जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा लेखन और रचनात्मकता-2     Posted: April 1, 2024

प्रेम, प्रणय, अनुराग, स्नेह  आदि बहुत सारे शब्द हैं, जो हमारे अन्तर्मन की विशद व्याख्या करते हैं। ‘प्रेम’ वास्तव में वह शब्द है, जिसकी कितनी भी व्याख्या क्यों न की जाए, फिर भी अधूरी है। यह जीवन की वह लच्छी है, जिसे जितना सुलझाया जाए, उतनी उलझती है। जितने नाम दिए  जाएँ, सब कम पड़ जाते हैं; लेकिन यह ‘प्रेम’ किसी बन्धन में नहीं बँधता। बाह्य प्रदर्शन या हाव, प्रेम का लक्षण हो सकता है, प्रेम का भाव नहीं। प्रेम जीवन की आन्तरिक ऊष्मा है। एक ओर यह जीवन की उद्दाम जिजीविषा है, तो साधारण स्तर पर कहें, तो यह जीवन का वह सूक्ष्म सूत्र है, जो मानवीय  सम्बन्धों को जोड़ने की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इसे केवल अनुभव किया जा सकता है। जब आन्तरिक ऊष्मा  का ह्रास होता है, तो संवेदनहीनता बढ़ती है, जिसका समापन संवादहीनता में होता है। हृदय की निर्मलता को आँकनेवाला कोई यन्त्र नहीं होता है, लेकिन प्रतिक्रिया का बैरोमीटर प्रत्यक्ष रूप से भाव की चुगली कर देता है। एक बात और है, वह यह  कि प्रतिरोध, घृणा, प्रहार, उपेक्षा, लांछित करके बलात्  दुर्ग जीते जा सकते हैं, किसी का प्रेम नहीं जीता जा सकता है। प्रेम दूसरे पर अधिकार जताकर उसको जीतता नहीं; बल्कि समर्पित होकर स्वतः उसका हो जाता है। बलात् एक तरफ़ा प्रेम करने वाले, किसी पर तेज़ाब फेंककर या शारीरिक आघात करके प्रेम नहीं पा सकते।

प्यार को कोई नाम नहीं दिया जा सकता। यह गहन अनुभूति है, जिसे किसी सम्बन्ध या परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता है। यह नाम से परे है, केवल अनुभवजन्य है। प्रेम में कोई अवस्था निर्धारित नहीं होती। किसी पात्र को मानव, वनस्पति, पशु-पक्षी  में वर्गीकृत करना भी आवश्यक नहीं। मानव में भी भाई, बहन, प्रेयसी, पत्नी, पुत्र-पुत्री का विभाजन भी सही नहीं। यदि प्रेम है, तो समर्पण -भाव होगा ही, यदि प्रेम नहीं है, तो ये भी एक -दूसरे के खून के प्यासे हो सकते हैं। धन-सम्पत्ति को लेकर इनके लाखों मुकदमें लड़े जा रहे हैं। कोई भी सम्बन्ध क्यों न हो, जो तलवार और ढाल की तरह मिलते हैं, वे प्रेम नहीं कर सकते और न किसी सम्बन्ध का निर्वाह कर सकते हैं। तुलसी ने ऐसे लोगों के लिए सुन्दरकाण्ड में विभीषण के माध्यम से कहा है- बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
पति-पत्नी के सम्बन्धों में प्रेम के लिए दक्ष स्मृति में कहा गया है कि जहाँ पति-पत्नी की अनुकूलता है, वहीं स्वर्ग है। जहाँ प्रतिकूलता रहती है,वहाँ नरक ही है। सही कहा जाए , तो आपस का  सच्चा प्रेम तो स्वर्ग में भी दुर्लभ है।

