जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा की विधागत शास्त्रीयता-2     Posted: January 1, 2026

दिसम्बर -25 अंक से जारी

आज लघुकथा इसलिए भी लोकप्रिय हुई है और होती जा रही है, क्योंकि इसमें विश्वसनीयता है। पाठक को यह ‘कथाकथ्यात्मक’ ‘लघुकथा’ अपने उपस्थित वर्तमान, परिधित परिवेश और अनुभूत चिंतन के त्रिकोण में जानी–पहचानी लगने लगती है। यथार्थ तो झख मारकर झेला जाता है। पर ‘विश्वसनीयता’ के साथ आत्मीयता हो जाती है। फिर ‘सत्य’ के संधान में समर्पित लघुकथा मानव मूल्य के शाश्वत स्परूप को रूपायित करने में व्यग्र और व्याकुल है। इस तरह लघुकथा के देहात्म–धर्म से यह निष्कर्ष निकलता है।

लघुकथा का अंतस्त्त्व है ‘मर्म’। मर्म अर्थात् मूलमानवमन या मूलमानववासनावृत्ति या मूलमानव–संवदेनधर्म। इस ‘मर्म’ मानववंश के इतिहास में जितना जो कुछ शुभ एवं शम् है, उसका अधिवास है। वह मर्म तीव्रसंवेद्य अंत:स्थल है। यह ‘मर्म’ मानव–समाज की सभी संवदेना एवं समवेदना का अधिकरणकारक है। अपनी स्पंदकारिका के क्षणों में यही अधिकरणाकारक संप्रदान–कारक बन जाता है। लघुकथा का कुछ भी बाहर शेष नहीं बचता। सब कुछ पाठक के भीतर, उसके मर्म पर अधिष्ठित हो जाता है। मर्म के ऊपर सभ्यता की इतनी–इतनी कृत्रिम परतें पड़ गई है कि उनका भेदन कर मूल मर्म पर पहुँचना वस्तुत: असंभव नही तो कठिनतम अवश्य हो गया है। इसलिए आज साहित्यकार का दायित्व गुरूतर और साधना कृच्छ्तर हो गई है। आज सफल लघुकथाकार नहीं हो सकता है, जिसका मर्म जीवित हो। जिसे मर्म की पहचान है, जो अपनी रचना को मर्मस्पर्शी बना सके और जिसके पास इसके शिल्प और संप्रेषण के शेष कलापक्ष का अभ्यास एवं अभ्यास हो। अन्य अनेक विधाओं में मर्महीन साहित्य रचा जा सकता है, किन्तु ‘लघुकथा’ मर्म से अलग होकर नहीं लिखी जा सकती। मर्म तो इसका वह ‘ऐटम’ है, जो विस्फोट कर दिक् एवं काल के मानस–स्तंभ पर नहीं मिटनेवाली पाषाण–पंक्तियाँ छोड़ जाता है। यही कारण है कि सौ–सौ लघुकथा पढ़ने पर कोई एक उत्तम और अनुशासित लघुकथा मिलती है। यह पाठकीय अभिमत तथा ऐतिहासिक सर्वेक्षण का अवांतर किन्तु आवश्यक विषय हैं लघुकथा का अंतिम तो नहीं, पर सर्वाधिक तीक्ष्ण संप्रेषणीय स्वर व्यंग्य का है। आज नीति और उपदेश से काम नहीं चलेगा। क्रोध और आक्रोश का भी राजनीतिक वर्गीकरण होने के कारण, वहाँ व्यर्थता आ गई है। ये सारे प्रयोग आज विफल और बेमानी है। घाव पुराना है। इसके भीतर मवाद भर गया है। दवा की गोलियों से यह घाव अब ठीक नहीं होगा। प्राकृतिक चिकित्सा भी बेकार है। इसलिए एक तेज नश्तर चाहिए। धीरे से चुभो देने की जरूरत है। फिर तो सब कुछ ठीक।

आज समाज में कुरीतियाँ कहाँ नहीं है। उनकी गणना ही व्यर्थ है? शायद ही कोई व्यक्ति, स्थान या विभाग शेष या अपवाद हो कि जहाँ ये विडंबित कुरूपताएँ न हों। अत: साहित्य के माध्यम से ही एक ओर व्यथा का मर्म उपस्थित किया जा सकता है और दूसरी और व्यथा के नियामकों पर व्यंग्य का नश्तर चुभोया जा सकता है। और कोई उपाय नहीं है। और यह कार्य सर्वाधिक कौशल एवं प्रभाव के साथ लघुकथा में हो रहा है।

