: आधार बनाकर ही इनके विभिन्न स्वरूपों को तदनुसार नाम दिये हैं। इस दृष्टि से कथानिका उपकथा में ही लघुकथा के बीज अन्तर्भुक्त मालूम होते हैं । जिस प्रकार उपन्यास से ‘उपन्यासिका’ कविता से क्षणिकाएँ, मुक्तक, हाइकु, हँसिकाएँ, आदि नाटक से ‘नाटिका’, एकांकी’, समयानुसार रूपांकित एवं विकसित हुए । उसी प्रकार कथा से लघुकथा के बीज भी विकसित हुए होंगे । अन्यथा अत्यधिक व्यस्तता के कारण जब कार्यव्यस्त लोगों को अन्य उपलब्ध श्रव्य-दृश्य के माध्यमों से आन्तरिक क्षुधा की तृप्ति के लिए यथेष्ट रुचिकर सामग्री उपलब्ध होने लगी, तो एकाग्रचित्तापेक्षी साहित्य के प्रति उनकी अभिरुचि में क्रमश: गिरावट आती गई और वे अल्प समयापेक्षित साहित्यिक रचनाओं के प्रति अधिक उत्कंठित हो गए । न्यूनतम समय में अधिकतम लाभांश अर्जित करने के आग्रही साहित्य की सभी विधाओं में ऐसी रचनाओं के पाठक बन गए ,जो बिजली की कौंध के समान अचानक चमक कर उनके बुभुक्षित एवं क्लान्त-श्रान्त मन को अपनी प्रखर प्रतिभा से आलोकित कर दे तथा भावों एवं विचारों की संकेन्द्रित औषधि से उन्हें अन्य क्षेत्रों में प्रवेश योग्य बनने की क्षमता प्रदान कर दे | इरा दृष्टि से लघुकथा को संघर्ष एवं कार्योनन्मादी युग के अति व्यस्त मानव की साहित्यिक क्षुधा का आत्यन्तिक तृप्ति-उपचार माना जा सकता है आत्यन्तिक तृप्ति इसलिए कि इसमें परिमाण से अधिक संगुणात्मक चमत्कार और उपचारात्मक संस्कार अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में सन्निविष्ट रहते हैं। भोक्ता की व्यथा-वाणी को सामासिक शैली में निबद्ध कर उग्र तेवर में अपनी टिप्पणी से आहत और दग्ध करने वाली यह साहित्यिक विधा हमें सहसा अपने एवं अपने समाज के प्रति सहज एवं सतर्क रहने का अर्थात् ‘जागते रहो’ का संदेश देती दिखाई देती है । सुप्रसिद्ध समीक्षक हैनरी हडसन ने लघुकथा की परिभाषा और व्याख्या इस प्रकार दी है – ‘लघुकथा में केवल एक ही मूलभाव होता है ! उस मूल भाव का विकास तार्किक निष्कर्षों के साथ लक्ष्य की एकनिष्ठता से सरल, स्वाभाविक गति से किया जाना चाहिए ।”
“कवि सब चरित समास बखाने” की भाँति सामासिक शैली में प्रस्तुत लघुकथाएँ पाश्वात्य जगत् में कहानियों के जनक एडगर एलेन पो के इस विचार को – “कहानी रसोद्रेक करने वाला एक आख्यान है, जो एक ही बैठक में पढ़ा जा सके” लाघवता प्रदान करते हुए अपनी पठनावधि की सीमा को कुछ क्षणों या मिनटों तक ही मर्यादित कर देती है। कहानी पढ़ने की सीमा का काल-निर्धारण करते हुए पाश्चात्य विद्वान एच. जी. वेल्स का मत है-“कहानी तो बस वही है जो बीस मिनट में राहत और कल्पना के साथ पढ़ी जाए’’ इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि लघुकथा रागय के पंख पर उड़नेवाली वह मनमोहक गंध है, जिसे अपनी मादकता एवं सुरभि को, गुणग्राहक के पास तक पहुँचाने के लिए किसी पड़ाव पर निर्धारित समय तक रुकने की आवश्यकता नहीं होती ।वह तो चलती हवा का वह झोंका है ,जो तप्त शरीर को शीतलता के “सुख का मनोहारी आनंद प्रदान करते हुए या आहत एवं क्षत-विक्षत शरीर पर नमक का चूरा फेंकते हुए अन्तर्धान हो जाता है । इसे यों भी कहा जा सकता है- लघुकथाओं में प्रस्तुत कथ्य की तीक्ष्णता ऐसा गहरा वार करती है कि भोग्य और भोक्ता दोनों के अनावृत्त रूप को तन ढकने के लिए गज भर कपड़ा भी नसीब नहीं होता। लघुकथाओं की भंगिमा में करुणा से अधिक आक्रोश का, वेदना से अधिक संवेदना का यथार्थ से अधिक व्यंग्य का, उपचार से अधिक निदान का, सदूक्ति से अधिक मर्मांकित का, प्रणय से अधिक विरह का, ‘सुंदरम्” से अधिक ‘सत्यम्’ एवं ‘शिवम्’ का, क्रोध से अधिक क्षोभ का, परंपरा से अधिक युगाचार का, युगबोध से अधिक सामयिक बोध का, त्याग से अधिक संघर्ष का, संबोधि से अधिक संबोधन का, अन्याय से अधिक अति- चार का, अव्यवस्था से अधिक उछृंखलता का, श्रेय से अधिक प्रेय का, सिद्धांत से अधिक व्यवहार का, पुरश्चरण, प्रसारण एवं विस्तारण हुआ है । इन कथाओं में समझौतायादी मान्यताओं का खंडन तथा प्रतिक्रियावादी विचारों का मंडन सर्वत्र समर्पित और अनुपोषित है। ऐसा लगता है कि युग की वेदना से त्रस्त लघुकथा- लेखक बहुविध प्रहारों एवं सधे व्यंग्यवाणों से समाज को सही दिशा दिखलाने के लिए व्यग्र एवं