लघुकथा शब्द का निर्माण लघु और कथा से मिलकर हुआ है। अर्थात् लघुकथा गद्य की एक ऐसी विधा है जो आकार में ‘लघु’ है और उसमें ‘कथा’ तत्त्व विद्यमान है। अर्थात् लघुता ही इसकी मुख्य पहचान है। जिस प्रकार उपन्यास खुली आँखों से देखी गई घटनाओं का, परिस्थितियों का संग्रह होता है, उसी प्रकार कहानी दूरबीनी दृष्टि से देखी गई किसी घटना या कई घटनाओं का वर्णन होती है। इसके विपरीत लघुकथा के लिए माइक्रोस्कोपिक दृष्टि की आवश्यकता पड़ती है। इस क्रम में किसी घटना या किसी परिस्थिति के एक विशेष और महीन -से विलक्षण पल को शिल्प तथा कथ्य के लेंसों से कई गुना बड़ा कर एक उभार दिया जाता है। किसी बहुत बड़े घटनाक्रम में से किसी विशेष क्षण को चुनकर उसे हाईलाइट करने का नाम ही लघुकथा है। इसे और आसानी से समझने के लिए शादी के एल्बम का उदाहरण लेना समीचीन होगा।
शादी के एल्बम में उपन्यास की तरह ही कई अध्याय होते है; तिलक का, मेहँदी का, हल्दी का, शगुन, बरात का, फेरे-विदाई एवं रिसेप्शन आदि का। ये सभी अध्याय स्वयं में अलग-अलग कहानियों की तरह स्वतंत्र इकाइयाँ होते हैं। लेकिन इसी एल्बम के किसी अध्याय में कई लघुकथाएँ विद्यमान हो सकती हैं। कई क्षण ऐसे हो सकते हैं जो लघुकथा की मूल भावना के अनुसार होते हैं। उदहारण के तौर पर खाना खाते हुए किसी व्यक्ति का हास्यास्पद चेहरा, किसी धीर-गंभीर समझे जाने वाले व्यक्ति के ठुमके, किसी नन्हे बच्चे की सुंदर पोशाक, किसी की निश्छल हँसी, शराब के नशे से मस्त किसी का चेहरा, किसी की उदास भाव-भंगिमा या विदाई के समय दूल्हा-पक्ष के किसी व्यक्ति के आँसू। यही वे क्षण हैं, जो लघुकथा हैं। लघुकथा उड़ती हुई तितली के परों के रंग देख-गिन लेने की कला का नाम है। स्थूल में सूक्ष्म ढूँढ लेने की कला ही लघुकथा है। भीड़ के शोर-शराबे में भी किसी नन्हें बच्चे की खनखनाती हुई हँसी को साफ़-साफ़ सुन लेना लघुकथा है। भूसे के ढेर में से सुई ढूँढ लेने की कला का नाम लघुकथा है।
लघुकथा विसंगतियों की कोख से उत्पन्न होती है। हर घटना या हर समाचार लघुकथा का रूप धारण नहीं कर सकता। किसी विशेष परिस्थिति या घटना को जब लेखक अपनी रचनाशीलता और कल्पना का पुट देकर कलमबंद करता है, तब एक लघुकथा का ख़ाका तैयार होता है।
लघुकथा एक बेहद नाज़ुक सी विधा है। एक भी अतिरिक्त वाक्य या शब्द इसकी सुंदरता पर कुठाराघात कर सकता है । उसी तरह ही किसी एक किन्तु अत्यंत महत्त्वपूर्ण शब्द की कमी इसे विकलांग भी बना सकती है। अत: लघुकथा में केवल वही कहा जाता है, जितने की आवश्यक होती है। दरअसल लघुकथा किसी बहुत बड़े परिदृश्य में से एक विशेष क्षण को चुरा लेने का नाम है। लघुकथा को अक्सर एक