व्यंग्य को लेकर एक भ्रांति भी है, जिसपर पुनर्विचार आवश्यक है। काव्यशास्त्र के अंतर्गत शब्दशक्ति–प्रकरण में तीन प्रकार के शब्दों का उल्लेख है–वाचक, लक्षक एवं व्यंजक। इन तीनों शब्दों से वाच्यार्थ, लक्ष्यार्थ एवं व्यंग्यार्थ को क्रमश: उत्पन्न किया जाता है। शब्द के अर्थ के निष्पादन में क्रमश: तीन शक्तियों का उपयोग होता है–अभिधा–शक्ति, लक्षणा–शक्ति एवं ‘व्यंजना’ शक्ति। अत: ‘व्यंग्य’ मूलत: काव्यशास्त्र का शब्द है। ‘व्यंग्य’ अर्थ (व्यंग्यार्थ) के रूप में तभी ‘व्यंजक’ शब्द से व्युत्पन्न होता है, जब ‘व्यंजना’ शक्ति का उपयोग किया जाता है। अभिधा से व्यंजना का संबंध विच्छिन्नप्राय हो जाता है। दूरगामी अर्थ का आक्षेपण (अनायन) व्यंग्य के द्वारा ही साधित होता है। आयरनी और सटायर के रूप में जब व्यंग्य का प्रयोग होता है तो इसका तात्पर्य एक आघातक साधन–विशेष है। आज के व्यंग्य और विशेषकर ‘लघुव्यंग्य’ को साहित्य–विधा के रूप में उपस्थित–स्थापित किया जा रहा है। कुछ पहले कहानी में व्यंग्य की प्रधानता के कारण उन्हें भी केवल ‘व्यंग्य’ कहा जाता था। परन्तु कालांतर में ‘व्यंग्यप्रधान कहानी’ जैसी बात कहकर विवाद समाप्त किया गया। कविता में भी व्यंग्य का उपयोग होता रहा है। कबीर इसके सर्वोत्तम उदाहरणपुरुष है परन्तु मूलत: उनकी रचना की व्यंग्य नहीं कहते। इसी तरह समाचारपत्रों में व्यंग्यप्रधान आलेख छपते हैं, जो केवल ‘व्यंग्य’ नहीं कहे जाते।

‘व्यंग्य’ गुण–मात्र है, यह गुणी नहीं हो सकता। एक उदाहरण से बात स्पष्ट होगी। नमक या लालमिर्च भोजन में आवश्यक हैं। ज्यादा मिर्च डालकर भोजन को तीखा बनाया जा सकता है, पर एक बात तै है कि केवल मिर्च या केवल नमक से भोजन नहीं बन सकता। लवण से लावण्य शब्द बनता है। लावण्य का सीधा अर्थ है नमकीनपन । यह वाच्यार्थ है, पर यही शब्द ‘व्यंग्यार्थ’ में (व्यंजना शक्ति के सहयोग से) सुंदरी नायिका के चुंबकीय एवं सम्मोहक मुखमंडल के उपांग–कपोल, अधरोष्ठ, नासिका, मस्तक–सर्वों पर छलक आता है और कहते हैं, मुख पर लावण्य है। यह लावण्य निराधार नहीं दीखता। दीख भी नहीं सकता।

इसी तरह व्यंग्य या हास्य या अन्य साहित्य–तत्व कथाफलक या साहित्य की अन्य स्वीकृत विधाओं में ही शोभित होते हैं। इसलिए व्यंग्य लघुकथा का एक आवश्यक और धारदार तेवर है। अत: अलग से लघुव्यंग्य की आवश्यकता मेरी दृष्टि में नहीं है। ‘लघुकथा’ के साथ ‘रस’ की चर्चा प्राय: नहीं हुई है। रस की चर्चा करते ही आलोचक को दिनातीत मान लिया जाता है। इसलिए लघुकथा से लेकर कहानी और उपन्यास तक और सभी गुण–धर्म, शील–स्वभाव, वृत्ति–प्रवृत्ति की तो चर्चा होगी, कुंठा, संत्रास, युगबोध इत्यादि का भी उल्लेख होगा, पर ‘रस’ का नामोल्लेख तक नहीं करेंगे और सत्य तो यह है कि रस का प्राथमिक उल्लेख भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में कथा–प्रसंग अर्थात् नाटक के सिलसिले में ही किया था। और फिर लगभग दो हजार वर्षों तक भरत के उस रससूत्र का विश्लेषण किया गया है। अंतत: इतना तो स्वीकार कर ही लिया कि साहित्य की आत्मा रस है– ‘रसासदिश्चात्मा’ रस के बिना जो साहित्य है वह रससाहित्य के कारण ‘रसहीन’ या ‘नीरस’ ही नहीं, ‘साहित्य’ मात्र नहीं है। अत: लघुकथा के प्रसंग में रस की चर्चा करनी होगी।

