विश्व साहित्य के इतिहास में लघुकथा का विस्तृत इतिहास है। भारतीय वाङ्मय में भी लघुकथा के सूत्र गहरे हैं।धर्म कथाओं ,प्रबोध कथाओं,जातक गाथाओं एवं लोक गाथाओं में लघुकथाओं का बाहुल्य है,हिंदी कथा साहित्य में भी लघुकथा प्रारम्भ से ही विद्यमान है। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लघुकथा पर गम्भीर विवेचना प्रारम्भ हुई और अनेक समीक्षकों ने इसे केंद्रीय विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने के गम्भीर प्रयास किए,इन प्रयासों के परिणामस्वरूप अनेक कथाकार इस विधा की ओर आकृष्ट हुए और उन्होंने लघुकथा लेखन प्रारम्भ किया।वर्तमान में अनेक लघुकथाकार सतत् सक्रिय रहकर इस विधा के भंडार को समृद्ध कर रहे है,लगभग प्रत्येक साहित्यिक पत्रिका लघुकथाएँ प्रकाशित कर रही हैं।
जैसा कि प्रत्येक विधा के साथ होता है वैसा लघुकथा के साथ भी हुआ,अनेक लेखक इसके लघुरूप पर आकृष्ट होकर लघुकथा लेखन में सक्रिय हो गए। वस्तुतः लघुकथा लेखन कृपाण धार पर चलने के समान है,एक अच्छे लघुकथाकार को अर्जुन की तरह लक्ष्य पर दृष्टि रखनी पड़ती है अन्यथा लघुकथा लक्ष्य से भटककर प्रभावहीन हो जाती है। लघुकथा न तो छोटी कहानी है और न केवल सतही बात या चुटकुला। यह एक गम्भीर विधा है, जिसकी मारक क्षमता अमोघ है। इसकी सम्पूर्ण संवेदना इसकी तीक्ष्ण व्यंजना में निहित है।
अपने लघु कलेवर के कारण इन्टरनेट और सोशल मीडिया पर भी लघुकथा तेजी से लोकप्रिय हुई तथा नई/पुरानी पीढ़ी के अनेक लेखक लघुकथा लेखन की ओर प्रवृत्त हुए फेसबुक पर अनेक समूह सक्रिय हैं। ब्लॉग और वेबसाइट के माध्यम से लघुकथाओं का प्रकाशन विशद रूप में हो रहा है, इनमे लघुकथा.कॉम शायद सबसे पुरानी वेब पत्रिका है ,लगभग एक दशक से इसका नियमित प्रकाशन हो रहा है तथा इसमें लघुकथा के प्रकाशन के साथ ही उसके विविध पक्षों पर गम्भीर चर्चाएँ भी हो रही हैं। निःसन्देह लघुकथा को लिखने और समझने वालों के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण वेब-पत्रिका है ।
.मेरे विचार से गद्य की समस्त विधाओं में लघुकथा लेखन सबसे कठिन है। एक लघुकथाकार को सजग होकर इसके शिल्प का निर्वाह करना चाहिए। लघुता के साथ ही शिल्प की कसावट, शब्द चयन और प्रभावी ढंग से अंत करने की कला लघुकथा की व्यञ्जना को महत्त्वपूर्ण बनाती है।
जहाँ तक मेरी पसंद की लघुकथाओं का प्रश्न है, उसमें अनेक लघुकथाएँ हैं, जो एकाधिक कारणों से मुझे पसंद है,किंतु चर्चा के लिए दो ही लघुकथाओं के चयन की सीमा है ,अतः यहाँ मैंने श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा ‘दूसरा सरोवर’ एवं डॉ.पूरन सिंह की लघुकथा ‘अधूरी पेंटिंग’ का चयन किया है।
