“ख़त में धुंधलका कैसा है देखो , लिखते में कोई रोया था शायद।”
“रोशनाई में ये सुर्खियाँ कैसी , लिखते में लहू निचोड़ा था शायद।”
“वाह ! वाह ! भई बहुत खूब।”
“क्या कमाल का शेर है मलिक साहब ! क्या दर्द बयाँ किया है।”
“अजी ! आपकी कलम ने तो गुलाम बना दिया, भई क्या कहने।”
“जनाब एक बार फिर हो जाए।” मलिक साहब के घर पर आज साहित्य गोष्ठी का आयोजन था , उनके शेर पढ़ते ही एक एक शेर पर दसियों दाद पा फूले नहीं समा रहे थे मलिक साहब।
“जी अभी हाजिर करता हूँ जनाब।” हाथ को पेशानी पर लगा शुक्रिया अदा करते हुए मलिक कहते जा रहे थे। “शुक्रिया ! शुक्रिया ! जनाब ! इस हौसला अफज़ाई का।”
“ …जहे नसीब ! “
“जी आदाब !” रचना की प्रशंसा से प्रफुल्लित मलिक ने पुन: शेर की बौछार कर दी।
भीतर रसोई में मेहमानों के जल पान की व्यवस्था के रही श्रीमती मलिक (रत्ना )भी पति की प्रतिभा और मिली प्रशंसा से खुश हो रही थी। मगर प्लेटें लगाते हुए उसका मन कुछ असमंजस में था। कल से वह मेहमानों की अगुवाई की तैयारी में जुटी थी। सोचा था ऐसी आवभगत करूंगी मेहमानों की कि पतिदेव खुश हो जाएँगे ; किन्तु सुबह थैला उठा मार्किट जाते हुए जब पति ने कहा ,
“मैं मेहमानों के लिए जलपान की व्यवस्था करके आता हूँ।”
“मगर आप बाज़ार से नाश्ता क्यों ला रहे हो जी ?”
“मतलब !”
“हमारे गाँव में तो मेहमानों को हाथ के बने पकवान बनाकर खिलाये जाते हैं।”
“वो तुम्हारे गाँव की बात है पगली , यह शहर है यहाँ लोगों को चायनीज़ , पिस्ता , कोल्डड्रिंक पसंद आता है।”
“मगर मैंने तो नाश्ता तैयार कर लिया है।”
“आखिर दिखा दिया न गँवारूपन ! कितनी बार कहा है शहर के ढाँचे में ढालो खुद को। मैं नाश्ता ला रहा हूँ , साइड में तुम अपनी ये कारीगरी भी रख देना। मगर पहले ही बता रहा हूँ -कोई पसंद नहीं करेगा।”
संकोच के साथ रत्ना ने प्लेटें लगाईं। बैठक में प्लेट आते ही घर के मसालों की खूशबू ने सभी का मन मोह लिया।
“भई ! वाह ! मलिक साहब क्या बात है ये हींग के तड़के वाली उड़द की कचौड़ियाँ , मज़ा आ गया। ऐसा स्वाद बरसों बाद चखा।
“हुम्म ! पुदीने की चटनी के साथ कांजी बड़े …भई कभी माँ बनाया करती थी कांजी बड़े , अब तक तरस रहे हैं खाने को , आज तो मज़ा आ गया।”
“अरे ! यह गाजर का हलवा तो लीजिए शर्मा साहब …आज तो भाभीजी ने माँ की याद दिला दी। जब से शहर आए हैं ,ये लज़ीज़ पकवान तो अतीत की याद होकर रह गए हैं। कहाँ मिलता है घर का सा स्वाद , बहुत तकदीर वाले हो मालिक साहब जो कलम के साथ-साथ माँ अन्नपूर्णा की भी रहमत है आप पर।”
दरवाज़े की ओट में खड़ी रत्ना के चेहरे पर वही ख़ुशी के भाव थे ,जो कुछ समय पहले मालिक साहब के चेहरे पर अपने शेर की दाद सुनकर आए थे। धीरे से बोली , ‘शुक्रिया ! सुधीजन मेरी रचना को दाद देने के लिए।’
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