व्याकुल है । “लघुकथा’ और ‘लघुकहानी” समानार्थक होते हुए भी व्यवहार में अपना पृथक् अस्तित्व बनाए हुए हैं। व्यंग्य इनके अमोघ अस्त्र हैं या इनके अख्तर के आनुषंगिक पुरजे हैं । इस पर विचार न कर मैं सर्वप्रथम लघुकथा के उद्भव विकास और बदलते स्वरूप और उसके उत्सस्थल से अपना निवेदन प्रारंभ करने की अनुमति चाहता हूँ । वैसे तो भिन्न-भिन्न भाषाओं में इसके अलग-अलग नाम हैं, किंतु स्वर और संदेश में एक ही प्रकार की संवेदना और संत्रास के व्यापार हैं | हिन्दी और गुजराती में यह ‘लघुकथा’ पंजाबी में “मिनी कहानी, उर्दू में ‘अफसांचा’ तथा अंग्रेजी में ‘स्टोरिएट’ नाम से ख्यात यह विधा आज हिन्दी में कहानी से सर्वधा अलग एक विशाल साम्राज्य की स्थापना में प्रायः सफल हो चुकी है । आज के लघुकथाकार या लघुकथा समीक्षक भले ही स्वीकार न करें, किन्तु मेरी तो अपनी धारणा है कि आज की लघुकथाएँ वर्तमान यांत्रिक एवं वैज्ञानिक युग की व्यस्तता एवं बदलती परिस्थितियों की अनिवार्य पूर्ति के लिए स्वयं चलकर आई एक बिल्कुल नई विधा नहीं, अपितु सूत्र साहित्य, बोध साहित्य आदि में व्यवहृत एवं उद्धृत दृष्टान्त कथाओं के विकसित आधुनिक रुप हैं । ब्राह्मण ग्रंथों की विस्तीर्णता से मुक्ति पाने के लिए भारतीय मनीषियों ने एक नवीन लेखन विधा को जन्म दिया ,जिससे संक्षिप्त शैली में वर्णित निर्देशों की प्राप्ति होने लगी | इस संक्षिप्त लेखन-विधा में प्रस्तुत समस्त साहित्य को सूत्र साहित्य की संज्ञा प्राप्त हुई | साूत्रात्मक शैली से तात्पर्य है -न्यूनतम शब्दों में विपुल अर्थ- संधारण की क्षमतावालीं शैली जिसके वर्ण्य विषय असन्देहात्मक व्यापकता की पूर्ण क्षमता से युक्त होते हुए अतिसंक्षिप्त एवं महत्वव्यंजक होते हैं । बोध साहित्य या उपदेशपरक साहित्य में विभिन्न . धर्म-संस्थापाकों, धर्मप्रचारकों, मतावलंबियों द्वारा अपने कथ्यों, विचारों की परिपुष्टि के लिए कथाओं के आश्रय लिए गए हैं | वेद, उपनिषद्, बाइबिल, कुरान, रामायण, महाभारत, जातक कथाओं, जैन धर्मग्रंथों आदि में ऐसी अनेकानेक कथाएँ भरी पड़ी हैं | नीतिशास्त्रियों ने भी नीतिवचनों के समर्थन में, महापुरुणों ने रुभाषितों, सूक्तियों के प्रणयन में ऐसी कथाओं को आधार बनाया है | सामासिक शैलीगत समानता के अलावा सूत्र साहित्य और लघुकथा साहित्य में कोई संबंध नहीं किन्तु पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक की कथाओं, वाइविल की बोध कथाओं, पुराण एवं कुरान के दृष्टान्तों, कथा सरित्सागर, रामायण, महाभारत की आवान्तर कथाओं में आधुनिक लघुकथाओं के बीज की खोज करना निरर्थक नहीं समझा जाना चाहिए । इस संबंध में मुझे चर्चित कहानीकार एवं लघुकथा-लेखक श्री कृष्णानंद कृष्ण की कुछ पंक्तियों को उद्धत करने का लोभ हो रहा है – ‘लघुकथा-लेखन के वर्तमान सागर में गोते लगाने से पहले एक नजर हमें लघुकथा की आधार पीठिका की ओर डालनी चाहिए । यानी कि लघुकथा-परंपरा पर दृष्टिपात करना होगा ; क्योंकि कोई भी लेखन अपने पूर्व के लेखन को आधार बनाकर ही आगे बढ़ता है, भले ही देशकाल और पात्र के चलते उसके स्वरूप (फ़ॉर्म) और विषयवरतु (कण्टेण्ट) में भिन्नता नजर आती हो । लघुकथा लेखन की परम्परा वैदिक साहित्य से शुरू होती हुई कथा सरित्सागर, पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाएँ, बैताल पचीसी और चौरासी वैष्णवों की वार्ता से होती हुई आज की आधुनिक लघुकथा तक फैली हुई है। हालाँकि कुछ लोगों को यह बात निरर्थक और बेमानी लग सकती है । मैं इसलिए यह कह रहा हूँ कि कई जगह लोगों ने इसका विरोध किया है । उन लोगों से मेरी छोटी-सी गुजारिश है कि वे अपने विचारों पर फिर से गौर करें।”
