जून 2026

पाठकीयलघुकथा समीक्षा में अभिनव प्रयोग-दो: भगीरथ परिहार     Posted: December 1, 2020

चादर: विश्लेषण

मुफ्त बाँटी जा रही खास तरह की चादरें(भगवा रामनामी) ओढ़कर टोलियाँ पवित्र नगर (अयोध्या) को कूच कर रही थीं । इस तरह की चादर ओढ़ने-ओढ़ाने से मुझे सख्त चिढ़ थी, पर मुफ्त चादर को मैंने यह सोचकर रख लिया था कि इसका कपड़ा कभी किसी काम आएगा। चादर ओढ़ कर लेटते ही गहरी नींद (नशे) ने मुझे दबोच लिया था।लेखक यहाँ एक फैंटेसी बुनता है।

आँख खुली तो मैंने खुद को पवित्र नगर में पाया।

यह ‘पवित्र नगर’ अयोध्या है और ‘पवित्र पर्वत’ रामकोट पहाड़ी जिस पर बाबरी मस्जिद का गुम्बद है। अयोध्या का माहौल ऐसा कि आदमी पर आदमी चढ़ा जा रहा था। कहाँ से आ गए इतने लोग? हरेक ने मेरी जैसी चादर ओढ़ रखी थी। धार्मिक उन्माद से उनके चेहरे तमतमा रहे थे। हवा में अपनी पताकाएँ (भगवा)फहराते जुलूस की शक्ल में वे तेजी से एक ओर बढ़े जा रहे थे। थोड़ी-थोड़ी देर बाद सम्मिलित उद्घोष(राम लला हम आएँगे, मंदिर वहीँ बनाएँगे, मंदिर वहीँ बनाएँगे, मस्जिद तोडकर जाएँगे, एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो,) से वातावरण गूँज उठता था। विचित्र-सा नशा(सक्रिय धर्मरक्षक का उन्माद )  मुझ पर छाया हुआ था। न जाने किस शक्ति के पराभूत मैं भी उस यात्रा में शामिल था’।यानी वे लोग भी जो इनके कार्यकलापों से सहमत नहीं थे माहौल के दबाब में उनमें सम्मिलित हो गए। ये कारसेवक  श्रीराम का मंदिर बनाने जा रहे है उनका विश्वास है कि राम जन्म भूमि यही है, उन्हें  इसमें राजनीति नजर नहीं आ रही थी। वे मुस्लिमों के विरुद्ध हिन्दू को संगठित कर वोटों का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर रहे थे। आयोजक अपने उद्देश्य में स्पष्ट थे वे धर्म के रास्ते राजनैतिक फतह हासिल कर सत्ता हथियाना चाहते थे। इसके लिए वे लगातार इमोशनल भाषणों से कार सेवकों को एक उन्मादी भीड़ में परिवर्तित करने का प्रयत्न करते रहे।

  कारसेवक कई दिन से ‘पवित्र पर्वत’ के चक्कर ही काट रहे थे। उसने पर्वत की चोटी की ओर संकेत करते हुए कहा कि क्या हम बिना चढ़ाई चढ़े बाबरी मस्जिद तक पहुँच जाएंगे? मैंने शंका जाहिर की।उसने संदेह भरी नज़रों से मुझे देखा। आपने कोई प्रश्न किया तो आप संदेह के घेरे में आ जाएँगे। प्रश्न आस्था पर चोट करता है।वक्त का इंतजार कीजिए या आदेश का इंतजार कीजिए।

आखिर वह समय भी आया जब उन्मादी भीड़ हिंसक भीड़ में तब्दील हो गई। बाबरी मस्जिद का नामोनिशान मिटा दिया।

चादरों पर खून  के छींटे लग गए। कुछ चादरें तो खून से तरबतर थी। जिसकी चादर जितनी ज्यादा खून से सनी हुई थी वह उतना ही बेपरवाह हो मूंछें ऐंठ रहा था।   यह देखकर मुझे झटका-सा लगा और मैं पवित्र नगर से निकल पड़़ा।

