लस्सी/ सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
“आइए सर! नमस्ते।”
स्कूल ढूँढने में कोई परेशानी तो नहीं हुई?”
“कोई विशेष नहीं, सड़क थोड़ी खराब थी, बस।”
” सर सड़क बनाने वाले और उसको सुपरवाइज करने वाले दोनों भ्रष्ट हैं। अभी कुछ दिन पहले ही नई बनी है। वैसे हमारा स्कूल तो मेन रोड पर ही है, दूर से ही दिख जाता है। इसलिए ढूँढने में परेशानी नहीं होती।
“कैसे आए हैं आप?”
“स्कूटर से!”
” ओह गर्मी बहुत है। सड़क पर ट्रैफिक भी बहुत है। आप फोन कर देते तो हम गाड़ी भिजवा देते। बहरहाल आप ए. सी. रूम में बैठिए। रिलेक्स हो लीजिए।”
“क्या प्रश्न पत्र के पैकेट खोल लिये हैं?”
“जी सर, अभी – अभी खोले हैं। आप साइन कर दीजिएगा।”
“जी! लाइए।”
” सर ! जल्दी क्या है! पहले आप थोड़ा रिलेक्स हो लीजिए।”
” ऐसी कोई बात नहीं। मैं थका हुआ नहीं हूँ। चलिए एक राउंड परीक्षा कक्ष का ले लेते हैं।”
“अभी तो सर, प्रश्नपत्र बँटा भी नहीं हैं। बच्चे भी पूरे नहीं आए हैं। आप कुछ ठंडा तो ले लीजिए, फिर चलते हैं।”
वे उसके इतने आत्मीय आग्रह को टाल नहीं सके और शिष्टाचार के तकाजे का सम्मान करते हुए मैनेजर के ए.सी. कक्ष में बैठ गए। थोड़ी ही देर में शहर के सबसे मशहूर और महँगे लस्सी वाले की कुल्हड़ वाली लस्सी, जिसमे पिश्ते भी पर्याप्त मात्रा में थे, उनके सामने परोसी जा चुकी थी।
उन्होंने निरपेक्ष भाव से लस्सी से भरे कुल्हड़ पर एक उड़ती- सी नजर डाली और बोले, “मैं सोच रहा था पहले जरा चलकर बच्चों की सिटिंग व्यवस्था देख लें, फिर बैठे।”
“सर! बड़ी स्वादिष्ट लस्सी है, गरम हो गई, तो सारा मजा जाता रहेगा। हमारे स्कूल की व्यवस्था हर तरह से उत्तम है. आप टेंशन न ले। पहले आप इस खालिस हिंदुस्तानी पेय का आनन्द लें।”
उनकी सहज प्रकृति, इस अनुरोध को नजरअंदाज नहीं कर सकी। उन्होंने लजीज लस्सी का कुल्हड़ उठाया और अपने होठों से लगा लिया। लस्सी वास्तव में बेहद स्वादिष्ट थी और उसमें घुले मेवे उसकी पौष्टिकता का एहसास करवा रहे थे। लस्सी को उन्होंने अपनी आदत के अनुरूप चबा- चबाकर पिया। लस्सी पीने के बाद, उन्हें अपने महत्त्वपूर्ण होने के भाव ने सन्तुष्ट भी किया। लस्सी पी चुकने के बाद उन्हें लगा कि धन्यवाद आवश्यक है। सो बोले, “लस्सी. स्वादिष्ट तो थी ही. पर्याप्त पोषक भी लग रही थी। इतना खर्च करने की क्या जरूरत थी?”
“सर, ऐसा न कहिए। आप हमारे मेहमान ही नहीं श्रद्धेय भी हैं। यह तो हमारा कर्म था। वैसे आपने बिलकुल ठीक कहा। ये कुल्हड़ वाली लस्सी अपने शहर के सबसे प्रतिष्ठित हलवाई की बनी है और इसकी बनाई लस्सी की बात ही निराली है।”
“सच कहा आपने। अब जरा वो काम भी कर लें, जिसके लिए विभाग ने मुझे भेजा है। परीक्षा कक्ष की तरफ चलना चाहिए।”
“हाँ – हाँ। चलते हैं न। सर, मौसम में वैसे तो गर्मी हर साल आती है; पर इस बार तो इसमें आम चुनावों की गर्मी भी मिल गई है। क्या लगता है आपको, किसकी हवा है?”
“देखो, जनता किसे जीत का सेहरा बाँधती है!”
“सही कहा सर, पर करप्शन इतना बढ़ गया है कि हर कोई परेशान है, मैं तो यहां तक कहता हूँ कि आतंकवाद की जड़ भी करप्शन ही है। करप्शन हटा दीजिए, देश के आम लोगों की आधी से ज्यादा समस्याओं का निदान पलक झपकते ही हो जाएगा।”
“आपकी बात सोलह आने सच्च है। अब जरा एक राउंड परीक्षा कक्ष का भी ले लें, फिर बैठकर चर्चा करते हैं।”
“सर! बच्चे आजकल इम्तहान को एक फोबिया की तरह लेते हैं। हमारे -आपके जाने से तनाव में आ सकते है। हमारे स्कूल की व्यवथा इतनी चुस्त है कि कोई बच्चा, कोई गलत काम कर ही नहीं सकता। आप निश्चिन्त रहिए। वैसे मैंने खाना मँगवा लिया है, पहले उसे खा लें, फिर आप चाहेंगे, तो चल पड़ेंगे।”
उन्होंने सोचा जब लस्सी इतनी लजीज़ और पोषक थी, तो खाना तो न जाने कैसा होगा। क्यों न उसे भी खा लिया जाए”
थोड़ी देर में वहीं खाना भी लग गया।
इन सब औपचारिकताओं में परीक्षा का समय कब समाप्त हो गया, उन्हें पता ही नहीं चला और परीक्षार्थी परीक्षा देकर चले भी गए।
उनके सामने इंस्पेक्शन रिपोर्ट तैयार करके रख दी गई। उन्होंने हस्ताक्षर किए, इंस्पेक्शन रिपोर्ट को अपने बैग के हवाले किया और फिर अपने स्कूटर की ओर बढ़ने को हुए ही थे कि मैनेजर ने उनकी ओर एक लिफाफा बढ़ाते हुए कहा, “एक मिनट सर, ये आपके लिए।”
“ये क्या है?” वे फुसफुसाए ।
“सर, आपने इतना कॉपरेट किया है, तो हमारा भी कुछ फर्ज बनता है न । ज्यादा नहीं है। सर, रख लीजिए।”
“अरे नहीं, इसकी क्या जरूरत थी। परीक्षा ठीक-ठाक हो गई, यही काफी है।” उन्होंने लिफाफा पकड़ते हुए कहा और बिना देरी किए अपने स्कूटर की ओर बढ़ गए, जिससे अँधेरा होने से पहले घर पहुँच सकें।