जब हिम्दी सहित्य में लघुकथा अन्य विधाओं की भाँति पूर्णतः प्रतिष्ठित हो गई तो उसके उद्भव, विकास की चर्चा स्वाभाविक रूप से होने लगी । श्री कृष्णानंद कृण की समझ से अभी तक प्रकाश में आई समग्री के अध्ययन से ऐसा लगता है कि भारतेन्दु हरिश्वन्द्र की ‘परिहासिनी’ ( 1875 ई. के आसपास छपी थी) में कई ऐसी छोटी रचनाएँ संकलित हैं, जो मुकम्मल लघुकथा होने की शर्त पर खरी उतरती हैं । यहीं से आधुनिक लघुकथा की शुरुआत मानी जा सकती हैं ।” श्री ‘कृष्णानंद कृष्ण इस प्रस्थापना के पूर्व लघुकथा-लेखकों एवं अधिकतर लघुकथा-समीक्षकों द्वारा 1900 ई. के आसपास लिखी गई माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ को लघुकथा की सभी विशिष्टताओं से युक्त कहानी मानी जाती थी।| इस लघुकथा के बाद जो लघुकथाएँ साहित्यिक दृष्टि रो मान्य समझी गई – वें हैं 1919-20 में लिखी गई जगदीशचन्द्र मिश्र की लघुकथा ‘बूढ़ा व्यापारी’ और 1929 में प्रकाशित कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर की लघुकथा ‘सेठजी’ । श्री कृष्णानंद कृष्ण के शब्दों में ही हम कहना चाहेंगे कि ‘इनके बाद हिन्दी-लघुकथा की गाड़ी धीरे-धीरे सरकती हुईं आगे की यात्रा तय करती रही । धीरे-धीरे यह परम्परा 1954 ई. तक कमोबेश चलती रही । 1954 ई. के आसपास राँची के प्रोफेसर भवभूति मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘बची खुची सम्पत्ति’ का प्रकाशन किया । उन्होंने सर्वप्रथम अपनी इन रचनाओं को ‘लघुकथा’ के नाम से पाठकों के सामने परोसा । उनकी इन लघुकथाओं को पढ़कर इसी पुस्तक की भूमिका में आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने इन रचनाओं को छोटी कहानियों के नाम से सम्बोधित किया । श्री कृणानंद कृष्ण ही नहीं, डॉ. सतीशराज पुष्फरणा, श्री राजकुमार गौतम, डॉ. शकुंतला किरण सदृश लघुकथा लेखक एवं समीक्षक भी यह स्वीकार करतें हैं कि आजादी के बाद छठे दशक में ही लघुकथा लेखन की विधिवत् यात्रा प्रारंभ हुई, जिसको समृद्ध और श्रीसम्पन्न करने का काम किया विष्णु प्रभाकर, कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर, उपेन्द्रनाथ अश्क, रामनारायण उपाध्याय, रावी, डॉ. श्यामसुंदर दास, मण्टो जैसे सशक्त रचनाकारों ने । सातवाँ दशक लघुकथा-आन्दोलन के पुरस्कर्ता डॉ. सतीशराज पुष्करणा के शब्दों में ‘इस विधा के लिए पुनरुत्थान काल का दशक था । आठवाँ दशक इसकी पहचान के लिए जाना जाता है और नौवाँ दशक लघुकथा के स्वर्णकाल के रूप में याद किया जाना चाहिए। इसी दशक में लघुकथा ने एक सार्थक दिशा में विकास पाना आरम्भ किया था, इसी दशक में इसे एक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त हुई थी। इसे इस स्थिति में पहुँचाने हेतु सैकड़ों लघुकथाकारों का योगदान रहा है ।” किसी भी इतिहास; विषय, आन्दोलन का स्वर्णकाल उसका आदर्श समन्वित ऐसा रूप- गुण- सम्पन्न अस्तित्व होता है, जिसके आलोक से उसका सम्पूर्ण इतिवृत प्रोद़्भासित होता है । इस दृष्टि से यदि हम विचार करें ,तो माना जाएगा कि नौंवे दशक में लिखी गई लघुकथाओं में उसके बीज के फल के रूप में विकास और आगे लिखी जाने वाली कथाओं के लिए पुष्ट बीज का वपन भी हुआ। इसीलिए ऐसा कहा जा सकता है कि यदि माखन लाल चतुर्वेदी, विष्णु प्रभाकर, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, उपेन्द्रनाथ अश्क, रामनारायण उपाध्याय आदि इस विधा के पुरस्कर्ताओं ने इसकी पृथक् पहचान बनाने में अहम् भूमिका अदा की है, तो आठवें और नौंवे दशक के लघुकथाकारों ने इस विधा को समृद्धि के शिखर पर पहुँचाने का अति यशस्य कार्य किया है । ‘को बड़ छोट कहत अपराधू’ इस संदर्भ में अधिक सटीक बैठता है, इसलिए बिना किसी का नाम लिये इस कालावधि में लिखित एवं तत्काल उपलब्ध लघुकथाओं के आधार पर इनकी सम्पदा एवं विस्तीर्णता पर विचार करना अधिक समीचीन एवं इष्टकर होगा । इसे हम ‘रैन्डम संवें’ का ही निष्कर्ष मानकर उसकी सम्पूर्णता की ॠद्धि-सिद्धि का अनुमान कर सकेंगे। तत्काल मेरे सामने डॉ. रातीशराण पुष्पारणा द्वारा संपादित लघुकथा-संकलन-‘समकालीन हिन्दी-लघुकथाएँ’ है, जिनमें देश भर के 23 कथाकारों की 104 लघुकथाएँ समाविष्ट हैं । यद्यपि इन कथाओं के लेखन-काल का स्पष्ट उल्लेख न कर विद्वान् सम्पादक ने ‘समकालीन’ शब्द में इनकी कालावधि को नजरबंद कर इंगित कर दिया है कि संकलित लघुकथाएँ विगत दो-तीन दशकों से ही संबंधित हैं और ‘सुलभता और सुविधा के अनुसार इन्हीं कुछ कथाओं को प्रस्तुत कर पाना ही उनके लिए संभव हो पाया है।’ इसी संकलन में नवीन पीढ़ी के रचनाकारों के विशेष आग्रह पर एक आलेख – ‘लघुकथा कैसे लिखें’ ? भी प्रकाशित है । डॉ. पुष्करणा जैसे 4 शिखरस्थ लघुकथा लेखक एवं लघुकथाशास्त्र विशारद लिखित यह शोधपरक आलेख लघुकथाशास्त्रीय सिद्धांतों को ही संहिताबद्ध एवं व्याकरणबद्ध करने वाले विद्वानों के लिए निश्चय ही पथनिर्देशन का काम करेगा । लघुकथा के शास्त्रीय एवं पठनीय स्वरूपों पर समवेत रूप से विचार करते हुए कथा-संसार के मूर्द्धन्य हस्ताक्षर और लघुकथा- लेखक, समीक्षक श्री कृणानंद कृष्ण ने भी ‘हिन्दी लघुकथा : स्वरूप और दिशा’ नाम से एक महत्त्वपूर्ण कृति का प्रणयन किया है ,जिसमें दिनकर, उपेन्द्रनाथ अश्क, विष्णु प्रभाकर, डॉ. पुष्करणा, बलराम की लघुकथाओं से लेकर, डॉ. परमेश्वर गोयल, सुकेश साहनी, अमरनाथ चौधरी ‘अब्ज’, डॉ. सुरेन्द्र मंथन, भगवती प्रसाद द्विवेदी, डॉ. कमल चोपड़ा, डॉ. शिवनारायण, श्री सत्यनारायण नाटे, श्यामबिहारी सिंह ‘श्यामल’, डॉ. मीरा दीक्षित, रामयतन प्रसाद यादव, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’, कमलेश भारतीय, भारत यायावर, असगर वजाहत, इंदिरा खुराना आदि तक की लघुकथाओं पर न केवल ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से अपितु शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार भी सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया है। राजकुमार गौतम, डॉ. शकुन्तला किरण, डॉ. सतीश टुबे, श्री कृष्णा मनु सदृश लघुकथा-लेखकों एवं समीक्षकों ने भी लघुकथा के आकार-प्रकार एवं अन्य पक्षों पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। अपनी उल्लिखित कृति के हिन्दी लघुकथा-समीक्षा की ‘दशा और दिशा’ नामक आलेख में भी विद्वान् समीक्षक कृष्णानंद कृष्ण ने हिन्दी साहित्य के मूर्द्धन्य समीक्षक आचार्य नलिन विलोचन शर्मा, आचार्य जगदीश पाण्डेय, डॉ. शंकर पुणताम्बेकर, कृष्ण कमलेश, जगदीश कश्यप, डॉ. स्वर्णकिरण, महावीर प्रसाद जैन, बलराम, अनिल जनविजय, बालेन्दु शेखर तिवारी, भूपाल उपाध्याय, राधे लाल विजधावने, मोहन राजेश, विक्रम सोनी, डॉ. चंद्रशेखर कर्ण, डॉ. जगदीश्वर प्रसाद, डॉ. ब्रजकिशोर पाठक, भगीरथ, निशांतर, अमरनाथ चौधरी ‘अब्ज’, डॉ. रवीन्द्रनाथ ओझा, राधिका रमण अभिलापषी, मुकेश शर्मा आदि की लघुकथा सम्बन्धी शिल्पगत एवं रूपगत अवधारणाओं को अत्यंत व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया है। लघुकथा समीक्षा के क्षेत्र में इन विद्वान समीक्षकों एवं पत्रिकाओं के योगदान का विशेष महत्त्व इसलिए भी है कि इनके द्वारा लघुकथा के स्वरूपात्मक व तात्विक अवयवों के क्रमश: विकसित हो रहे अंगो-उपांगों पर गंभीरता से विचार करने का सन्निष्ठ प्रयास हुआ है । इस आलेख में लेखक के स्तुत्य प्रयास के बावजूद भी ‘स्वाति’ एवं ‘सानुबंध’ के समान कई पत्रिकाओं एवं श्री कृष्ण मनु, डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र, कौशलेन्द्र पाण्डेय, डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव, राजेन्द्र मोहन द्विवेदी ‘बन्धु’ सदृश सुधी समीक्षकों के नाम छूट गए मालूम होते हैं। फिर भी प्रतिपादित विषय की परिपूर्णता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता नहीं दिखाई देता। लघुकथा-लेखन और लघुकथा-समीक्षा की क्रमिक विकास-परम्परा का उल्लेख मात्र यह उपदर्शित करने के लिए किया गया है कि हिन्दी-साहित्य में यह विधा अन्य समृद्ध विधाओं की भाँति सुस्थिर और संस्थित हो चुकी है ओर अब इसके शास्त्रीय स्वरूप को छेनी, हथौड़ी से तराशकर समतल, सुघड़ और सार्वजनीक बनाने की आवश्यकता आ पड़ी है। कदम ताल करती हुईं यह विधा अब पाठकों और समीक्षकों दोनों से अपनी गति पर दृष्टि रखने का आग्रही हो गई है । परिवीक्षण की कालावधि समाप्त कर अब यह संपुष्ट किए जाने की प्रौढ़ता प्राप्त कर चुकी है । अतः, अब वह निरंकुशता के पैरों तले रौंदे जाने का विरोध करती हुईं अपने लिए एक शास्त्रसम्मत रूप आचार की अपेक्षा करती है । इस दृष्टि से विचार करने पर इसके दो पक्ष सामने जाते हैं – विषय पक्ष अर्थात् वर्ण्य विषय (कथानक) एवं शिल्प पक्षों अर्थात् अभिव्यक्ति-कुशलता इन्हीं दोनों पक्षों को विस्तार देते हुए डॉ. पुष्करणा ने ‘लघुकथा कैसे . लिखें?! निबंध में कथानक, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, भाषा-शैली आदि विभिन्न तत्त्वों पर अत्यंत विशदता से विचार किया है । आज की लघुकथाओं में इन तत्त्वों का सम्यक् ढंग से निर्वाह हो रहा है या नहीं ? यही प्रस्तुत आलेख का प्रतिपाद्य विषय है । !
