जून 2026

दस्तावेज़लघुकथा समीक्षा में अभिनव प्रयोग-एक     Posted: October 1, 2020

कथा शिल्पी सुकेश साहनी की सृजन -संचेतना- भगीरथ परिहार से उद्धृत टिप्पणियाँ एवं लघुकथाएँ

नंगा आदमी- विश्लेषण

 एक दिन मैंने अपने आभिजात्य के खोल (चोले) को उतार फेंका। खिड़की दरवाजे ,जो हमेशा बंद रहते थे, खोल दिए। देखा, कमरे में चाँदनी छिटक आई है । समुन्दर की हवाएँ मेरे शरीर को छूने लगी। मैं इतना अभिभूत हो गया कि हवा का पूरा स्पर्श लेने के लिए मैंने कपड़े उतार दिए । वे सब कपड़े ,जो मैंने विभिन्न अवसरों पर पहने थे। इतना प्रफुल्लित कि नंगा ही सड़क पर आ गया। आसमान चाँदनी से भरा था और सड़क हलचल से। सबसे पहले वे औरतें आईं, जिनके गोद में नन्हे बच्चे थे ,जो मेरी तरह नंगे थे । उन्हें देखकर मुझे खुशी हुई कि ये नन्हे सूरज ही जगत् को रोशनी देंगे। उन औरतों के सामीप्य ने मुझे वात्सल्य से सराबोर कर दिया। फिर आए, युवक-युवतियाँ ,जो अपने सपने और रोमांस में महफूज थे, मैं भी सपने देखना लगा, सपने देखना कितना सुहावना है। वे सपने ,जो कहीं खो गए थे, काम और तरक्की की भेंट चढ़ गए थे। मैं और आगे बढ़ा, कामगार दिनभर की मेहनत से थककर चूर, वहाँ से गुज़र रहे थे। उनके चेहरों पर तृप्ति के भाव देखकर लगा-पसीने की कमाई में जो तृप्ति ,जो सुख है वह कहीं नहीं है।

और आगे सन्नाटा था ; क्योंकि यह कुलीनों की बस्ती थी उनके दरवाजे और खिड़कियाँ मजबूती से बंद थे और कुत्ते रखवाली करते थे। मुझ जैसे नंगे आदमी को देखकर भौंकने लगे। काँच की दीवारों के पीछे विभिन्न पोशाकें पहने, मुझे देखकर, उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। घर लौटा ,तो गहरी मीठी नींद सोया।

सुबह उठकर बाहर देखा वही लोग सफेद कपड़ों में घर के बाहर जमा थे। मेरे बाहर आते ही बोले- ‘‘तुम ऐसा नहीं कर सकते—–लो इन्हें पहन लो। ये वही कपड़े थे ,जो मैंने बीती रात उतार कर फेंक दिए थे। सारे मुखौटे उन्होंने मुझे वापस दे दिए, कहा इन्हें पहन लो। नंगा आदमी अश्लील लगता है। खालिस आदमी कुरूप लगता है। नंगे आदमी का तिलिस्म लेखक ने रचकर इसे आकर्षक और रोचक बना दिया है ।

 कथा लेखक से बातचीत के बाद इसका एक पाठ और सामने आया।

नंगा आदमी वस्तुतः उस मानव का प्रतीक है,जो इस दुनिया में नंगा जन्म लेता है और प्रकृति और मानवता की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए जीवन-यापन करना चाहता है। माताओं की गोद में बच्चे, युवकों के सपने, कामगारों का पसीना उसकी इसी सदिच्छा को प्रदर्शित करते हैं। उसके इस पवित्र साफ़-सुथरे रूप को देखकर उसके पिछले साथियों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगती हैं, उन्हें डर है कि वह उनकी पोल खोल देगा। घर लौटने पर वर्षों बाद बच्चों वाली मीठी नींद सोता है, सुबह खिड़की से झाँककर देखता है। बाहर वही लोग जमा थे, जो रात उसे देखकर छिप गए थे। इस समय उन सभी ने सफेद कपड़े पहन रखे थे, ठीक उसी तरह जैसे किसी के मरने पर जाया जाता है, वे उसे फिर उनके साथ आ मिलने के लिए धमकाते हैं।

