दुनिया में प्रत्येक जीव व वस्तु को एक नाम दिया गया है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक नाम होता है, उसकी पहचान। इसी तरह से प्रत्येक साहित्यिक कृति का भी अपना एक नाम होता है, उसका शीर्षक। अकसर कहा जाता है कि नाम में क्या पड़ा है। अगर रामचंद का नाम लेखराज हो तथा सोहन लाल का रमेश कुमार तो कुछ फर्क नहीं पड़ता। असल बात तो गुणों की होती है। किसी भिखारी का नाम करोड़ी मल तथा सेठ का नाम फकीरचंद हो सकता है।
क्या साहित्यिक कृति के संबंध में भी ऐसा कहा जा सकता है? मेरा उत्तर है—नहीं। कारण स्पष्ट है। व्यक्ति का नाम तो उसके जन्म के कुछ दिन बाद ही रख लिया जाता है। कुछ माता-पिता तो बच्चे का नाम जन्म से पहले ही तय कर लेते हैं। उस समय बच्चे के गुणों व भविष्य के बारे में किसी को कुछ नहीं पता होता। बच्चे का सारा विकास तो उम्र बढ़ने के साथ ही होता, यानि उसके नामकरण के बाद। ऐसा कह सकते हैं कि माँ-बाप बच्चे का वैसा नाम रखते हैं जैसा वह उसके बनने की कामना करते हैं। लेकिन एक साहित्यक रचना अपने रूप व सभी गुणों सहित पूर्ण रूप से विकसित होने के पश्चात् ही अपना नाम (शीर्षक) ग्रहण करती है।
साहित्य की अनेक विधाएँ हैं। कथा साहित्य में भी उपन्यास, कहानी व लघुकथा विधाएँ आती हैं। इन तीनों विधाओं के लिए शीर्षक का महत्त्व एक जैसा नहीं होता। महाकाव्य की तरह किसी उपन्यास के नामकरण के समय अधिक कठिनाई पेश नहीं आती। इन साहित्यिक कृतियों के शीर्षक रचना पर अधिक प्रभाव नहीं डालते। वास्तविक प्रभाव तो रचना का ही होता है। फिर भी शीर्षक रचना के मूल भाव के विपरीत नहीं हो सकता। कहानी का शीर्षक भी रचना के अनुरूप ही होता है, यद्यपि शीर्षक में किए गए थोड़े बदलाव से रचना की प्रभावोत्पादकता में अधिक फर्क नही पड़ता; परंतु इस संबंध में लघुकथा की स्थिति भिन्न है। प्रभावोत्पादकता के संदर्भ में लघुकथा का शीर्षक बहुत अंतर डाल सकता है। लघु आकार की रचना होने के कारण शीर्षक भी एक तरह से रचना का हिस्सा ही होता है; परंतु फिर भी अनेक लघुकथा लेखक रचना के शीर्षक की ओर अधिक ध्यान नहीं देते। बहुत कम समीक्षकों ने लघुकथा में शीर्षक के महत्त्व की ओर ध्यान दिलाया है।
क्योंकि लघुकथा छोटे आकार की साहित्यिक विधा है; इसलिए इसमें शीर्षक का महत्त्व अधिक हो जाता है। हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि लघुकथा की बुनावट बहुत ही कसी हुई होनी चाहिए तथा भाषा प्रतीकात्मक। और इसमें एक भी शब्द ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसे रचना से हटाया जा सके। तब हम लघुकथा के शीर्षक को महत्त्वहीन कैसे मान सकते हैं? स्व. डॉ. सतीश दुबे जी का मानना था— ‘शीर्षक लघुकथा के प्रभाव को बढ़ाने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा लघुकथा का नब्बे प्रतिशत कथागत संदेश शीर्षक में ही छिपा होता है।’ जब शीर्षक इतना ही महत्त्वपूर्ण है, तो इसके बारे में गंभीरता से विचार-विमर्श होना चाहिए।
