जून 2026

दस्तावेज़लघुकथा में पात्र और उनकी भूमिका     Posted: January 1, 2023

सामान्यतः यह माना जाता है कि कथा रचनाओं में मानव और मानव की तरह व्यवहार करने वाले संरचनात्मक तत्त्व रचना के पात्र होते हैं; लेकिन मुझे लगता है कि इस तरह सोचना ठीक नहीं है। वास्तव में कथा रचनाओं (उपन्यास, कहानी और लघुकथा- सभी) में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय (एक्टिव) एवं क्रियाशील (इन्वाल्व्ड) प्रत्येक जैविक-अजैविक संरचनात्मक तत्त्व  (ऑब्जैक्ट), जो व्यक्त-अव्यक्त भावों-विचारों का वाहक बनकर कथा को बुनने और आगे बढ़ाने का माध्यम बनता है, उस रचना का पात्र होता है। ये संरचनात्मक तत्त्व  कथा रचना में पात्रेतर भूमिका (वातावरण के सामान्य अवयव के रूप) में भी होते हैं। पात्र या पात्रेतर भूमिका उनकी क्रियाशीलता की प्रकृति पर निर्भर करती है। यदि ऐसा तत्त्व  रचनागत उद्देश्य से जुड़े व्यवहार को व्यक्त करता है तो वह पात्र की भूमिका में होगा, इसके विपरीत यदि वह पात्रों की सक्रियता व क्रियाशीलता एवं कथात्मक स्थितियों के लिए निर्मित वातावरण की आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा ऐसे ही किसी अन्य कारण से उपस्थित है तो वह रचनागत वातावरण का सामान्य/पात्रेतर अवयव माना जायेगा। उदाहरण के लिए रामकुमार घोटड़ की लघुकथा ‘छत्रछाया’ में पिता के लगाये ‘पेड़’ को काटने से माँ बेटे को मना करती है, वह ‘पेड़’ लघुकथा में पात्र की तरह उपस्थित है। इस लघुकथा में सन्दर्भित पेड़ में माँ अपने पति यानी बेटे के पिता की आत्मा का अहसास करती है। इसका अर्थ है वह ‘पेड़’ भाव का वाहक है और कथा को बुने जाने का कारण बनता है। इस पेड़, जिस रूप में वह उपस्थित है, को रचना से यदि हटा दिया जाये तो लघुकथा लिखने का कोई कारण ही नहीं बचेगा। जबकि ब़ेटे द्वारा कटवा दिये गये अन्य पेड़ वातावरण के सामान्य अवयव की तरह लघुकथा में आते हैं। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘कस्तूरी मृग’ में संदर्भित ‘चीड़ और देवदार के वृक्ष’ वातावरण के सामान्य अवयव के रूप में ही उपस्थित हैं। इस लघुकथा की इन पंक्तियों को पढ़िए-  ‘‘वह नदी के बिल्कुल किनारे पहुँच गया। लिद्दर पत्थरों के बीच उछलती टकराती बह रही थी। नदी के दोनों ओर चीड़ और देवदार के वृक्ष अंधेंरे में खड़े ऊँघ रहे थे। उसने दो-तीन बार गहरी साँस ली। उस पर…।’’ इस संदर्भ में एक और बात देखी जा सकती है, जहाँ संरचनात्मक तत्त्व  पात्र के रूप में उपस्थित हैं, वहाँ उन्हें हटा देने पर रचना का अस्तित्व ही छिन्न-भिन्न होता दिखाई देता है और जहाँ वे पात्रेतर भूमिका में हैं, वहाँ रचना के प्रभाव में कुछ अन्तर तो आ सकता है लेकिन सामान्यतः रचना के अस्तित्व पर संकट नहीं आता। उपरोक्त उदाहरणों में भी इस तथ्य को देखा जा सकता है।
      सभी कथा रचनाओं में स्थिति के आधार पर प्रायः दो तरह के पात्र होते हैं। एक वे, जो अपनी सक्रियता (एक्टिविटी) और क्रियाशीलता (इन्वाल्वमेंट) के आधार पर प्रमुखता प्राप्त कर लेते हैं और दूसरे वे, जिनकी सक्रियता और क्रियाशीलता सहायक जैसी भूमिका में यानी प्रमुख पात्रों की सक्रियता और क्रियाशीलता का कारण बनने, उसे उत्प्रेरित करने या/एवं आगे बढ़ाने की होती है। प्रकृति की दृष्टि से पात्र या तो चरित्र के रूप में उपस्थित होते हैं या फिर समस्यात्मक एवं अनुभूतिजनक स्थितियों को उभारने और उनकी परिणामी प्रभावशीलता को रेखांकित करने के माध्यम रूप में। यहाँ चरित्र का आशय मानवीय जीवन से जुड़ी धारणाओं, मान्यताओं एवं वातावरण को प्रभावित (परिवर्तित, परिवर्द्धित एवं स्थापित) करने वाले वैशिष्ट्य से है।