अनुकूल कलत्रोय-स्तस्य स्वर्ग इहैव हि।

प्रतिकूलकलत्रस्य नरको नात्र संशय ॥

स्वर्गेऽपि दुर्लभं ह्योतदनुरागः परस्परम् ।
            प्रेम को केन्द्र में रखकर बहुत कम लघुकथाएँ लिखी गई हैं। सम्भवतः इसका कारण यही है कि लघुकथा की मूल प्रवृत्ति विरोध-केन्द्रित है। स्वयं को छोड़कर  अधिकतम का विरोध करना। यहाँ मैं 1-पाठ / सुकेश साहनी,  2-चकोर / रचना श्रीवास्तव, 3-कैमिकल लोचा/ सविता पाण्डे, 4 आधे किवाड़ का पूरा जीवन/ चैतन्य त्रिवेदी   का उदाहरण देना चाहूँगा।

‘पाठ / सुकेश साहनी’ में फिज़िक्स की ट्यूशन पढ़ने वाली पाखी का प्रसंग आता है, जिसके पापा एक हादसे में गुज़र गए। इस प्रेम कथा का आरम्भ बहुत शालीनता से हुआ है, जिसका पहला कारण था, ट्यूशन के समय पाखी की माँ का अकारण आसपास न मँडराना ।

पाखी को उसके घर जाकर फिज़िक्स की ट्यूशन पढ़ाते मुझे एक साल और पाँच महीने हो गए थे। पंद्रह-सोलह वर्षीया खूबसूरत, मासूम-सी पाखी बहुत ही मेधावी थी। उसके पापा बचपन में ही एक हादसे में गुज़र गए थे। तब से उसकी मम्मी का तो जैसे एक ही लक्ष्य था-अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाना। पाखी की माँ दूसरों से अलग थी, एक तो मेरा बहुत सम्मान करती थीं, दूसरे ट्यूशन के समय बेमतलब आस-पास मँडराती नहीं थीं।

पिछले कुछ दिनों से मैं पाखी में कुछ बदलाव महसूस कर रहा था, ‘जब मेरा ध्यान किताब में होता, तो वह अपलक मेरी ओर देखने लगती, “सर, आपकी शादी हो गई?” पूछना, “सर! आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।” पाखी का  शरारत से मुस्कराते हुए कई बार पलकें झपकाना। “पाखी! पढाई में कंसन्ट्रेट करो” कहने के बाद भी-“सर! आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। ”  -इस मधुर कथन का दिमाग़ से न निकलना, परेशान कर रहा था। एक दिन मैं ट्यूशन देने पहुँचा, तो वह मुझे बहुत गंभीर लगी। उसकी माँ  बाजार गईं थी। उसे मुझसे अपने मन की बात करनी है, जो ममा के सामने नहीं कर पाएगी।

एक दिन मेरा दाहिना हाथ पकड़ लिया और मुझे अपने कमरे की ओर खींचकर ले जाने लगी। पाखी की  यह चेष्टा और

किशोरावस्था का यह अनुराग या आकर्षण एक बारगी पाठक को चलताऊ चिन्तन की ओर जाता हुआ लगता है। कोई अन्य लेखक होता, तो इसे मादक स्पर्श या अलिंगन के खाँचे में रखकर  यहीं कथा का समापन कर देता।

यहीं से लेखक रचनात्मकता की ओर बढ़ता है। अगले ही क्षण हम आदमकद आईने के सामने थे। “वह आगे थी, उसके पीछे मैं था। मेरा दाहिना हाथ अभी भी उसके हाथ में था। अब वह एकटक मेरी आँखों में झाँक रही थी। मेरे देखते ही देखते उसकी ऑंखें डब-डब करने लगीं।”

निम्नलिखित संवाद एक झटका देता है, जिससे सहृदय पाठक चौंकता और चिहुँकता है-

वह रुँधी हुई आवाज़ में बोली, “सर,आइ लव यू !!”

