समकालीन लघुकथा आज सामाजिक परिवर्तन को गति देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है ऐसे में पुनरीक्षण का हमारा दायित्व बढ़ जाता है कि हम ठहरकर देखें कि लघुकथा रचने में कौन सी सूक्ष्म त्रुटियाँ हमसे हो रही हैं जो लघुकथा के सहज प्रवाह में और उसे कालजयी /चिर स्मरणीय बनाने में बाधक हैं?
एक लघुकथा पढ़ रहा था, उसी का अंश-
खोटा सिक्का
सड़क पर बैठी एक बहुत बूढ़ी, लगभग 90 वर्षीय बुढ़िया ने फेंके हुए सिक्के को उठाया, दोनों तरफ़ से उल्टा, पलटा और तड़पकर कहा-ये तो खोटा है!
‘‘नहीं अम्मा, एक तरफ खरा भी…..”
एक अन्य लघुकथा में-
पच्चासी वर्षीय ससुर ने लगभग बावन वर्षीय अपनी बहू को आवाज लगाई- ‘‘बेटी, अपनी सास की तस्वीर फेंक दी न, मुझे भी फेंक दे बाहर!”
या , यह-
पैंतीस वर्षीय अंशुल अपने दफ्तर में ही था कि उसे पता चला शहर में दंगे फैल गए हैं…. या 23 वर्षीय लतिका ने 47 वर्षीय माँ, अनामिका को आवाज लगाई…..
एक लघुकथा का अंश पढ़कर तो दंग रह गया-
बारह वर्षीय अंश ने अपनी दो साल छोटी, दस वर्षीय बहन कनिका को फटकारा…..
उक्त सभी लघुकथाओं में पात्रों की तुम्र का उल्लेख है जिसका कथावस्तु से कोई संबंध नहीं है, जो आगे के घटनाक्रम में भी कहीं उपयोगी नहीं है। उम्र को अन्य तरीकों से भी दर्शाया जा सकता था; लेकिन फिर भी पात्रों की उम्र का उल्लेख किया गया है !
आजकल अधिकतर लघुकथाओं में यह एक गलत ट्रेडिशन(परम्परा) बनता जा रहा है- बिना वजह पात्र की उम्र का वर्णन! पात्र की आयु पर फोकस! यह लघुकथाकार के जल्दबाज़ी करने और भावनाओं में बहकर तुरन्त लेखन/ प्रकाशन का दुष्परिणाम है।
कहा गया है कि रचना -प्रक्रिया विचारों के सृजन से लेकर अंतिम अभिव्यक्ति तक का एक व्यवस्थित चरणबद्ध सफर है, जिसमें तैयारी और ऊष्मायन (विचारों का परिपक्व होना) शामिल है। यह एक खोजी प्रक्रिया है, जहाँ रचनाकार अनुभवों को भाव, कल्पना और शब्दों के माध्यम से जीवंत रूप देता है। साहित्य भावनाओं का सागर है; लेकिन फिर भी उसे रचने में भावनाओं के साथ-साथ व्यवहारिकता को भी ध्यान में रखना पड़ता है। लघुकथाकार जल्दबाज़ी न करते हुए यह सोचें कि लघुकथा में पात्र की उम्र का उल्लेख कब और क्यों आवश्यक है, आवश्यक भी है या नहीं, तो यह बोझिलपन खत्म हो सकता है।
लघुकथा में आकार पर बात करते हुए हम हमेशा कहते -सुनते आए हैं कि लघुकथा में एक भी शब्द या अक्षर तो क्या, एक अर्ध विराम भी अतिरिक्त नहीं होना चाहिए और यह भी कि लघुकथा हर पाठक के लिए नहीं, प्रबुद्ध पाठक के लिए होती है। तब हम बिना वजह पात्र की उम्र दर्शाकर लघुकथा को अनावश्यक विस्तार क्यों दे रहे हैं, पाठक को कम अक्ल क्यों समझ रहे हैं?
लघुकथा में सूक्ष्मता का बहुत महत्त्व है- सूक्ष्म अर्थ, सूक्ष्म मानवीय संवेदना, सूक्ष्म चयन इन सभी तथ्यों को लघुकथा में बहुत गम्भीरता से लिया जाता है। डॉक्टर कमल चोपड़ा के अनुसार – लघुकथा का गठन संश्लिष्ट और सांकेतिक है उसी के अनुसार पात्र चयन, उनकी भाषा, संवाद आदि का चयन किया जाता है ।
विशेष ध्यान यह रखा जाता है कि लघुकथा कथ्य के अनुसार ही शब्द सीमा में रहे और विस्तार ले भी तो अपने कथ्य के आसपास ही, और वह भी कसावट- भरा। कसावट भरे विस्तार का अर्थ है कि लघुकथा के सामान्य सिद्धांतों का पालन करते हुए, कथ्य की मांग के अनुसार फैलाव।
अगर लघुकथा घटना प्रधान है, तो शब्दों की मितव्ययिता जरूरी है जैसे-
दंगों का सब सामान तैयार था -आदमी, हथियार, गोला-बारूद और एक अदद सूअर !-
वहीं मनोवैज्ञानिक स्थिति, एकालाप श्रेणी की लघुकथा है, तो विस्तार जरूरी है , जैसे सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘मन के साँप’।
लघुकथा में पात्र की तुम्र के उल्लेख की तब तो जरूरत है ही जब विषयवस्तु ( Content) ही ‘उम्र ‘ हो , तब भी जरूरी है, जब उम्र का आगे कहीं उपयोग हो। ऐसे में पात्र की आयु का उल्लेख अवश्यंभावी हो जाता है; क्योंकि लघुकथा को पूरा सम्प्रेषण पसंद है ,अधूरापन नहीं, जैसे-
बहुत दिनों से गुमसुम ‘चार वर्षीय’ बालिका दुकान पर अचानक बोल पड़ी- पापा ये पिछतौल लेना अब वो दिनेछ अंकल मेले को हाथ लगाएँगे न , तो इछी पिछतौल छे उनको माल दालूँगी हाँ….
