जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा में गढंत     Posted: June 1, 2025

 ‘कथादेश’ और ‘छत्तीसगढ़ फिल्म एन्ड विज़ुअल आर्ट सोसाइटी’ के संयुक्त तत्त्वावधान में कथा समाख्या के छठे आयोजन में 29 फरवरी से 2 मार्च तक ‘कहानी में गढंत’ विषय पर तीन सत्रों में गंभीर चर्चा और विमर्श में प्रतिभाग का अवसर मिला। बरेली सत्र की शुरुआत में सुभाष मिश्र ने ‘कहानी में गढंत’ विषय पर टिप्पणी करते हुए जो कहा, उसका एक अंश यहाँ प्रस्तुत है-

यूँ तो आधुनिक कहानी जीवन की वास्तविकता को आख्यान में ढालकर पेश करने यानी गढ़ने की ही कला है, लेकिन कहानी का मूल चारित्रिक लक्षण है यथार्थ की विश्वसनीयता और वृत्तांत की स्वाभाविकता। आख्यान के रूप में उसे गढ़ने का अर्थ है-उसकी स्वाभाविकता और विश्वसनीयता को बनाये रखते हुए जीवन की विडंबनाओं की पहचान और प्रस्तुति। मगर कहानी गढ़ने के प्रयत्न में यदि कहानीकार वृत्तांत के बजाय यथार्थ को ही मनमाने ढंग से गढ़ने लगे तो यथार्थ की विश्वसनीयता भंग होती है। कहानीकार की महत्त्वाकांक्षा, चमत्कारप्रियता और उसकी वैचारिकता का दबाव आदि सर्जन प्रक्रिया को नियंत्रित करने लगे तो कहानी स्वाभाविकता खोकर ‘गढंत’ में तब्दील होने लगती है, यथार्थ का आभास देने वाली एक कृत्रिम आख्यानात्मक संरचना। दरअसल इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में कहानीकार आ गया है और कहानी हाशिये पर चली गई है। कहानीकारों में आख्यान को गढ़ने की जगह यथार्थ को ही नियंत्रित या ‘मैनिपुलेट’ करने की प्रवृत्ति बढ़ी है …

(‘कहानी में गढंत’ , कथादेश, जनवरी 2021, पृष्ठ 75)

‘कहानी में गढंत’ विषयक इस त्रिदिवसीय आयोजन में प्रतिभाग करते हुए ‘लघुकथा’ से अतिरिक्त जुड़ाव के चलते नेपथ्य में कहीं ‘लघुकथा में गढंत’ विषय पर भी विचार मंथन चलता रहा। उपर्युक्त टिप्पणी को यहाँ उद्धृत करने का उद्देश्य भी यही है कि जिन खतरों की ओर इस टिप्पणी में सचेत किया गया है, वे कहानी की तुलना में लघुकथा में कई गुना अधिक हैं।

वर्तमान में लघुकथा लेखन में सक्रिय लेखकों की संख्या बहुत अधिक है। कभी-कभी है लगता है, आजकल लोग लेखन की शुरुआत लघुकथा से ही करते हैं, जबकि पहले कविता से हुआ करती थी। इसे आकारगत लघुता के कारण तत्काल सोशल मीडिया पर पोस्ट कर वाहवाही लूटी जा सकती है, लाइक या वाह-वाह करने वालों में अधिकतर ऐसे मित्र होते हैं, जो साहित्य की समझ नहीं रखते, केवल औपचारिकता निभाते हुए टिप्पणी कर देते हैं। साहित्य-जगत् में कुछ ऐसे लेखक भी हैं, जिनकी निगाह में लघुकथा का आज भी कोई वजूद नहीं है, वे अपनी लघुकथा को कहानी के तौर पर ही छपवाना पसंद करते हैं। उनकी इस धारणा के पीछे, कहीं न कहीं लघुकथा में हो रहा सतही लेखन भी जिम्मेवार है। ऐसा भी नहीं है कि सोशल मीडिया से लेखन की शुरुआत करने वालों में प्रतिभा नहीं हैं, अनेक लेखकों ने इस प्लेटफार्म पर ही लिखना शुरू किया और आज प्रिंट तथा सोशल मीडिया में अच्छे लघुकथा लेखक के रूप में जाने जाते हैं, पर ऐसे कथाकार गिने-चुने ही हैं। लघुकथा में ‘गढंत’ कि दृष्टि से आकारगत लघुकथा ही इसके लिए अभिशाप बनी हुई है, निम्न कारणों से अधिकतर लघुकथाएँ अपना प्रभाव नहीं छोड़ पातीं।  

