इस अंक में पुरस्कृत लघुकथाओं के प्रकाशन के साथ ही कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता का बारहवाँ आयोजन संपन्न हो गया है और अगले यानी तेरहवें आयोजन की घोषणा अगले अंक में हो जाएगी। यह नए-पुराने लेखकों/पाठकों का प्यार ही है कि यह प्रतियोगिता 2006 से निर्बाध रूप से चल रही है। प्रसन्नता का विषय यह भी है कि इस प्रतियोगिता में प्रतिभागिता करनेवालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। इनमें नई पौध क़े साथ-साथ वरिष्ठ/स्थापित कथाकारों ने भी रुचि दर्शाई है, जो पत्रिका के लिए सम्मान की बात है। हम ऐसे सभी साथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
इस प्रतियोगिता क़े माध्यम से लघुकथा क़े क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हुई है। पिछली ग्यारह प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत सभी लघुकथाएँ ‘कथादेश : पुरस्कृत लघुकथाएँ‘ क़े नाम से ‘नयी किताब समूह प्रकाशन‘ द्वारा पाठकों क़े लिए उपलब्ध कराई गई है। उल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय स्तर पर किसी भी प्रतिष्ठित पत्रिका द्वारा आयोजित होने वाली प्रतियोगिता में पुरस्कृत लघुकथाओं का यह पहला संग्रह है। इसका लोकार्पण प्रसिद्ध साहित्यकार महेश कटारे जी की अध्यक्षता में विश्व पुस्तक मेले में सम्पन्न हुआ था । इस अवसर पर वागर्थ के संपादक शम्भूनाथ जी, प्रसिद्ध कहानीकार भालचंद जोशी, प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह, पवन करन , सुभाष नीरव , अवधेश श्रीवास्तव और पुस्तक के संपादक हरिनारायण एवं सुकेश साहनी सहभागी रहे थे। इस अवसर पर सभी ने अपने विचार रखे थे; परन्तु महेश कटारे जी क़े अध्यक्षीय उद्बोधन से सुखद आश्चर्य हुआ था । महेश कटारे जी ने पहली कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाई थी, यानी लगभग चौदह वर्ष पहले। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने लघुकथा ‘दंश (दिनेश भट्ट) का उल्लेख किया। हैरानी की बात यही थी कि चौदह वर्ष पूर्व पढ़ी लघुकथा उन्हें याद थी। पुस्तक में संगृहीत पुरस्कृत लघुकथाओं क़े महत्त्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा था कि अच्छी लघुकथाएँ पाठक को देर तक याद रहती हैं। प्रत्येक वर्ष इस लेख/टिप्पणी क़े अंत में लघुकथा क़े गुण-धर्म को लेकर उदाहरण स्वरूप एक लघुकथा दी जाती रही है। इस बार महेश कटारे जी द्वारा संदर्भित लघुकथा ‘दंश'(दिनेश भट्ट) दी जा रही है।
लघुकथा प्रतियोगिता-1 से 12 तक निर्णायक मंडल में मैनेजर पाण्डे, सुभाष पन्त, महेश कटारे, विभांशु दिव्याल, सुरेश उनियाल, हृषिकेश सुलभ, राजकुमार गौतम, सत्यनारायण, भालचंद्र जोशी, आनंद हर्षुल, योगेंद्र आहूजा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, श्याम सुन्दर अग्रवाल , देवेंद्र, श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’, जितेंद्र रघुवंशी,गौतम सान्याल, जय प्रकाश, हरिनारायण एवं सुकेश साहनी शामिल रहे।
लघुकथा प्रतियोगिता-12 के लिए बहुतायत में लघुकथाएँ प्राप्त हुईं। पिछले सभी आयोजनों से अधिक। मेल से रचनाएँ भेजने का प्रचलन बढ़ा है, जो सुविधाजनक भी है। प्रतियोगिता में भाग लेने वालों में नवोदितों का प्रतिशत अधिक है। इधर लघुकथा के शास्त्रीय पक्ष को लेकर काफी काम हो रहा है। लघुकथा समीक्षा को लेकर काफी पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं। लघुकथा में विभिन्न विषयों को लेकर शोध कार्य भी हो रहे हैं। अक्सर कुछ प्रतिभागियों द्वारा पूछा जाता है कि हमारी लघुकथा प्रतियोगिता से बाहर क्यों हो गई ? क्या वह लघुकथा के समीक्षा-बिंदुओं पर खरी नहीं उतरती थी? आगामी प्रतियोगिताओं को दृष्टिगत रखते हुए यह बताना जरूरी है कि ‘प्राथमिक छँटनी’ में भी सम्बन्धित निर्णायक/ कथाकार/सम्पादक प्रतियोगिता हेतु प्राप्त लघुकथाओं को ‘आम पाठक’ की तरह ही पढ़ते हैं। इसमें लघुकथा के शास्त्रीय पक्ष को लेकर कोई माथापच्ची नहीं की जाती है। प्रथम दृष्टया निम्न बिंदुओं का संज्ञान लेते हुए चयन किया जाता है –
(1) विचारार्थ प्रेषित रचना को ‘लघुकथा‘ होना ही चाहिए।
लघुकथा के भिन्न –भिन्न ‘नामकरण’ करने के हास्यास्पद प्रयास हुए,जो सफल नहीं हुए। हिंदी और अंग्रेजी में अब इसे ‘लघुकथा’ के रूप में ‘पहचान’ मिल चुकी है। इसमें किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए। जैसे ‘आदमी’,’घोड़ा’,’कबूतर’ या ‘मछली’ का नाम लेते ही सम्बन्धित का चित्र हमारी आँखों के आगे आ जाता है, उसी तरह ‘लघुकथा’ का नाम लेते ही उसका चित्र मस्तिष्क में बन जाता है। आकार को लेकर भी अनावश्यक विवाद उत्पन्न किया जाता है, जिससे आने वाले नए लेखक भ्रमित ही होते हैं। लघुकथा के आकार को लेकर सतीशराज पुष्करणा की टिप्पणी बहुत सटीक लगती है कि आदमी मोटा भी होता है और पतला भी,लम्बा भी और ठिगना भी; तो क्या वह ‘आदमी’ की श्रेणी में नहीं आएगा? अर्थात ‘रचना’ को ‘लघुकथा’ होना ही चाहिए। कई बार चार-पाँच पृष्ठों की रचनाएँ ‘लघुकथा’ के रूप में प्राप्त होती हैं,’लघुकथा’ न होने के कारण ये प्रतियोगिता से बाहर हो जाती हैं।
(2) कथानक अथवा विषय-वस्तु में नवीनता
लघुकथा लिखने में जल्दबाजी के कारण मिलते-जुलते कथानकों पर बहुत सी रचनाएँ प्राप्त होती हैं,जिनमें कोई नवीनता नहीं होती। आकारगत लघुता के कारण यह संकट लघुकथा में अन्य विधाओं की तुलना में बहुत अधिक हैं। लघुकथाओं पर टिप्पणी के दौरान इस बिंदु पर आगे विस्तृत चर्चा की जाएगी। एक ही विषय पर अनगिनत लघुकथाएँ लिखी जा सकती हैं, लेकिन उनका प्लाट या थीम अलग होना ही चाहिए। संयोगवश यदि कथानक भी मिलता जुलता है, तो ‘कथ्य’ तो अनिवार्य रूप से अलग होना चाहिए।
(3) पाठक की पसंद – सर्वोच्च प्राथमिकता