उत्तम कृति और सहृदय पाठक का जब ‘संयोग’ होता है धीरे–धीरे ‘साधरणीकरण’ को स्थिति उत्पन्न होती है। साधारणीकरण एक बहु–आयामी बोधन–व्यापार और अंत: प्रक्रिया है। लेखक के विचार, उन विचारों में व्यवस्थित चरित्र और शब्द, सहृदय सामाजिक (प्रेक्षक, पाठक, श्रोता किसी भी रूप में) सर्वों का साधारणीकरण होता है। फिर रसोपचिति या रसनिष्पात्ति होती है। इसके पश्चात् आनंद की वह स्थिति उत्पन्न होती है, जिसके लिए उपनिषद् में ‘रसो वै:’ कहा गया।

स्थायीभाव दिक्कालातीत भाव से प्रत्येक सहृदय सामाजिक के हृदय में पहले से ही विद्यमान होते हैं। जो अपने अनुकूल स्थिति–योग या दृश्य–स्पर्श या भावबोध के कारण रसदशा में रूपांतरित हो जाते हैं।

लघुकथा अपनी काया के अवकाश–लाघव के कारण साधारणीकरण तक पहुँचकर छोड़ देती है। तत्काल रसरूपांतरण होता नहीं, हो भी नहीं सकता। फिर होमियोपैथी की दवा की तरह यह हाई पावर्ड छोटी गोली असर करने लगती है। हो सकता है, दवा महीनों बाद असर दिखाए। इसी तरह लघुकथा का असर दूर और देर तक रहता है। ‘लघुकथा’ प्रत्यंचित बाणाग्र पर बैठकर अपने पाठक के साथ टंकार के साथ छूट तो जाती है, पर तत्काल कोई लक्ष्यवेध नहीं होता। कभी भी,कालांतर में लक्ष्यवेध हो सकता है। तबतक हम प्रक्रिया–सुख में होते हैं। भोजन के बाद की तृप्ति ‘चरम है और उसका अपना एक सुख है। किन्तुं डायनिंग टेबुल पर भोजन की चर्वणवस्था का भी अपना सुख और सौंदर्य है। लघुकथा साधारणीकरण के भूमपीठ पर पहुँची हुई मधुमती भूमिका है। मधुमती भूमिका ‘समाधि’ या ‘रसोपचिति’ के पहले की वह अवस्था है, जिसे हम खुमारी की संज्ञा देते हैं। खुमारी न तो बेहोशी है, न ही जागरण। यह मध्यवर्ती स्थिति है। इसे ही कबीर कहते हैं–’पियत रामरस लगे खुमारो।’दृष्टांत–भाषा में लघुकथा गोमुख–गोमुखी–मात्र हैं इस गोमुखी से गंगा निकलती है। गोमुखी के पीछे संशोधित जलराशि की अल्केमी का विशाल भंडार होता है, जो दीखता नहीं। गोमुखी से निकली गंगा आगे कितने तीर्थ बना यह भी नहीं दीखता। दीखती तो है बस यह मध्यस्थ गोमुखी। लधुकथा में चुंबक का पानी होता है। लघुकथा अतीत और भविष्य दोनों का संकेत दे देती हैं पाठक जीवन–भर उस लघुकथा में उपसर्ग–प्रत्यय लगाता रहता है और उसे अपना बना लेता है। लेकिन शर्त यह है कि ऐसी लघुकथा में विश्वसनीयता और सत्य होना चाहिए, कथा और कथ्य होना चाहिए, स्थापत्य–शिल्प एवं भाषा–शैली होनी चाहिए। लघुकथा के चरित्र भाषा के शब्दों में पिघलकर एकाकार हो जाते हैं। इसलिए लघुकथा में संगतराश भी शिल्पगत तराश होनी चाहिए। जरा–सी चूक, हल्की या भारी चोट या जरा–सी गलत जगह की तराश से मूर्ति विकृत हो जा सकती है। लघुकथा योग की लघिमा एवं अणिमा–सिद्धि है।