एक-सोशल मीडिया के विभिन्न समूहों में विषय / शीर्षक / चित्र देकर लघुकथाएँ आमंत्रित करने का चलन है। इस बार तो राजस्थान पत्रिका ने विषय (आखिरी रात, खोई हुई चाबी, पिछली गली, कॉलेज का आखिरी दिन, बड़ा पार्सल, रेलगाड़ी की खिड़की) देकर लघुकथाओं के वीडिओ आमंत्रित किए थे। इस प्रकार के प्रायोजित और समयबद्ध लेखन में प्रतिभाग करनेवाला लेखक (अपवाद स्वरूप कुछ अति प्रतिभाशाली कथाकारों को छोड़कर) बिना सृजन-प्रक्रिया से गुजरे कैसे स्तरीय रच सकता है? वह दिए गए विषय के इर्द-गिर्द मनगढ़ंत (फेब्रिकेटेड) ताने-बाने बुनेगा, जिससे यथार्थ की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। ऐसी बेजान रचनाएँ बहुतायत में दिखाई देती हैं।

दोलघुकथा के बारे में यही भ्रान्ति व्याप्त है कि इसका अंत (जो यहाँ पंच लाइन के रूप में पॉपुलर है) चमत्कारी / विस्फोटक / चौंकाने वाला / धारदार होना ही चाहिए, इस भ्रान्ति के चलते हो यह रहा है कि कथ्य की आवश्यकता के विपरीत वास्तविकता से परे, कल्पना के बल पर धमाकेदार अंत ‘गढ़’ दिया जाता है, जबकि यहाँ अभिप्राय यह है कि अंत में कथ्य पाठक के सामने इस रूप में प्रकट हो कि पूरी कथा के मायने और उद्देश्य एकदम सम्प्रेषित हो जाएँ।

तीन-समसामयिक विषयों पर अपने वैचारिक एजेंडे को स्थापित करने के लिए आकारगत लघुता के चलते लघुकथा में अभिव्यक्ति काफी सुविधाजनक है, चट-पट लिखा और पोस्ट / प्रकाशित कर दिया। ऐसी रचनाओं (?) की आयु पानी के बुलबुलों के समान होती है। देश-विदेश में घट रही घटनाओं पर तात्कालिक प्रतिक्रिया स्वरुप इनका जन्म होता है, इनके माध्यम से अपने विचार प्रतिपादित करने के लिए जो पात्र गढ़े जाते हैं, वह लेखक के हाथों की कठपुतली होते हैं और उसी के द्वारा दिखाए रास्ते पर चलते हैं।

चार-इधर लघुकथा में प्रयोग का चलन बढ़ा है। यदि जीवन का यथार्थ जटिल है और कथ्य को सम्प्रेषित करने में ‘प्रयोग’ सहायक है, तो उसका स्वागत होना चाहिए, ऐसी लघुकथाएँ प्रभावित भी करती हैं। वर्तमान में विद्वत्ता दर्शाने के लिए अथवा सायास जो प्रयोग हो रहे हैं, वे निराश करते हैं, जब कथ्य को सीधे-सरल अंदाज़ में बेहतर अभिव्यक्ति मिल सकती है, तो ऐसे प्रयोग की क्या आवश्यकता जो उलटे लघुकथा को इस कदर जटिल बना दे कि सम्प्रेषण का संकट उत्पन्न हो जाए।

पाँच-इस विषय पर पहले भी ध्यान आकृष्ट किया गया है, एक ही कथ्य को दोहराती अनेक लघुकथाएँ प्राप्त होती हैं, जिनके मौलिक होने पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। कुछ तो विश्व प्रसिद्ध लेखकों की कहानियों का सार लगती हैं, कुछ अपने देश के लेखकों की प्रसिद्ध लघुकथाओं में मामूली फेर-बदल कर गढ़ ली जातीं हैं। कहना न होगा कि कुछ लघुकथाएँ संयोगवश भी इस श्रेणी में आ जाती हैं। वर्तमान में ‘ऊँचाई’ लघुकथा (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ) की पुनः चोरी चर्चा में है।

छह-कुछ लघुकथाओं (?) में यथार्थ के नाम पर सिर्फ और सिर्फ घटनाएँ होती हैं, इनमें किसी चैनल या अखबार की खबर से ऊपर कुछ नहीं होता। कोविड काल से जुड़ी अधिकतर रचनाएँ (घटनाएँ) इसी प्रकार की पाई गईं, इनमें घटना को कथा बनाने का कोई प्रयास नहीं दिखाई दिया। कुछ चुटकुलेनुमा कथाएँ भी प्राप्त हुईं, यह खतरा भी इस विधा पर पुनः मँडराने लगा है। दो तीन पंक्तियों वाली रचनाएँ भी बहुत निराश करती हैं। ऐसे रचनाकारों को रमेश बतरा की इस कथन को समझने का प्रयास करना चाहिए-“किसी भी बीज का छोटा पौधा लघुकथा नहीं। लघुकथा की तुलना अगर पौधों से की जाए, तो लघुकथा भी ठीक वैसे ही पौधों में शुमार होती है, जो प्राकृतिक रूप से मूलतः होते ही छोटे हैं और उनका छोटापन ही उनका आकर्षण भी होता है और भव्यता भी।”