पत्रिका और लेखक दोनों का ही एक ही उद्देश्य होना चाहिए कि पाठक के समक्ष अपना सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुत करें, जिसे पढ़कर पाठक को लगे कि पढ़ना सार्थक हुआ। रचनाओं का चयन करते हुए इस बिंदु को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। सैकड़ों रचनाओं में से ऐसी रचनाएँ गिनी-चुनी ही होती हैं, जो रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु‘ के इस कथन की पुष्टि करती हों –‘जब किसी रचनाकार का रचनाकर्म या कोई विशिष्ट रचना पाठक को वशीभूत कर ले,उस रचना के समग्र प्रभाव की अनुगूँज रह-रहकर मानस में उत्ताल तरंगों की तरह उभरती रहे,रचना का अविच्छिन्न प्रभाव सहृदय पाठक को सोचने पर बाध्य कर दे।अनायास मुँह से आह! या वाह! निकल पड़े। तभी समझो कि रचना अपने नाम से याद की जाएगी,यानी रचनाकार को ‘रचना‘ के नाम से याद किया जाएगा।‘ यहाँ ऊपर चर्चा में आई ‘दंश‘ लघुकथा का उदाहरण दिया जा सकता है।
(4) एक ही फाइल में अधिकतम तीन लघुकथाओं का प्रेषण
कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता की घोषणा में लिखा जाता है कि एक कथाकार एक से अधिक लघुकथाएँ विचारार्थ भेज सकता है। पिछली टिप्पणियों में इसे स्पष्ट किया गया है-एक से अधिक का अभिप्राय ‘अधिकतम तीन‘। लेखक अलग -अलग फाइलों में दस-पंद्रह लघुकथाएँ भेज देते हैं। इसे उनका अपने सृजन में विश्वास न होना ही कहा जाएगा। इससे कथादेश सम्पादकीय कार्यालय और निर्णायकों दोनों का काम बहुत बढ़ जाता है। भविष्य में कृपया एक ही फाइल में अधिकतम तीन रचनाएँ ही भेजें। प्रथम तीन के बाद की लघुकथाओँ पर विचार नहीं किया जाएगा।
प्रतियोगिता हेतु प्राप्त लघुकथाओं में से कुल 35 लघुकथाओं का चयन निर्णायकों के पास भेजने हेतु किया जा सका । निर्णायकों (कथाकार आनंद हर्षुल, आलोचक जयप्रकाश और कथाकार सुकेश साहनी ) द्वारा दिए गए अंकों के आधार पर प्रथम 12 पुरस्कृत लघुकथाएँ निम्न हैं- –
(1)पिता (महेश शर्मा), (2) रावण (महावीर राजी), (3) राजनीति (मार्टिन जॉन), (4) सर्द जवाब (संतोष सुपेकर), (5)दूध (विभा रश्मि), (6) आजादी (मीना गुप्ता), (7) जंगल की ओर (राम मूरत राही), (8)फूल बाई (सविता प्रथमेश ), (9) रिश्ते (नमिता सचान), (10) आवाज़ (मृणाल आशुतोष), (11) भोला (सीमा वर्मा), (12) मदारी (राघवेन्द्र रावत)
कथादेश परिवार और निर्णायकों की ओर से पुरस्कृत लघुकथा लेखकों को हार्दिक बधाई !
शेष चयनित लघुकथाओं का विवरण निम्नानुसार है –
तुलसी विवाह (गोविंद भारद्वाज), सवाल (नीरज नीर), एरिया (गोकुल सोनी), बिरादरी (नमिता सचान), सजा (रजनीश दीक्षित), मी टू (वीना श्रीवास्तव), अरूप रूप (संध्या तिवारी), दया (गोकुल सोनी), लड़कियाँ और रंग (खेमकरण सोमन), दृष्टि (मनजीत शर्मा ‘मीरा), ढलते वक्त (कुणाल शर्मा), आत्मविश्वास (प्रियंवदा), बरसात (डॉ0 पूरन सिंह), एक और एक ग्यारह (रत्न कुमार सांभरिया),वर्दी वाले (सविता मिश्रा), खिड़की का दुख (राधेश्याम भारतीय), खबर है कि… (मनजीत शर्मा‘मीरा’), कठपुतली (भगवान वैद्य ‘प्रखर), आईना (इन्द्रजीत कौशिक), शौक़ीन (निरंजन धुलेकर), आवाज (अरुण कुमार), अनपढ़ (ज्योति जैन), इमोशन का तड़का (मार्टिन जॉन)
अंतिम चक्र तक पहुँची लघुकथाओं को कथादेश के सामान्य अंक में प्रकाशित किया जाता रहा है। जाहिर सी बात है कि इसमें समय लगता है,धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। जो लेखक इसमें रुचि न रखते हों और अपनी रचना अन्यत्र छपवाना चाहते हों, वे कथादेश को सूचित करते हुए अपनी रचना अन्यत्र भेज सकते हैं। उनकी रचना प्रतीक्षा सूची से हटा दी जाएगी। ऊपर प्रतियोगिता हेतु दस से पद्रह लघुकथाएँ भेजने वालों के संदर्भ में टिप्पणी की गई थी, जिसका आशय यही था कि गुणवत्ता महत्त्वपूर्ण है न कि संख्या। ऊपर दी गई सूची से इस बात की पुष्टि होती है। कुल चयनित 35 लघुकथाओं में मार्टिन जॉन, नमिता सचान और मंजीत शर्मा ‘मीरा‘ जैसों की दो-दो रचनाएँ पहुँची हैं।
लघुकथाओं पर विमर्श से पहले सम्पादक कथादेश-हरिनारायण जी के प्रति आभार व्यक्त करना चाहूँगा,हालाँकि मेरी इस टिप्पणी पर भी इस मौन साधक को संकोच /आपत्ति होगी। लघुकथा प्रतियोगिता का यह गरिमापूर्ण आयोजन उन्हीं के कारण संभव हो पा रहा है। इस प्रतियोगिता में पहले-पहल प्रतिभाग कर बहुत से कथाकारों ने लघुकथा लेखन में अपनी पहचान बनाई है। कथादेश के अलावा प्रथम पंक्ति की ऐसी कोई दूसरी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका नहीं है, जिसने लघुकथा को महत्त्व देते हुए निरंतर बारह लघुकथा विशेषांक(पुरस्कृत लघुकथाओं पर केंद्रित) निकाले हों,और फिर पुरस्कृत लघुकथाओं का संकलन भी प्रकाशित किया हो। कूप-मंडूक सोच वाले अपनी टर्र-टर्र में गलती से भी इस आयोजन/संकलन का नाम नहीं लेते।
आगे चर्चा करने से पूर्व यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी पुरस्कृत लघुकथाएँ स्वागत योग्य हैं। अपनी खूबियों के कारण ही इनका चयन हुआ है। यहाँ रचनाओं पर चर्चा का उद्देश्य, लघुकथा के विकास के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर ज़मीन तैयार करना होता है, न कि रचना की कमजोरियाँ गिनाना। विमर्श के इस दोतरफा आदान-प्रदान से निर्णायकों समेत सभी को कुछ सीखने को मिलता है। निर्णायकों से बड़ा तो आम पाठक होता है। कथादेश के स्तम्भ ‘अनुगूँज’ में पाठक निर्णायकों के निर्णय पर खुलकर अपना ‘फैसला’ सुनाते हैं।
पिता (महेश शर्मा) निर्णायकों के सम्मिलित अंकों के आधार पर प्रथम रही। महेश शर्मा आज लघुकथा के क्षेत्र में जाना-माना नाम है। इनकी पहली लघुकथा ‘सॉरी,डियर चे‘ कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता-4 में पुरस्कृत हुई थी। पिछले दस वर्षों में महेश शर्मा की दस-बारह लघुकथाओं को पढ़ने का अवसर मिला है, इनमें चार तो कथादेश में ही पुरस्कृत हुई हैं । शायद उन्होंने पंद्रह-सोलह से अधिक लघुकथाएँ नहीं लिखी होंगी, पर उनकी सभी लघुकथाएँ बहुत सराही गई हैं। दूसरी ओर ऐसे रचनाकार भी हैं, जिनके लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हो गए हैं, पर उनकी पाँच स्तरीय रचनाएँ ढूँढे नहीं मिलती।