प्रथमत: लघुकथा के आकार-प्रकार को लेकर ही विद्वानों में मतभेद चल रहा है। कुछ लघुकथाकार एवं समीक्षक 1500 शब्दों तथा कुछ 25 से लेकर 1000 शब्दों तक की कथा को लघुकथा मानने के आग्रही रहे हैं। किन्तु मैं समझता हूँ, जिसका समर्थन श्री कृष्णानंद कृष्ण, डॉ. सतीशराज पुष्करणा, राजकुमार गौतम, डॉ. शकुंतला किरण जैसे कथाकार एवं समीक्षक भी करते हैं कि किसी भी साहित्यिक विधा को निश्चित शब्दों के दायरे में परिरुद्ध करना उस विधा के हित में नहीं है ।_लघुकथा में मेघाच्छन्न आकाश में कौंधी हुई बिजली के समान होनी चाहिए, जो मन-मस्तिष्क को क्षण भर के लिए आलोकित कर गायब हो जाए और ऐसे क्षण का विस्तार पृष्ठों में नहीं होता । राजकुमार गौतम ने ठीक ही लिखा है – “आकार छोटा होने का अर्थ रचना की सीमाओं को बाँधना ठीक नहीं है, बल्कि कथ्य द्वारा केन्द्रीयता तक शीघ्र पहुँचने का निर्मम ट्रीटमेन्ट है ।” डॉ. शकुन्तला किरण की भी मान्यता है- ”मात्र आकार का छोटा या बड़ा होना किसी भी विधा के लिए मूल्य स्थापित नहीं कर सकता । लेखन वही मूल्यवान् एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता रहा है, जो अपने युगीन जनजीवन की परतें उघाड़ पाठकों को उसके नंगे यथार्थ से परिचित करवा सकें ।” लघुकथा के कलेवर की संक्षिप्ता का अनुसमर्थन करते हुए जब सतीश दूबे कहते हैं- लघुकथा संक्षेप में कहीं गईं सहज, स्वाभाविक अभिव्यकति है, जो पाठक को से जोड़ती है” तो ऐसा लगता है जैसे डॉ. सतीशराज पुपष्करणा भी उसी बात को जरा अधिक चुस्त ढंग से कह रहे हैं – ”लघुकथा जीवन के क्षण विशेष का, जो कम- से-कम शब्दों का चुस्त एवं त्वरा गति से चलने वाले प्रभावपूर्ण कथात्मक (गद्य रुप में) ढंग से दोहे की तरह कसा-गठा किन्तु यथार्थ के धरातल पर पैनी धार से कहा (शैली के अर्थ में) गया मानवोत्थानिक संदेश है।| लघुकथा स्थूल से सूक्ष्म की सहज यात्रा है”
एक सामान्य पाठक के रूप में भी मान्यता है कि लघुकथाओं को न सूक्ति, सुभाषित, पहेली, ढकोसला आदि की तरह अति संक्षिप्त होना चाहिए और न व्यास शैली में विस्तारित।| यहाँ ‘लघु’ शब्द न विशेषण है और न संज्ञा वरन् यह उस प्रक्रिया का नाम है, जिसमें नाविक के तीर जैसी गहरा घाव करने की क्षमता होती है। फिर भी उसने अपने नाम के अनुकूल अपने आकार-प्रकार को संसीमित तो करना ही होगा । किन्तु उसके लिए ऐसे किसी कठोर बंधन का प्रावधान नहीं होना चाहिए कि कथाकार संवेदना-संवहन के अपने प्रयास में इस कृत्रिम बंधन के कारण अपने को बौना महसूस करने, लगे । प्रसाधन की न्यूनतम सामग्री के उपयोग… से अपने को आकर्षक, ध्यानाकर्षी और मनमोहक बनाने वाली नवोढ़ा अथवा अल्हड़ नायिका की भाँति लघुकथा को न्यूनतम शब्दों तथा साहित्याभूषणों से ही अलंकृत करने की आदत डालनी होगी । इसके लिए लघुकथाकार को कम बोलने और शब्दों में अधिक स्वर भरने तथा सांकेतिक रूप से अपनी गूढ़ बात को भी सरल ढंग से कहने में पारंगत होना होगा । ऐसी स्थिति में डॉ. सतीशराज पुष्करणा के इस विचार का ही संपोषक बनना. पड़ेगा कि “साहित्य के किसी रूप को ‘गणित’ या – विज्ञान’ की तरह किसी सूत्र में बाँध देना उसके विकास को अवरुद्ध करना होगा । सभी विधाएँ जैविकों की तरह स्वत: अपनी सहज विकास-प्रक्रिया में विकसित होती हैं । समय-समय पर इनमें कुछ परिवर्तन भी हो जाते हैं। लघुकथा भी इसका अपवाद नहीं है।” कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि सभी विधाओं को इस संक्रान्तिकाल से गुजरना पड़ा है । अतः लघुकथा के आकार-प्रकार को इतने ही प्रतिबंध के अंदर संयमित रखने की आवश्यकता होगी कि पाठक चाय की प्याली के साथ उसके स्वाद को भी पूर्णतः: आत्मसात् एवं हृदयंगम कर लें । मेरे विचार से डॉ. पुष्करणा द्वारा संपादित ‘समकालीन हिन्दी लघुकथाएँ’ में संकलित प्रायः सभी कथाएँ आकार- प्रकार की दृष्टि से लघुकथा की अपेक्षाओं को पूरा करती हैं। एक शब्द की कविता ‘मृत्यु’ और दो शब्दों की कविता “मोटा चश्मा” (चौथा सप्तक में संकलित श्री रामवर्मा की कविता) जैसी संक्षिप्तता और सांकेतिकता लघुकथा के क्षेत्र में न तो स्वीकार्य है और अपेक्षित ।