उसके हाथ में मेरा हाथ थरथरा गया। ध्यान देने की बात है कि  थरथराने वाल हाथ  युवा शिक्षक का  है, पाखी का नहीं; कथा अपनी चरम सीमा पर है। पाठक का रोम रोम कान बनकर सुनने को आतुर है। वह अपनी बात को पूरा करके अन्तर्द्वन्द्व से उबरने का प्रयास करती है-

 “इस जन्म में मुझे डैडी का प्यार नहीं मिला। मैं चाहती हूँ, अगले जन्म में मुझे आप जैसे डैड मिलें!!” -डब-डब करती आँखों से आँसू बह निकले।

यही वे पंक्तियाँ हैं, जो एक -एक सोपान तय करके, अन्तर्मन का माधुर्य छलका देने को आतुर हैं। इतना कहकर उसने सब कुछ कह दिया।

अब इन दो वाक्यों को देखिए-1-कहकर वह आईने के फ्रेम से बाहर हो गई। फ़्रेम से बाहर होना निष्पाप , निर्मल हृदय का, निर्द्वन्द्व होने का  और निश्छल प्रेम का उदाहरण है।

2-‘कमरे में मैं अकेला खड़ा था, पर अब आईना मुझे देखे जा रहा था।’ शिक्षक उस अप्रत्याशित एवं भाव-विभोर करने वाले ‘कथन’ से बाहर नहीं निकल पाया। वह मोहाविष्ट -सा खड़ा रह गया। अब उसे आईना देख रहा था कि विज्ञान पढ़ाने वाले समर्थ शिक्षक! अब किशोर मनोविज्ञान को समझो और उसे वह प्रेम देने का प्रयास करो, जिसकी उसके जीवन में कमी है। कैशोर्यावस्था के प्रेम को अभिव्यक्त करती यह बेजोड़ लघुकथा है, जो सार्थक कथ्य और  निहित उद्देश्य का पूर्णतया निर्वहन करती है, वह भी पूरी सहजता से। शिक्षकों को सचेत करने के लिए यह कथा किसी पाठ से कम नहीं। केवल छात्रों को ही पाठ नहीं पढ़ना पड़ता, कभी- कभी शिक्षकों को भी पाठ पढ़ने की आवश्यकता होती है। ‘अब आईना मुझे देखे जा रहा था।’  का समापन वाच्यार्थ पर न होकर व्यंग्यार्थ पर हो रहा है। ‘आईने का मुझे देखना’ पाठ शीर्षक को सार्थक करता है। दोनों पात्र परिचित हैं, अतः इसे साहचर्यजन्य प्रेम की श्रेणी में रखा जाएगा।

रचना श्रीवास्तव की लघुकथा ‘चकोर’अलग तरह की प्रेम कथा है, एक तरफ़ा प्रेम की। इसमें परिचय या साहचर्य भी नहीं।चार बजते ही उस घर की बालकनी में दूधिया से रंग की एक नाज़ुक सी लड़की आती, कभी अपने बाल सुखाती, कभी वहाँ  के गमलों में पानी देती और कभी अरगनी पर कपडे फैलाती।’ एक लड़का ठीक उसी समय आता और पेड़ के नीचे खड़ा होता और उस लड़की को निहारता। उसे लुभाने का प्रयास भी करता। उसके इस आकर्षण को उसके मित्र भी जान गए और वे भी उसके साथ आने लगे और उसे प्रेरित करने लगे। एक दिन वह फ़ाटक खोलकर  इमारत में आ गया। उसने देखा कि अलगनी टूटकर नीचे गिर गई है। इस सबसे अनजान लड़की, नित्य प्रति के अभ्यास के कारण  डोरी को टटोल रही है। लड़का हतप्रभ। डर के कारण डोरी को नहीं बाँध सका। भरपूर दृष्टि से उसको देखकर उदास मन से वापस आ गया। उदास मन से लड़के ने प्रकट रूप  में दोस्तों को सुनाकर  निर्णय लिया-, “पास से देखने पर मुझे लड़की बिल्कुल नहीं जमी, बेमतलब समय ख़राब किया। अब कभी यहाँ नहीं आना है, चलो चलते हैं।”

 सभी वहाँ से चले गए। उस लड़के ने जो कहा, वह सत्य नहीं था। वह अपने गहन और उदासी से सिंचित प्रेम को किसी से साझा नहीं करना चाहता था। प्रेम हृदय की भीतरी तहों में छुपा होता है। वह किसी से साझा किया भी नहीं जा सकता। लड़की नहीं जानती कि उसे कोई प्रेम करता है। लघुकथा का शीर्षक इस कथा के सारे सूत्र खोल देता है। एक पुराना गीत अनायास याद आ गया-‘चाँद को क्या मालूम चाहता है  उसे कोई चकोर’। लड़की  नेत्रहीन है और लड़के की किसी गतिविधि से अवगत नहीं  है। चाँद भी क्या जाने कि कोई चकोर उसे एकटक निहार रहा है।