      रचना विशेष का कोई प्रमुख/विशिष्ट पात्र जब रचना में सर्वाधिक क्रियाशील रहकर तमाम स्थितियों-परिस्थितियों को प्रभावित करता हुआ संघर्ष/समाधान को अपनी योग्यता, व्यवहार और क्षमताओं से निर्धारित करता है तो वह रचना का नायक बनकर उभरता है। ऐसी कथा रचनाएँ सामान्यतः नायकत्व/चरित्र केन्द्रित होती हैं। इन रचनाओं में पात्र सामान्यतः ‘चरित्र’ के रूप में उपस्थित होते हैं और सर्वाधिक प्रमुख/विशिष्ट पात्र रचना में अपने वैशिष्ट्य एवं प्रभावी क्षमताओं के कारण ‘नायक’ की भूमिका अदा करता है। ऐसी रचनाओं में नायक की सक्रियता के साथ कमाधिक समस्तर पर सक्रिय कुछ अन्य प्रमुख पात्र भी होते हैं और उनकी संख्या एकाधिक हो सकती है। प्रमुख पात्रों से इतर लघु भूमिकाओं का निर्वाह करने वाले कुछ सहायक पात्र भी हो सकते हैं। उपन्यास एवं कहानी विधाओं में प्रमुख पात्र प्रायः नायक/नायिका के रूप में विद्यमान होते हैं। इसके विपरीत लघुकथा में सभी पात्र नायकेतर भूमिका का निर्वाह करते हैं क्योंकि वहाँ रचना के केन्द्र में समस्या, समस्यात्मक स्थिति या कोई विशेष अनुभूति होती है, चरित्र नहीं।
      नायकत्व आधारित कथा विधाओं से लघुकथा का अन्तर और स्पष्ट करने के लिए हम इस तरह भी बात कर सकते हैं कि लघुकथा में पात्र समस्या या अनुभूति को उभारने में सहायक/माध्यम होते हैं जबकि अन्य विधाओं (उपन्यास व कहानी) में समस्याएँ एवं अनुभूतियाँ चरित्र को उभारने में सहायक/माध्यम बनती हैं। सूक्ष्मता से देखने पर हम पायेंगे कि चरित्र के रूप में पात्र (नायक) सीमाओं के दायरे में सक्रिय एवं क्रियाशील होते हैं। वे यदि कहीं किन्हीं सीमाओं को तोड़ते हैं तो नई सीमाओं को स्थापित भी करते हैं। लघुकथा में प्रमुख पात्र सहित सभी पात्रों की सक्रियता एवं क्रियाशीलता ऐसी सीमाओं से सामान्यतः असम्बद्ध होती है।
      पात्रों के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि पात्रों की सक्रियता व क्रियाशीलता कथा के विषय, प्रकृति और उद्देश्य के अनुरूप कथा में प्रायः कुछ न कुछ स्पेस माँगती है। उपन्यास और कहानी जैसी विधाओं में स्पेस की समस्या उतनी नहीं होती, जितनी लघुकथा में। लघुकथा में स्थान सीमित होता है। घनीभूत बहुकोणीय समस्यात्मक स्थितियों में भी एक सूत्र से जुड़े न्यूनाधिक तीन-चार पात्र हो सकते हैं, लेकिन सामान्य रूप से नए-नए पात्रों के प्रवेश के लिए नई स्थितियों और परिवेशगत नई आवश्यकताओं का होना भी जरूरी होता है। दूसरी बात, उपयुक्त स्थितियों के साथ नए-नए पात्रों के प्रवेश से आकार बढ़ता है, जिसके समायोजन के लिए अन्यान्य सह उद्देश्यों एवं विभिन्न पात्रों से जुड़े विशिष्ट आकर्षण के कारण उपस्थित न हों तो रचना में शिथिलता आती है। इसी कारण से उपन्यास और कहानी के विपरीत लघुकथा के सन्दर्भ में सामान्य धारणा यह है