दिल्ली: वह ट्रेन में मिला था मुझे। वह किसी बड़ी कम्पनी का बड़ा आदमी था। कद लम्बा और गोरा था, और आँखें छोटी और भेदती हुईं। वह ऊपर से नीचे तक देख रहा था मुझे और चश्मे के अन्दर उसकी आँखें और छोटी होती जा रही थीं। वह दिल्ली जा रहा था। मैं डर रहा था, उसके लिए…कि कहीं वे आँखें बन्द न हो जाएँ।
वह दिल्ली उतरा। मैं भी दिल्ली उतरा। वह लोगों से घिर गया था, मैं अकेला था। लोग उसे हाथों-हाथ ले रहे थे, और मैं फिर डर गया था, उसके लिए….कहीं वह अपने पैरों पर खड़ा होना ही न भूल जाए….जाते जाते जब उसने मेरी तरफ देखा, तो वह एक बड़ी सी कार में था, और मैं बस स्टैंड पर। मैं ठीक से नहीं कह सकता कि उसकी आँखें उस वक्त कैसी थीं?
पटना: वह फिर मिला था दिल्ली स्टेशन पर। वह पटना जा रहा था। मैं भी पटना जा रहा था। उसने देखा था मेरी तरफ। उसने कुछ कहा था। पहले की तुलना में इस बार उसकी आँखें कुछ बड़ी थीं। वह पटना में उतर गया। मैं भी पटना में उतर गया। वह चला गया। मैं भी चला गया।
मुजफ्फरपुर: वह पटना बस स्टैंड पर फिर मिला। वह मुजफ्फरपुर जा रहा था। मैं भी मुजफ्फरपुर जा रहा था।
‘‘आप भी मुजफ्फरपुर जा रहे हैं?’’ उसने पूछा और पूछते हुए उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा!
‘‘जी हाँ’’, मैं चौंक गया।
‘‘कहाँ रहते हैं?’’ उसने पूछा। मैंने बताया।
‘‘अच्छा ऽ!….मैं भी तो वहीं रहता हूँ।’’
मैंने नहीं बताया कि मैं जानता था कि वह वहीं रहता है, जहाँ मैं रहता हूँ।
वह अब बोल रहा था। मैं सुन रहा था। मुजफ्फरपुर आया और वह उतरा। मैं भी उतर गया। उसने इधर-उधर देखा, अपना सामान नीचे रखा…और उसने अँगड़ाई लेते हुए एक लम्बी साँस ली, फिर मुड़कर मेरी तरफ देखा उसने। मैं आश्चर्य से देखता रहा उसकी तरफ…..उसकी आँखें पूरी की पूरी खुल गई थीं!…वह मुस्कुराया मेरी तरफ देखकर। मैं न मुस्कुरा सका, वह कुछ कहना चाह रहा था, पर मैं अपने रास्ते जाने के लिए मुड़ गया था। मैं डरा हुआ था!…मुझे डर था वह फिर कभी मुजफ्फरपुर से दिल्ली जाते वक्त मिल जाएगा और उसकी आँखें फिर छोटी होती चली जाएँगी-दिल्ली पहुँचते-पहुँचते।
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