‘अब कभी यहाँ नहीं आना है’ क्या यह कथन सत्य है? कदापि नहीं। चकोर लघुकथा की ऊँचाई, इसकी रचनात्मकता और औदात्य  इस अन्तिम वाक्य में सामने आते हैं-

 ख़ास बात यह कि वह लड़की अभी भी रोज़ाना चार बजे बालकनी में आकर अपने रोज़ के काम करती है और वह लड़का भी प्रतिदिन पेड़ के नीचे खड़े होकर चुपचाप उसको निहारता रहता है….

 रचना श्रीवास्तव ने बहुत कम लघुकथाएँ लिखी हैं। इनका कोई लघुकथा -संग्रह तो आया ही नहीं। ‘प्रेम’ विषय पर केन्द्रित यह लघुकथा अपनी मार्मिक प्रस्तुति, मँजे हुए शिल्प के कारण अभिनन्दनीय है।

सविता पाण्डे की लघुकथा -कैमिकल लोचा, दाम्पत्य सम्बन्धों की अनोखी लघुकथा है। अगर पति-पत्नी में गहरा प्रेम रहा है, तो किसी अहमन्यता के  कारण या और बेहतर जीवन की तृष्णा में अलगाव होने पर भी, वह पूरी तरह मिट नहीं जाता। कुछ आधे अधूरे क्षण बचे रहते हैं। अलगाव के बाद भी उन क्षणों का अभाव सालता है। अलगाव हो गया, लेकिन प्रेम की   नम्यता और लचक नष्ट नहीं हुए। चम्पा ने भोलेराम के साथ बसा- बसाया घर छोड़कर किसी और को अपना लिया। एक ही कपड़े में चली गई। बच्चों की भी चिन्ता नहीं की। भावहीन हुए भोलेराम ने न उस पर क्रोध किया और न उसके लिए फ़रार या फ़ुर्र होने जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया। वह हर शाम रिक्शा चला लेने के बाद दूर से चम्पा की गृहस्थी को  निहार लेता। लगातार कई दिनों से एक ही साड़ी पहने चंपा को देखा तो कपड़ों की कमी का एहसास हुआ। एक दिन चंपा के सारे कपड़े बाँध उसके नए घर पहुँच गया।  “हर रोज एक ही साड़ी मत पहना करो।”-कथन में भोलेराम की पीड़ा ही नहीं, उसका प्रेम भी बोल रहा है। चम्पा ने उसको  जल्दी वापस जाने को कहा।

अन्तिम पंक्ति में लेखिका ने जो कहा है, वह इस लघुकथा का प्राण तत्त्व है। भोलेराम का छुपकर भागना, वह भी नए प्रेमी की तरह-

भोलेराम ने चंपा को उसकी साड़ियों की पोटली थमाई और यूँ छुपकर निकल भागा जैसे उसका कोई नया प्रेमी हो!’

यह प्रेम की विवशता है कि पूर्व पति उसे एक ही साड़ी में नहीं देख सकता। छुपकर उसके पास जाने का अर्थ है, अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया। इस लघुकथा में प्रेम का एक अलग ही कोण है। यह लेखिका का सामर्थ्य ही है कि अछूते विषय के विरल– से सूत्र को थामकर भोले राम के ऊर्ध्वगामी  दाम्पत्य प्रेम को मार्मिक स्वरूप प्रदान किया है।

मानव मन का संसार बहुत व्यापक है। उसमें कितनी ही तरंगें उठती हैं। उन सबका विश्लेषण बहुत जटिल है। प्रेम तो स्वयं में बहुत तुनकमिज़ाज होता है। न जाने कितनी पर्तों में दबा-छुपा  रहता है। हम स्वयं को भी नहीं समझ पाते, दूसरों को क्या समझेंगे!