कि संख्या में पात्र जितने अधिक होंगे, रचना में अनावश्यक विस्तार के साथ शिथिलता उतनी ही बढ़ेगी। वास्तविक बात यह है कि लघुकथा में पात्रों की संख्या कथ्य-सम्प्रेषण के दृष्टिगत स्थिति और वातावरणजनित आवश्यकता से अधिक नहीं होनी चाहिए। चूँकि पात्रों को उनकी आवश्यकतानुरूप स्पेस देना ही पड़ता है, अतः लघुकथा में वही पात्र उपयुक्त होते हैं जो उसके विधागत स्वभाव के साथ कथ्य के प्रति एकाग्रता को बनाये रख सकें। इससे इतर किसी अतिरिक्त पात्र के लिए अतिरिक्ति स्पेस बनाने की कोशिश लघुकथा रचना में शिथिलता पैदा करेगी, जिसके कारण अन्ततः रचना के प्रभाव और सौंदर्य दोनों का क्षरण होगा। पात्रों पर विचार करते हुए यह बात हमारे अन्तर्मन में रहनी चाहिए। इस विमर्श में लघुकथा में पात्रों की संख्या को किसी भी स्तर पर सीमित या प्रतिबन्धित करने का मेरा कोई आग्रह-दुराग्रह शामिल न समझा जाए।
       चूँकि लघुकथा-सृजन का उद्देश्य उपन्यास और कहानी से भिन्न होता है, लघुकथा में उपन्यास और कहानी के सापेक्ष सभी पात्रों की भूमिका सर्वदा भिन्न रूप-स्वरूप में होती है। उसमें समस्या, समस्यात्मक स्थिति या सामाजिक-वैयक्तिक जीवन से जनित विशिष्ट अनुभूति प्रमुख होती है, चरित्र नहीं। इसलिए पात्र अपनी सक्रियता एवं क्रियाशीलता के माध्यम से लघुकथा के केन्द्र में विद्यमान समस्या, समस्यात्मक स्थिति अथवा जीवनानुभूति को उभारने एवं सक्रिय बनाने में भूमिका निभाते हैं, नायकत्व को सृजित या स्थापित करने में नहीं।
      यहाँ हमें यह समझना भी आवश्यक है कि लघुकथा में पात्रों की सक्रियता एवं क्रियाशीलता के लिए सीमित स्पेस और कथ्य संप्रेषण के लिए समय भी सीमित होता है। दूसरी बात, लघुकथा के केन्द्रीय तत्त्व  (समस्या, समस्यात्मक स्थिति अथवा जीवनानुभूति) को उभारने/रेखांकित करने की आवश्यकताओं के अनुरूप विभिन्न लघुकथाओं में प्रमुख पात्रों की भूमिका के सन्दर्भ में उनकी स्थिति एवं प्रकृति भी अलग-अलग हो सकती है। इन स्थितियों में लघुकथा के पात्रों की भूमिका कहानी या उपन्यास के पात्रों जैसी नहीं हो सकती। लघुकथा में पात्रों की संख्या सामान्यतः अत्यंत सीमित होने के साथ प्रत्येक पात्र की भूमिका अपने-अपने कारण से महत्वपूर्ण होती है। उनमें से किसी विशेष पात्र को प्रमुखता मिल भी सकती है और एकाधिक पात्र समान रूप से भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में बहुत सारी लघुकथाओं में प्रमुखतम पात्र का निर्धारण करना बेहद मुश्किल होता है, इनमें नायक तो प्रायः नहीं ही होता है। सतीश दुबे की ‘शिनाख्त’, भगीरथ की ‘सोते वक्त’, बलराम अग्रवाल की ‘अलाव के इर्द-गिर्द’, सुकेश साहनी की ‘जागरूक’, मधुदीप की ‘नियति’, युगल की ‘छोटी बात – बड़ी बात’, संध्या तिवारी की ‘जहन्नुम’, सुधीर द्विवेदी की ‘जीने का सलीका’, सुरेश तन्मय की ‘छोटू का दर्द’ एवं अन्यान्य लघुकथाओं में इस स्थिति को देखा जा सकता है।  