आकार के सथ ही किन्तु सवधिक महत्त्वपूर्ण अंग है लघुकथा का कथानक, जिसपर बड़े विस्तार से प्रकाश डाला है डॉ. पुष्करणा ने अपने उल्लिखित संकलन में। उसे दुहराना तो शायद विषय का मात्र पिष्टपेषण होगा किन्तु वे इतना कुछ कह चुके हैं कि शायद मेरा हर कथ्य आपको बासी ही लगे, पर आलेख को अपनी दृष्टि से सर्वंगपूर्ण बनाने के प्रयास में तो मुझे कुछ कहने की अनुज्ञा आप देंगे ही। यहाँ भी मुझे अपनी बात कहने के लिए डॉ. पुष्करणा की इस प्रस्थापना को, कि ‘कथानक’ यदि किसी भी लघुकथा की आत्मा होती है ,तो शिल्प उसका शरीर माना जा सकता है । कथानक को यदि कंकाल मानें तो शिल्प को त्वचा मानना होगा । कथानक को यदि ढाँचा मान लें,तो शिल्प को आवरण कहना उचित होगा । अतः कथानक और शिल्प से ही किसी विधा का रूप स्पष्ट होता है!” को संबल बनाना पड़ रहा है ।
‘कथानक’ कथन या कथ्य का ही शास्त्रीय पर्याय बोधिपद है। कवि, कथाकार, निबंधकार सबका तो अपना एक कथ्य होता है, जिसे समझाने या आप तक पहुँचाने के लिए उन्हें शब्दों की छोटी या बड़ी फौज खड़ी करनी पड़ती है ।लघुकथाओं में कथानक का चयन इस दृष्टि से करना पड़ता है कि वो पाठकों के रंजन के साथ उसके मन-मस्तिष्क को स्वस्थ खुराक भी दे सके । न्यूनतम शब्दों में अधिकतम संदेशवाहक प्रयोजनों को उद्भासित करने का गुरुत्तर दायित्व लघुकथाओं को निभाना है, इसलिए हुक्का-पानी की बात छोड़कर उसे सीधे अपने अभीष्ट का ही इजहार करना है। पाठक का हर क्षण लघुकथा-लेखक से अपने सार्थक उपयोग की माँग करता है , इसलिए उसे सतर्क होकर अपनी कथा का कैनवास तैयार करना होता है। एक छोटे कक्ष में मानवीय मस्तिष्क के सुखोपभोग और चिन्तन-मनन की सारी सामग्री इस तरह से विन्यस्त करनी होती है कि आगन्तुक प्रवेश करते ही अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुएँ तत्काल पा ले ।
लघुकथा के कथानक में इतनी शक्ति होनी चाहिए कि वह व्यक्ति की चेतना को जागृत कर उसे संवेदित कर दे। उसमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं वैयक्तिक विसंगतियों को प्रकट करने की पर्याप्त क्षमता एवं सजगता हो । लघुकथाओं में शिक्षण या उपदेशन का प्रत्यक्ष प्रयास नहीं होना चाहिए । उसे तो | कोई बिन्दु खड़ा कर उस पर टॉर्च लाइट फेंककर उसके समाधान या उपचार के लिए पाठकों को स्वतन्त्र रूप से कार्रवाई करने के लिए छोड़ देना चाहिए । प्रकारान्तर से यह जा सकता है कि लघुकथाओं की समस्या का समाधान न प्रस्तुत कर पाठकों को सीधे उनसे सक्षात्कार करा देना चाहिए । इसमें उपदेष्टा का आग्रह नहीं, अनुमन्ता की ललकार रहनी चाहिए । आदर्श के लिए तपश्चर्या सदृश नियम व्रत का विधान नहीं, यथार्थ को बलात् पकड़ने के अपने सामर्थ्य पर विश्वास रहना चाहिए।
लंघुकथा के कथानकों में व्यंग्य की छौंक रहे और वह भी. इस रूप में कि उसकी गंध से लघुकथा का स्वाभाविक रूप विकृत न हो तो ठीक है किन्तु उसे व्यंग्य… के सामने अपने अस्तित्व की चिंता सदा बनी रहनी चाहिए । सुतरां लघुकथा को अपने मूल रूप में आक्रान्ता ही बना रहना श्रेयस्कर एवं हितकर होगा, अन्यथा उसे भयंकर जोखिम उठाना पड़ सकता है।
इस संदर्भ में लघुकथा-लेखन के पुरोधा श्री विष्णु प्रभाकर का यह कथन विशेष रूप से विचारणीय है – ‘लघुकथा जीवन को इस प्रकार उभारती है कि मन और ‘ मस्तिष्क झन-झनाकर रह जाते हैं । तात्पर्य यह किलघुकथा में जीवन की विसंगतियों को नंगे रूप में प्रगटकर लोगों (पाठकों) को छटपटाने के लिए छोड़ देना चाहिए ।