कथा कहना क्या चाहती है? आदमजात आदमी निश्छल बच्चे की तरह जीना चाहता है, प्रकृति और मानवता से सराबोर होकर; तभी वह वात्सल्य,रोमांस और मेहनत के पसीने की बात करता है। इनोसेंट व्यक्ति तमाम तरह के पाखंड और मुखौटे विहीन होता है, वह दूसरों के छल को भी बेनकाब करने की कूवत रखता है; इसीलिए उसके साथी उसे वापस अपने में मिलाने की कोशिश करते हैं।

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लघुकथा-

1-नंगा आदमी

            आँख खुलते ही मैंने घर के सभी खिड़की-दरवाजे खोल दिए। वर्षों से बंद पड़े कमरे में हर कहीं चाँदनी छिटक गई। सात समुंदर का फैसला तय कर मुझ तक पहुँची हवा ने जैसे ही मुझे छुआ, मेरे शरीर में झुरझुरी-सी दौड़ गई। मैंने दो-तीन बार गहरी साँस ली, फिर न जाने किस शक्ति से पराभूत मैंने एक-एक कर अपने सभी कपड़े उतार डाले। इनमें वे सभी पोशाकें थीं, जिन्हें मैं आज तक भिन्न-भिन्न ‘अवसरों’ पर पहनता रहा था।

            मैं घर से बाहर सड़क पर आ गया । आसमान में चाँद चाँदी-सा चमक रहा था। सड़क पर खूब हलचल थी।

            सबसे पहले मुझे बहुत-सी औरतें आती दिखाई दीं। हरेक की गोद में एक नन्हा सूरज था। उन नन्हे सूर्यों को अपनी जैसी हालत में देखकर मुझे खुशी हुई। उनमें से किसी ने मुझ पर ध्यान नहीं दिया। जब वे मेरे पास से गुज़रतीं तो मैं उनके वात्सल्य की ऊष्मा में नहा गया।

            सामने से लड़के-लड़कियों का झुंड चला आ रहा था। वे अपने सपनों की बातें करते हुए मेरे पास से निकल गए। कई सालों बाद मैं जाग्रत अवस्था में सपने देखने लगा।

            कारखाने से लौट रहे कामगारों की आँखों में दिनभर की मेहनत से कमाई गई तृप्ति भरी थकान थी। उन्होंने भी मेरी ओर ध्यान नहीं दिया। जब वे मेरे पास से गुज़रे ,तो मैं पसीने से नहा गया।

            आगे सड़क का सन्नाटा था। दोनों ओर के मकानों के खिड़की-दरवाजे ही नहीं रोशनदान भी मजबूती से बंद थे। बड़े-बड़े लोहे के गेटों के उस पार विदेशी नस्ल के खतरनाक कुत्ते थे, जो मुझे देखते ही जोर-जोर से भौंकने लगे। देखते ही देखते काँच की दीवारों के पीछे तरह-तरह की पोशाकों में लिपटे लोग नमूदार हो गए। मुझे इस हालत में देखकर उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। वे सब अपने-अपने घरों में दुबक गए।

            घर लौटने पर वर्षों बाद मीठी नींद सोया।

सुबह खिड़की से झाँककर देखा। बाहर वही लोग जमा थे, जो रात मुझे देखकर छिप गए थे। इस समय उन सभी ने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

            मेरे बाहर आते ही उनमें से एक आगे बढ़कर आदेश भरे अंदाज में बोला,  “तुम ऐसा नहीं कर सकते—लो, इन्हें पहन लो।”