वेद, उपनिषद् एव स्मृति-ग्रन्थों  में नारी के महत्त्व का विशद् वर्णन ही नहीं, स्थापना भी है। पाराशर स्मृति में कहा गया है कि एक पहिए पर रथ नहीं चल सकता, एक पंख से पक्षी नहीं उड़ सकता, उसी प्रकार बिना पत्नी के पुरुष भी सब कार्यों में अयोग्य और अधूरा है। चाणक्य नीति  में तो यहाँ तक कह दिया गया है कि जिसके घर में न माता हो और न स्त्री प्रियवादिनी हो, उसे वन में चले जाना चाहिए; क्योंकि उसके लिए घर और वन दोनों समान हैं-

माता यस्ये गृहे नास्ति, भार्या चाप्रियवादिनी।

अरण्य तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम्।

नारी को सम्मान दिए बिना सच्चा प्यार नहीं पनप सकता। उसे  रूढ़ियों की आदर्श कहे जाने वाली बेड़ियों में जकड़ा जाएगा, तो परिवार के लिए वह अभिशाप हो जाएगा। दोनों में सामंजस्य और सन्तुलन आवश्यक है।

 चैतन्य त्रिवेदी  की लघुकथा ‘आधे किवाड़ का पूरा जीवन’ में असन्तुलन के उसी पक्ष पर चोट करते हैं, जहाँ नारी को उपेक्षित किया जाता है। उसे हाड़-मांस का एक पुतला मान लिया जाता है।  उसकी कोमल भावनाओं की उपेक्षा की जाती है। कथा की इन पंक्तियों को देखिए-

‘जब वह पहली पहली दफा आई थी, किवाड़ पूरा खुला था। फिर उस घर में जीना शुरू किया तो आधा किवाड़ ही खुला रहता। वह आधे किवाड़ का जीवन जीती रही। उस आधे किवाड़ में अधूरी नजर से पूरा जीवन जी लिया उसने। सारे बसंत हँस लिये। उस घर के आधे किवाड़ के पीछे सारे सावन भिगो दिए।

जब आई,पूरा किवाड़ खुला था। घर में जीना शुरू किया तो आधा किवाड़ ही खुला रहता। इन विषम परिस्थितियों में उसने अधूरी नज़र से पूरा जीवन जिया। ( जो पूरा जीवन जिया, वह भी अधूरा ही होगा )

इन पंक्तियों में बसन्त का हँसना और आधे किवाड़ के पीछे सारे सावन भिगो देना उस नारी के जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना रही। उसने खुलकर जीवन जिया ही कहाँ। सब तो अधूरा ही था।  परम्पराओं की बेड़ियों  में जकड़ी वह इच्छा होने पर भी वह पूरा जीवन न जी सकी।

 ‘गुजरती बारातें, नाच-गाने सब कुछ आ किवाड़ से देखती रह जाती।’ से उसका दर्द छलकता है, छलककर बाहर नहीं आ पाता। एक बन्द सन्दूक में ढल जाना,  उसके रूढ़िग्रस्त जीवन की पराकाष्ठा थी। किसी भी व्यवस्था का यह विद्रूप, विरोध और प्रतिकार को जन्म देता है। आहत और लाचार होकर वह जिस पूरे खुले किवाड़ से भीतर आई थी, उसे पूरा खुला छोड़कर चली गई।  दुर्भाग्य की बात यह है कि उम्रदार बुज़ुर्ग  फिर उन्हीं रूढ़ियों का यह कहकर पोषण कर रही हैं“मजाल है कभी वह पूरे किवाड़ खोल बाहर आई हो!”  उन्हें उस बेचारी के हारे-थके हाथों  से किवाड़ों का सहारा लेना, टूटे घर को निहारने की व्यथा  का सहन करने का एहसास कभी हुआ ही नहीं।

चैतन्य त्रिवेदी ने अपनी विशिष्ट शैली में ‘आधे किवाड़ का पूरा जीवन’ जिस प्रकार बेपर्द किया है, वह किसी भी नारी की गहन पीड़ा का भावार्थ बन गया है। अन्तिम पंक्ति तक पहुँचते-पहुँचते यह लघुकथा अपनी  रचनात्मकता और भाषा कौशल के से पाठक के मन को भाव प्रवण कर जाती है।

