विश्वास ( लघुकथा : डॉ . सतीशराज पुष्करणा)
पत्नी लंबे समय से बीमार चल रही थी।लाख यत्न करने पर डॉक्टर उसे रोगमुक्त नहीं कर पा रहे थे।
पति परेशान था।पत्नी की पीड़ा वह दूर नहीं कर सकता था और उसका रोग शय्या पर इस तरह पड़ा रहना वह और नहीं झेल सकता था।वह क्या करे,क्या न करे?इसी उधेड़बुन में सड़क पर चलते-चलते उसने सोचा,ऐसे जीवन से उसे या रोगिणी को क्या लाभ हो रहा है।इससे तो अच्छा है, पत्नी को जीवनमुक्त कर दिया जाए। और उसने जहर की एक शीशी खरीद ली।
घर पहुँचा।पत्नी ने लेटे-लेटे मुस्कुराकर पूछा, “आ गए?”
“हाँ।” वह बोला, “तुम दवा ले-लो।”
” इतनी दवाइयाँ रखी हैं, किसी से कुछ लाभ तो। नहीं हुआ? मैं नहीं खाऊँगी अब कोई भी दवा।”
पति बोला,”आज मैं तुम्हारे लिए बहुत अच्छी दवा लाया हूँ। इससे तुम जल्दी अच्छी हो जाओगी।”
पत्नी पुन: मुस्कुराकर, “तुम नहीं मानोगे।अच्छा लाओ,अब तुम मुझे जहर भी दे दो तो भी मैं पी लूँगी।
इसी क्षण शीशी पति के हाथ से छूटकर जमीन पर गिरकर चूर-चूर हो गई।
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मेरी दृष्टि में ‘लघुकथा के पितामह’ की लघुकथा :’विश्वास’

लघुकथा के शिखर-स्तंभ आदरणीय पुष्करणा जी की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करती हूँ। आपके हाथों पुरस्कार-स्वरूप प्राप्त उनकी पुस्तक ‘लघुकथा समीक्षा:एक दृष्टि’ में लघुकथा को परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा है कि–
“लघुकथा जीवन के किसी क्षण विशेष का कम से कम अत्यावश्यक शब्दों का कथात्मक (गद्यात्मक रूप में)ढंग से यथार्थ के धरातल पर पैनी धार से कहा(शैली के अर्थ में)गया मानवोत्थानिक सन्देश है।”
प्रख्यात साहित्यकार की यह बात उनकी अनेकानेक लघुकथाओं पर शत -प्रतिशत खरी उतरती है। उन्होंने लघुकथाओं को लिखकर अपने विचारों को लेखकीय धरातल पर रोपा भी और पल्लवित-पुष्पित भी किया। आप उनकी कोई भी लघुकथा उठाकर पढ़े,चाहे ‘सहानुभूति’ को ले लें, ‘अपाहिज’ को ले लें, ‘माँ’, ‘ममता, ‘रक्तबीज’,’विश्वास’ या फिर कोई और ले लें, सभी इस बात की पुष्टि करते नजर आयेंगे।उनकी सभी लघुकथाएं लघुकथा के मापदंड पर,तकनीकी तौर पर भी और संवेदना के स्तर पर भी, हमें ‘आह’ और ‘वाह’ कहने को बाध्य तो करती ही है, काफी समय तक वह लघुकथा हमारे अंदर घुमड़ती हुई हमें कुछ सोचने को मजबूर करती है और तब यह बात समझ में आती है कि डॉ . सतीशराज पुष्करणा जी को ‘लघुकथा का जनक’ क्यों कहा जाता है!