आसान विधा मान लेने की ग़लती कर ली जाती है, जबकि वास्तविकता बिल्कुल इसके विपरीत है। लघुकथा लिखना, गद्य साहित्य की किसी भी विधा में लिखने से थोड़ा मुश्किल ही होता है; क्योंकि रचनाकार के पास बहुत ज़्यादा शब्द ख़र्च करने की स्वतंत्रता बिल्कुल नहीं होती। शब्द कम होते हैं, लेकिन बात भी पूरी कहनी होती है। और सन्देश भी शीशे की तरह साफ़ देना होता है। इसलिए एक लघुकथाकार को बेहद सावधान और सजग रहना पड़ता है।
लघुकथाकार अपने आसपास घटित चीज़ों को एक माइक्रोस्कोपिक दृष्टि से देखता है और ऐसी चीज़ उभार कर सामने ले आता है जिसे नंगी आँखों से देखना असंभव होता है। दुर्भाग्य से आजकल लघुकथा के नाम पर समाचार, बतकही, क़िस्सागोई यहाँ तक कि चुटकुले भी परोसे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का केले के छिलके पर फिसलकर गिर जाने को, सड़क के किनारे सर्दी के कारण किसी की हुई मौत को, या किसी ढाबे पर काम करने वाले बाल श्रमिक की दुर्दशा को घटना या समाचार तो कहा जा सकता है, किन्तु लघुकथा हरगिज़ नहीं. कथा-तत्त्व ही ऐसी घटनाओं को लघुकथा में परिवर्तित कर सकता है। श्री सुदर्शन वशिष्ठ ने कथा तत्त्व के महत्त्व को कुछ यूँ वर्णित किया है: “जब हम कहानी की बात करते हैं तो दादी-नानी द्वारा सुनाई जाने वाली लोककथाओं का स्मरण हो आता है। लोककथा में सरल भाषा में एक कथा-तत्त्व रहता है जो बच्चे और बूढ़े, दोनों को बराबर बाँधे रखने की क्षमता रखता है। यही कथा-तत्व कहानी में भी अपेक्षित है। कहानी में यदि कथा-तत्त्व नहीं है तो वह संस्मरण, रिपोर्ताज, निबन्ध कुछ भी हो सकता है, एक अच्छी कहानी नहीं हो सकती। कथा-तत्त्व कहानी का मूल है।”
लघुकथा लेखन प्रक्रिया
मैं लघुकथा लेखन प्रक्रिया को भवन-निर्माण शिल्प की तरह ही देखता हूँ। भवन-निर्माण में सबसे पहले किसी भूमि खंड का चुनाव किया जाता है, उसी तरह लघुकथा में भी सबसे पहले कथानक (प्लॉट) चुना जाता है। फिर उस भूमि खंड की नींवों को भरा जाता है। लघुकथा में इस नींव भरने का अर्थ है उस कथानक को अगले क़दम के लिए चुस्त-दुरुस्त करना। नींव भरने के पश्चात उस भूमि खंड पर भवन का निर्माण किया जाता है। यह भवन-निर्माण लघुकथा में रचना की रूपरेखा अर्थात् शैली कहलाता है। जिस प्रकार भवन का ढाँचा तैयार होने के बाद उसकी साज-सज्जा होती है, बिल्कुल उसी तरह से ही लघुकथा में काट-छील करके उसको सुंदर बनाया जाता है। समृद्ध भाषा एवं उत्कृष्ट संप्रेषण लघुकथा में इसी रूपसज्जा का हिस्सा माना जाता है। भवन पूरी तरह बन जाने के बाद अंतिम कार्य होता है, उसका नामकरण। नए घर को सुंदर और सार्थक नाम देने हेतु हम लोग ज्योतिषियों तक की सलाह लेते