
राधा ने ‘उपमा’ टेबल पर रखा तो सहसा मैं बोल पड़ा -“आज से पचपन साल पहले भी तुम इसी तरह नाश्ता लगाती थी और हम दोनों खाते थे! इतने सालों में कुछ नहीं बदला!”
“हाँ अब भी हम दो डब्बों की ट्रेन है! मैंने तो सोचा था और डब्बे जुड़ जाएँगे ; पर वे लोग तो मुसाफिर निकले!”
“छोड़ो भी राधा ; तुमने तो हँसते- हँसते उन्हें हवाई अड्डे पर उतार जो दिया!”
“बताओ और क्या करती …?’’
‘‘सोचा था- तुम्हें आराम मिलेगा; पर उन्होंने अपने कैरियर की दुहाई दी और ….?”
“हाँ बहू भी तो चाहती थी- चूल्हे- चौके की जिंदगी से बाहर निकलकर खुले आसमान में उड़ना? इसलिए मैंने उसे सहर्ष जाने दिया।”
“राधा हमारी दो डब्बों की ट्रेन सवारियाँ उतारते हुए अब अंतिम स्टेशन की और जा रही है… तुम्हें डर नहीं लगता?” -मैने उसके चेहरे की गहराई में उतरने की कोशिश की।
“पवन, तुम इंजन हो और मैं ट्रेन की गार्ड। पूरे सफर में न तो मेरी हरी झंडी रुकी और न ही तुम्हारा इंजन फेल हुआ। बस पूरी शिद्दत से हमने सवारियों को मंजिल पर पहुँचा दिया। तुम तो जानते हो- मुसाफिर कभी मुड़कर नहीं देखता?”-
वह बिंदास हँस रही थी। उसका थुलथुल पेट हिल रहा था और बिना दाँत के मुँह ऐसा लग रहा था जैसे बुद्धा हँस रहा हो… ‘लाफिंग बुद्धा’।
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