‘पिता‘ पर केंद्रित दो बहुत ही उत्कृष्ट लघुकथाएँ याद आ रही हैं,एक –रघुनन्दन त्रिवेदी की ‘स्मृतियों में पिता‘ और दूसरी सत्यनारायण जी की ‘आईना‘, दोनों रचनाएँ पाठक के दिलो-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। महेश शर्मा की ‘पिता’ वर्तमान पीढ़ी के सोच को बहुत ही सहजता से पेश करती है,पर उसके निहितार्थ बड़े गहरे है। हमें याद है कि बचपन में जब पिता जी बाहर से घर आते थे, तो हम भाई, बहन इधर उधर दुबक जाते थे। उनके घर से जाते ही हुड़दंग शुरू हो जाता था। हमें नहीं याद कि उन्होंने अपने प्यार का ज़रा-सा भी इज़हार हमसे किया हो। लेकिन हमारे मन में कभी नहीं आया कि हमारे प्रति उनके उनके प्यार में कोई कमी थी। उनकी टोका -टाकी को हम बहुत सहज रूप में लेते थे।
महेश शर्मा की लघुकथा में पुत्र पिता की टोका-टाकी से खीझकर उनकी अवमानना करने लगता है,उनके प्रति विद्रोह से भर उठता है। तय करता है कि वह अपने बच्चों को कभी नहीं टोकेगा, उनके साथ दोस्ताना व्यवहार रखेगा। वह उस पर अमल भी करता है और उसे लगने लगता है कि वह बच्चों के लिए दुनिया का ‘द बेस्ट पा’ है।
अपने पिता से उसकी असंवाद जैसी स्थिति थी, उसने मन ही मन धारणा बना ली थी कि पिता उससे बदला ले रहे हैं- उसे चिढ़ाने कि लिए शेव नहीं करते, ज्यादातर पायजामा और बनियान ही पहने रहते हैं। बेटी को देखने लड़के वाले आते हैं ,तो उसे पिता की ज़रूरत पड़ती है, वह आदेशात्मक स्वर में उनसे कहता है, ” थोड़ा हुलिया सुधार लीजिए -नाख़ून काट लीजिए -शेव बना लीजिए -और ग्रे कलर का सूट हैं न आपका- उसे पहन लीजिए”
बहुत-सी प्रसिद्ध कहानियों में हम देखते हैं कि इस स्थिति में बूढी माँ को सामने नहीं आने दिया जाता, छिपाया जाता है मेहमानों से। उन कहानियों से उलट, अलग कोण प्रस्तुत करते हुए महेश शर्मा चमोत्कर्ष पर लघुकथा का समापन कर सकते थे ,पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि समाज की नब्ज पर लेखक का हाथ है। इसीलिए महेश शर्मा लघुकथा-लेखन में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुए हैं। यहाँ चरमबिंदु पर कथ्य प्रकटीकरण को लेकर कथाकार भगीरथ की टिप्पणी प्रस्तुत है –‘कथ्य प्रकटीकरण का समायोजन लघुकथा की जान है। कथ्य प्रकटीकरण का ढंग कौशलपूर्ण हो, तो वह कलात्मक हो जाती है। अक्सर रचनाकार संवाद के माध्यम से,सांकेतिक,प्रतीकात्मक या व्यंजनात्मक भाषा में कथ्य का प्रभावी प्रकटीकरण करते हैं। अक्सर चमोत्कर्ष पर ही कथ्य का उद्घाटन होता है। कथ्य हल के रूप में नहीं किया जाय बल्कि समस्या से साक्षात्कार का ही उद्देश्य होना चाहिए। कथ्य ऐसे हों जो व्यापक सामाजिक मुद्दे छूते हों। पाठक की भावनाओं को,विचारों को एवं सौंदर्यबोध को अपील कर सकें ।’
महेश शर्मा के लघुकथा लेखन की विशेषता है की लघुकथा लिखते समय लघुकथा लेखन के लिए निर्धारित मानबिंदु मस्तिष्क में नहीं होते हैं , होने भी नहीं चाहिए। यह लेखक ही है,जो समीक्षकों को लघुकथा-लेखन हेतु अपने निर्धारित मानदंडों पर पुनर्विचार के लिए बाध्य कर देता है। महेश की लघुकथा यह स्थापित करने में सफल रही है कि लघुकथा में एक से अधिक चमोत्कर्ष हो सकते हैं।
पिता को आदेश देकर लौटते पुत्र को पिता का गंभीर स्वर सुनाई देता है ,”अपनी शेविंग क्रीम दे जाओ। मेरी वाली ख़त्म हो गई है।”
रचना इसी संवाद पर ख़त्म हो जाती है, बेटे की किसी प्रतिक्रिया का उल्लेख नहीं है। लेकिन पाठक मुँह से ‘आह’ निकल जाती है, बेटे के पैरों के नीचे से निकलती जमीन महसूस की जा सकती है,अपने बर्ताव और गलत धारणा के कारण न जाने कितने वर्ष पुत्र की मुठ्ठी से रेत की मानिंद फिसल जाते हैं। पुत्र की गलत धारणा के कारण अभावों में चुपचाप जी रहे पिता का मार्मिक चित्र विचलित कर देता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि लघुकथा- लेखन को लेकर महेश शर्मा कि दृष्टि बहुत साफ़ है।’पिता’ लघुकथा में भी ‘कथ्य’ पर उनका फोकस और शब्दों की मितव्ययिता प्रशंसनीय है। यही वजह है कि प्रतियोगिता में भी प्राप्त अंकों के आधार पर वह अपने निकटतम प्रतिभागियों से बहुत आगे खड़े दिखाई देते हैं।
महावीर राजी की लघुकथा ‘रावण‘ देश के वर्तमान परिदृश्य का सटीक चित्रण करते हुए तथाकथित छिपे हुए असंख्य-असंख्य रावणों की ओर ध्यान खींचने में सफल रही है। महावीर राजी वरिष्ठ कथाकार हैं, कहानियों के साथ-साथ स्तरीय लघुकथा लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। ‘रावण’ का कथ्य बहुत महत्त्वपूर्ण है, कथ्य के अनुरूप ही भाषा का चयन किया गया है। बुराई अच्छाई की आड़ में अपना खेल खेलती है और धीरे-धीरे अच्छाई को कुतरती जाती है। इसी कथ्य को बहुत ही रोचक ढंग से ढंग से पेश किया गया है। देश में राम की आड़ में जो ‘खेल’ हो रहे हैं, उनसे सभी वाकिफ़ हैं, लघुकथा का समापन देखें –रावण हर बार की तरह इस बार भी सूक्ष्म रूप धरकर पुतले से निकला और हवा में घुमेरे घालता सीधे राम के भीतर की अशोक वाटिका में जा छुपा, आज भी वहाँ आराम से बैठा हुआ है, राम के भीतर के ‘राम‘ को शनैः शनैः कुतरने में लगा है। राम के सारे भक्त भक्तिभाव से ‘जय श्रीराम‘ के नारे लगाते पुतले को धू –धू करके जलते देख रहे हैं। नारों के समवेत कोलाहल में राम की भीतर सुरक्षित बैठे रावण की खिलखिलाहट किसी को भी सुनाई नहीं पड़ती।
‘मोपासां ने कहा था कि कहानी में अगर आप बन्दूक को दीवार पर टँगा दिखा रहे हैं। तो वह बन्दूक चलनी भी चाहिए।लघुकथा में तो यह और भी जरूरी हो जाता है,आकारगत लघुकथा की अनिवार्यता के कारण उसमें एक शब्द भी फालतू नहीं होना चाहिए। लेखक ने रावण को ‘राफेल’ पर सवार दिखाया है, दशहरे पर रावण राफेल से नीचे कूदता है और कलाबाजी खाते हुए मैदान खड़े अपने पुतले में समा जाता है। इसके अलावा पूरी लघुकथा में राफेल का कोई उपयोग नहीं है।
राफेल फ़ौज द्वारा इस्तेमाल किया जानेवाला लड़ाकू विमान है। आज ही एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की हैड लाइन पढ़ रहा था कि ‘काशी की शिवांगी होंगी राफेल की पहली महिला पायलट’। है। क्या ‘रावण’ लघुकथा में ‘राफेल’ कथ्य से सम्बन्धित है? क्या इसके उल्लेख से एक ‘बड़ी‘ लघुकथा का दायरा कुछ सीमित नहीं हो जाता?