संघर्ष व्यक्ति को बुरी तरह  तोड़ देता है। जिसका जीवन दुःखों और संघर्षों से भरा है, उसके लिए अकस्मात् आया सुख भी दुःख जैसा ही चौंकाने वाला होता है। गरीबी और भूख से जूझने वाली माँ – और बेटी अंजलि की संघर्ष कथा को प्रस्तुत करने वाली  हरभगवान चावला  की ‘थाप’ लघुकथा में यही कटु सत्य उजागर होता  है। माँ को विधवा पेंशन मिलती, तो बेटी उसके साथ किसी के खेत में कपास चुगने जाती, किसी के यहाँ बर्तन माँज  देती। गोबर बटोरकर  उपले बनाती और बेचती। है। विषम परिस्थितियों में भी बेटी पूरी तन्मयता से परिश्रमपूर्वक पढ़ाई करती रही।

मोबाइल पर माँ को उसके सब इंस्पेक्टर पुलिस  के चयन की सूचना बेटी के मित्र दीपक ने दी थी। माँ न कुछ समझ पाई। विश्वास न करके चारपाई पर गिर गई। बेटी के हिलाने-डुलाने पर फोन की ओर इशारा किया। दीपक से बात करने पर अंजलि को पूरी सूचना मिली।

जिसने जीवन में सदा अशुभ ही सुना हो, कभी कुछ भी अच्छा न  सुना हो, तो उसको  इतनी अच्छी खबर झटका ही देगी। थाप कहानी में जीवन के गहन संघर्ष से उपजी खुशी भी, उसे किस प्रकार विचलित कर देती है! इस लघुकथा की अन्तिम पंक्ति ‘‘ढोल के शीर्ण पर्दे पर ज़ोरदार थाप पड़ेगी तो पर्दा फटे भले ही न, उखड़कर गिर तो ज़रूर जाएगा।” कथा के प्रभाव को और अधिक बढ़ा देती है। कथा के सभी संवाद परस्पर अनुस्यूत होकर कथा-प्रवाह को और भी तीव्र और सम्प्रेष्य बना देते हैं।

अंजू खरबन्दा की लघुकथा ‘अपराजितापरिवार के औपचारिक सम्बन्धों की आड़ में छल-छद्म से विरूपित चेहरों की पहचान  कराती है। पति की मृत्यु के बाद संयुक्त परिवारों में निराश्रित पत्नी को झूठे दिलासे देकर सम्पत्ति पर काबिज़ होने के सारे प्रयास किए जाते हैं। सम्बन्धों की बिसात पर शतरंजी चालें चलकर असहाय को और अधिक दीन-हीन करने के प्रयास किए जाते हैं। धूर्त्तता में पारंगत अधिकतर लोग इसमें सफल रहते हैं। दुनियादारी से अनजान उमा पिछले  तीन महीनों से संयुक्त परिवार के कुचक्र में फँसती जा रही थी। एक बेटी ब्याही जा चुकी थी। एक और विवाह योग्य थी।

जब जेठ ने मकान के पेपर हस्ताक्षर करने के लिए उमा के सामने रखे और कहा, तो  वह कुटिल मुस्कान के पीछे छुपे षड्यन्त्र को ताड़ गई। उमा ने दामाद को पेपर दिखाने की बात की, तो जेठ भड़क गए। वह सारा खेल समझ गई

“अपना घर, कारोबार सब आपके नाम करके मैं आश्रित नहीं बनना चाहती जेठ जी… और हाँ मुझे ऐसे किसी सहारे की कोई आवश्यकता नहीं, जो मुझे ही बेसहारा बना दे।”- कहते हुए उमा ने वे कागज टुकड़े-टुकड़े कर डस्टबिन में डाल दिए।

असहाय स्त्री प्रायः ऐसे अवसर आने पर घर के लोगों पर विश्वास करके छल का शिकार होकर पूरा भविष्य अन्धकारग्रस्त कर लेती है, लेकिन उमा ने प्रतिरोध का मार्ग अपनाकर अपना बचाव कर लिया।