कथानक की दृष्टि से लघु किन्तु तेवर में उग्र.लघुकथाओं का शब्दवेधी शिल्प ही उसकी लघुता को गुरुता प्रदान करता है। शिल्प कवि या कथाकार के कथन की विदग्धता का शास्त्रीय नाम है । इसका कुशल॒ प्रयोक्ता वहीं समझा जाता है, जो कथानक की सभी संभावनाओं का अधिकतम उपयोग कर उसे सुन्दरतम रूप प्रदान कर सके । कमजोर कथानक भी अच्छे शिल्पकार के हाथ से उत्तम रचना का आधार बन सकता है। कथानक और भाषा-शैली के सूत्र-संचालक पात्र और उनके संवाद अर्थात् कथोपकथन का लघुकथाओं के सृजन तथा सम्प्रसारण में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। कथानक के अनुरूप पात्रों की अवधारणा तथा कथोपकथनों की सर्जना पर इसलिए लघुकथाकार को विशेष ध्यान रखना पड़ता है | लघुकथा में सामूहिक निकायों के अतिरिक्त पात्रों की न्यूनतम संख्या में उपस्थिति अभीष्ट है। मानव एवं मानवेतर प्राणी इसके पात्र हो सकते हैं किन्तु मानवेतर प्राणियों को लघुकथा का पात्र बनाने के पूर्व इसकी उपस्थिति की सार्थकता और मानaव क बदले इसके लाने का पूर्ण औचित्य स्वत: स्पष्ट होना चाहिए, जैस कि ‘स्वाति-पथ छह’ में प्रकाशित श्री कौशलेन्द्र पाण्डेय की लघुकथा ‘धुन’ और “समकालीन हिन्दी लघुकथाएँ’ में संकलित डा, सुधाकर आशावादी की लघुकथा मरखनी’ में उद्भासित
लघुकथाओं में अतिमानवीय पात्रों या चरिम्रों प्रवेश यदि वर्जित नहीं, तो उनके प्रवेश पर पूछकर आएँ का बोर्ड अवश्य लगा रहना चाहिए । लघुकथा उन पात्रों से ही अपनी गतिविधि का संचालन एवं सूत्रण तथा शृंगार करना चाहती है, जो उसके उपभोक्ताओं के दृष्टिपथ में सदैव क्रियाशील दिखाई पड़ते रहते हैं । उनके हर पग एवं हर शब्द की ध्वनि से उपभोक्ता पूर्ण: परिचित रहता है । कहने का अर्थ यह कि लघुकथा के पात्रों का सुपरिचित रहना आवश्यक है । लघुकथा के पात्रों को जानदार तथा दमदार होना चाहिए, तभी तो वह अपनी अल्पकालीन उपस्थिति से अपने ग्राहकों को झकझोर कर आन्दोलित कर सकेगा । पात्रों के सम्बन्ध में भी डॉ. पुप्करणा का यह अभिमत विचारणीय और ग्रहण योग्य है कि “लघुकथा-लेखक को अपनी लघुकथा में प्रस्तुत देश-काल, परिवेश, वातावरण के अनुकूल तथा मनोवैज्ञानिक ढंग से या प्रतीकों के उपयोग से अपने पात्रों के नाम तथा चरित्र को इस हद तक उभारना चाहिए कि उनका जीता-जागता चित्र जीवन तत्त्वों का चेतन संगठन करते हुए प्रस्तुत कर सकें ।”
पात्रों या लघुकथा से संबंधित अन्य प्रसंगों की भाषा और उसकी प्रस्तुति का लघुकथाओं के संदर्भ में विशेष महत्त्व इसलिए है कि इन्हें’ बूँद में समुद्र’ को समाहित करने की शक्ति और दक्षता से सम्पन्न रहने की अनिवार्यता है । गद्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कहानी, लघुकथा में भाषा और शैली का अधिक महत्त्व होता है। “कहानी की भाषा को प्रभावित करने वाले स्रोत कौन हैं? निश्चय ही कहानीकार की शिक्षा-दीक्षा के माध्यम से भाषा और साहित्य की सुदीर्घ परंपरा, भाषा के सर्वसम्मत प्रयोग. और साहित्य की सौन्दर्यमयी शैली का असर कहानी की भाषा पर होता है । किन्तु इससे भी अधिक असर उस परिवेश का होता है । उस वातावरण का होता -है, जिससे प्रेरणा लेकर कहानीकार घटनाओं और पात्रों का सृजन करता है । यदि सामान्य जनजीवन से घटनाएँ और पात्र लिये गए हों तो निश्चय ही कहानी की भाषा पर जनजीवन में प्रयुक्त भाषा का असर होगा । गँवई भाषा (स्लैंग) कहानी लिए दोष नहीं, गुण बन जाती है। उसका प्रयोग प्रयोक्ता पात्रों के व्यक्तित्व को सच्चाई के साथ लाने में सहायक होता है। कहानी की भाषा को प्रभावित करनेवाले स्रोत के संबंध में संचेतना’ पत्रिकां के सम्पादक डॉ. महीप सिंह के विचार द्रष्टव्य हैं। इन्हीं के शब्दों में मेरी भाषा को प्रभावित करने वाला सबसे प्रमुख स्रोत मेरा अपना परिवेश है। मैं उसी भाषा में उन्हीं शब्दों के द्वारा अपने आपको व्यक्त करने की कोशिश करता हूँ, जो मुझे अपने परिवेश में मिलते हैं।
