जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा- शिल्प में संकेतों का उपयोग (टिप्पणी )     Posted: July 1, 2024

  लघुकथा के क्षेत्र में जब मैं बिल्कुल शैशवावस्था में  थी,  मुझे याद है तब मैं आदरणीय सतीश दुबे जी से पहली बार मिली और उन्हें अपनी कुछ लघुकथा में दिखाई।  तब उन्होंने उस वक्त नई दुनिया में छपी मेरी लघुकथा का जिक्र करते हुए कहा कि तुम्हारी यह बहुत अच्छी सांकेतिक लघुकथा है। मुझे बहुत ज्यादा तो समझ नहीं आया, लेकिन धीरे-धीरे लेखन ने जब थोड़ी गति पकड़ी तो बहुत सारी चीजें समझ में आने लगी। वह लघुकथा यहाँ प्रस्तुत करने से पहले मैं एक बात कहना चाहूँगी कि कई बार स्त्री के लिए अबला शब्द का प्रयोग किया जाता है और मेरा यह मानना है कि स्त्री कोमल हो सकती है, लेकिन कमजोर नहीं। तो यही संकेत मेरी उस लघुकथा में परिलक्षित था, जो उस वक्त आदरणीय सतीश दुबे जी ने सराही थी। लघुकथा कुछ इस तरह थी–

ताकत

“सारे दाँत पौरुष के दंभ में जीभ को चिड़ा रहे थे। बत्तीस दाँतों का बहुमत होने से जीभ दो चार बार कट भी गई। आखिर जब अति हो गई तो जीभ ने एक बाहुबली के सम्मुख अनर्गल वार्तालाप शुरू कर दिया। बस… फिर क्या था…!  दो-चार घूँसे पड़े और आधे दाँत नीचे जमीन पर आ पड़े थे।

 बचे खुचे दाँत अकेली जीभ की ताकत जान चुके थे।”

इसमें संकेत है कि स्त्री जीभ के समान कोमल भले ही हो, लेकिन कमजोर नहीं है…उसे अबला नही समझा जाए। और दूसरे बहुमत ना होने पर भी वह बुद्धि से जीत सकती है।

 सांकेतिक रचना यानी ऐसी रचना जिसमें सीधे-सीधे कोई बात ना कहकर संकेत में कही गई हो।

 और संकेत इस तरह के हो कि यह बात पाठकों को समझ में आ जाए कि लेखक किस ओर इंगित कर रहा है। जब हम दो वस्तुओं, जैसे सुई व कैंची को विषय बनाकर कथा लिखेंगे, तो संकेत साफ -साफ रहेगा कि सुई जोड़ने का कार्य करती है और कैंची काटने का।

 या दो ऐसे वृक्ष ,जिनमे से एक छाँव में खिलता है ..लेकिन दंभी है। और एक विनम्र भाव वाला वृक्ष है, जो धूप में भी खिलता है….हर परिस्थिति में प्रसन्न रहता है…परमार्थ का भाव रखता है। अब पाठकों में अगर कोई उस स्वभाव का व्यक्ति है, तो यह संकेत उसके लिए काफी होता है।

शीतलता के लिए चंद्रमा का संकेत है… तो सूर्य का संकेत ताप या ऊर्जा के लिए हो सकता है । यह लघुकथाकार के शब्द- चातुर्य पर निर्भर है कि वह उस संकेत में  ऊर्जा देगा या झुलसाएगा।

एक और लघुकथा है बोन्साई।

जब कोई बच्चा को बोन्साई  की विशेषताओं के बारे में जानकर यह प्रश्न करता है कि क्या बच्चे भी बोन्साई होते हैं…?  तब इस संकेत भर से पाठक समझ जाते हैं कि आजकल के माता- पिता बच्चों पर कितना दबाव डालते हैं, उन्हें बड़ों के सामान क्वालिटी देने के लिए।

 आदरणीय सतीश दुबे जी की एक लघुकथा पासा इसी तरह की लघुकथा है, जिसमें यह साफ साफ संकेत है कि स्त्री जब बोलती है, तब पुरुष संवाद  नहीं करना चाहता; लेकिन बात जब पुरुष की महिला मित्र की होती है, तब वह मुखर हो जाता है।

 यह बहुत सरल और स्वाभाविक संकेत है। लगभग हर पुरुष इस संकेत को समझता है।

 इसी तरह मांसाहारी पशु की तुलना शाकाहारी पशु से होने वाली विषयक रचनाएँ भी साफ-साफ संकेत देती है कि  जैसा खाओगे अन्न, वैसा होए मन ।

सांकेतिक लघुकथाओं में संकेत को  स्पष्ट करना अनिवार्य नहीं है ….पाठकों की समझ पर लेखक को भरोसा करना होगा। लेकिन हाँ…! इतना अवश्य है कि बहुत ज्यादा क्लिष्ट भाषा नहीं रखनी होगी, ताकि संकेत स्पष्ट हो सके।

रवि प्रभाकर जी की एक लघुकथा है कर्मजली। बहुत मार्मिक व अंदर तक झकझोर देने वाली लघुकथा है।  उसमें सिर्फ एक संकेत पाठकों को समझा देता है कि एक जवान लड़की से पूछताछ का क्या अर्थ है..! इसमे निशाना युवती है, लेकिन डाँट पुरुष को पड़ रही है..।

 संकेत साफ है, जो कि पुरानी कहावतों में भी झलकता था.. कि कहना बेटी को.. सुनाना बहू को।

लघुकथा, क्योंकि बारीक और सूक्ष्म अवलोकन वाली विधा है, इसलिए उसमें संकेतों का होना जरूरी भी होता है। सीधे सपाट बयानी के साथ यदि कोई बात कह दी जाती है, तो वह उतना प्रभाव नहीं छोड़ती जितना संकेतों के माध्यम से कही गई कोई बात। यहाँ पर संकेत शिल्प का काम करते हैं और कथा को प्रभावी बनाते हैं; इसलिए लघुकथा की ताकत के लिए संकेतों का उपयोग जरूर करना चाहिए।

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