श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी की अनेक लघुकथाओं के मध्य मैंने दूसरा सरोवर को सायास चुना है,यह कहानी अपनी बहुअर्थी व्यञ्जना और प्रतीकों के कारण चमत्कृत करती है,कथा के प्रतीक बहुत गहरे है।लघुकथा के केंद्र में एक सामान्य-सा गाँव है,ग्रामवासी कुछ दूर स्थित सरोवर से जल लाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। एक दिन अचानक उजले कपड़े पहने हुए एक व्यक्ति वहाँ आता है और प्रधान तथा ग्रामवासियों को अपने भाषण द्वारा यह विश्वास दिलाने में सफल हो जाता है कि वह जादू के द्वारा तालाब को गाँव के बीचोबीच ले आएगा,जिससे ग्रामवासियों का जीवन सुगम हो जाएगा। वह अपनी जादू की छड़ी भी ग्राम प्रधान को सौंप देता है। सरोवर के पास जाकर वह व्यक्ति उजले कपड़े उतार कर सरोवर में प्रवेश करता है। ग्राम प्रधान उसके द्वारा बतलाई गई उक्ति से उस पर जादू की छड़ी से प्रहार करता है ,तो व्यक्ति एक भयावह मगरमच्छ में तब्दील हो जाता है,प्रधान उसे पुनः छड़ी से मारता है ; किंतु वह मगरमच्छ व्यक्ति रूप में नहीं बदलता ।अब सरोवर पर मगरमच्छ का कब्जा हो जाता है और ग्रामवासियों को अपने लिए दूर दूसरे सरोवर की शरण लेनी पड़ती है।कथा इस एक पंक्ति के साथ समाप्त होती है-“आज वह मगरमच्छ जगह- जगह नंगा घूम रहा है।”
इस कथा को मैं जब भी पढ़ता हूँ ,हमेशा एक नया अर्थ ध्वनित होता है ।सामान्य रूप से यह राजनीतिक व्यवस्था के भ्रष्टाचार और शोषण की कथा प्रतीत होती है। उजले कपड़े वाला व्यक्ति नेता का प्रतीक है ,जो भोले भाले ग्रामीणों को भाषणों से ये विश्वास दिलाने में सफल होता है कि वह सुविधाओं को उनके द्वार तक ले आएगा ,इस प्रकार उन्हें बहलाकर वह स्वयं ही मगरमच्छ बनकर उनके संसाधन पर अधिकार जमा लेता है। बेचारे ग्रामीणों को अपनी आवश्यकता की पूर्ति हेतु नये संसाधन तलाशने होते है, जो पहले से अधिक दूरी पर होते है। आम जन की यही विडम्बना है ,जिसे वह अपने उद्धारक के रूप में देखता है ,वही भक्षक बन जाता है।
काम्बोज जी ने इस लघुकथा में अभिनव एवं सार्थक प्रतीकों का प्रयोग किया है,इन प्रतीकों को अनेक अर्थो में घटित किया जा सकता है।सरोवर संसाधनों का प्रतीक है,यह शान्ति एवं संतोष का प्रतीक भी हो सकता है,सबसे विलक्षण प्रतीक है जादू का डंडा।आखिर ये कौन-सा डण्डा है, जो उजले कपड़े वाला जादूगर मुखिया को सौंपता है?मगरमच्छ तो भयाक्रान्त करने वाले शोषक का प्रतीक है।लोकतंत्र में सत्ता कोई भी हो, एक शोषक वर्ग सदैव सक्रिय रहता है,कभी वह दलाल के रूप मे आता है,कभी नेता के रूप में। उसका भयानक मगरमच्छी रूप उजले कपड़ों के नीचे छिपा रहता है। वह जनता को मताधिकार या प्रलोभन रूपी जादू की छड़ी थमाकर उन्हें ठग लेता है और स्वयं जनता के संसाधनों पर अधिकार करके भयावह और असली रूप में आ जाता है। लघुकथा का अंतिम वाक्य-‘आज वह मगरमच्छ जगह जगह नंगा घूम रहा है’-में यही संकेत है।
