लिहाज
कुमार गौरव
छुट्टन पान की दुकान पर सिगरेट फूँक रहे थे कि सामने मदन बाबू छुट्टन के चाचा के साथ आते दिख गए। छुट्टन सिगरेट पीछे छुपा लिए, हालाँकि इस चक्कर में मटियातेल से चलनेवाले विक्रम टेम्पो की तरह उनके पिछवाड़े से धुआँ निकलता रहा।
चाचा मदन बाबू के साथ सामने से गुजरे तो छुट्टन दुकान पर से ही प्रणाम फेंके, ‘‘गोर लागअतानि चाचा!’’
चाचा मुस्कराए, ‘‘का हो हीरो, हम्मर खटिया नहीं न बिनाया।’’
छुट्टन ने आश्वासन दिया, ‘‘कल दोपहरी में बिना जाएगा चाचा बस कौनो भिण्डा पकड़ने वाला खोज के रखिएगा।’’
दोनों आगे बढ़े तो मदन बाबू ने टोका, ‘‘आप ही मन बढ़ाए हुए हैं इसका, सिगरेट पी रहा था, डाँटना चाहिए था आपको। बड़का भैया ( छुट्टन के बाबू) देखते तो तत्काल कूट देते।’’
‘‘काहे भैया, काहे डाँटें, हमरी माई भी तो बीड़ी पीती है। हम भी सिगरेट पीते हैं, और भैया जवानी में कौनो कम गाँजा पिए हैं’’
मदन बाबू कन्फ्यूज हो गए, ‘‘लेकिन इस उमर में चौराहे पर सरेआम, लोग का कहेंगे!’’
हँसकर मदन का कन्धा थपथपाए, ‘‘देखकर सिगरेट छुपा लिया था, बस इतना लिहाज काफी है। दो दिन लगातार टोकेंगे तो सामने आकर पीने लगेगा। भैया के इसी व्यवहार से उनको एक लोटा पानी नहीं देता है ये लड़का। लेकिन हमरा तो खटिया भी बिनने के लिए तैयार है।’’
मदन बाबू प्रतिरोध करना चाहे, ‘‘लेकिन…..’’
‘‘कुच्छो लेकिन-वेकिन नहीं है मदन, कपड़े के भीतर झाँकोगे तो सब नंगे ही दिखेंगे।’’
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