            मैंने देखा, उसके पास वही कपड़े थे जिन्हें मैंने बीती रात उतार फेंका था।

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उतारविश्लेषण

1966 से 2006 के बीच यानी पिछले पचास वर्षों की, यह ‘पानी की कहानी’ है ,जो एक मिस्त्री की डायरी के माध्यम से कही गई है। प्रत्येक दस वर्षों के अंतराल में कुएँ की गहराई बढ़ती गई और जलस्तर भी। 2006 में आकर गहराई 160 फीट हो गई ; लेकिन पानी गायब।

10 मई 1966-कुएँ की कुल गहराई-30 फीट, भूजल स्तर-14 फीट

25 मई 1976-कूप की कुल गहराई-60 फीट, चुआन – 28 फीट                

30 जून 1986-हैंडपम्प की कुल गहराई-90 फीट, चुआन-45 फीट                   

17 जुलाई 1996-बोरिंग की कुल गहराई-120 फीट, चुआन -75 फीट            

25 जुलाई 2006-कुल बोरिंग -160 फीट, चुआन-जाने कहाँ बिला गई है!!                

दूसरी कहानी कुँए से प्रारम्भ होती है, हैण्डपंप से होती हुई बोरिंग पर समाप्त होती है यानी तकनीक का विकास के साथ प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र दोहन होता है।

तीसरी कहानी कुओं की संख्या को लेकर है ,जो लगातार बढ़ती जाती है, रुकती कहाँ है? जब धरती पानी उगलना बंद कर देती है।                  

चौथी कहानी सामाजिक है। सबसे पहले जब एकमात्र कुएँ को दो फीट गहरा किया , तो गाँव के लोग भी जुटे थे। सामूहिक श्रम था। पानी के सोते फूटने पर खुशियाँ भी साझी थीं। पूरे गाँव में बताशे(मिठाई नहीं) बाँटे गए ; क्योंकि बताशे ही बँट सकते थे। आगे जाकर एक और कहानी जुड़ जाती है। जातिवार कुएँ हो गए- जातियों को मजबूत करने के लिए नेताओं के फेरे भी होने लगे। दसवाँ कुआँ पंडितों के लिए खुदा , तो मिठाई केवल पंडितों में बाँटी गई। कहानी दर कहानी जुड़ती जाती है, हैण्डपंप मिस्त्री के आते ही कुआँ खोदने वाले मजदूर के हाथ का काम कम हो गया। यहाँ शहर गाँव का अतिक्रमण कर उसकी स्वायत्तता को भंग कर, उसे शहर पर निर्भर कर देता है। जिसका परिणाम होता है बेरोज़गारी। फिर ग्रामीण बेरोज़गार को शहर भागना पड़ता है रोज़गार के लिए। घर खेतों का बँटवारा हो गया है। प्रत्येक खेत को बोरिंग चाहिए । हरेक पानी को अपनी मुट्टी में करना चाहता है। सो ठेकेदारों के बोरिंग सैट धरती को छलनी बनाए दे रहे हैं। जल स्तर के नीचे ‘उतार’ के साथ-साथ क्या-क्या नीचे उतर जाता है; यही सब कहती है यह कथा।

पचास साल को लघुकथा में समेटना मुश्किल काम है ; पर सुकेश साहनी ने इसे सफलतापूर्वक कर दिखाया। डायरी शैली में इस कथा का प्रस्तुतीकरण अच्छा बन पड़ा है। डायरी के दस-दस वर्षों के अंतराल के पन्नों का चयन कर, यह कथा प्रस्तुत की गई है। पानी की कहानी के साथ सामाजिक और राजनैतिक परिवेश को शामिल कर लिया गया है। विकास की दिशा शहरीकरण की तरफ़ होने से गाँव की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढाँचा चरमराने लगा है।

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लघुकथा

2-उतार

(कुआँ खोदने वाले मिस्त्री की डायरी से)