‘विश्वास’ (लेखक : डॉ . सतीशराज पुष्करणा) लघुकथा मेरी चुनिंदा प्रिय लघुकथाओं में से एक है। इसका कथानक साधारण से भारतीय परिवार में पति-पत्नी के जीवंत दांपत्य- प्रेम को आधार बनाकर बुना गया है। जैसा कि विदित है, प्रेम सार्वभौमिक और चेतन-जगत में सहज रूप से विद्यमान रहने वाला मृदु भाव है। माना जाता है कि,विश्व के समस्त भाषाओं में सबसे अधिक साहित्य -सभी विधाओं में, प्रेम पर ही (वह प्रेम का संयोग पक्ष हो या वियोग पक्ष हो ) लिखा गया है। अत: पाठक प्रारंभ में ही स्वाभाविक रुप से इस लघुकथा के वर्ण्य को आत्मसात कर लेता है। पत्नी की बीमारी से परेशान पति द्वारा पत्नी की पीड़ा अब सही नहीं जाती और दाम्पत्य-प्रेम की यही प्रगाढ़ता तरल रूप से प्रवाहित हो कर पाठकों के मन को भिंगो देती है। जब पाठक अगली पंक्ति में प्रेमदग्ध पति को पत्नी की मुक्ति की युक्ति से रू-ब-रू होता है तो वह हतप्रभ रह जाता है।
पति जहर की शीशी में अपनी प्रिया के दर्दनाक होने की दवा पाता है।सबसे गजब की बात कि उसके इस कृत्य से देख पाठक के मन में उसके प्रति वितृष्णा का कोई भाव नहीं आता,वह उसे हत्यारा नहीं दिखता।अपितु प्रेम का यह स्वरूप उसके मन को आर्द्र कर देता है –उसे पत्नी के बिछोह में स्वयं को डूबो देना स्वीकार है। लेकिन,उसके तन के कष्ट को नहीं सह पा रहा है।यह अद्भुत प्रेम एकतरफा नहीं है,उधर पति-परायण पत्नी के प्रेम की पराकाष्ठा है कि वह उसके हाथों जहर भी पीने को प्रस्तुत हो जाती है।क्योंकि एक भारतीय नारी को पता है कि,उसका पति उसे जहर नहीं दे सकता।पाठक धड़कते हुए ‘क्या होगा’ की स्थिति में पहुँचता ही है कि,पत्नी का अगाध विश्वास उसे भाव-बिभोर कर देता हैऔर नायक के हाथ से जहर की शीशी अचानक गिरकर टूट जाती है।
दांपत्य-प्रेम को दर्शाती इस लघुकथा को पढ़कर पाठक का ह्रदय मृदु भावानुभाव में देर तक दोलन करता भी है। लेखक द्वारा इस लघुकथा के विषय-वस्तु के चयन का कायल होता पाठक -मन तत्क्षण लघुकथा के उत्कृष्ट कथानक होने की उद्घोषणा भी कर देता है।
लघुकथा के आकार और कथ्य की क्षिप्रता के कारण लेखक को आलंकारिक एवं फुर्सत से तराशी गई भाषा के लिए अवकाश नहीं होता। लघुकथा हमेशा सरल,स्पष्ट और प्रवाहमयी भाषा की माँग करती है,ताकि हवाई गति में शीघ्रता से अपने गंतव्य को पा सके। इस दृष्टि से पुष्करणा जी बड़े धनी थे। चुस्त-दुरूस्त, त्वरित गति से आम बोलचाल की भाषा में वे इस तरह अपनी बात कह जाते हैं कि, पाठक विस्मित हो,कह उठता है -वाह!गजब!! सर के कलम की यह जादूगरी विश्वास में भी निखरकर आई है। सरल प्रवाहमयी भाषा और सहज शिल्प में जब लेखक लिखता है कि, “…पति के हाथ से छूटकर जमीन पर गिरकर चूर-चूर हो गई।”
भाषा और शिल्प का इस मणिकांचन संयोग ने इस लघुकथा के कथानक को भरपूर निखारा तो है ही,इसके शीर्षक ने उस अनकहे-कथ्य को भी स्पष्ट तौर पर खोलकर रख दिया है, जिसे लेखक कहना चाहता है —
” पत्नी पुन: मुस्कुराकर, “तुम नहीं मानोगे।अच्छा लाओ,अब तुम मुझे जहर भी दे दो तो भी मैं पी लूँगी।”
पति-पत्नी के अगाध ‘विश्वास’ का यही रूप भारतीय वैवाहिक जीवन का मूल आधार है। अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सारी दुनिया को भारतीय दाम्पत्य-प्रेम का यही रागात्मक स्वरूप,जहाँ हम एक-दूसरे की परवाह करते हैं की अभिव्यंजना कर पुष्करणा जी ने इस लघुकथा को विशिष्टता प्रदान तो की ही है, इसके शीर्षक को सार्थकता भी दी है।
मैं जब भी पुष्करणा सर की यह लघुकथा पढ़ती हूँ, तो हर बार प्रथम बार पढ़ने पर होनेवाली मसृण-अनुभूति होती है और उसमें निमग्न हो जाती हूँ।
पुन: लघुकथा के जनक को नत-शीश वंदन करत हुये अपनी श्रद्धा-सुमन अर्पित करती हूँ।
_पूनम (कतरियार), पटना