तृतीय पुरस्कार
आए दिन गटर के भर जाने से मास्साहब की घर मे पानी की निकासी बन्द हो जाती, मास्साहब ही क्या पूरी गली ले घरों का आलम यही होता। मास्साहब बालेश्वर को बुला खरपच्ची से गटर खुलवाते। बालेश्वर इस काम की मुँहमाँगी कीमत वसूलता। उसका पेशा ही वही था। मासाहब्ब आए दिन गटर बन्द होने से दुःखी थे। आखिर उन्होंने मोटे पाइप को मुख्य सड़क की गटर लाइन से जोड़ समस्या का निदान कर लिया।अब वे निश्चिन्त थे। कुछ दिन पहले ही छत का पाइप अवरूद्ध होने पर उन्हें बालेश्वर का ध्यान आया। मास्साहब बालेश्वर के बैठने के ठिये से उसे बुला लाए थे। बालेश्वर ने पाइप लाइन खोलने के तीन हजार रुपये माँगे। मास्साहब ने कहा-” भाई, ये काम इतने का नहीं है। फिर इसमें गटर जैसी कुछ गंद भी नहीं, छत का पानी ही आता है।”
“मास्साहब, इतना ही जानते हो तो खुद कर लो। मेरी क्या जरूरत है।”
मास्साहब ने पुरानी पहचान, अपने व्यवहार, उसकी पूर्व में की सहायता की दुहाई भी दी; लेकिन उस पर उनका कोई असर न पड़ा। आखिर मास्साहब को मुँह माँगी कीमत पर काम करवाना पड़ा। बालेश्वर आधे-पौने घण्टे में काम निपटा पैसे लेकर जा चुका तो मास्साहब बहुत देर तक दिहाड़ी का हिसाब-किताब लगाते रहे।
इस घटना को बामुश्किल महीना भी नहीं हुआ कि माहमारी के चलते, शहर मे आपातकाल जैसी स्थिति हो गई। मास्साहब को ख्याल आया कि कैसे मजदूर, गरीब इस दौर में गुजर-बसर कर रहे होंगे। वे इस सोच में डूबे थे, अचानक डोरबेल बजने पर उनका ध्यान भंग हुआ। दरवाजा खोला तो देखा, बालेश्वर सामने था।मास्साहब को देखते ही हाथ जोडकर खड़ा हो गया।
“कहो, कैसे आये बालेश्वर?”
“साहब, सब काम-धाम बन्द है, खाने तक को पैसे नहीं हैं, कुछ मदद कर देते तो…..।”
उसकी बात भी पूरी नहीं हुई थी, मास्साहब की आँखों के सामने छत का पाइप खुलवाने की पूरी घटना चलचित्र की तरह घूम गई। वे बोले-” बताओ, क्या करूँ?”
“कुछ पैसे मिल जाते, तो बच्चो के लिए राशन …।”
“अरे पास ही मेरा विद्यालय हैं, वहाँ बना-बनाया खाना आता है, मैं साथ चलकर दिलवा देता हूँ।”
उसने सकुचाते हुए बना-बनाया खाना ले जाने में लाचारी जाहिर की, मास्साहब के चेहरे पर एक बार फिर मुस्कान आ गई। जेब से चार पाँच-पाँच सौ के नोट उसके हाथ पर थमाते हुए बोले-“लो, पास की दुकान से घी-तेल, आटा, दाल ले लेना; लेकिन एक बात है, उस दिन के काम के तीन हजार रुपये वाकई ज्यादा थे।”
बालेश्वर ने गर्दन झुकाते हुए पैसे लेने को हाथ आगे बढ़ा दिया।
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