लघुकथा का इतिहास लगभग अस्सी वर्षों का इतिहास है। कहानी के समानांतर इसका सोता चलता रहा है। जिस तरह कहानी उपन्यास का उत्तर परिणाम नहीं, वरन् एक स्वतंत्र और स्वाबलंबी विषय है। यह दूसरी बात है कि कहानी का विकास पहले और ज्यादा हुआ है। लघुकथा का विकास बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक से कहानी के समानांतर धीरे–धीरे अवश्य हुआ है किन्तु अब इसकी जमीन स्थिर होती जा रही है। यह भी सत्य है कि लघुकथा के लिए कभी कोई आयोजित आन्दोलन नहीं हुआ। इस प्रबंध के आरम्भ में लघुकथा को ऐतिहासिक दृष्टि से देखते हुए इसके दो काल–खण्ड किए गए थे–प्राक्–स्वातंत्र्य–काल और स्वातंत्र्योत्तर–काल। प्राक्स्वातंत्र्य -काल में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की कुछ लघु कहानियों को लघुकथा की गलत संज्ञा दी गई हैं, किन्तु लघुकथा का विश्वसनीय स्वरूप उपेन्द्रनाथ अश्क की लघुकथाओं में मिलता है। स्वातंत्र्योत्तर–काल में लघुकथा का आरम्भ यशपाल के ‘फूलो का कुरता’ कहानी –संग्रह की भूमिका में व्यवस्थित एक लघुकथा से होता है। फिर 1989 में, आज तक ऐसे बीसियों लघुकथाकारों के नाम सफल सूची में रखे जा सकते हैं।

विश्वस्तर पर जिन लघुकथाकारों के नाम लिए जाते हैं, उनमें मूलत: सभी छोटी कहानी के लेखक हैं। फिर भी कुछ ‘छोटी–छोटी कहानियों’ के आधार पर उन्हें लघुकथाकार के रूप में भी स्वीकार किया गया। इनमें बालजाक, खलील जिब्रान, एडगर एलेन पो,मोपासाँ, पुश्किन, चेखव, गोगोल ओ0 हेनरी के साथ अन्य बीसियों नाम आते हैं। पर मेरी दृष्टि में ओ0 हेनरी विश्व के प्रथम लघुकथाकार हैं। किसी ‘लघुकथा’ आन्दोलन का उन्होंने प्रवर्तन नहीं किया था। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशक तक ओ0 हेनरी का लेखन–काल है।

ओ हेनरी की छोटी कहानी ‘गिफ्ट ऑव मेगाई’ वस्तुत: लघुकथा है। इसे मैं विश्व की पहली शिल्पित लघुकथा मानता हूँ। यद्यपि इसे छोटी कहानी की कोटि में रखा गया है। यहाँ विधा और शास्त्र पर विचार करने के सिलसिले में ‘गिफ्ट ऑव मेगाई’ का उल्लेख करना चाहूँगा।

‘डेला और बिल पत्नी–पति हैं। गरीब हैं। बिल मामूली नौकरी पर है। जिस जगह उसके रहने का मामूली फ्लैट है, उसके सामने के लेटर–बॉक्स का भी सही रख–रखाव वे नहीं कर पाते। दोनों में बेहद प्यार है।

दोनों मन–ही–मन क्रिसमस में एक–दूसरे को उपहार देने को सोचते हैं। डेला सालभर से बचत करती चली आ रही है कि वह इस क्रिसमस के दिन अपने पति को घड़ी की चेन खरीदकर दे सके। और उसने सालभर में एक डॉलर सतासी सेंट्स बचाए हैं। पिता से मिली घड़ी को उसका पति पहन नहीं पाता, क्योंकि उसमें चेन नहीं है। वह आईने के पास खड़ी होती है। वह अपने सुंदर, रेशमी और बड़े बालों को देखती है, जिन बालों के कारण वह चर्चा में रहती है। इन रेशमी केशों के कारण पति और अधिक प्यार करता है। वह अचानक कुछ सोचती है और बाजार जाकर ब्यूटी पार्लर में अपने केश समूल कटवाकर बेच देती है। फिर बालों के पैसे और पहले से इकट्ठे पैसों से वह पति के लिए घड़ी का खूबसूरत चेन खरीद लाती है, ताकि इस क्रिसमस पर वह सरप्राइज गिफ्ट दे सके।

इधर पति बिल बाजार जाकर अपनी घड़ी बेचकर प्यारी पत्नी के लिए खूबसूरत कंघी खरीद लाता है। दोनों इस क्रिसमस पर एक–दूसरे को उपहार देते हैं।

यहीं कथा का अंत होता है। दांपत्य,वैवाहिक जीवन, प्रेम, गरीबी, त्याग, निश्छलता, अव्यावहारिकता ओर अमृत संवेदना का ऐसा संगुंफन अन्यत्र कम हुआ है। दांपत्य, प्रेम और विवाह का त्रिकोण जिस गरीबी की भूमि पर बना है, वहाँ दोनों ही अपने सर्वोत्तम का सहज त्याग करते हैं। अपने से अधिक महत्व दूसरे को देते हैं। यह लघुकथा है। इसे फैलकर छोटी कहानी, कहानी या लंबी कहानी का भी रूप दे दिया जाए तो भी इसकी कथाकाया लघुकथा की ही होगी । आधुनिक काल में ऐसी अनेक लघुकथाएँ पढ़ने को मिलती हैं, जो मूलत: छोटी कहानी या कहानी का कथातत्व लिये होती है।