हैं। बिल्कुल यही महत्त्व लघुकथा के शीर्षक का भी है। शीर्षक, दुर्भाग्य से लेखन व्यवहार में लघुकथा का सबसे उपेक्षित पक्ष हुआ करता है। दस में से नौ शीर्षक बेहद चलताऊ और साधारण पाए जाते हैं, जबकि लघुकथा में शीर्षक इतना महत्त्वपूर्ण और अभिन्न अंग हुआ करता है कि बहुत बार शीर्षक ही लघुकथा की सार्थकता को अपार ऊँचाइयाँ प्रदान कर देता है। अत: शीर्षक ऐसा हो जो लघुकथा में निहित संदेश का प्रतिनिधित्व करता हो, या फिर लघुकथा ही अपने शीर्षक को पूर्णतया सार्थक करती हो।
लघुकथा लेखन प्रक्रिया के महत्त्वपूर्ण अंग
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जिस प्रकार भवन निर्माण हेतु सबसे पहले भू-खंड (प्लॉट) का चुनाव होता है बिल्कुल वैसे ही लघुकथा लिखने के लिए कथानक या प्लॉट का चयन किया जाता है। लघुकथा लेखन में यह सब से महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है जो रचनाकार के अनुभव, उसकी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टि पर निर्भर है। संक्षेप में कहें तो सबसे पहले लघुकथाकार को यह निर्णय लेना होता है कि वास्तव में उसको “क्या कहना है।” इसका तात्पर्य है – कथानक (प्लॉट) का चुनाव।
(2). जैसे पहली प्रक्रिया है- ‘क्या कहना है’, वहीं दूसरी महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है ‘क्यों कहना है’, अर्थात् लघुकथा कहने का उद्देश्य वास्तव में क्या है। यह भी भवन निर्माण कला की प्रक्रिया के एक हिस्से की ही तरह है, जिसमें निर्माण करने वाला भवन बनाने का उद्देश्य तय करता है। अक्सर लघुकथा के अंत से ही उसके उद्देश्य का पता चल जाता है।
(3). अगला पड़ाव है, जो कहना है वह ‘कैसे कहना है’, इस बात का संबंध लघुकथा की भाषा से है। भाषा जितनी सरल और अक्लिष्ट होगी शब्दों का चुनाव जितना सटीक होगा, रचना उतनी ही प्रभावशाली बनेगी । भारी-भरकम शब्दों एवं अस्वाभाविक बिंबों का उपयोग रचना को उबाऊ बना सकता है। भाषा का प्रयोग यदि पात्रानुकूल या परिस्थतिनुकूल हो तो रचना जानदार हो जाती है; जबकि चलताऊ, खिचड़ी एवं कमज़ोर शब्दावली रचना को कुरूप बना देती है। एक लघुकथाकार किसी भाषा-वैज्ञानिक से कम नहीं होता। अत: उससे यह अपेक्षा की जाती है कि उसका भाषा पर पूर्ण नियंत्रण हो। जहाँ बेहद क्लिष्ट शब्दावली रचना को बोझिल बनाती है, वहीं आम बाज़ारू भाषा रचना में हल्कापन लाती है। भाषा में सादगी, स्पष्टता एवं सुभाषता किसी की लघुकथा में चार चाँद लगाने में सक्षम होती हैं।