कभी न कभी प्रत्येक व्यक्ति को एकाकीपन एक अलग दिशा की ओर ले जाता है। यह पूरा जीवन एक रंगमंच है, जिस पर आकर हम सब अभिनय करते हैं। सामाजिक परिवेश में मनुष्य का व्यवहार परिस्थिति, पात्र, समय एवं  मनःस्थिति के अनुसार बदलता रहता है। नेपथ्य में बहुत कुछ घटित होता रहता है, जो प्रकटतः दृष्टिगोचर नहीं होता है। समुद्र में जो हिमशैल ऊपर दिखाई देता है, वह केवल उतना  ही नहीं होता है। समुद्र के भीतर, बहुत गहरे तक उसकी पैठ  होती है। जो यह नहीं समझते , वे उससे टकराकर खण्डित हो सकते हैं।  सीमा पर तैनात सैनिक शौर्य का स्वरूप होता है, लेकिन कुछ पल ऐसे होते हैं, जिसमें उसको किसी की निकटता चाहिए, भावात्मक स्पर्श, शब्दों की थपकी, माथे पर किसी की ऊष्मित छुअन। वह  भी अपने घर पर पत्नी, बच्चों को छोड़कर मोर्चे पर आया है। भले ही मोबाइल फोन जैसे संसाधन हों,  फिर भी वह अपने परिवार से स्वेछया सम्पर्क नहीं कर सकता। कभी-कभी किसी अभियान विशेष के कारण दीर्घ अवधि तक उसका पारिवारिक संवाद भी नहीं हो पाता। उसकी यह स्थिति, उसके जीवन की दुश्चिन्ता, पत्नी और बच्चों को भी मानसिक रूप से प्रभावित करती है। आराम का जीवन जीने वाला  सामान्य नागरिक उनकी पीड़ा को नहीं समझ सकता। कुछ तो उनको लांछित करने के लिए  निर्मम प्रवचन करके अपना मानसिक दिवालियापन तक प्रकट कर देते हैं।

 अनीता सैनी ‘दीप्ति’ की लघुकथा नेपथ्य में वही मनोवैज्ञानिक प्रभाव व्यंजित होता है।  दिनभर  घर-परिवार के कार्यों में व्यस्त और जूझते हुए, उसे कुछ सोचने-विचारने का समय नहीं मिलता होगा। रात के एकान्त में  जिस मानसिक थकान और एकाकीपन से उसका सामना होता है, उसे भी कोई ऐसा मधुर स्पर्श नहीं मिल पाता, जिससे वह सारी थकान भूल जाए। लेखिका ने आर्मी हॉस्पिटल के साइकेट्रिस्ट डॉक्टर के पास पहुँची  महिला के माध्यम से अपनी अनुभूतियों को उजागर किया है। महिला का यह कहना-‘‘पिछले कुछ समय से मेरे बालों की सफ़ेदी बढ़ती जा रही  है। जीवन में कोई समस्या नहीं। मन शांत है, फिर भी…?”  यह ‘फिर भी…?’ का  पद हिमशैल-सी गहराई के साथ बहुत कुछ छुपाए हुए है

 डॉक्टर उससे दिनचर्या के अलावा उसकी मानसिक डाइट प्लान पूछता है , तो वह अनभिज्ञता के कारण अचकचा जाती  है-“मानसिक डाइट प्लान ? ”  स्वतः मिलने वाला नहीं, बल्कि  जो फ़ालो किया जाता है वह डाइट प्लान। डॉक्टर स्पष्ट करता है- यहाँ! सैनिकों से मानसिक डाइट प्लान फॉलो करवाए जाते हैं। वहीं मैं समझ सकता हूँ, समाज में उनकी पत्नियों से उसका निर्वहन करवाया जाता है।”

सैनिक-पत्नी होने के कारण अनीता सैनी ने  नेपथ्य की व्यथा को गहनता से समझा है। ‘मानसिक डाइट प्लान’ का प्रत्यय  इस लघुकथा की धुरी है। लेखिका ने इस तथ्य से जुड़े कथ्य को अधिक विश्वसनीय बना दिया है।

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