इस लघुकथा में बालिका की उम्र का उल्लेख आवश्यक भी है और सामयिक भी ; क्योंकि आज के लगातार दूषित होते वातावरण में छोटी बच्चियों के साथ अधिक अपराध हो रहे हैं। यहाँ उम्र का उल्लेख न केवल कथ्य का अंग है ; बल्कि पाठक के मन को बहुत करीब से स्पर्श भी करता है ,अधिक प्रभाव संप्रेषित करता है।
या फिर-
“यार इस हीरोइन की उम्र कितनी होगी?”
“बीस से ऊपर तो किसी हालत में नहीं, अपने से तो छोटी ही होगी।” फड़कते हुए दूसरे युवक ने कहा , “अभी देखते हैं न यू ट्यूब पर इसकी डी.ओ. बी… … “
इस लघुकथा की विषयवस्तु भी तुम्र ही है।
लेकिन इसके विपरीत, अब दबे पाँव लघुकथा को देखिए-
पति पत्नी को एक दूसरे से बहुत प्यार था। हमेशा साथ जीने और मरने की कसमें खाई जाती थीं। एक बार अंतरंग क्षणों में पति ने कहा, “हमारा प्यार अमर है। मेरी इच्छा है कि हम हर जन्म में यूँ ही पति-पत्नी बनकर रहें।”
“नहीं” आशा के विपरीत पत्नी ने उत्तर दिया।
“क्या ?” प्यार के पंखों पर सवार पति जैसे आसमान से गिरा। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।
“अरे मेरा मतलब यह था….” बात को सँभालते हुए पत्नी ने कहा, “क्या ये जरूरी है कि हर जन्म में तुम ही पति बनो और मैं पत्नी ? एक जन्म में तो मुझे पति बनने दो, चूल्हे- चौके से फुर्सत पाने दो, ठीक है न ?”
“ओह” पति की जान में जान आई। वह पुनः प्यार के सागर में गोते लगाने लगा; पर उसे महसूस हो रहा था, प्यार में भी, नारी मुक्ति आंदोलन की छटपटाहट… दबे पाँव ..
इस लघुकथा में दंपती के उम्र का उल्लेख करना बिलकुल त्याज्य है। ऐसा करना ( तुम्र का उल्लेख) बेवजह ही होगा और कसे हुए शिल्प को लचर ही बनाएगा। बिना कारण पात्र की उम्र दर्शाना उसके शिल्प को तो बिगाड़ता ही है पाठक के मन में नए प्रश्न भी खड़े करता है। 29 वर्षीय,नौजवान नौकरानी … के स्थान पर सिर्फ ‘युवा नौकरानी’ लिख देना पर्याप्त है।
लघुकथा विवेचन में एक शब्द है ‘लाघव’!
डॉक्टर बलराम अग्रवाल के अनुसार –
‘लाघव’ से तात्पर्य कथाकार का इस ओर सचेत रहने से है कि प्रस्तुत कथानक का कितना हिस्सा ‘वस्तु’ संप्रेषण की दृष्टि से लघुकथा के लिए यथेष्ट होगा, कितना नहीं। लघुकथाकार कभी भी संपूर्ण घटना को लघुकथा का आधार नहीं बनाता बल्कि घटना के जितने अंश को ‘वस्तु’ संप्रेषण हेतु उपयुक्त समझता है उसे ही ‘पूर्णता’ प्रदान करता है।
हमें लघुकथा में पूर्णता चाहिए। अब उसमें पात्र की उम्र का उल्लेख आवश्यक है या नहीं , यह लघुकथाकार को तय करना है।
कमलेश भारतीय के अनुसार लघुकथा अनुभूति के उन क्षणों की पकड़ है जिन्हें जान-बूझकर विस्तार नहीं दिया जा सकता। हमें लघुकथा में भी कुछ भी, जान-बूझकर नहीं डालना है। अपनी लघुकथा की कसावट को हृदयंगम करते हुए पाठकों के साथ हम जितना तादात्म्य ,
जितनी तत्स्वरूपता स्थापित करेंगे लघुकथा का भविष्य उतना ही सुरक्षित होगा।
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