किसी भी रचना का अभिप्रेत सदा वही नहीं होता ,जो लेखक अभिव्यक्त करना चाहता है,रचना के कुछ अर्थ समीक्षक या पाठक अपने अनुभव संसार से भी ग्रहण करते हैं; जो लेखक के सत्य से भिन्न भी हो सकते हैं। इस कथा का यही वैशिष्ट्य है कि इसके प्रतीकों से कई अर्थ निकलने लगते हैं। कथा में व्यक्त गाँव आज के गाँवों की तरह राजनीतिक प्रपंचो का गाँव नही है,ये उस दौर का गाँव है जब सरकारी पैसों का प्रवेश गाँवों में नही हुआ था।अब प्रधानों के चुनाव में लोकतंत्र के सारे दुर्गुण प्रवेश कर चुके हैं इस दृष्टि से अर्थ निकालने पर मगरमच्छ निर्लज्ज पूँजी के अर्थ में सामने आता है । राजनीतिज्ञ ग्राम विकास के नाम पर तमाम पूँजी गाँवों में ले आए, पर इसने गाँव की सहृदयता और शान्ति को उनसे दूर कर दिया। इतिहास के विकास-क्रम में कमोबेश यही कार्य बाजारवाद के विस्तार के साथ भी हो रहा है। बाज़ार मोहक और प्रवंचक रूप धारण करके हमारे मध्य आया और उसने निर्लज्ज होकर अपसंस्कृति का विस्तार किया तथा हमारी आत्मिक शांति को हमसे दूर कर दिया। कथा के प्रतीकों को हम बाज़ारवाद की इस विकृति पर भी घटित कर सकते है।
जिस दूसरी रचना का चयन मैंने किया है वह डॉ०पूरन सिंह की लघुकथा ‘अधूरी पेंटिंग’ है, यह एक भिन्न धरातल की लघुकथा है।अधूरी पेंटिंग में यथार्थ के महीन धागों को मनोविज्ञान के ताने बाने में बड़े ही कौशल से पिरोया गया है। एक बेटा अपनी वृद्धा माँ की तस्वीर बनाना चाहता है,फाइन आर्ट्स में स्नातक कर रहे बेटे की यह इच्छा स्वाभाविक भी है। माँ बहुत मुश्किल से पेंटिंग बनवाने को राजी होती है, उसके लिए लंबे समय बैठना कष्टसाध्य है ,पर बेटे की जिद जीत जाती है ।माँ पेंटिंग बनवा रही है,बेटा उसे विविध मुद्राओं में बैठने का निर्देश देता है।वह मानती जाती है,फिर भी बेटा सन्तुष्ट नहीं है ।उसकी अपेक्षा के अनुरूप भाव माँ के चेहरे पर नहीं आ पा रहे है अचानक बेटे को एक युक्ति सूझती है -वह माँ से कहता है कि दूर क्षितिज में ऐसे देखो मानो सपना देख रही हो। बेटे के यह कहते ही माँ की स्मृतियों में उसका अतीत,उसका हाहाकारी जीवन साकार होने लगता है..वह जीवन, जिसमें पीड़ा थी,दर्द था,कराहें थीं,गरीबी थी,अपमान था और स्त्री होने का अपराध था। माँ का धैर्य चुक जाता है उसके मुख से एक वाक्य निकलता है-“क्या पत्थर भी सपने देखते हैं” यहीं इस कथा की सारी संवेदना छुपी है ।सहज प्रवाह में बहती लघुकथा अचानक झटका देती है। यही अच्छी लघुकथा की विशेषता होती है वह अचानक ही पाठक को हतप्रभ कर देती है।
और ये पेंटिंग अधूरी ही रह जाती है। इस लघुकथा में माँ बेटे के स्नेह सम्बन्धों और उनके मनोविज्ञान का सुंदर निरूपण हुआ है,पर इसके साथ ही एक स्त्री की,एक निर्धन स्त्री के जीवन के कठोर यथार्थ और उससे प्रभावित होने वाले माँ के मनोविज्ञान का बड़ा सहज चित्रण हुआ है।अपनी सहजता,अपनी कसावट और शिल्प की दृष्टि से मुझे ये लघुकथा प्रभावित करती है।
दोनों लघुकथाओं की पसन्दगी के मेरे अपने तर्क है,सम्भव है अन्य पाठक इससे कुछ भिन्न दृष्टि भी रखते हों।
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लघुकथाएँ
1-दूसरा सरोवर- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