हिंदी–साहित्य के स्वातंत्र्योत्तर–लघुकथाकाल में मेरी दृष्टि में पहली समर्थ लघुकथा ‘फूलो का कुरता’ (यशपाल) है । यहाँ यह लघुकथा यथावत् प्रस्तुत है–

‘वंकू शाह की दूकान के बरामदे में पाँच–सात भले आदमी बैठे थे। हुक्का चल रहा था। सामने गाँव के बच्चे ‘कीड़ा–कीड़ी’ का खेल खेल रहे थे। साह की पाँच बरस की लड़की फूलो भी उन्हीं में थी।

पाँच बरस की लड़की का पहरना और ओढ़ना क्या? एक कुरता कंधे से लटका था। फूलो की सगाई हमारे गाँव से फर्लांग–भर दूसर ‘चूला’ गाँव में संतू से हो गई थी। संतू की उम्र रही होगी, यही, सात बरस। सात बरस का लड़का क्या करेगा? घर में दो भैसें, एक गाय और दो बैल थे। ढोर चरने जाते तो संतू छड़ी लेकर उन्हें देखता और खेलता भी रहता, ढोर काहे को किसी के खेत में जाएँ। साँझ को उन्हें घर हाँक लाता।

बारिश थमने पर संतू अपने ढोरों को दलवान की हरियाली में हाँककर ले जा रहा था। संतू साह की दुकान के सामन पीपल के नीचे बच्चों को खेलते देखा तो उधर ही आ गया। संतू को खेल में आया देखकर सुनार का छह बरस का लड़का हरिया चिल्ला उठा–’आहा, फूलो का दुल्हा आया।’

दूसरे बच्चे भी उसी तरह चिल्लाने लगे।

बच्चे बड़े–बूढ़ों को देखकर बिना बताए–समझाए भी सबकुछ सीख और जान जाते हैं। यों ही मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति की परंपरा चलती रहती है। फूलों पाँच बरस की बच्ची थी तो क्या? वह जानती थी, दूल्हे से लज्जा करनी चाहिए। उसने अपनी माँ को, गाँव की सभी भली स्त्रियों को लज्जा से घूँघट और परदा करते देखा था। उसके संस्कारों ने उसे समझा दिया था, लज्जा से मुँह ढक लेना उचित है।

बच्चों के उस चिल्लाने से फूलो लजा गई, परन्तु वह करती तो क्या? एक कुरता ही तो उसके कंधों से लटक रहा था। उसने दोनों हाथों से कुरते का आँचल उठाकर अपना मुख छिपा लिया।

छप्पर के सामने, हुक्के को घेरकर बैठे प्रौढ़ भले आदमी फूलों की इस लज्जा को देखकर कहकहा लगाकर हँस पड़े।

काका राम सिंह ने फूलों को प्यार से धमकाकर कुरता नीचे करने के लिए समझाया। शरारती लड़के मजाक समझकर हो–हो करने लगे।

यहाँ यह लघुकथा समाप्त होती है। ‘फूलो का कुरता’ यशपाल की आठ कहानियों का संग्रह है, जिसका प्रकाशन विप्लव कार्यालय, लखनऊ से हुआ था। इस कहानी संग्रह में भूमिका शब्द के नीचे उपशीर्षक है ‘फूलों का कुरता’। तीन पृष्ठों की इस भूमिका में एक पृष्ठ यह लघुकथा घेरती है। लेखक के हस्ताक्षर के साथ तिथि छपी है, अगस्त 1949 ईस्वी।

यह लघुकथा भूमिका के मध्य में व्यवस्थित है। ग्रंथ की आठ कहानियों के साथ इसे नहीं रखा गया परन्तु भूमिका के बीच इसके व्यवस्थापन से इसका महत्व बढ़ा ही है।