यदि लघुकथा का कथ्य रक्षा सौदों में घोटाले से सम्बन्धित होता तो राफेल का उल्लेख स्वाभाविक लगता । डॉ0 सतीशराज पुष्करणा की एक प्रसिद्ध लघुकथा का शीर्षक ही ‘बोफ़ोर्स कांड’ है।
तीसरे स्थान के लिए मार्टिन जॉन की ‘राजनीति‘ पुरस्कृत हुई है। मार्टिन जॉन कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता में कई बार पुरस्कृत हो चुके हैं। लघुकथा की विकास-यात्रा में निरंतर सक्रिय रहे हैं। वरिष्ठ लघुकथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
देश में साम्प्रदायिक सद्भाव की कमी नहीं है, बहुत रोचक संवादों से मार्टिन जॉन कथा की शुरूवात करते हैं –
“ओए पंडत ….! कहाँ मर गया रे!”
“मुझसे पहले तू मरेगा नासपीटे मौलाना।….क्यों चीख रहा है पागलों की तरह ?”
दोनों में खूब प्यार है, मंदिर मस्जिद के एक अहाते में साथ-साथ होने की खबर तफसील से अखबार में छपती है। खबर पढ़कर विधायक जी दौड़े चले आते हैं। उनके बीच कायम साम्प्रदायिकता सद्भाव की मिसाल को अपने पक्ष में भुनाने के लिए दोनों की तारीफ़ करते हैं, कहते हैं कि उनके माध्यम से यह सन्देश दूर तक पहुँचेगा। उस परिसर में उनका आना-जाना शुरू हो जाता है। पंडित और मौलाना, दोनों के घरों में उनकी खूब आवभगत होती है।
लघुकथा इस चरमोत्कर्ष पर समाप्त हो जाती है कि विधायक जी के ‘सत्संग’(राजनीति) से मंदिर- मस्जिद वाला परिसर दो भागों में बँट जाता है। देश में व्याप्त साम्प्रदायिक सद्भाव को किस प्रकार राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति चमकाने के लिए नष्ट कर देते हैं,उसका प्रभावी चित्रण हुआ है।
आगे रचनाओं पर विमर्श से पूर्व वर्तमान लघुकथा लेखन में व्याप्त प्रमुख समस्या पर चर्चा करना आवश्यक है, इसी क्रम में यहाँ प्रस्तुत है राम पटवा कि लघुकथा ‘अतिथि कबूतर‘-
रोज सुबह एक छत पर दो कबूतर मिला करते थे। दोनों में घनिष्ठ मित्रता हो गई थी। एक दिन दूर खेत में दोनों कबूतर दाना चुग रहे थे, उसी समय एक तीसरा कबूतर उनके पास आया और बोला, ‘मैं अपने साथियों से बिछड़ गया हूँ । कृपया आप मेरी मदद करें।
दोनों कबूतरों ने आपस में गुटर-गूँ किया, ‘‘भटका हुआ अतिथि है… ‘अतिथि देवो भवः’ लेकिन प्रश्न खड़ा हुआ कि यह अतिथि रुकेगा किसके यहाँ ? दोनों कबूतर अलग-अलग जगह रहते थे, एक मस्जिद की मीनार पर तो दूसरा मंदिर के कँगूरे पर।’’
अंततः यह तय हुआ कि अतिथि कबूतर को दोनों कबूतरों के साथ एक-एक दिन रुकना पड़ेगा।
तीसरे दिन ‘अतिथि’ की भावभीनी विदाई हुई। दोनों मित्र अतिथि कबूतर को दूर तक छोड़ने जाते हैं। शाम को जब वे लौटे तो देखा-मंदिर और मस्जिद के कबूतरों, में ‘अकल्पनीय’ लड़ाई हो रही है। इस दृश्य से दोनों स्तब्ध रह जाते हैं। बाद में पता चलता है कि अतिथि कबूतर संसद के गुम्बद से आया था।
(बीसवीं सदी-प्रतिनिधि लघुकथाएँ 2000 ,गहरे पानी पैठ,2020 सम्पादन -सुकेश साहनी)
मार्टिन जॉन और राम पटवा की लघुकथा की विषयवस्तु और कथ्य मिलते -जुलते हैं। मार्टिन जीवन के वास्तविक पात्रों के माध्यम से अपनी बात रखते हैं,जिसे आम पाठक बहुत आसानी से ग्रहण कर लेता है,यह इस रचना का सकारात्मक पक्ष है। प्रतीकों के चयन में किया गया मनन और रचना की कलात्मक पेशकारी के कारण राम पटवा की ‘कबूतर’ मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ती है । दोनों ही लघुकथाएँ सशक्त हैं।
लघुकथा में इस समय मिलते -जुलते कथानक और कथ्य पर बहुतायत में रचनाएँ देखने को मिल रही हैं। इससे बचा जाना चाहिए। लघुकथा लेखक भी प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह के सुझाव पर विचार करें ,तो इस समस्या से निजात पा सकते हैं।
केदारनाथ सिंह जी कहा करते थे :
“कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है। वह सिर्फ़ बीच की ख़ाली जगह को भरता है। इस भरने की प्रक्रिया में ही रचना की संभावना छिपी हुई है।”
लघुकथा के क्षेत्र में जैसी आपा -धापी है, मशीनी लेखन हो रहा है,उसे देखते हुए पहले से लिखी स्लेट के बीच खाली जगह बहुत सीमित है,उसे भर पाना हरेक के बस का नहीं है। अपने रचना -कर्म के प्रति गंभीर लेखक अपने रचना-कौशल और सृजनात्मक तप से ही इसे भर सकता है।
आकारगत लघुता के कारण यह समस्या अन्य विधाओं की तुलना में लघुकथा में कुछ अधिक ही देखने में आ रही है और यह किसी भी लघुकथाकार के साथ घट सकता है। एक या दो घटनाएँ,सीमित वर्णन, गिने-चुने पात्र, रोजमर्रा की आम घटनाओं पर लिखने की हड़बड़ी इसका प्रमुख कारण है। विषय सार्वभौमिक है, तो खतरा और भी बढ़ जाता है। लेखकों को नई-पुरानी सभी लघुकथाओं का अध्ययन करना चाहिए। नीचे दिए उदाहरणों से इसे समझा जा सकता है –
ज़मीन पर
हूंदराज बलवाणी
दो मित्र एक ऊँची ऐतिहासिक इमारत देखने गए। एक मित्र नीचे खड़ा रहा और दूसरा ऊपर चढ़ गया।
इमारत के सबसे ऊँचाई वाले स्थान पर पहुँचकर उसने नीचे की ओर देखा,“आश्चर्य ! रास्ते छोटे, गलियाँ छोटी, मकान छोटे, मोटर-गाड़ियाँ छोटी!”