(3). लघुकथा लेखन में अगला सबसे अहम् क़दम है इसका शिल्प। शिल्प चुनाव भी बिल्कुल भवन- निर्माण के दौरान शिल्प निर्धारण करने जैसा ही है जिससे भवन का चेहरा-मोहरा निश्चित होता है। शिल्प की कोई निजी प्रामाणिक परिभाषा नहीं होती है। एक स्वतंत्र इकाई होते हुए भी वास्तव में यह बहुत सी अन्य इकाइयों पर निर्भर होती है। अगर भवन निर्माण के हवाले से देखा जाए तो ताजमहल का अपना शिल्प है, क़ुतुब मीनार का अपना, तो संसद भवन का अपना। इसलिए शिल्प इस बात पर निर्भर है कि उसे किस चीज़ के लिए उपयोग किया जा रहा है। अर्थात् भवन में कमरे दो हों या दो दर्जन, चारदीवारी 4 फ़ीट ऊँची हो या 7 फ़ीट, फ़र्श साधारण हो या कि संगमरमर का, छत की ऊँचाई कितनी हो, घर में पेड़-पौधे हों कि गमले, मकान स्वयं रहने के लिए बनाया गया है या किराए पर देने के लिए – ये सब बातें मिलकर शिल्प- निर्धारण का कारण बनती हैं। उदाहरण के लिए किसी आवासीय भवन या इकाई में पर्याप्त मात्रा में हवा एवं धूप का आवागमन अति आवश्यक माना जाता है, लेकिन वह किस दिशा से और कितने समय के लिए आने चाहिए, यह देखना भी अति आवश्यक होता है। बेरोकटोक ठंडी हवा गर्मियों में तो शीतलता देगी किन्तु जाड़े में इसका प्रभाव बिल्कुल विपरीत हो जाएगा। अत: शिल्प भी भवन की संरचना और उपयोग पर निर्भर है। लघुकथा के आलोक में भी शिल्प को बिल्कुल ऐसे ही देखा जाना चाहिए।
(4) लघुकथा शिल्प का एक और अति महत्त्वपूर्ण पहलू है इसकी शैली। उत्कृष्ट शब्द-संयोजन एवं उत्तम भाव-संप्रेषण लघुकथा शैली की जान है। मेरा मानना है कि बहुत बार सशक्त शैली कमज़ोर कथानक और ढीले शिल्प को भी ढक लिया करती है। शैली भी लघुकथा के चेहरे-मोहरे पर ही निर्भर होती है, जिसका चुनाव बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। मुख्य तौर पर लघुकथा वर्णनात्मक, वार्तालाप शैली अथवा मिश्रित शैली (जिसमें कथन के अलावा पात्रों के मध्य संवाद / वार्तालाप भी होता है) में लिखी जाती है। यदि कथानक की आवश्यकता हो तो मोनोलॉग शैली (स्वयं से बात) में भी लघुकथा कही जा सकती है। हालाँकि निजी तौर पर मुझे इस शैली में लिखना पसंद नहीं। क्योंकि इसमें अक्सर लेखक पक्षपाती हो जाता है।
(5) लघुकथा लेखन का एक और महत्त्वपूर्ण (किन्तु दुर्भाग्य से अति उपेक्षित) हिस्सा है ‘शीर्षक’, वास्तव में शीर्षक को लघुकथा का ही हिस्सा माना जाता है। शीर्षक का चुनाव यदि पूरी गंभीरता से किया जाए तो अक्सर शीर्षक ही पूरी कहानी बयान कर पाने में सफल हो जाता है या फिर लघुकथा ही अपने शीर्षक को सार्थक कर दिया करती है। जिस प्रकार किसी भवन का नामकरण बहुत सोच-समझकर किया जाता है, लघुकथा का शीर्षक भी उसी प्रकार चुनना चाहिए। सुंदर और सारगर्भित शीर्षक भी लघुकथा की सुंदरता में चार चाँद लगा देता है।