लघुकथा का शीर्षक कैसा होना चाहिए, इस पर बहुत विचार-विमर्श की आवश्यकता है। इस आलेख का मुख्य उद्देश्य इस विषय की ओर लेखकों एवं समीक्षकों का ध्यान आकर्षित करना है। मेरे विचार में लघुकथा के शीर्षक का चुनाव करते समय निम्नलिखित कुछ बातों की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए—
शीर्षक आकर्षक हो
शिक्षित माता-पिता अपने बच्चे का नामकरण करते समय उसे कभी भी टींडू, कद्दू, भिंडी, तोता, बंदर, कालू, भैंगा जैसे बेहूदा नाम देना पसंद नहीं करते। वे अपने बच्चे का नाम मनमोहक-सा रखना चाहते हैं, ताकि सुनने वाले को वह प्यारा लगे, बच्चे के प्रति दूसरों के मन में अच्छे विचार उत्पन्न हों। रचना में भी पाठक ने सबसे पहले शीर्षक को ही पढ़ना होता है; इसलिए शीर्षक में पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता होनी चाहिए। मन को प्रभावित करने वाला शीर्षक ही पाठक को रचना पढ़ने के लिए बाध्य करता है। ‘चुप्पी के बोल’, ‘काली धूप’, ‘ठंडी रजाई’, ‘रोटी की ताकत’, ‘बिन शीशों वाला चश्मा’, ‘अकेला कब तक लड़ेगा जटायु’, ‘विष-बीज’, ‘जब द्रौपदी नंगी नहीं हुई’, ‘रिश्ते का नामकरण’, ‘डरी हुई तस्वीर’, ‘ज़मीर का हल्फिया ब्यान’, ‘गुमशुदा हाथ की तलाश’ इत्यादि शीर्षक आकर्षक कहे जा सकते हैं।
शीर्षक कथ्य अनुरूप हो
लघुकथा का शीर्षक रचना के कथ्य के अनुरूप ही होना चाहिए। शीर्षक कथ्य के अनुरूप न हो तो रचना अपने मूल भाव को पाठक तक ठीक से संप्रेषित नही कर पाती। शीर्षक से रचना के कथा-कहानी विधा से संबंधित होने का भी पता चलना चाहिए। शीर्षक पढ़कर पाठक को ऐसा न लगे कि यह किसी अन्य विधा से संबंधित रचना है। ‘विज्ञान के चमत्कार’, ‘परिवार नियोजन’, ‘आर्थिक असमानता’, ‘देश के निर्माता’ तथा ‘सक्षम महिला-एक पहल’ ‘अपनी मातृभाषा’ जैसे शीर्षक कथा-रचना की जगह आलेख होने का भ्रम पैदा करते हैं। इन्हें लघुकथा के लिए उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। जहाँ तक संभव हो लघुकथाकार को ऐसे शीर्षक से बचना चाहिए।
शीर्षक कथ्य को उजागर न करता हो
केवल वही लघुकथा पाठक को बाँधकर रख सकती है, जो उसे साहित्यिक आनंद प्रदान करे। जो उसके मन में रचना को आगे पढ़ने के लिए उत्सुकता पैदा करे। प्रत्येक पंक्ति को पढ़ने के पश्चात—‘आगे क्या होगा?’ जानने की जिज्ञासा बनी रहनी चाहिए। अगर रचना का समापन बिंदु अथवा कथ्य शीर्षक से ही उजागर हो जाए तो रचना में पाठक की दिलचस्पी का कम हो जाना स्वाभाविक है। पाठक ऐसी रचना को पढ़ना पसंद नहीं करता। अगर पाठक ऐसी रचना को पढ़ता भी है तो भी उसकी साहित्यक भूख की तृप्ति नहीं हो पाती। श्रेष्ठ लेखक वही है, जिसकी रचना का शीर्षक पढ़ते ही पाठक जिसे अपनी उँगली पकड़ाए और अंत तक अपनी उँगली छुड़ाने का प्रयास न करे। भाव यह है कि न केवल पाठक उस रचना को अंत तक पढ़े; बल्कि लेखक की अगली रचना पढ़ने को भी उत्सुक रहे। ‘मिलने का ढंग’, ‘मेज के नीचे से’, ‘खेत को खाती बाड़’ पहले से ही प्रशानिक भ्रष्टाचार की ओर संकेत कर देते हैं। ‘ढोल की खुली पोल’, ‘चोर की दाढी में तिनका’, ‘बच्चे पैदा करने वाली मशीन’, ‘पर-पीड़ा में सुख’, ‘इश्क न पूछे जात’, ‘दूसरी फिल्म’, ‘अमीर गरीब का फर्क’, ‘तजुर्बा बनाम डिग्री’ तथा ‘कथनी-करनी’, ‘हिसाब बराबर’, जैसे शीर्षक रचना के कथ्य को पहले ही उजागर कर देते हैं। ऐसी रचनाओं को पढ़ने के प्रति पाठक की जिज्ञिसा समाप्त हो जाती है।
शीर्षक अस्पष्ट न हो
अकसर नए लेखक व कुछ प्रबुद्ध रचनाकार भी लघुकथा को शीर्षक देते समय बहुत सोच-विचार नहीं करते। वे अकसर रचना में बार-बार प्रयोग किए गए शब्द का ही शीर्षक के रूप में प्रयोग कर लेते है या फिर रचना के अंत अथवा वाक्य में प्रयुक्त किसी विशेष शब्द अथवा वाक्यांश को ही शीर्षक का रूप दे देते हैं। कई बार ऐसे शीर्षक बहुत ही अजब व अस्पष्ट बनकर रह जाते हैं। ‘इज्जत मुफ्त मिलेगी’, ‘लव यू बोले तो’, ‘आपका स्वागत है’, ‘पढ़ा, पढ़ा, भला तुम क्या पढ़ोगे?’, ‘तुम मेरे क्या लगते हो?’, ‘जा तू चली जा’, ‘ऐसे ही खामखाह’, ‘कह देंगे’, ‘मैं नहीं जाती’, ‘तुम गुस्सा तो नहीं करोगी?’ जैसे शीर्षक अस्पष्ट व अर्थहीन बनकर रह जाते हैं। पाठक इनसे कुछ नहीं समझ पाता। शीर्षक का चुनाव करने से पहले कथ्य व उसके द्वारा संचारित संदेश को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। शीर्षक संपूर्ण रचना का प्रतिनिधित्व करता हुआ दिखाई देना चाहिए।
शीर्षक रचना को अर्थ प्रदान करता हो
लघुकथा का शीर्षक अर्थ-भरपूर होना चाहिए, न कि कोई व्यर्थ शब्द। उसी शीर्षक को उत्तम शीर्षक कहा जा सकता है, जो रचना को अर्थ प्रदान करता हो तथा अगर शीर्षक को हटा दिया जाए अथवा बदल दिया जाए, तो रचना पर गहरा प्रभाव पड़े अथवा उसके अर्थ ही बदल जाएँ। रचना पढ़ने के पश्चात् उसको समझने के लिए पाठक को पुनः उसका शीर्षक पढ़ना पड़े, उसे मैं श्रेष्ठ शीर्षक मानता हूँ। ऐसे शीर्षक ही सही अर्थों में लघुकथा का भाग बनते हैं। उदाहरण के लिए डॉ. पूनम गुप्त की लघुकथा ‘डर’ को लिया जा सकता है।
रमेश की मौसी के घर जागरण था। परिवार का जागरण में शामिल होना जरूरी था। रमेश की पत्नी सुनीता जागरण में जाने से कतरा रही थी।
”मैं काकू को लेकर घर पर ही रह जाती हूँ।” उसने रमेश से कहा।
”क्यो?”
“पिछली बार स्पीकरों के शोर-शराबे में काकू ने रो-रोकर बुरा हाल कर लिया था।”
“तुम रात को अकेली कैसे रहोगी, डर नहीं लगेगा ?”