      इसके विपरीत यदि किसी लघुकथा में कोई पात्र अपनी अधिक और प्रभावी सक्रियता के आधार पर प्रमुखतम जैसी स्थिति प्राप्त करता भी है, तब भी उसकी भूमिका ‘चरित्र’ या नायक की न होकर लघुकथा के केन्द्र में विद्यमान समस्या अथवा विशिष्ट जीवनानुभूति को उभारने या कहिए उस पर फोकस करने की होती है। बलराम अग्रवाल की ‘सियाही’, सतीश दुबे की ‘फैसला’, भगीरथ की ‘नाटक’, सुकेश साहनी की ‘ठंडी रजाई’, मधुदीप की ‘अवाक्’, अशोक भाटिया की ‘रंग’, आाशा शैली की ‘दूरियाँ’, अशोक गुजराती की ‘मौत संवेदना की’, चन्द्रेश छतलानी की ‘पलायन का दर्द’, संतोष सुपेकर की ‘अर्थ ढूँढ़ती सिहरन’, उषा अग्रवाल की ‘मूँगफली टाइमपास’ जैसी अनेकानेक लघुकथाओं में इस स्थिति को देखा जा सकता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि लघुकथा में जहाँ कहीं पात्र की यह नायकेतर प्रमुखता उभरती है तो उसमें योग्यता और क्षमता से स्थितियों-परिस्थितियों को प्रभावित करने से अधिक लक्षित बिन्दु की सूक्ष्मता को व्यापक फलक पर दिखाने की क्रियाशीलता का आवेग ही प्रमुख होता है। कुछ लघुकथाओं में नायकत्व का तत्त्व  दिखाई देता है लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से समझने पर आसानी से इस निष्कर्ष पर  पहुँचा जा सकता है कि वह रचना का लक्ष्य नहीं होता। रचना का लक्ष्य समस्या या समस्यात्मक स्थिति अथवा कोई विशेष अनुभूति ही होती है। जगदीश कश्यप की ‘साँपों के बीच’, बलराम अग्रवाल की ‘अकेला कब तक लड़ेगा जटायु’, सतीश दुबे की ‘गन्ध’, सुकेश साहनी की ‘गोस्त की गन्ध’, भगीरथ की ‘फूली’, मधुदीप की ‘भय’, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की ‘ऊँचाई’, युगल की ‘तीर्थयात्रा’, माधव नागदा की ‘मेरी बारी’, मधुकान्त की ‘मौसम’, खेमकरण सोमन की ‘मनीआर्डर’, कुणाल शर्मा की ‘अटूट बन्धन’, मीनू खरे की ‘दूसरी रिपोर्ट’, ज्योत्स्ना कपिल की ‘प्रेम’ आदि जैसी लघुकथाओं को पढ़ते हुए इस स्थिति को समझा जा सकता है।
      पात्रों की स्थिति को लेकर लघुकथा में ऐसी और भी स्थितियाँ देखने को मिल सकती हैं लेकिन पात्रों की भूमिका लघुकथा के केन्द्रीय तत्त्व – समस्या, समस्यात्मक स्थिति या विशिष्ट अनुभूति पर फोकस करने में ही निहित होगी। दरअसल लघुकथा तभी तक लघुकथा है जब तक जीवनालोचना से जुड़ा तत्त्व  अपने समग्र प्रभाव और ऊर्जा के साथ उसके केन्द्र में विद्यमान है। संभव है कुछ मित्र ऐसी रचनाओं के उदाहरण सामने रखें, जिनमें लघुकथा की प्रवृत्तियों के बावजूद रूपाकार के आधार पर कहानी की मान्यता दी जा रही हो। मैं इतना ही कहूँगा, जैसे लघ्वाकार में कहानी मौजूद हो सकती है वैसे ही वृहद् आकार में लघुकथा भी हो सकती है। किन्तु यह बेहद स्पष्ट है कि कथा साहित्य में पात्रों के संदर्भ में ‘नायक’ और ‘प्रमुख पात्र’ अलग-अलग कान्सैप्ट हैं। प्रमुख पात्र नायक हो सकता है और नहीं भी। हर कथा रचना में नायक हो, यह आवश्यक नहीं है। लघुकथा की प्रकृति प्रमुख पात्र को नायक के रूप में भूमिका प्रदान नहीं करती। लघुकथा की प्रकृति और विधागत स्वभाव नायकत्व के पक्ष में नहीं है। समकालीन लघुकथा जीवन की आलोचना करते हुए सीधे-सीधे समस्यात्मक स्थितियों से टकराती हुई अथवा विशिष्ट जीवनानुभूतियों को उभारती हुई निकलती है, यही उसका ल़क्ष्य भी होता है। इस लक्ष्य प्राप्ति में नायकेतर भूमिका के बावजूद लघुकथा का प्रमुख पात्र सक्रियता और क्रियाशीलता की सघनता के आधार पर अपना प्रभाव सम्प्रेषित करने में समर्थ हो सकता है।
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