6. लघुकथा का अंत करना एक हुनर है। लघुकथा का अंत उसके स्तर और क़द-बुत को स्थापित करने में एक बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अधिकतर सफल लघुकथाएँ अपने कलात्मक अंत के कारण ही पाठकों को प्रभावित करने में सफल रहती हैं। विद्वानों के अनुसार लघुकथा का अंत ऐसा हो जैसा लगे अचानक किसी ततैया ने डंक मार दिया हो, जैसे किसी फुलझड़ी ने आँखों को चकाचौंध कर दिया हो, जैसे किसी ने एकदम सुन्न और सन्न कर दिया हो ! एक ऐसा धमाका जिसने बैठे बिठाए हुओं को हिलाकर रख दिया हो, जो इतने प्रश्न-चिह्न छोड़ जाए कि पाठक एक से अधिक उत्तर ढूँढने पर मजबूर हो जाए। जो विचारोत्तेजक हो, जो पाठक के विचारों को आंदोलित कर दे। जो किसी भी सूझवान व्यक्ति को मुट्ठियाँ भींचने पर विवश कर दे।
कहा-अनकहा
लघुकथा में जो कहा जाता है वह तो महत्त्वपूर्ण होता ही है, किन्तु उससे भी महत्त्वपूर्ण वह होता है जो ‘नहीं कहा जाता’. लघुकथाकारों के लिए इस’जो नहीं कहा जाता’ को समझना बहुत आवश्यक है। दरअसल इसके भी आगे तीन पहलू हैं जिन्हें आसान शब्दावली में कहने का प्रयास किया है :
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1. ‘जो नहीं कहा गया’ – अर्थात् वह इशारा जिसके माध्यम से एक सन्देश दिया गया हो या बात को छुपे हुए ढंग या वक्रोक्ति के माध्यम से कही गई हो। उदाहरण हेतु मैं श्रीगणेश बाग़ी जी की एक लघुकथा ‘श्रेष्ठ कौन’ का एक हिस्सा प्रस्तुत कर रहा हूँ :
-पीतल ने कहा कि उसके बर्तनों में देवों को भोग लगाया जाता है, कुलीनजनों के पास उसका स्थान है जबकि ऐलुमिनियम के बर्तनों में झुग्गी-झोपड़ी के लोग खाते हैं और तो और इसका कटोरा भिखमंगे लेकर घूमते रहते हैं । ऐलुमिनियम अपने पक्ष में कोई विशेष दलील नहीं दे सका I चाँदी महाराज ने अपने निर्णय में कहा कि पीतल भरे हुए को भरता है जबकि ऐलुमिनियम भूखे को खिलाता है, अत: भूखे को खिलाने वाला ही सदैव श्रेष्ठ होता है ।
यह निर्णय सुनकर एक कोने में पड़ी ‘पत्तल’ मुस्कुरा उठी ।
पत्तल का मुस्कुराना बिना कुछ कहे ही सब कुछ कह गया। यही लघुकथा की सुंदरता है। क्या यहाँ पत्तल को तर्क-वितर्क करते हुए नहीं दर्शाया जा सकता था ? बिल्कुल दर्शाया जा सकता था, लेकिन उस स्थिति में लघुकथा ‘जो नहीं कहा गया’ नामक आभूषण से वंचित न रह जाती ? ‘
दूसरा उदाहरण है श्री रवि प्रभाकर जी की लघुकथा ‘दंश’
“बहन ! आज मुझे काम से लौटने में देर हो जाएगी, तब तक तुम मुन्नी को अपने पास ही रखना।” उस विधवा ने हाथ जोड़ते हुए अपनी पड़ोसन से आग्रह किया।
“पर अब तो तेरा देवर भी गाँव से आया हुआ है, तो फिर…..।”
“इसीलिए तो तुम्हारे पास छोड़ रही हूँ;”
अंतिम पंक्ति में बिना कुछ कहे ही क्या सब कुछ नहीं कह दिया गया ?