और अंत में

 लघुकथाओं में उस ‘गढंत’ की बिंदुवार चर्चा की गई है, जिसके कारण रचना इतनी क्षणिक या अल्पजीवी हो जाती है कि पाठक को बिलकुल प्रभावित नहीं करती। इस प्रकार ‘रचने’ ओर ‘गढ़ने’ के अंतर को समझा जा सकता है।

लघुकथा ‘रचने’ को लेकर रमेश बतरा कहते हैं—”रचने’ का अर्थ मेरे तईं बिलकुल असैंबलिंग जैसा है, यानी घड़ी के पुर्जे मेरे इर्द-गिर्द गिरा दिए गए हैं और अब यह मुझ पर आधारित है कि मैं उन्हें जोड़-जोड़कर कैसी और किस प्रकार की घड़ी तैयार करता हूँ। इस तरह यह मेरे लिए एक सतत खोज है, जो मुझे कुछ सिखाती-समझाती है और मैं उस सीख को समझ को रचना के माध्यम से सबके साथ साझा करने की कोशिश करता रहता हूँ।” रमेश बतरा की टिप्पणी से भी स्पष्ट है कि लेखक के आस-पास बिखरी सामग्री (लेखन के लिए कच्चा माल) को लेखक भीतर सतत खोज, सीख और समझ (सर्जन प्रक्रिया) की जरूरत होती है। केवल फेब्रिकेशन (गढंत) से किसी दीर्घजीवी रचना का जन्म संभव नहीं। यहाँ इसी सन्दर्भ में प्रस्तुत है उनकी एक लघुकथा-

रमेश बतरा / खोया हुआ आदमी

वह अपनी धुन में मस्त चला जा रहा था। सहसा सड़क के बीचोबीच भीड़ को देखकर, यह जाने की उत्सुकता होते हुए भी कि वहाँ क्या हो रहा है, वह उसे नजरअंदाज करके निकल गया।

“भाई साहब…भाई साहब।” वह अभी कोई दस-बारह कदम ही आगे गया था कि भीड़ में से एक आदमी उसे पुकारने लगा।

“क्या है?” पीछे घूमकर उसने वहीँ से पूछा।

“इधर आइए, यहाँ आपके मित्र की हत्या हो गई है।”

वह परेशान-सा लौट पड़ा…और याद करने लगा कि उसे पुकारने वाला आदमी कौन है, जो उसे और उसके मित्र दोनों को जानता है। दिमाग पर काफी जोर देने के बाद भी वह केवल यही तय कर पाया कि वह उसका परिचित तो है, लेकिन यह याद नहीं आ रहा कि वह कौन है और उसकी उससे पहली, पिछली या कोई भेंट कब और किस सिलसिले में हुई थी।

भयभीत-सा वह भीड़ के पास पहुँचा तो भीड़ ने उसके लिए रास्ता छोड़ दिया। वह कुछ कदम दूर से ही सामने पड़े शव को देखने लगा और मिनट-भर बाद उसे पहचानकर हँस पड़ा, “यह तो मेरा शत्रु है।”

“जरा ध्यान से देखिए।”

“शत्रु ही है!”

“शत्रु कौन?”

“कौन हो सकता है!” वह दुविधा में पड़ गया…फिर मेरा तो कोई शत्रु नहीं!

“आप जरा गौर से पहचानिए।”

इस बार वह शव के नजदीक चला गया और उसे घूरते-घूरते हैरान रह गया…यह तो वही आदमी था, जिसने पुकारा था।

उसने भीड़ में चारों ओर देखा, वह आदमी कहीं नहीं था। वह घबरा गया और घबराहट में ऐनक उतारकर फिर से शव पर झुक गया।

“पहचाना?” किसी ने पूछा।

“हूँ,” वह बड़बड़ाया, “पहचान लिया।”

“कौन है?”

“अंधे हो क्या…दिखाई नहीं देता?” उसे गुस्सा आ गया और चिल्लाते-चिल्लाते सहसा रुआँसा होकर दोनों हाथों से मुँह ढाँप लिया, “यह मैं हूँ…मुझे पहचानो!”

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