अचानक रोड पर आते जाते लोगों पर दृष्टि पड़ते ही वह कहने लगा,”लोग कितने छोटे दिखाई देते हैं ! लोगों की तुलना में मैं कितना बड़ा लगता हूँ।” फिर वह हँसते कहने लगा,”मैं कितना बड़ा और ऊँचा हूँ।”
थोड़ी देर के बाद वह नीचे आया तो नीचे खड़े उसके मित्र ने उससे कहा,”यार, तुम ऊपर से तो बिल्कुल छोटे दिखाई देते थे।”
…और वह आसमान से ज़मीन पर आ गया।
(शक्ति ब्रिगेड साहित्य गंगा समूह पर योगराज प्रभाकर द्वारा पढ़ी गई लघुकथा)
सुदर्शन
मेरी बड़ाई
जिस दिन मैंने मोटरकार खरीदी और उसमें बैठकर गुजरा, उस दिन मुझे खयाल आया, ‘‘यह पैदल चलने वाले लोग बेहद छोटे हैं और मैं बहुत बड़ा आदमी हूँ।’’
और जब शाम को मैं और मेरी बड़ाई घर आते तो हम दोनों खुश होते तो लगता जैसे हमारे चेहरे सीढ़ियों के अँधेरे में चमकते हों।
और जब हम सोफ़े पर बैठे , तो मेरी छोटी बच्ची एक कुर्सी घसीटकर पास ले आई और उसके ऊपर खड़ी होकर बोली, ‘मैं तुमसे बड़ी हूँ। तुम मुझसे छोटे हो’’
और मेरे दिल में यह बात चुभ गई और मैंने मुड़कर अपनी बड़ाई की तरफ देखा, मगर वह बिजली के प्रकाश में गायब हो चुकी थी।
(झरोखे, हिन्द किताबस लिमिटेड,1947, बीसवी सदी: प्रतिनिधि लघुकथाएँ, सम्पादक सुकेश साहनी)
‘हार की जीत’ जैसी कालजयी कहानी के रचयिता और प्रेमचंद परम्परा के कथाकार सुदर्शन(1896 -1967 ) की इस लघुकथा(छोटी रचना) को मैंने ‘बीसवीं सदी की प्रतिनिधि लघुकथाओं’ में सन 2000 में शामिल किया था। ‘बड़ाई’ का अनुमानित रचनाकाल 1920 से 1947 के मध्य का है।
हूंदराज बलवाणी सिंधी के प्रतिष्ठित कथाकार हैं। हिंदी में भी लिखते हैं। उनकी लघुकथा ‘जमीन पर’ सोशल मीडिया के एक समूह में योगराज प्रभाकर द्वारा अपनी पसंदीदा लघुकथाओं के तौर पर पढ़ी गई थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक सशक्त लघुकथा है। इसको सुनते ही मुझे सुदर्शन जी कि ‘बड़ाई’ याद आई और याद आए खलील जिब्रान। दोनों लघुकथाओं का कथ्य एक ही है। हूंदराज बलवाणी कथ्य को सम्प्रेषित करने के लिए ऊँची ऐतिहासिक इमारत का प्रयोग करते हैं,जबकि सुदर्शन मोटर का। सुदर्शन का रचनाकाल पहले का है,यहाँ मोटर का प्रयोग स्वाभाविक लगता है।
ऐसी स्थिति किसी भी रचनाकार के साथ हो सकती है,इस स्थिति से दो -चार न हों या कम से कम ऐसा हो, इसका समाधान भी केदारनाथ सिंह जी के कथन में छिपा है। जो स्लेट हमें मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है। वो सब एक दिन में नहीं लिखा गया होगा,उसमें भी बरसों-बरस लगे होंगे, लिखनेवाले भी छोटे-बड़े सभी होंगे। हमें खाली मिली जगह बेशकीमती है, इसे अपनी रचनात्मकता से भरने से पहले आश्वस्त होना जरूरी है कि स्लेट पर दूसरों के लिखे का भी अध्ययन हमने कर लिया है ।
आगे खलील जिब्रान (1883 – 1931 ) की कुछ ‘पंक्तियाँ’ लघुकथा के रूप में प्रस्तुत हैं। खलील जिब्रान दार्शनिक के रूप में जाने जाते हैं, यह बात अलग हैं कि उपदेश हेतु उन्होंने बहुत शानदार कथाएँ रची, जिन्हें हम आज लघुकथा के रूप में प्रस्तुत करते हैं । प्रस्तुत रचना को ‘ ऊँचाई ‘ शीर्षक मेरे द्वारा ही दिया गया है। यहाँ ये देखना रोचक होगा कि खलील जिब्रान वर्षों पहले जो कहते हैं, वह ऊपर दी गई दोनों रचनाओं से किस तरह अलग है-
खलील जिब्रान
ऊँचाई
अनुवाद: सुकेश साहनी
आपने पवित्र पर्वत के बारे में जरूर सुना होगा।
यह संसार का सबसे ऊँचा पर्वत है।
अगर आप उसकी चोटी पर पहुँच सकें तो आपकी एक ही इच्छा होगी कि वहाँ से उतरें और जीवन की मुख्य धारा से जुड़े लोगों के साथ घाटी में रहने लगें।
(खलील जिब्रान की लघुकथाएँ, पृष्ठ 114, वर्ष 1995)
‘बड़ाई’ और ‘जमीन पर’ के कथ्य से यही सम्प्रेषित होता हैं कि झूठी शान या अहम् से कोई वास्तव में बड़ा नहीं होता। खलील जिब्रान इन रचनाओं से आगे की बात करते हैं, प्रतीक के रूप में उस ‘पवित्र पर्वत’ का उल्लेख करते हैं,जो संसार का सबसे ऊँचा पर्वत हैं ,यदि मनुष्य चरित्र की दृष्टि से खुद को इतना ऊँचा उठा सके, तो वह झूठी शान -शौकत को स्वेच्छा से त्यागकर जीवन की मूल धारा से जुड़ जाएगा।
संतोष सुपेकर की ‘सर्द जवाब‘ चौथे स्थान के लिए पुरस्कृत हुई। सुपेकर पहले भी कई बार कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता में पुरस्कृत हो चुके हैं। उनकी पुरस्कृत लघुकथा ‘आर्द्रता‘ काफी चर्चित हुई थी। ‘सर्द जवाब‘ में कड़ाके की सर्दी में दस-बारह साल का एक लड़का किसी धर्म स्थल के झंडे को उतारकर भाग जाता है, यह देख वहाँ कोहराम मच जाता है, इसे दूसरे धर्म वालों की साजिश समझा जाता है। मार-काट की बातें होने लगती हैं। झंडा लेकर भागे लड़के को पकड़ने गया लड़का आकर सबको बताता है कि वह उसके पास तक पहुँच गया था,पर पैर फिसल कर गिरने के कारण वह हाथ से निकल गया। वह गर्व से बताता है कि झंडा वापस छीन लाया उससे। बुजुर्ग उसे डाँटते हुए कहते हैं कि जरा-सा लौंडा निकल गया तेरे हाथ से,कमीज की कॉलर में हाथ डालकर खींच लाता उसे । लघुकथा का समापन इस साधारण- सी घटना को विशिष्ट बना देता है ,”कमीज कहाँ थी उसके शरीर पर? इतनी कड़ी सर्दी में भी “-नम आँखों और पछतावे भरे स्वर में छोटू ने जवाब दिया ,”यही झंडा तो ओढ़ रखा था उसने अपने खुले बदन पर!”