2. दूसरा बिंदु है ‘जो नहीं कहा जाना चाहिए’ – अर्थात् वह अनावश्यक विवरण जिसकी लघुकथा में कोई आवश्यकता ही नहीं थी और जसके बग़ैर भी बात बन सकती थी । उदाहरण के लिए निम्नलिखित पंक्ति देखें :
“जनरल मेनेजर मिस्टर खन्ना अपनी नई हौंडा सिटी कार से नीचे उतरे, उन्होंने महँगा विदेशी सूट, चमचमाते हुए जूते, रे-बैन का चश्मा पहना हुआ था और उनके हाथ में लाल रंग का ब्रीफ़केस था।”
यह विवरण कहानी में हो तो कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन लघुकथा का नाज़ुक-सा स्वभाव इतना भारी-भरकम विवरण बर्दाश्त नहीं कर सकता, जेनरल मेनेजर खन्ना है या कपूर क्या फ़र्क़ पड़ता है ? गाड़ी किस कंपनी की है क्या इससे कुछ अंतर पड़ेगा ? सूट विदेशी हो भारतीय, चश्मा रे-बैन का है या देसी, (या फिर चश्मा न भी पहना हो) तथा सूटकेस लाल हो हरा या नीला क्या ये बात कोई मायने रखती है ? क्या इस पूरी पंक्ति को यूँ लिख देने से ही बात स्पष्ट नहीं हो जाएगी ?:
1. सूट-बूट पहने जनरल मेनेजर साहिब अपनी गाड़ी से नीचे उतरे।
2. इसी पंक्ति को यदि और कसना हो, तो यूँ भी कहा जा सकता है:
“जनरल मेनेजर साहिब अपनी गाड़ी से नीचे उतरे।”
ज़ाहिर है कि कोई जनरल मैनेजर पायजामे में तो दफ्तर आने से रहा। (मेरे एक सुहृदय मित्र श्री अनिल चौहान के सुझाव के अनुसार)
3. ‘जो कहा तो जाना चाहिए; लेकिन कहा नहीं गया’. यह ‘मिसिंग-लिंक’ रचना में एक अजीब-सा अधूरापन ला देता है। पूरी कथा पढ़ने के बाद यदि कोई पाठक यह प्रश्न करे कि फिर क्या हुआ ? तो समझ जाना चाहिए की कोई कड़ी लघुकथा से नदारद है। उदाहरण हेतु एक आशु-लघुकथा प्रस्तुत है:
-तक़रीबन हर आधे घंटे बाद सिगरेट पीने के आदी मिश्रा जी को आज चार-पाँच घंटे बिना सिगरेट के रहना पड़ा। घर में पूजा थी, अत: न तो उन्हें धूम्रपान का समय मिला, न ही अवसर।
“राहुल, सिगरेट ख़त्म हो गई है, ज़रा भागकर एक पैकेट तो लेकर आ बाज़ार से, जान निकली जा रही है यार बग़ैर सिगरेट के”
पंडितजी को विदा होते ही मिश्रा जी ने अपने बेटे को सौ का नोट थमाते हुए कहा।
लगभग एक घंटे बाद बाद जब राहुल घर लौटा तो मिश्रा जी ने कहा-“सिगरेट ले आया बेटा।”
“सॉरी पापा ! मैं भूल गया।”
कहकर राहुल अपने कमरे की तरफ़ चल दिया।
यह लघुकथा पढ़कर पाठक यह प्रश्न नहीं करेगा कि फिर क्या हुआ ? सिगरेट के लिए तड़पते हुए व्यक्ति ने क्या कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर न की होगी ? और आख़िर राहुल सिगरेट लेकर क्यों नहीं आया ? यह ‘नदारद कड़ी’ लघुकथा की एक कमज़ोरी मानी जाती है।
लघुकथा का आकार
यह प्रश्न बरसों से उठाया जाता रहा है कि लघुकथा का आदर्श आकार या शब्द-सीमा क्या हो। मेरे निजी मत में लघुकथा का आकार वास्तव में उसके प्रकार पर निर्भर है। कथानक के हिसाब से एक लघुकथा अपना आकार स्वयं ही निर्धारित कर लिया करती है। स्मरण रखने योग्य बात केवल यह है कि लघुकथा इस प्रकार लिखी जाए कि उसमें एक भी अतिरिक्त शब्द जोड़ने अथवा घटाने की गुंजाइश बाक़ी न बचे। वैसे आम हिसाब से एक लघुकथा अधिकतम 300 शब्दों से अधिक नहीं जानी चाहिए।