लौटते हुए मैंने देखा, पूरा देश दंगों की चपेट में था, लोगों को जिन्दा जलाया जा रहा था, हर कहीं खून-खराबा था। मैंने पहली बार अपनी चादर को ध्यान से देखा, उस पर भी खून के छींटे साफ दिखाई देने लगे थे। मैं सब कुछ समझ गया। मैंने उसी क्षण  खूनी चादर को अपने जिस्म से उतार फेंका। ‘चादर’ एक प्रतीकात्मक कथा है इसमें हमारे देश की महत्वपूर्ण घटनाएँ जो अयोध्या से जुडी है का समायोजन किया गया है। साम्प्रदायिकता को हवा देकर हिन्दुओं का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर वोट हासिल करना है भले ही साम्प्रदायिकता की आग में हजारों की हत्या हो जाय। इससे चाहे हमारा सेक्यूलर ढांचा ध्वस्त / छिन्न भिन्न हो जाय।

लेखक का वर्सन (पाठ)

लेखक का मानना है कि ‘चादर’ अयोध्या प्रकरण पर लिखी गई है लेकिन बाबरी मस्जिद से इसका कोई लेना देना नहीं हैपवित्र नगर अयोध्या है, पवित्र पर्वत (रामकोट पहाड़ी न होकर) कोई भी पर्वत हो सकता है जहाँ मंदिर का निर्माण होता है, पवित्र पर्वत पवित्र ऊंचाई है जहाँ पर हर मानव पहुँचना चाहता हैयानी मानव मूल्यों तक पहुँचना चाहता हैपवित्र चढ़ाई से तात्पर्य श्रद्धाभाव से भगवत दर्शन के लिए की गई चढ़ाई से हैये सब पुण्य प्राप्ति के लिए है जिसका झांसा दिया जाता है और भोले भाले लोग कथानायक की तरह इस झांसे में आ जाते हैचलते हुए कई दिन बीत गए लेकिन जहाँ मंदिर बनना था वहाँ नहीं पहुंचे, लोगों को यों ही भगवान के नाम पर भटकाना ‘वह पवित्र पर्वत ही हमारी मंजिल है’ जो हमें वर्तमान में नहीं दिख रही है (कथ्य सिमट कर इस बात पर आ जाता है कि धर्म के नाम पर भटकाव पैदा किया जाता है)  

लघुकथा :चादर

दूसरे नगरों की तरह हमारे यहाँ भी खास तरह की चादरें लोगों में मुफ्त बाँटी जा रही थीं, जिन्हें ओढ़कर टोलियाँ पवित्र नगर को कूच कर रही थीं। इस तरह की चादर ओढ़ने-ओढ़ाने से मुझे सख्त चिढ़ थी, पर मुफ्त चादर को मैंने यह सोचकर रख लिया था कि इसका कपड़ा कभी किसी काम आएगा। उस दिन काम से लौटने पर मैंने देखा सुबह धोकर डाली चादर अभी सूखी नहीं थी। काम चलाने के लिए मैंने वही मुफ्त में मिली चादर ओढ़ ली थी। लेटते ही गहरी नींद ने मुझे दबोच लिया था। आँख खुली तो मैंने खुद को पवित्र नगर में पाया। यहाँ इतनी भीड़ थी कि आदमी पर आदमी चढ़ा जा रहा था। हरेक ने मेरी जैसी चादर ओढ़ रखी थी। उनके चेहरे तमतमा रहे थे। हवा में अपनी पताकाएँ फहराते जुलूस की शक्ल में वे तेजी से एक ओर बढ़े जा रहे थे। थेड़ी-थोड़ी देर बाद ‘पवित्र पर्वत’ के सम्मिलित उद्घोष से वातावरण गूँज उठा था। विचित्र-सा नशा मुझपर छाया हुआ था। न जाने किस शक्ति के पराभूत मैं भी उस यात्रा में शामिल था।

इस तरह चलते हुए कई दिन बीत गए पर हम कहीं नहीं पहुँचे। दरअसल हम वहाँ स्थित पवित्र पर्वत के चक्कर ही काट रहे थे।

‘‘हम कहाँ जा रहे हैं?’’ आखिर मैंने अपने आगे चल रहे व्यक्ति से पूछ लिया।

‘‘वह पवित्र पर्वत ही हमारी मंजिल है।’’ उसने पर्वत की चोटी की ओर संकेत करते हुए कहा।

‘‘हम वहाँ कब पहुँचेगे?’’