गद्य जी अन्य विधाओं से कहानी की भाषा स्वाभाविक रूप से अलग होनी ही चाहिए । कहानी गद्य होते हुए भी बहुत गाद्यिक नहीं है।| उसकी भाषा जहाँ एक ओर जनजीवन से जुड़ी रहती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक कविता की बहुत-सी विशेषताओं को अपने में समाहित करती है।| यही उसे अन्य गद्य विधाओं से पृथक् करता है ।” भाषा-संबंधी कहानी की उपर्युक्त विशिष्टाओं का अनुपालन लघुकथाओं में भी अपेक्षित है | समकालीन हिन्दी लघुकथाएँ में संकलित डॉ. कृष्णानंद कृष्ण की लघुकथा अर्थपिशाच’ आलोक भारती की लघुकथा ‘कुण्ठा’, डॉ. सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘मरुस्थल’, डॉ. परमेश्वर गोयल की लघुकथा ‘लँगड़ी मानसिकता, रामयतन प्रसाद यादव की लघुकथा ‘भूण- हत्या’, कृष्ण मनु की कथा ‘पाँचवाँ सत्यवादी’, डॉ. सी. आर. प्रसाद की लघुकथा ‘पूछ लीजिए ज्ञान’, डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेय की लघुकथा ‘संवेदनशीलता’ आदि हर प्रकार की भाषा के अच्छे उदाहरण हैं ।
इसके अतिरिक्त लघुकथाकार को शब्दों के चयन में विशेष सतर्कता बरतने की आवश्यकता होती है। उसके द्वारा प्रस्तुत शब्दों को न केवल बोलना है बल्कि गरजना है, ताकि उसकी ध्वनि ‘कर्णमंद’ तक भी पहुँच सके, अदत्त चित्त लोगों को भी दहला सके। लघुकथाओं के मामले में ‘महाभाष्य’ में शब्दों के संबंध में पतंजलि के व्यक्त विचार पूर्णतः सटीक बैठते हैं – एक: शब्द: सम्यग् ज्ञात: सुप्रयुक्त: स्वर्गलोके च कामधुग् भवति ।“’ “शब्द की अर्थवत्ता की पकड़ में शब्द की ऐतिहासिक और अर्थ की सामाजिक परख दोनों निहित है और अर्थवान् शब्द का संवेदन (संप्रेषण) हो ही नहीं सकता बिना युग संपृक्ति के ।”
शैली ही वह प्रविधि या पद्धति है जो लेखक या कथायकार की अभिव्यंजना जो सप्राण एवं सहज ग्रहणशील बनाती है। शैली के द्वारा कथाकार को अपनी वाणी में ऐसी मोहकता और चारुता लानी होती है कि श्रोता एवं पाठक को वह जबरदस्ती अपने आगोश में समेट ले ।इसके लिए उसे देश-विदेश एवं बोलियों के प्रचलित एव॑ अर्थवोधक शब्दों के साथ मुहावरे, लोकोक्तियाँ, कहावतों, सूक्ति-सुभाषितों आदि के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा। शैली के इन महत्त्वपूर्ण उपादानों के व्यवहार से कथाकार के कथन में स्वाभाविकता तथा संजीदगी पैदा होती है, जो संप्रेपणीयता के लिए अपरिहार्य है । दरअसल इन विधाओं में अभयार्थ से सर्वत: या अंशतः भिन्न लक्ष्यार्थ की अभिव्यक्ति होती है। प्रायः रुढ़ लक्षणाशक्ति इनमें निहित रहती है ,जो अति-प्रचलन एव॑ व्यवहार के कारण विजली की कौंध की तरह क्षणिक उपस्थिति से ही प्रकाशन का बोध करा देती है
आधुनिक लघुकहानियों के व्यापक अध्ययन के फलस्वरूप हमने पाया है कि आज के अधिकतर लघुकथाकार मुहावरों, कहावतों, लोकोक्तियों आदि के प्रयोग द्वारा कथ्य को धारदार बनाने में सफल रहे हैं। इस क्षेत्र में प्रवेश द्वारा अपने को कथाकर घोषित कराने के लिए प्रयत्नशील कुछ ऐसे भी छद्मवेशी एवं दरिद्र कथाकार हैं, जो कथा के नाम पर भोंड़े एवं अनगढ़ चित्र प्रस्तुत कर इस स्वस्थ विधा को बदनाम एवं विरुपित कर रहे हैं।| ऐसे अनधिकारी लोगों के प्रवेश से भीड़ तो बढ़ेगी , पर पाठकों की संख्या घटेगी । इसलिए समीक्षकों एवं लघुकथा प्रेमियों को इन पर विचार करते समय हर पक्ष पर भी ध्यान रखना होगा।
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