कोई भी धर्म मानवता से बड़ा नहीं है , दूसरे धर्म के लड़के से झंडा छीनते ही छोटू को अहसास हो जाता है कि लड़के ने कड़ाके की सर्दी में अपना तन ढकने के लिए झंडा चुराया था,उसे पछतावा भी होता है और उसकी आँखें भी नम हो जाती है।लघुकथा ये भी सम्प्रेषित करने में सफल है कि दंगों में सबसे अधिक क्षति गरीबी की मार झेलते बेगुनाहों को ही पहुँचती है। लघुकथा में बुजुर्ग का यह वाक्य ‘उसकी कमीज़ में ,कमीज़ के कॉलर में हाथ डालकर खींच लेता साले को’ बहुत ही अस्वाभाविक है,लड़के के बदन पर और कोई कपड़ा नहीं था ,बताने के लिए गढ़ा गया है।
निर्णायकों के अंकों के आधार पर वरिष्ठ लघुकथा लेखिका विभा रश्मि की ‘दूध‘ पाँचवे स्थान पर रही। जब लघुकथा लेखन में जीवन के अनुभव साहित्यिक रूप के साथ आते हैं,तो रचना विश्वसनीय और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। शहर में कर्फ्यू लगा है,लोग दूध,दवाई जैसी जरूरतों के लिए तरस रहे हैं। ऐसे में एक परिवार में दो वर्षीय बच्ची दूध के लिए जमीन-आसमान एक किए है। बच्ची के किसी भी तरह से न बहलने पर पिता को दूध की तलाश में बाहर निकलना पड़ता है।अधिकतर लोग मना कर देते हैं। एक चौकीदार उसकी परेशानी समझता है और पत्नी के विरोध के बावजूद अपने बच्चे के लिए आधे गिलास बचाकर रखे दूध को वो पन्नी में पलटकर ले आता है और उसे थमाते हुए वापस भाग जाने को कहता है। बच्ची के लिए दूध लेने निकला व्यक्ति उससे कहता है, “माफ़ करना तुम्हारे बच्चे का हक मार रहा हूँ। “
“न न ,वो बड़ा सयाना हो गया है। बात मान जाएगा।”
“कितने बरस का है तेरा बेटा?”
“छह माह का।’
इसी चरमोत्कर्ष पर लघुकथा समाप्त हो जाती है। कथ्य बहुत महत्त्वपूर्ण है कि लाड़-प्यार में पलनेवाले अमीर बच्चों की तुलना में अभावों में जीने वाले गरीब बच्चे जल्दी सयाने हो जाते हैं।
मीना गुप्ता की ‘आजादी‘ एक सशक्त लघुकथा के रूप में छठे स्थान के लिए पुरस्कृत हुई है। कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता -9 में इनकी लघुकथा ‘कोशिश’ प्रथम स्थान के लिए चयनित हुई थी। इनके द्वारा प्रायः नए विषयों का चयन किया जाता रहा है। नारी -विमर्श के नाम पर पत्नी को पूरी ‘आज़ादी’ देते हुए समाज में वाह-वाही लूटने वाले पति की पोल -पट्टी बहुत ही रोचक ढंग से खोली गई है। आजादी देने का जग दिखावा करता है पति। असलियत में वह पत्नी सहित प्रत्येक वस्तु पर कुंडली मारे बैठा रहता है। मीना गुप्ता की ‘कोशिश’ लघुकथा की तरह ‘आज़ादी’ भी धीरे -धीरे पाठक के आगे खुलती है। कथ्य प्रकटीकरण के साथ ही पाठक स्तब्ध रह जाता है,न जाने कितनी नारियाँ इस तरह जीने को अभिशप्त हैं-
“और तुम …तुम्हारा खर्च…?”
” माँग लेती हूँ जी …और ज्यादा जरूरत हुई तो सौ दो सौ चुपचाप रख लेती हूँ …क्या करूँ ..कम से कम घर से बाहर… निकल ..साँस लेने और दुनिया देखने की ‘आजादी‘ तो मिली है ..!”
सातवें स्थान के लिए पुरस्कृत राम मूरत राही की लघुकथा ‘जंगल की ओर‘ पर्यावरण के प्रति मनुष्य को जागरूक करती उत्कृष्ट लघुकथा है । आधुनिक लघुकथा में अक्सर मानवेतर पात्रों को लेकर लिखने से बचने की सलाह दी जाती है। तर्क दिया जाता है कि इससे लघुकथा नीति कथा और बोध कथा की श्रेणी में चली जाएगी। पात्रों का चयन पूर्णतयः कथानक की प्रकृति पर निर्भर है।’जंगल की ओर’ का जो कथ्य है, उसके लिए चिड़िया से बेहतर पात्र नहीं हो सकते थे। शहरों का कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो जाना,रेडिएशन का खतरा,गाँव में रासायनिक खाद और कीटनाशकों के खतरे के कारण चिड़िया अपने बच्चों को ऐसे जंगल में जाने की सलाह देती है ,जहाँ मनुष्य की छाया भी न पड़ी हो।
सविता प्रथमेश की लघुकथा ‘फूल बाई’ निर्णायकों के सम्मलित अंकों के आधार पर आठवें स्थान पर रही। कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता में पुरस्कृत लघुकथाओं को जस का तस प्रकाशित किया जाता है। फूल बाई में प्रथम तीन पंक्तियों में ‘हमेशा की तरह’ का तीन बार प्रयोग हुआ है।लघुकथा में शब्दों की फिजूलखर्ची से बचना चाहिए। प्रतियोगिता -11 में टिप्पणी करते हुए लिखा गया था कि लघुकथा में आकारगत लघुता का ध्यान रखते हुए किसी पात्र का चरित्रांकन चुनौती-भरा कार्य है। विचार हेतु पाठकों की अदालत में रघुनन्दन त्रिवेदी की ‘निहालचंद‘ प्रस्तुत की गई थी। यहाँ फूल बाई का चरित्र बहुत सशक्त तरीके से प्रस्तुत किया गया है-“क्या बच्ची जलकर घर आएगी तभी मानोगी मालकिन ?”फूल बाई का गुस्से भरा स्वर। शब्दों की मितव्ययिता का ध्यान न रखने क़े कारण कहानी पढ़ने का अहसास होता है। लघुकथा क़े क्षेत्र में ‘फूल बाई’ जैसी चरित्र प्रधान लघुकथाओं का स्वागत किया जाना चाहिए।