लघुकथा के प्रकार
मुख्यत: लघुकथा की तीन प्रचलित शैलियाँ हैं।
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विवरणात्मक (बिना किसी संवाद के लिखी गई लघुकथा)
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संवादात्मक (केवल संवादों में लिखी गई लघुकथा)
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मिश्रित (विवरण एवं संवाद युक्त लघुकथा)
जल्दबाज़ी: काम शैतान का
जो विचार मन में आए उसको परिपक्व होने का पूरा समय दिया जाना चाहिए, पोस्ट अथवा प्रकाशन की जल्दबाज़ी से लघुकथा अपनी सुंदरता खो सकती है। इस आलोक में आ० गौतम सान्याल जी के निम्नलिखित शब्द स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य हैं:
“लघुकथाएँ किसी अस्थिर समाज में अधिक उपजती हैं, जिसमें भौतिक उत्पादन के साधन और मानसिक उत्पादन के साधनों में तीव्र संघर्ष दिखाई देता है। लघुकथा हठात् जन्म नहीं लेती, अकस्मात् पैदा नहीं होती। दूसरे शब्दों में कहें तो लघुकथा तात्कालिक प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं होती। जब कोई कथ्य–निर्देश देर तक मन में थिरता है और लोक–संवृत में अँखुआ उठता है, तब जाकर जन्म ले पाती है लघुकथा । जैसे सीपी में मोती जन्म लेता है। जब कोई धूलकण या फॉरेन बॉडी बाहर से सीपी में प्रवेश करती है तो उसे घेरकर सीपी में स्राव शुरू हो जाता है। एक दीर्घकालिक प्रक्रिया के तहत वह धूलिकण एक ट्यूमर के रूप में मोती का रूप ग्रहण कर लेता है । कहना न होगा कि इस सहजात जैव प्रक्रिया के तहत सीपी को एक गहरी और लंबी वेदना से गुज़रना होता है। आदमी विवश होकर ही लिखता है जैसे कोई झरना विवश होकर अन्तत: फूट निकलता है। यहाँ तक तो एक कविता–कहानी या लघुकथा में कोई विशेष फ़र्क़ नहीं। फ़र्क़ इतना है कि साधारणत: एक लघुकथा का लगभग अंतिम प्रारूप व्यक्त होने के पहले ही अपना रूपाकार ग्रहण कर लेता है। यह तथ्य क्रोचे का गड़बड़ाता नहीं है। कहना बस इतना है कि जीवन महज़ एक तथ्य नहीं है–यह अपने आपमें कथ्य भी है। जब जीवन के तथ्य और कथ्य एकमेक होकर गद्य के प्रारूप में अन्वित–संक्षिप्तियों में प्रकट होते हैं तो उसे लघुकथा कहते हैं। लेकिन ‘मोती’ का प्रारूप ग्रहण कर लेने से ही लघुकथा की सृजन–प्रक्रिया संपन्न नहीं हो जाती। इसके बाद एक सूक्ष्म कलाजन्य–शल्य–चिकित्सा अपेक्षित है। इसके बाद अत्यंत सतर्कता बरतते हुए सीपी से मोती को निकालना होता है। जो सीपी से मोती को नोचकर निकालते हैं वे हत्यारें हैं, क़साई हैं, बनिए हैं, शीघ्रस्रावी हड़बडि़ए हैं। उन्हें किसी भी दृष्टि से लघुकथाकार नहीं कहा जा सकता।”
लघुकथाकारों के लिए स्मरण रखने योग्य महत्त्वपूर्ण बातें :