            10 मई 1966

            कुएँ की सफाई होनी थी। मुझे लगा अगर कुआँ दो फीट और गहरा कर दिया जाए तो ज़्यादा  पानी देगा। प्रधान जी को मेरा मशविरा पसंद आया। खुदाई शुरू करते ही गाँव के बहुत से लड़के मेरे साथ जुट गए। दो दिन का काम हमने एक दिन में ही पूरा कर लिया। कुआँ पानी से लबालब हो गया। गाँव की औरतों ने खुशी मनाई, बताशे बाँटे-पूरे गाँव में।

कुएँ की कुल गहराई: 30 फीट, चुआन (भूजल स्तर): 14 फीट

            25 मई 1976

            आज पंडितों वाला कूप तैयार हो गया। यह दसवां कुआँ है इस गाँव में। मिठाई बाँटी गई- केवल पंडितों में। जब से इन वोट वालों का आना-जाना शुरू हुआ है, गाँव का माहौल बिगड़ता जा रहा है। पहले दो कुओं से पूरा गाँव पानी लेता था, अब हर जाति का अलग कुआँ है।

कूप की कुल गहराई: 60 फीट, चुआन: 28 फीट

            30 जून 1986

            आज हरनामसिंह के घर पर गाँव का पहला हैडपम्प लग गया। शहर से मिस्त्री आया था। ठाकुर के कहने पर उसने बेमन से मुझे अपने साथ काम पर लगा लिया था। मेरे पास औजार होते तो मैं यह काम उससे कम पैसों में कर सकता था। कुल दो रुपये मजदूरी मिली। हालात ऐसे रहे तो रोटियों के भी लाले पड़ सकते हैं।

हैंडपम्प की कुल गहराई: 90 फीट, चुआन: 45 फीट

            17 जुलाई 1996

            मन बहुत उदास है। मेरे द्वारा तैयार किए गए सभी कुओं का इस्तेमाल बंद हो गया है, उनमें कूड़ा -करकट भरा हुआ है। उनकी सफाई में किसी की दिलचस्पी नहीं रही। इस बारे में कुछ भी कहो तो सभी मजाक उड़ाते हैं। बच्चे मुझे ‘सूखा कुआँ’ कहकर चिढ़ाने लगे हैं। घर-घर में हैंडपम्प लग रहे हैं। ठेकेदार के पास कई बोरिंग सैट हैं, मनमाने पैसे वसूल रहा है गाँव वालों से। मुझे जमीन के नीचे चप्पे-चप्पे की जानकारी है, ठेकेदार इस बात का पूरा फायदा उठाता है, पर मजदूरी आधी देता है। पाठशाला वाली बोरिंग का काम पूरा हो गया।

बोरिंग की कुल गहराई: 120 फीट, चुआन: 75 फीट

            25 जुलाई 2006

            तीन ठेकेदारों के सात बोरिंग सैट धरती का सीना छेदे डाल रहे हैं। पुराने लोग एक-एक कर खत्म होते जा रहे हैं। घर-खेतों का बँटवारा हो गया है। जहाँ चार भाइयों के खेतों पर एक बोरिंग से बखूबी काम चलता था, वहीं बँटवारे के बाद हरेक खेत में एक बोर वैल ज़रूरी हो गया है। हरेक पानी को अपनी मुट्टòी में करना चाहता है। इस बूढ़े शरीर से अब मजदूरी नहीं होती। काश! मैं एक बोरिंग सैट खरीद पाता। दो रोटियों के लिए इन बदमिजाज लड़कों के आगे रोज ही जलील होना पड़ता है।

            नेता जी के फार्म हाउस पर चल रहे बोरिंग के काम ने थका डाला है। काम शुरू हुए आज नौवां दिन है,पर बोरिंग कामयाब होती नहीं दीख रही।

            कुल बोरिंग:160 फीट, चुआन:जाने कहाँ बिला गई है!!

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