नमिता सचान की रिश्ते में दादी को छोटी चाची पर हमेशा चिल्लाते देख मुन्नी सवाल खड़े करती है, तो दादी कहती है,”अरे बिटिया तुम न समझोगी। इस कुलच्छनी ने पैर धरे नहीं आंगन में कि खा गई तुम्हरे छोटे चाचा को।“ ‘खाने’ का मतलब पूछने कि बाद मुन्नी फिर दादी से कहती है,”पर बुआ भी तो फिर फूफा जी को खाकर आई हैं ?”प्राप्त अंकों के आधार पर यह लघुकथा नौवें स्थान पर आयी है। इस प्रकार के कथानकों में दोहराव का खतरा बना रहता है। लेखिका ने कथ्य पर फोकस कर प्रभावी प्रस्तुति दी है ।
मृणाल आशुतोष की ‘आवाज’ निर्णायकों क़े अंकों क़े आधार पर दसवें स्थान पर रही। मानवेतर पात्रों को साथ लेकर लिखी गई यह लघुकथा बहुत प्रभावशाली बन पड़ी है- रेड लाइट क़े पास आठ-दस साल का लड़का गुब्बारे बेच रहा है। रंग -बिरंगे गुब्बारे आपस में बातचीत करते हुए अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं,कोई किसी बच्चे क़े जन्मदिन में सजना चाहता है,कोई किसी भव्य समारोह का हिस्सा बनना चाहता है,कोई स्वतंत्रता दिवस पर खुले आसमान में उड़ जाना चाहता है। जब हरे गुब्बारे से पूछा जाता है, तब वह जो जवाब देता है, उससे कथ्य प्रकटीकरण क़े साथ लघुकथा पाठक क़े मस्तिष्क में खुल जाती है। लघुकथा में जो अनकहा है, वह सामने आ जाता है। यह अलग बात है कि कितने पाठक इसकी गहराई तक पहुँच पाते हैं। हरे गुब्बारे की इच्छा है कि गुब्बारेवाला उसे बेचने के बजाय उससे खेले। लेखक हरे गुब्बारे के माध्यम से बताना चाहता है कि होश सँभालते ही गुब्बारेवाले को दो जून रोटी के लिए काम पर निकलना पड़ा था, दूसरे बच्चों कि तरह वह भी गुब्बारों से खेलना चाहता था, पर उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी थी, हसरत दबी रह गई, गुब्बारा उसकी इच्छा पूरी करना चाहता है। वह सही मायने में उसके दुःख -सुख से जुड़ा हुआ है। पाठकों के मन में संवेदना जगाती उद्देश्यपूर्ण लघुकथा। इसी क्रम में आनंद हर्षुल की लघुकथा ‘कोयले की इच्छा‘ प्रस्तुत कर अपनी बात पूर्ण करना चाहूँगा –
धोबी, पॉलीथिन की थैली में, कोयला लेकर अपने घर के भीतर घुसा, धोबी की बच्ची ने, कोयले को सिंघाड़ा समझा। बच्ची कूदने लगी-ताली बजा-बजाकर कि बाबू सिंघाड़ा लाए-बाबू सिंघाड़ा लाए-खुश बच्ची की, खुश-खुश उड़ती ताली, ताल की आवाज से, धोबी का घर भर गया।
धोबी पहली बार, पॉलीथिन की थैली में लाया था दो किलो कोयला, वह हमेशा पाँच- दस किलो कोयला, बोरी में भरकर लाता था। पर आज उसके पास, पाँच किलो कोयला खरीदने लायक पैसे नहीं थे तो वह ले आया दो किलो कोयला-पॉलीथिन की पारदर्शिता से कोयले, सिंघाड़े की तरह झाँक रहे थे। जिन्हें सिंघाड़ा समझ,धोबी की बेटी ताली बजा खुश हो, कूद रही थी।
धोबी की, खुश होकर कूदती, बच्ची की तालियों की खुश-आवाज सुन, पहली बार कोयले के भीतर सिंघाड़ा होने की इच्छा जागी। कोयले ने पहली बार, अपने सिंघाड़ा होने की इच्छा से,अपनी राख होने की इच्छा को दबाया।
(कथादेश, अगस्त 2013, मास्टर स्ट्रोक -लघुकथा संकलन, पृष्ठ 30, वर्ष 2020)
जिनका भी यह मानना है की गणित की तरह साहित्य में भी दो जमा दो का हल चार के सिवा कुछ नहीं हो सकता,उनको इस तरह की लघुकथाएँ समझ नहीं आएँगी,वे सवाल खड़े करेंगे- बेजान कोयला अपना गुण-धर्म का परित्याग कर सिघाड़ा होने की इच्छा कैसे कर सकता है? बच्चे की गुब्बारे से खेलने की बात समझ में आ जाएगी ,पर गुब्बारे की बच्चे से खेलने की इच्छा पर प्रश्न चिह्न लग जाएगा। इसी प्रतियोगिता से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है,जिसमें उर्मिल कुमार थपलियाल जी की एक लघुकथा में ‘मैं’ पात्र मंटो से पूछता है,”मंटो मियाँ। उस खूंखार दरिंदे दहशतग़र्द ने सड़क पारकर रहे एक छोटे बच्चे पर निशाना साधा और दन्न से गोली मार दी। गोली बच्चे के करीब से निकल गई। ऐसा कैसे हुआ?” मंटो जवाब देते हैं,”इसलिए कि गोली को पता था।” ‘मैं’ पूछता है कि गोली को क्या पता था।मंटो जवाब देते हैं , “गोली को पता था कि वह बच्चा है।” शाब्दिक अर्थ लेने के कारण कुछ लोग लेखक के मंतव्य तक नहीं पहुँच सके थे। ‘कोयले की इच्छा’ में जो अनकहा है, उसपर लम्बी टिप्पणी की जा सकती है।
सीमा वर्मा की भोला भले ही निर्णायकों के अंकों के आधार पर ग्यारहवें स्थान पर आई हो,परन्तु लघुकथा अपनी बुनावट और प्रस्तुति के कारण चर्चा योग्य है। रचना में यह कहना मुश्किल है कि नानी अधिक संवेदनशील या बैल। रचना के अंत में ही पता चलता कि है नानी की डाँट से मुँह फुलाकर मंदिर में जा बैठने वाला भोला बैल है। कसी हुई लघुकथा प्रस्तुत करने के लिए लेखिका को बधाई ।
राघवेंद्र रावत की लघुकथा मदारी पहली पंक्ति से ही बाँध लेती है। हमें अपना बचपन याद आता है, जब नुक्कड़ों पर ऐसे मदारियों का दिखाई देना आम बात थी, हम रुककर देखते भी थे,जब खेल दिखाने के बाद वह पैसे माँगने लगता, तो हम चल देते थे। मदारी,जमूरा और पूरा मजमा पाठक को बाँध लेता है। लेखन में सरलता और प्रवाह है,जो प्रशंसनीय है।लेखक लगभग नब्बे प्रतिशत रचना में मदारी और उसके खेल का रोचक वर्णन करता है,अंत में एक वाक्य लिखकर वह पूरी घटना को मायने ही नहीं देता, राष्टीय स्तर पर किसी भी काल की राजनीति पर प्रश्न खड़े करता है। समापन देखें -‘मुझे लगा मैं उसी भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा हूँ और अनिष्ट के भय से स्तब्ध देख रहा हूँ, मेरे मदारी से हूबहू मिलता हुआ यह मदारी है,जो देश को अपनी बाँसुरी की धुन पर मंत्र मुग्ध किये हुए है।’