‘‘क्या बिना पवित्र चढ़ाई चढ़े उस ऊँचाई पर पहुँचना सम्भव होगा?’’ मैंने शंका जाहिर की।

इस पर वह बारगी सकपका गया, फिर मूँछें ऐंठते हुए सन्देह भरी नजरों से मुझे घूरने लगा।

तभी मेरी नजर उसकी चादर पर पड़ी। उस पर खून के दाग थे। मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई। मैंने दूसरी चारों पर गौर किया तो सन्न रह गया, कुछ खून से लाल हो गई थीं और कुछ तो खून से तरबतर थीं। सभी लोग हट्टे-कट्टे थे, किसी को चोट चपेट भी नहीं लगी थी और न ही वहाँ कोई खून-खराबा हुआ था, फिर उनकी चादरों पर ये खून।।।।? देखने की बात ये थी कि जिसकी चादर जितनी ज्यादा खून से सनी हुई थी, वो इसके प्रति उतना ही बेपरवाह हो मूँछें ऐंठ रहा था। यह देखकर मुझे झटका-सा लगा और मैं पवित्र नगर से निकल पड़़ा।

लौटते हुए मैंने देखा, पूरा देश दंगों की चपेट में था, लोगों को जिन्दा जलाया जा रहा था, हर कहीं खून-खराबा था। मैंने पहली बार अपनी चादर को ध्यान से देखा, उस पर भी खून के छींटे साफ दिखाई देने लगे थे। मैं सब कुछ समझ गया। मैंने क्षण उस खूनी चादर को अपने जिस्म से उतार फेंका।

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प्रतिमाएँ : विश्लेषण  

मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के साथ बाढ़ग्रस्त क्षेत्र का निरीक्षण करने पहुंचे। भीड़ ने उनको घेर लिया। लोग गुस्से में थे और भीड़ का नेतृत्व करने वाला युवक नारे लगवा रहा था। प्रधानमंत्री के समक्ष उनकी हालत पतली होने लगी। उन्होंने प्रशासन से हेलिकोप्टर का प्रबंध करने को कहा और प्रधानमंत्री को हवाई सर्वेक्षण के लिए भेज दिया। वे स्थिति संभालने के लिए वहीं रुके रहे।

 हवाई निरीक्षण से लौटने पर प्रधानमंत्री दंग रह गए। अब वहां असीम शांति छाई हुई थी। भीड़ का नेतृत्व कर रहे युवक की विशाल प्रतिमा चौराहे के बीचों बीच लगा दी गई थी। मूर्ति की आँखें बंद थी, होंठ भिंचे हुए थे और कान असामान्य रूप से छोटे थे। यानी स्थानीय नेता भी गेंडे के समान हो गया उसे अब न भुखमरी दिख रही थी न लोगों का दुःख दर्द सुनाई पड रहा था। वह और उसके साथ के लोग मूर्ति की मुद्रा में खड़े थे।

विवरणात्मक कथा है। नरेटिव बताता है कि मुख्यमंत्री लोगों के गुस्से का प्रबंधन कैसे करते हैं वे स्थानीय नेतृत्व को संतुष्ट करने के लिए जगह-जगह उनकी मूर्तियाँ लगवा देते हैं फिर मुख्यमंत्री स्वयम मूर्तियों का अनावरण करते हैं जिससे विरोध के स्वर थम जाते है। बल्कि वे मुख्यमंत्री के सपोर्टर बन जाते हैं और उनका शासन निर्बाध चलता रहता है। उन्हें शासन की कमियां दिखाई देना बंद हो जाती है वे उसे पार्टी में शामिल कर संगठन में किसी पद पर बैठा देते हैं। वे उसे महत्त्व देने लगते हैं सरपरस्ती का हाथ उनके सिर पर रख देते हैं। बस विरोधियों की सारी ग्रिवेंसेज दूर।