1. केवल छोटे आकार की वजह से ही हरेक रचना लघुकथा नहीं होती। आकार में लघु और कथा-तत्त्व से सुसज्जित रचना को ही लघुकथा कहा जाता है।
2. कहानी के संक्षिप्तीकरण का नाम लघुकथा नहीं है। यह एक स्वतंत्र विधा है और इसका अपना विशिष्ट शिल्प-विधान है।
3. अनावश्यक विवरण एवं विस्तार से हर हाल में बचा जाना चाहिए।
4. पात्रों की संख्या पर नियंत्रण रखना चाहिए, पाँच पंक्तियों की लघुकथा में यदि 6 पात्र डाल दिए गए, तो पाठक उनके नामों में ही उलझा रहेगा ।
5. शीर्षक का चुनाव सोच समझकर करें। या तो शीर्षक ही कहानी को परिभाषित करता हो या कहानी शीर्षक को। मजबूरी, लाचारी, दहेज़, सोच, धोखा, अत्याचार, चोर, लुटेरे आदि चलताऊ शीर्षक रचना को बदरंग और बदरूप कर देते हैं। शीर्षक को लघुकथा का प्रवेश द्वार माना गया है। एक कमज़ोर शीर्षक पाठक को रचना से दूर कर सकता है।
6. रचना में भाषण देने से गुरेज़ करें। जो कहना हो वह पात्रों या परिस्थितियों के माध्यम के कहना चाहिए। जब रचनाकार स्वयं पात्र की भूमिका में आ जाता है तो उसके पक्षपाती हो जाने के अवसर बहुत ज़्यादा बढ़ जाते हैं।
7. लघुकथा को ‘बोधकथा’ या ‘बच्चों के मुख से’, ‘हितोपदेश’ अथवा ‘प्रेरक प्रसंग’ बनने या बनाने से गुरेज़ करना चाहिए।
8. एक लघुकथाकार के लिए लघुकथा, सपाट क़िस्सागोई, नारे एवं समाचार में अंतर को समझना बेहद आवश्यक है।
9. लघुकथा को प्रभावशाली बनाने के अतिरिक्त उसे दीर्घजीवी बनाने का भी प्रयत्न किया जाना चाहिए। ताज़ा समाचार या घटना का अक्षरश: विवरण/चित्रण रचना की आयु पर कुठाराघात सिद्ध होता है।
10. लघुकथाकार को चाहिए कि वह व्यंग्य को कटाक्ष का रूप देने का प्रयास करे, ताकि लघुकथा हास्यास्पद या चुटकुला बनने से बची रहे।
11. विषय में नवीनता लाने का प्रयास करना चाहिए। चलताऊ विषयों से बचना चाहिए। मसलन ‘कथनी-करनी में अंतर’ बेहद पुराना और घिसा-पिटा एवं उबाऊ विषय हो चुका है और दुर्भाग्यवश अभी भी नए लघुकथाकारों का मनपसंद विषय है।
12. लघुकथा चूँकि एक विशेष क्षण को उजागर करने वाली एकांगी रचना होती है, अत: रचना में विभिन्न काल-खंडों अथवा अध्यायों हेतु लिए कोई स्थान नहीं है। लघुकथा में एक से अधिक घटनाओं का समावेश इस विधा के कोमल कलेवर के विपरीत है।
13. हालाँकि यह सच है कि लघुकथा के अंत में कुछ-न-कुछ पाठक के विवेक पर छोड़ दिया जाता है, किंतु स्मरण रखना चाहिए कि स्पष्टता लघुकथा की जान मानी जाती है। अत: लघुकथा को पहेली बनने से भी बचाया जाना चाहिए।
14. लघुकथा में मनमर्ज़ी का अंत थोपने से बचना चाहिए। क्योंकि लघुकथाकार जब निर्णायक की भूमिका में आ जाता है, तब लघुकथा के बेजान और बेमानी होने के अवसर बहुत ज़्यादा बढ़ जाते हैं।
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लघुकथा का अंत प्रभावशाली और विचारोत्तेजक होना चाहिए। यह बात याद रखनी चाहिए कि एक सशक्त अंत लघुकथा की कई कमियों को ढक दिया करता है।