और अंत में
(लघुकथा, जिसे चौदह वर्ष बाद महेश कटारे जी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में याद किया)
दिनेश भट्ट
दंश
इंजीनियरिंग कालेज के हॉस्टल में गिरीश और मुझे एक ही रूम मिला था। चौथे दिन पाँच सीनियर्स आए थे कमरे में।
‘‘तुम दोनों का अटेस्टेशन हो गया?’’ उन्होंने कड़ककर पूछा।
‘‘नहीं…! यह अटेस्टेशन क्या है भैया?’’….हम भीतर तक काँप गए थे उनकी आँखों को देखकर।
‘‘रूम नं. अड़तालिस में पहुँचो, सब मालूम हो जाएगा।’’ कहकर वे चले गए।
गिरीश और मैं सिर से पाँव तक रैगिंग के भय में डूबे पहुँचे थे रूम नम्बर अड़तालिस में वे पाँचों किसी जूरी के सदस्य की तरह बैठे थे। उनके सामने एक बड़ी परात में नीला रंग घुला रखा था।
‘‘अपने पैंट-चड्डी उतारो और इस परात में बैठो। फिर उठकर उस बड़े कागज पर बैठो। तुम्हारे पीछे की निशानी कागज़ पर बन जाए फिर उस पर हमसे साइन कराओ। यह अटैस्टेड कागज तुम्हारे कमरे में हमेशा उपलब्ध होना चाहिए। कागज गुमा, अटेस्टेशन फिर से होगा।’’ बीच में बैठा सीनियर यह प्रक्रिया समझा रहा था। कमरे में तैरते उसके शब्द हमारे भय को द्विगुणित कर रहे थे। हमारे शरीर पसीने से तर थे और दिमाग सोचने-समझने की स्थिति में नहीं।
मैं बचपन से शर्मीला और संकोची रहा हूँ। मेरे लिए यह करना असम्भव था। मैंने शरीर की सारी शक्ति लगाकर शब्द जोड़े और हकलाकर कहा, ‘‘भैया मैं नंगा नहीं हो पाऊँगा।’’
पाँचों ने विचित्र दृष्टि से मुझे देखा। एक सीनियर उठा था। उसका भारी हाथ मेरे बाएँ गाल पर पड़ा।
‘‘साला….’’ बिना अटेस्टेशन कराए रहेगा हॉस्टल में……’’ पाँचों इतनी जोर से हँसे थे कि पूरा कमरा गूँज गया।
‘‘शाम को तुम्हारा अटेस्टेशन हॉस्टल के सभी लड़कों के बीच होगा।’’ कहकर वे कहीं चले गए।
कमरे में लौटकर मैंने गिरीश से कहा था, ‘‘मैं अटेस्टेशन नहीं कराऊँगा चाहे मुझे पढ़ाई छोड़कर घर वापस जाना पड़े।’’
गिरीश बोला था, ‘‘मैं वापस नहीं जाऊँगा। वापस जाकर मुझे खेती करनी पड़ेगी और फिर जल्दी ही शादी।’’
शाम होने से पहले मैं सामान उठाए स्टेशन पर था।
गिरीश ने अटेस्टेशन करा लिया था। आज वह प्रथम श्रेणी इंजीनियर है। मैंने नहीं कराया मिडिल स्कूल शिक्षक हूँ।
कुछ घटनाएँ जो जिन्दगी पर गहरा दंश छोड़ती है, उसके लिए एक छोटा शब्द भी जिम्मेदार होता है, जैसे मेरे लिए अटेस्टेशन।
(कथादेश पुरस्कृत लघुकथाएँ, लघुकथा प्रतियोगिता-1, पृष्ठ 18, पांचवें स्थान पर)
संपर्क : 185 उत्सव पार्ट 2 ,महानगर ,बरेली -243006
मेल : sahnisukesh@gmail .com
कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता-12 तक पुरस्कृत लेखकों की सूची
महावीर राजी,विभा रश्मि ,राममूरत राही,सविता प्रथमेश,नमिता सचान,मृणाल आशुतोष ,सीमा वर्मा,राघवेंद्र रावत,राम करन,सविता इंद्र गुप्ता¹,विनोद कुमार दवे,नीतू मुकुल ,निरंजन धुलेकर,सत्य शर्मा ‘कीर्ति’,सविता मिश्रा,प्रह्लाद श्रीमाली,अभिषेक चन्दन,अदिति मेहरोत्रा,मीना गुप्ता, वंदना शांतुइंदु, मानवी वहाणे, महेश शर्मा¹ , मार्टिन जान¹, सुभाष अखिल, सुरेश बाबू मिश्रा, नीना छिब्बर, सीमा जैन, सारिका भूषण , सीताराम गुप्ता, बाल कीर्ति, संध्या पी.दवे,सुनील गज्जाणी, राधेश्याम भारतीय,उर्मिल कुमार थपलियाल¹, सविता पाण्डेय, खेमकरण सोमन, जयमाला, डॉ.पूरनसिंह¹, अनुपम अनुराग, संतोष सुपेकर¹, रंजीत कुमार ठाकुर, मनोज अबोध, डॉ सुलेखा जादौन, कस्तूरीलाल तागरा¹, आनंद¹, पुष्पा चिले,, सीताराम शर्मा ‘चेतन’,डॉ. अनुराग आर्य,लोकेन्द्र सिंह कोट, अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’, रामकुमार आत्रेय¹, ,शशिभूषण मिश्र, सरोज परमार, अखिल रायजादा, शुभा श्रीवास्तव, हरि मृदुल¹, हरभगवान चावला, दिनेश सिन्दल, एस.एन.सिंह, चन्दर सोनाने, धर्मेन्द्र कुशवाहा¹, के.एस.एस.कन्हैया, के.पी. सक्सेना ‘दूसरे’, गौतम, कुमार शर्मा ‘अनिल¹’, गजेन्द्र रावत, जयश्री राय, युगल, रामकुमार सिंह, हरदर्शन सहगल, दिलीप कुमार, अरुण कुमार¹, डॉ. रश्मि वाष्णेय , चन्द्रमोहिनी श्रीवास्तव, घनश्याम अग्रवाल, जावेद आलम, रविन्द्र बतरा, अमरजीत कौर, योगेन्द्रनाथ शुक्ल, राघवेन्द्र कुमार शुक्ला, पंकज कुमार चौधरी, किसलय पंचोली, सुस्मिता पाठक, राकेश माहेश्वरी ‘काल्पनिक’, हरीश कुमार अमित, रणजीत टाडा, जगवती, मीरा जैन, सविता पाण्डेय, किरन अग्रवाल, ओमप्रकाश कृत्यांश, जयमाला, गजेन्द्र नामदेव, पल्लवी त्रिवेदी, मोहम्मद साजिद खान, श्री कृष्ण कुमार पाठक, इन्दिरा दाँगी, सुनील सक्सेना, अरुण मिश्र, लव कुमार सिंह, हरिश्चंद्र बर्णवाल, दिनेश भट्ट, सोनाली सिंह, मनोज कौशिश, अनवर शमीम, अजय कुमार, हरीश करमचन्दाणी,
¹एक बार से अधिक पुरस्कृत लेखक