परम्परा से प्रशिक्षित लज्जा की भावना और उसको ढकने के क्रम में प्राकृतिक संस्कृति नंगी हो गई है। आज हो यही रहा है। बाल–विवाह का सामाजिक रोग भी यहाँ है। बच्चों की मासूमियत और परम्परा–प्रशिक्षित संस्कार एवं उपस्थित यथार्थ के संघर्ष का दुष्परिणाम सामने है। बच्चों के सहज चारित्रय में विश्वसनीयता और सत्य का उद्घाटन है। शब्दों में पूर्वापरता का अंत: सूत्रित अनुबंध और कथा से संयुक्त कथ्य का कौशल इस लघुकथा को एक ऊँचाई दे जाता है। धीरे–धीरे यह लघुकथा अपने शब्दानुशासन और स्थापत्यकला के सावधान पूर्वापर–संयोजन के कारण संवेद्य एवं संप्रेषणीय बन गई है। शिल्प की तराश और भाषा की एकोद्दिष्ट भंगिमा लघुकथा को साहित्यिक साधारणीकरण और सामाजिक संवेदन एक साथ प्रदान करती है। मैं इस लघुकथा को अनेक दृष्टियों से महत्व देते हुए हिंदी की पहली शिल्पित लघुकथा कहना चाहूँगा।

1949 ई0 के बाद जनवरी 1989 की एक लघुकथा का उल्लेख करना चाहूँगा। बीच में चालीस वर्षों का अंतराल है। लघुकथा अनेक उतार–चढ़ाव को पार करती हुई यहाँ तक पहुँची है। इस मध्य के बीसियों नाम उल्लेखनीय हैं, या हो सकते हैं। लघुकथा के प्रकाशित ग्रंथ भी अब अंगुलिगण्य नहीं हैं। लेकिन मेरा मकसद इतिहास उपस्थित करना नहीं, वरन इतिहास–दर्शन,ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और भविष्य–धावित कालचक्र के आलोक में लघुकथा की विधागत शास्त्रीयता का अनुचिंतन करना था। जब सिद्धांत बनते या बनाए जाते हैं तो उनका विनियोग भी होता है। इसी विनियोग–विन्यास पर मैं सिर्फ़ दो लघुकथाओं को रख रहा हूँ। एक तो ‘फूलों का कुरता’, जिसका उल्लेख किया जा चुका है और दूसरा श्रीयुगल–लिखित ‘पेट का कछुआ’ शीर्षक लघुकथा। इसका प्रकाशन ‘हंस’ (दिल्ली) मासिक पत्रिका के जनवरी 1989 के अंक में पृष्ठ 65 पर हुआ है। पहले यहाँ लघुकथा यथावत् प्रस्तुत है, ‘खस्ता हाल बन्ने का बारह साल का लड़का पेट–दर्द से परेशान था और देह छीजती जा रही थी। टोना–टोटका और घरेलू इलाज का कोई फायदा नजर नहीं आ रहा था। दर्द उठता तो लड़का ऐंठ जाता, चीखता और माँ–बाप की आँखों में आँसू आ जाते। एक रात जब लड़का ज्यादा बदहाल हुआ, तो माँ ने बन्ने को लड़के का पेट दिखलाया। बन्ने ने देखा, कछुआ–जैसा कुछ पेट के अंदर चलने की कोशिश कर रहा है। गाँव के डॉक्टर ने भी हैरत से देखा और सलाह दी कि लड़के को शहर के अस्पताल ले जाओ।

बन्ने घर के बर्तन बेचकर लड़के को शहर ले आया। अस्पताल के सर्जन को भी अचरज हुआ,–पेट में जिंदा कछुआ? सर्जन ने जब कछुए को उँगलियों से दबाया तो वह इधर–उधर चलता–जैसा नजर आया। और लड़के के पेट का दर्द बढ़ गया। सर्जन ने बतलाया, लड़के को बचाना है तो दो हजार का इंतजाम करो।

बन्ने की आँखें चौंधिया गई। दो क्षण साँसें ऊपर की अटकी रह गई। लड़के को वह कभी नहीं बचा सकेगा। उसके जिस्म की ताकत चुकती लगी। वह बेटे को लेकर अस्पताल केबाहर आ गया। वह विमूढ़ बना सड़क के किनारे बेटे के साथ बैठ गया।

‘लड़के को कराहता देखकर किसी ने सहानुभूति जतलाई, ‘क्या हुआ है?’ बन्ने बोला, ‘पेट में कछुआ है साहब।’

‘पेट में कछुआ?’ मुसाफिर को अचरज हुआ।

‘हाँ साहब।’ और बन्ने ने लड़के का पेट दिखलाया। पेट पर उँगलियों का टहोका दिया। कछुआ कुछ इधर–उधर हिला। बन्ने का गला भर आया। ‘आपरेशन होगा साहब! डॉक्टर दो हजार माँगता है। मैं गरीब आदमी। लड़का मर जाएगा साहब।’ और वह रो पड़ा।

तब तक कई लोग वहाँ खड़े हो गए थे। उस मुसाफिर ने दो रुपए का नोट निकाला और कहा, ‘चंदा इकट्ठा कर लो और लड़के का आपॅरेशन करवा दो।’

