लघुकथा विधा से मेरा सबसे पहला परिचय ख़लील जिब्रान, झेन गुरुओं और आध्यात्मिक विचारों के प्रेषण को पठनीय बनाने वाले गुरु–शिष्य आदि के वार्तालाप के रूप में सजी कथाओं के माध्यम से हुआ।
पढ़ने के लिए समय कम होना, इस हेतु से लघुकथा लोकप्रिय नहीं होने वाली। लिखने के लिए ही कम शब्दों की आवश्यकता है और अभिव्यक्ति यदि कम शब्दों में सम्पूर्णता को पा सकती है, यह स्थिति लघुकथा के लिए आदर्श हो जाती है।
मेरे अनुसार, लघुकथा विधा के दो स्वरूप सामने आते हैं। जैसा कि पहले उल्लेखित है, झेन कथाएँ, दार्शनिकों के संवादों, गुरु शिष्य, संसारी व्यक्ति और विरक्त आदि के मध्य होने वाले संवाद, समस्या समाधान आदि के द्वारा हमें मार्ग दिखाती, जीवन के वास्तविक अर्थ से जोड़ती, अन्तस में झांकने का अवसर देने वाली कथाएँ। इनमें विरक्ति का भाव इतना प्रबल है कि लेखक का भी नाम नहीं होता। यह वही स्थिति है, जो आपको पवित्र आध्यात्मिक तीर्थ स्थल पर, साधना की तरंगों के मध्य अनुभूत होती हैं; परन्तु भौतिक स्वरूप में बंधा व्यक्ति, हमेशा तो हिमालय में, तीर्थ स्थलों पर, पावन नदियों के तटों पर जीवन यापन नहीं कर सकता। उन स्मृतियों को संजोए, वह अपने घर लौट आता है। उन्ही आपसी सम्बन्धों में, धन, भोजन, ऊँच-नीच और भागदौड़ के अनिवार्य जंजाल में उलझता है। कोई आश्चर्य नहीं कि सोने के पिंजरे में बंद पक्षी के समान जल्द ही मनुष्य को यह जंजाल भी उतना ही प्रिय लगने लगता है।
इस अनिवार्य वापसी के बाद शुरु होती है हमारे भौतिक जीवन की लघुकथा। घर संसार, दैनिक दिनचर्या, दफ्तर, सरकार, व्यवस्था, बचपन, यौवन, वृद्धावस्था, आपसी सम्बन्ध और कभी-कभी अपराध, व्यवसाय, स्त्री विमर्श जैसे विषयों पर शब्द विन्यास करती लघुकथा। इसे जितना परिभाषित करते हैं, उतना ही परिवेश और स्वयं को कहते जाते हैं।
जीवन को जीते हुए जब हमें परिस्थितियों से ऊपर उठ जाने की कला आ जाती है, तब सम्बन्ध, व्यवहार, यहाँ तक कि आस पास की निर्जीव वस्तुओं की उपस्थिति में भी अस्तित्व के धागे मिलने लगते हैं। किसी सुन्दर रचना के समान हमारे जाने पहचाने रास्ते, वृक्ष, यहाँ तक कि महक भी यह क्षमता रखती है कि हमारी सोच का विस्तार करे।
अब इन्हीं धरातलों पर अपने सशक्त अस्तित्व को प्रकट करती हुई दो लघुकथाओं की बात करते हैं।
मेरी पसंद की पहली लघुकथा है, आदरणीय डॉ. सतीश दुबे की ‘चौखट’। एक निर्जीव लकड़ी को लेकर विविध ताने बाने बुनती यह लघुकथा जैसे कुछ शब्दों में जीवन का सारा वृत्तांत हमारे सामने रख देती है। सजीव सम्बन्धों को भी उपेक्षा से नकारने वाले इस समय में, निर्जीव वस्तु को लेकर आधुनिकता के समक्ष दृढ़ता से खड़ा होता गृहस्वामी हमें तिनके का सहारा लगने लगता है। उहापोह के मध्य सकारात्मकता की जीत और अपने निर्णय के लिए किसी के अनुमोदन को नकारना, स्वयं के प्रति पूर्णता देता है।
इन सभी ऊँचाइयों के अलावा, जीवन को देखने का एक स्नेहिल दृष्टिकोण भी हमें यह कथा दे जाती है। वर्णन के लिए चुने गए शब्द भी इतने सजीव है कि लाल पोटली की कल्पना सहज ही होने लगती है, श्वेत वस्त्र पर हल्दी के लाज भरे क़दम हम भी महसूस कर पाते हैं, गुलगोथने बच्चों के गृह प्रवेश के समय की उनकी भंगिमाओं के वर्णन पर मन विभोर हो जाता है। बेटियों की बिदाई के आँसुओं का मूक साक्षी होना जहाँ इस चौखट को एक जीवन्त तत्व प्रदान कर देता है, वहीं इसे इतिहास के साथ जोड़कर हम सभी को महत्त्वपूर्ण बना देता है।
‘लक्ष्मीस्वरूपा बहुओं के आन्तरिक हर्ष वाद्य’ ‘बाहर से लाई गई खुशियों को घर में बाँटे जाने वाले मनसूबों से लदे चरण की उल्लासभरी थिरकन’ ये कुछ वाक्य स्वयं इस लघुकथा के मुख पर पवित्र मनोभावों के समान है, जिनके होते इसे किसी कृत्रिम भाव के आभूषण से सजाने की आवश्यकता नहीं है।
डॉ.सतीश दुबे द्वारा लघुकथा विधा को लेकर जो मानक प्रस्तुत किए गए हैं, उनकी प्रत्येक कथा में परिलक्षित होते हैं, यह कथा बताती है कि सूक्ष्म दृष्टि भी जुड़ाव के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती है।