एक गाँव था। उसी के पास में था स्वच्छ जल का एक सरोवर। गाँव वाले उसी सरोवर का पानी पीते थे। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब खुशहाल थे।
एक बार उजले-उजले कपड़े पहनकर एक आदमी गाँव में आया। उसने सब लोगों को मुखिया की चौपाल में इकट्ठा करके बहुत अच्छा भाषण दिया। उसने कहा-‘‘सरोवर आपके गाँव में एक मील की दूरी पर है। आप लोगों को पानी लाने के लिए बहुत दिक्कत होती है। मैं जादू के बल पर सरोवर को आपके गाँव के बीच में ला सकता हूँ, जिसे विश्वास न हो वह मेरी परीक्षा ले सकता है। मैं चमत्कार के बल पर अपना रूप-परिवर्तन कर सकता हूँ। गाँव के मुखिया मेरे साथ चलें। मेरा चमत्कारी डण्डा इनके पास रहेगा। मैं सरोवर में उतरूँगा। ये मेरे चमत्कारी डण्डे को जैसे ही ज़मीन पर पटकेंगे मैं मगरमच्छ का रूप धारण कर लूँगा। उसके बाद फिर डण्डे को ज़मीन पर पटकेंगे, मैं फिर आदमी का रूप धारण कर लूँगा।’’
लोग उसकी बात मान गए। उजले कपड़े किनारे पर रखकर वह पानी में उतरा। मुखिया ने चमत्कारी डण्डा ज़मीन पर पटका। वह आदमी खौफनाक मगरमच्छ बनकर किनारे की ओर बढ़ा। डर से मुखिया के प्राण सूख गए। हिम्मत जुटाकर उसने फिर डण्डा ज़मीन पर पटका। मगरमच्छ पर इसका कोई असर नहीं हुआ। नुकीले जबड़े फैलाए कांटेदार पूछ फटकारते हुए मगरमच्छ, मुखिया की तरफ बढ़ा। मुखिया सिर पर पैर रखकर भागा। डण्डा भी उसके हाथ से गिर गया।
अब उस सरोवर पर कोई नहीं जाता। उजले कपड़े आज तक किनारे पर पड़े हैं। गाँव वाले चार मील दूर दूसरे सरोवर पर जाने लगे हैं।
आज वह मगरमच्छ जगह-जगह नंगा घूम रहा है।
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2-अधूरी पेण्टिंग -डॉ.पूरन सिंह
उसका छोटा बेटा बैचलर ऑफ फाइन आर्ट की अंतिम वर्ष में था। जिद कर गया था उस दिन, ‘माँ, आपका चित्र बनाना है ।’
माँ बहुत देर तक ना-नुकुर करती रही-‘इस बुढ़ापे में अब कहाँ बैठ पाऊँगी देर तक। तेरी पेटिंग्स बहुत समय लेती हैं। मुझसे नहीं बैठा जाएगा ।’
फिर भी, बेटा नहीं माना।
माँ ने समर्पण कर दिया या कहें कि ममता जीत गई थी।
बैठे-बैठे तीन घण्टे हो गए। न बेटा हिम्मत हारता न पेण्टिंग बनने को राजी होती। तभी बेटे को याद आया, ‘हाँ यह ठीक रहेगा‘ और माँ से बोला, ‘बिल्कुल ऐसे ही बैठी रहो ।’
‘थोड़ा सा सामने देखो।’
‘थोड़ा सा मुस्कराने की कोशिश करो।’
‘थोड़ा सा एक एकचित्त हो।’
माँ, बेटे के अनुसार ही करती रही; परन्तु बेटे ने जब यह कहा, ‘माँ दूर क्षितिज में ऐसे देखो- मानो सपना देख रही हो।’
माँ के सामने पूरा जीवन हाहाकार करने लगा था जिसमें पीड़ा थी….दर्द था…..कराह थी…….गरीबी थी…..अपमान था……स्त्री होने का अपराध था। माँ का धैर्य चुक गया था और वह चुप न रह सकी, ‘क्या पत्थर भी सपने देखते हैं।’
बेटा माँ के मन में छिपी असहनीय पीड़ा को समझ गया था जो शरीर की पीड़ा से करोड़ों गुना अधिक थी। उसने अपनी पेण्टिंग को वहीं रोक दिया था।
पेण्टिंग अधूरी ही रह गई थी।
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