फिर कई लोगों ने एक–दो रुपए और दिए। जो सुनता रुक जाता……….’पेट में कछुआ?’………’हाँ जी, चलता है।’……

‘चलाओ तो।’

बन्ने लड़के के पेट पर उँगलियों से टहोका देता। कछुआ हिलता। लड़के के पेट का दर्द आँखों में उभर आता। लोग एक–दो या पाँच के नोट उसकी ओर फेंकते! ‘आपॅरेशन करा लो भाई। शायद लड़का बच जाए।’

साँझ तक बन्ने के फटे कुरते की जेब में नोट और आँखों में आशा की चमक भर गई थी।

अगले दिन वह उस शहर के दूसरे छोर पर आ गया। वह लड़के के पेट पर उसी तरह टहोका मारता। पेट के अंदर कछुआ चलता। लोग प्रकृति के इस मखौल पर चमत्कृत होते और रुपए देते। बन्ने दस दिनों तक शहर के चालू नुक्कड़ों पर यह तमाशा दिखलाता रहा और लोग रुपए देते रहे। दूसरे–तीसरे दिन लड़के की माँ आती। बन्ने उसे रुपए देकर लौटा देता। लड़के ने पूछा–’बाबू ऑपरेशन कब होगा?’ फिर कुछ सोचता हुआ बोला–

‘मुन्ना तेरा क्या ख्याल है? पेट चीरा जाकर भी तू बच जाएगा? डॉक्टर भगवान तो नहीं। थोड़ा दर्द ही तो होता है न? बर्दाश्त करता चल। यों जिंदा तो हैं। मरने को क्या? असल तो जीना है।’

लड़का कराहने लगा। उसके पेट का कछुआ फिर चलने लगा था।’

यहाँ लघुकथा समाप्त होती है। मर्म के हर रेशे को झकझोरने वाली यह लघुकथा जिस अकथित कथ्य के साथ यहाँ उपस्थित होती है, उसका कथ्य सम्पूर्ण कथा है। कथा, कथ्य और भाषा का समीकरण तादात्म्य में बदल गया है। इन्हें हम यहाँ अलग–अलग नहीं कर सकते। शब्द उतने ही हैं, जितने की जरूरत कथा में है। एक भी फालतू शब्द नहीं है। शब्दों का संयोजन और विन्यास इस हिसाब से है कि उन्हें न तो हम न्यूनाधिक कर सकते हैं, न ही व्यक्तिक्रमित। कथा उतनी ही उपस्थित तथा स्थापत्य–स्थापित है, जो कथ्य बन सकती है। कथा और कथ्य का परस्पर निगीकरण रूपक–अलंकार की तरह सर्वात्मभावित है।

मुन्ने के पेट में कछुआ है। वह दर्द से कराहता है। वह इलाज के लिए घर के बर्तन बेच देता है। बर्तन संपत्ति की अंतिम इकाई होते हैं। माँ–बाप का वात्सल्य आँखों में उमड़ता–झरता रहता है।

वही बच्चा जब शहर के चौराहे पर खड़ा है और बाप अपरिचित भीड़ से याचना करता है तो उसे इलाज के लिए रुपए मिलने लगते हैं। रुपए इतने कि हर दूसरे–तीसरे दिन बन्ने की पत्नी राशि बटोर कर ले जाती है। समाज के पास सहानुभूति है। इस सहानुभूति के वशीभूत होकर लोगों ने रुपए दिए किंतु इससे भी बड़ी बात है, मनोरंजन की लालसा। समाज दूसरों के जीवन के मूल्य पर भी अपना मनोरंजन चाहता है। फिर वह समाज जोखिम उठाने और जान पर खेलकर तमाशा दिखानेवालों को पैसा देता है। बन्ने के पास अब रुपए बरसने लगे। वह मदारी की तरह अपने मरणोन्मुख बेटे का तमाशा दिखाता है।

इस समाज में अर्थ की जो महत्ता और नियामकता है, उसके परिणाम–स्वरूप जो मानवीय विपर्यस्तता तथा विकृति आती है, उसका एक संश्लिष्ट चित्र यहाँ उपस्थित है। माता–पिता का वात्सल्य और ममता धीरे–धीरे इस अर्थ–तंत्र में सूख जाती है। उस पैसे के लिए वह अपने बीमार और जीवित बेटे को भी परवान चढ़ाता है। बेटे के पेट पर ठोकर मारकर वह तमाशा दिखाता है। लोग पैसे देते हैं। बन्ने मुन्ने का ऑपरेशन नहीं कराता। बेटे के पूछने पर वह पूरी स्थिति का दार्शनिकीकरण कर देता है। वह कहता है, ‘थोड़ा दर्द ही होता है न? बर्दाश्त करता चल क्यों जिंदा तो हैं। मरने को क्या? असल तो जीना है।’