“डर कैसा! अपना घर है।” सुनीता के जवाब में बहुत हौसला था।
”अच्छा ठीक है’’- कहकर रमेश माता-पिता के कमरे की ओर बढ़ा।
“आप, अभी तक तैयार नहीं हुए? छह बज गए…हम सात बजे भी चले, तो नौ बजे से पहले नहीं पहुँच पाएँगे।”
रमेश की बात सुन उसकी माँ तो तैयार होने लग गई, लेकिन पिता नहीं उठे। रमेश के दोबारा कहने पर मरियल-सी आवाज में बोले, “मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं…तुम लोग जा आओ।”
“अभी तो आप चंगे-भले थे। सबसे पहले जाने को तैयार थे, अब अचानक क्या हो गया?” रमेश हैरान था।
“नहीं मैं घर पर ही रुकता हूँ। साथ में सुनीता भी घर में अकेली नहीं रहेगी,” कहकर उन्होंने रमेश के पास खड़ी सुनीता की ओर देखा।
ससुर की बात सुन सुनीता अपने कमरे की तरफ चल दी। कुछ ही देर में वह काकू के साथ जाने को तैयार खड़ी थी।
“क्या बात अब तू इतनी जल्दी जाने को तैयार भी हो गई? अब नहीं डर लगेगा काकू को?”
“मैंने सोचा, ऐसे कब तक चलेगा…आखिर काकू के मन से डर तो निकालना ही पड़ेगा।”
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शीर्षक के बिना इस रचना के अर्थ बहुत स्पष्ट नहीं हैं; लेकिन जब लेखिका ने इसको शीर्षक ‘डर’ दिया तो अर्थ स्पष्ट हो गए और यह भी कि वास्तविक डर कौन-सा है। एक और रचना ‘सतयुग की कथा’ पर विचार करते हैं:
गाँव के बुज़ुर्ग साहूकार की जवान व अति सुन्दर पत्नी बेला व गँगू झीवर के नौजवान पुत्र सरजू को प्रेमरोग ने जकड़ लिया था। इस रोग ने उनके साथ-साथ साहूकार व गाँव की सेहत को भी प्रभावित किया। अपने सभी इलाज बेअसर होते देख साहूकार मामला पंचों के पास ले गया।
पंचायत जुड़ी। सारे मामले पर खुलकर विचार हुआ। पंचायत ने इस केस में चार लोगों को दोषी ठहराया– गँगू व उसका पुत्र सरजू, बेला व उसका बाप जंगी। गँगू का दोष था कि वह अपने बेटे को इस नाजायज काम से रोकने में असफल रहा। बेला के पिता जंगी को इसलिए कसूरवार ठहराया गया कि उसने अपनी बदचलन बेटी का रिश्ता गाँव के शरीफ व सम्मानित व्यक्ति से कर उसकी बदनामी करवाई। बेला व सरजू तो नाजायज संबंधों के दोषी थे ही।
गँगू व जंगी तो सरपंच तथा साहूकार के पाँवों में गिर गए और अपने आँसुओं से उनके पाँव धो दिए। उनकी रहम की अपील स्वीकार कर, सरपंच ने उन्हें केवल जुर्माना ही किया। जुर्माना अदा करने हेतु दोनों गरीब आदमियों ने सरपंच की बेगार करना स्वीकार कर लिया। बेला व सरजू अड़े रहे। गाँव के सभी धर्मी लोगों का विचार था कि अगर नाजायज संबंधों के दोषी गाँव में रहे, तो गाँव पर कोई भी कहर टूट सकता है; इसलिए उन दोनों को मारपीट कर गाँव से बाहर निकाल दिया गया।
अपमानित प्रेमी जोड़ा दूर किसी और परदेस में चला गया।
कुछ दिन बाद ही गाँव में भयंकर भूकंप आया और सारा गाँव तबाह हो गया। बस झोंपड़ियों में रह रहे कुछ लोग ही जीवित बचे।
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इस लघुकथा का शीर्षक अगर ‘कलियुग की कथा’ कर दिया जाए तो लेखक द्वारा दिया जाने वाला संदेश पूरी तरह बदल जाएगा।
अंत में यही कहूँगा कि रचनाकारों को लघुकथा के शीर्षक की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। शीर्षक को कभी भी महत्त्वहीन नहीं समझा जाना चाहिए। इस विषय में और विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
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