  प्रधानमंत्री यह देखकर हैरान है कि जगह-जगह स्थानीय नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं लगी है। वे एक सबक लेकर राजधानी जाते है। प्रधानमंत्री की ओर से मुख्यमंत्री को सन्देश आया कि प्रदेश की राजधानी में मुख्यमंत्री की विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय किया गया है जिसका अनावरण स्वयं प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष करेंगे। इसका लाभ यही होगा कि मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के खिलाफ नहीं बोलेंगे। प्रतिमाओं का राजनैतिक उपयोग भी है और अपनी राजनीति चमकाने का अवसर भी है।

विरोधी या चुनौती देनेवाले नेता को ठिकाने लगाने का एक तरीका यह है कि उसे ‘किक अप’ करके प्रतिष्ठित पद पर शोभायमान कर दो। जहाँ प्रतिष्ठा तो हो लेकिन पॉवर न के बराबर हो। जैसे गवर्नर बना देना। प्रधानमंत्री यही करते हैं।

प्रधानमंत्री को यह भय सताने लगता है कि आने वाले समय में मुख्यमंत्री उनके लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकते हैं क्योंकि उनमें प्रधानमंत्री बनने की काबलियत है और वह उनकी जगह ले सकते हैं। वे मुख्यमंत्री का पोलिटिकल करिअर ख़त्म करने के लिए वे उसे गवर्नर [मूर्ति] बनाकर रास्ते से हटा देते हैं। भारतीय राजनीति ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है।

लघुकथा : प्रतिमाएँ 

उनका काफिला जैसे ही बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के नजदीक पहुंचा,भीड़ ने उनको घेर लिया। उन नंग–धड़ंग अस्थिपंजर–से लोगों के चेहरे गुस्से से तमतमा रहे थे। भीड़ का नेतृत्व कर रहा युवक मुट्ठियां हवा में लहराते हुए चीख रहा था,‘‘मुख्यमंत्री।।।।मुर्दाबाद! रोटी, कपड़ा दे न सके जो, वो सरकार निकम्मी है! प्रधानमंत्री!।।।।हाय! हाय!’’ मुख्यमंत्री ने जलती हुई नजरों से वहां के जिलाधिकारी को देखा। आनन–फानन में प्रधानमंत्री के बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के हवाई निरीक्षण के लिए हेेलीकॉप्टर का प्रबन्ध कर दिया गया। वहां की स्थिति संभालने के लिए मुख्यमंत्री वहीं रुक गए।

हवाई निरीक्षण से लौटने पर प्रधानमंत्री दंग रह गए। अब वहां असीम शांति छाई हुई थी। भीड़ का नेतृत्व कर रहे युवक की विशाल प्रतिमा चौराहे के बीचोंबीच लगा दी गई थी। प्रतिमा की आंखें बंद थीं, होंठ भिंचे हुए थे और कान असामान्य रूप से छोटे थे। अपनी मूर्ति के नीचे वह लगभग उसी मुद्रा में खड़ा हुआ था। नंग–धडंग लोगों की भीड़ उस प्रतिमा के पीछे एक कतार के रूप में इस तरह खड़ी हुई थी मानो अपनी बारी की प्रतीक्षा में हो। उनके रुग्ण चेहरों पर अभी भी असमंजस के भाव थे।

प्रधानमंत्री सोच में पड़ गए थे। जब से उन्होंने इस प्रदेश की धरती पर कदम रखा था, जगह–जगह स्थानीय नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं देखकर हैरान थे। सभी प्रतिमाओं की स्थापना एवं अनावरण मुख्यमंत्री के कर कमलों से किए जाने की बात मोटे–मोटे अक्षरों में शिलालेखों पर खुदी हुई थी। तब वे लाख माथापच्ची के बावजूद इन प्रतिमाओं का रहस्य नहीं समझ पाए थे, पर अब इस घटना के बाद प्रतिमाओं को स्थापित करने के पीछे का मकसद एकदम स्पष्ट हो गया था। राजधानी लौटते हुए प्रधानमंत्री बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे।

दो घंटे बाद ही मुख्यमंत्री को देश की राजधानी से सूचित किया गया–‘‘आपको जानकर हर्ष होगा कि पार्टी ने देश के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विशाल प्रदेश की राजधानी में आपकी भव्य, विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया है। प्रतिमा का अनावरण पार्टी–अध्यक्ष एवं देश के प्रधनमंत्री के कर–कमलों से किया जाएगा। बधाई!’’

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