प्रेमचंद की कहानी ‘कफ़न’ अपनी मार्मिकता एवं शिल्पगत तराश के लिए हिंदी की सर्वोंत्तम या सर्वोंत्तम कहानियों में एक है। वहाँ घीसू और माधव पिता–पुत्र हैं। दुधिया पेट में बच्चा लिए मर जाती है। उसके कफन के नाम पर दोनों चंदा लेते और दारू पी जाते हैं। यहाँ माता–पिता अपने जिंदा बेटे के दर्द का तमाशा दिखाकर पैसे लेते और आँखों में चमक लिए हैं। दुधिया के पेट में बच्चा था। यहाँ मुन्ने के पेट में कछुआ है। दुधिया गर्भस्थबालक के साथ मर गई थी। यहाँ मुन्ना गर्भस्थ कछुआ के साथ जिंदा है।

‘कफन’ में माधव जब अपने पिता घीसू से पूछता है कि बाबा, हमने कफन के रुपए से तो दारू पी ली, कफन भी नहीं खरीदा, दुधिया की आत्मा क्या कहेगी? परलोक में हम क्या जवाब देगें? तो घीसू दार्शनिक की तरह समझाता है कि चिंता मत करो, उसे स्वर्ग मिलेगा। उसके कफन के पैसे से हमने दारू पी और भरपेट भोजन किया।

यहाँ पिता दर्द से कराहते अपने बेटे को समझाता है ‘थोड़ा दर्द ही होता है न? बर्दाश्त करता चल। यों जिंदा तो हैं। मरने को क्या? असल तो जीना है।’ दोनों स्थलों पर दर्शन के इस्तेमाल के सहारे अपनी विकृतियों को उचित ठहराया जा रहा है। यह विकृति सामाजिक विषमताओं और शोषण का उत्तर परिणाम है, किंतु कभी भी इनके कारणों का न तो उल्लेख है, न ही आक्रोश। एक विकृत स्थिति–चित्र, उसके भीतर कराहता हुआ दर्द और उसकी भी तह में सामाजिक विषमता का शोषक समुदाय। तीन परतों से बनी इस लघुकथा में केवल पहली परत स्पष्ट है। दूसरी और तीसरी परत का कहीं उल्लेख या संकेत तक नहीं। यह कथा का कथ्यापत्मक कौशल है।

बच्चा पेट में दर्द का कछुआ अथवा कछुआ का दर्द लिये कराह रहा है, किंतु माँ–बाप को तमाशा दिखाकर पैसे मिलते है और समाज को सस्ते में कौतुकाधार आनंद।

पूरी कथा की बुनावट ऐसी है कि कथा–पट पर कोई धागा अलग से नहीं दीखता। ऊपर से कोई कशीदाकारी नहीं है, बल्कि भीतरी तारों के कुशलसंयोजन से अपेक्षित चित्रांकण उभर आता है। भीतर से ही सब कुछ पैदा हो रहा है।

ऊपर वीभत्स रस, मध्य में करुण रस और भीतर अंतिम छोर पर रौद्र रस का त्रिपादी कथारस इस कौशल से प्रवाहित हुआ है कि सहृदय सामाजिक का हृदय अभीप्सित साधारणीकरण तक सहज ही पहुँच जाता है। फिर तो दर्द का यह कछुआ सबों के पेट में उतर जाता है और फिर हम बिना टहोका मारे कराह उठते हैं।

लघुकथा का यही कौशल भी है।

ऐसे और भी उदाहरण उपस्थित किए जा सकते हैं, पर यहाँ इतिहास–दृष्टि और व्यावहारिक आलोचना के स्थान पर विधागत शास्त्रीयता पर ही केंद्रित रहना था। ये कुछ उदाहरण इसलिए उपस्थित किए गए कि प्रस्तारित निकष पर लघुकथा की जाँच की क्या प्रक्रिया हो सकती है, इसे थोड़ा स्पष्ट करना था।

इस विचारपत्र के माध्यम से मैंने जो कुछ निवेदित किया है, वह अंतिम नहीं है, ऐसा मैं आरम्भ में भी कह चुका हूँ। आपके परामर्श , विचार, संशोधन और संयोजन से मैं निश्चय ही लाभान्वित होना अपना सौभाग्य समझूँगा। इत्यलम्।

[यह आधार-आलेख लघुकथा-लेखक –आलोचक –सम्मेलन , अप्रैल 1989 के अवसर पर पटना में प्रस्तुत किया गया । लेखक और सम्पादक की अनुमति के बिना इस लेख का उपयोग नहीं किया जा सकता ।]

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