मेरी पसंद की दूसरी लघुकथा है, माननीया उर्मि कृष्ण जी की ‘समाज का दर्पण’। ‘वह’ नामक हम सभी के बीच का एक व्यक्तित्व है जो यहाँ से वहाँ तक के विस्तार में जीता है। यह कथा एक प्रकार से भौतिक जीवन की उलझनों से लेकर ऊंचाई के झूठे पैमानों तक को स्पर्श करती है। अपनी समस्याओं से ग्रस्त होकर व्यक्ति भगवान के पास जाने के स्थान पर लेखक के पास जाता है और अपनी व्यथा को शब्द देने को कहता है। यह मोड़ इस कथा को एक अलग स्थान प्रदान करता है। यहाँ थोड़ी अनिश्चय की स्थिति अवश्य बनती दिखाई देती है लेकिन आपसी संवाद, पार्श्वभूमि और परिस्थितियाँ मिलकर इसे गति अवरोधकों से बचाते हुए फिर सुरम्य मार्ग पर ले आते हैं।
‘जब दाँत साबुत थे, तब चने नहीं थे और अब चने हैं, तो दाँत नही’ इस प्रकार की कहावतों को जीवन्त करती कथा सकारात्मक होकर भी बेचैन करती है और बेचैनी में भी पाठक पर निर्णय छोड़ देती है कि वह कभी नायक की स्थिति पर खुश या दुखी होता है, कभी स्वयं को टटोलता है, कभी लेखक को लेकर असमंजस में जाता है और अन्त में, ‘नियति’ के सामने मुस्कुरा भर देता है। “दिमागी अय्याशी” जैसे शब्द कथा में पड़ाव के समान हैं, जहाँ पर सुस्ताकर हम अब तक की कथा को एक बार फिर से अनुभव में उतारते हैं, फिर आगे बढ़ते हैं।
उर्मि कृष्ण जी लेखिका कम और साधिका ज़्यादा हैं। उनका कर्म, अनुभव और समर्पण रचनाओं में उभरकर सामने आता है। अनुभव के विविध सोपानों पर चढ़कर उनके तपे हुए शब्द संघर्ष और तप की अनुभूति देते हैं।
इन दोनों कथाओं के माध्यम से लघुकथा विधा की समृद्धि, क्षमता और विस्तार का परिदृश्य स्वाभाविक रूप से सामने आ जाता है। किसी भी विधा को लेकर चर्चा, आलोचना, अभिव्यक्ति और सर्जन समान रूप से आवश्यक माने गए हैं। इसी मार्ग पर वर्तमान लघुकथा भी उत्तम गति प्राप्त कर चुकी है। इसे अनावश्यक उलझनों से बचकर, वाक्य विन्यासों की जादूगरी से परे, अनुभूतियों के साम्राज्य में अधिक समय बिताना होगा।
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1-चौखट/ डॉ. सतीश दुबे
चौखट-पूजा वाले दिन श्रीफल बदार कर मंत्रबद्ध पूजन सामग्री सहित लाल कपड़े में बाँधी गई छोटी-सी पोटली मस्तिष्क में उभरकर आँखों के सामने आ गई। चौखट में दरवाजे का लगना और फिर मंगल प्रवेश।
शादी होने के पूर्व तक का खुशनुमा जीवन जीने तथा स्कूल से कॉलेज तक की शिक्षा के लिए सब बच्चे इसी चौखट से निकले। बाहर से लाई गई खुशियों को घर में बाँटे जाने वाले मनसूबों से लदे चरण की उल्लासभरी थिरकन इसने महसूस की। देश विदेश से उपलब्धियाँ प्राप्त कर लौटे बेटों तथा पहली बार आए दामादों का स्वागत भी तो सबसे पहले इसी ने किया। यही नही, शुभ्र वस्त्र पर हल्दी भरे चरण चिह्न अंकित कर छुई-मुई-सी लजाती शरमाती लक्ष्मी स्वरूपा बहुओं का आंतरिक हर्ष वाद्यों के साथ प्रवेश हेतु आग्रह कर रही गृह तपस्विनी की छवि को इसने एलबम की तरह अपने में समाए रखा है। यदि मन के सूक्ष्म यंत्रों से देखा जाए, तो बेटियों को बिदा करते वक़्त टपकी आँसुओं की ढ़ेर सारी बूँदे भी तो यहाँ दिखाई देगी। इस मायने में ख़ुशी ही नहीं, न जाने कितने दर्द और कोलाहल की प्रतिध्वनियों को इस चौखट ने अपने में ज़ज्ब कर रखा है।
अंकित, प्रेक्षा, प्रीतांशु, पुनर्वसु तथा सूर्यांश अब तो बडों-बडों के कान काटने लगे हैं, किन्तु इन्होंने जन्मदात्रियों की गोद में टुकुर-टुकुर आँखें घुमाते हुए इसी चौखट से तो प्रवेश कर जीवन को सँवारने की शुरुआत की।
अकबर महान के ‘बुलंद दरवाजा’ की तरह जो दक्षिणमुखी प्रवेश द्वार, इतनी उपलब्धियों की नींव पर खड़ा हो, उसे अनिष्टकारी कैसे माना जा सकता है।
मस्तिष्क से अंतिम निर्णायक सूत्र मिलते ही उन्होंने निगाहें घुमाकर सामने बैठे वास्तुशास्त्री तथा भवन निर्माता की ओर देखा तथा दृढ़ता से बोले ” मि. फ़ेंगशुई, क्षमा कीजिएगा, वास्तु सिद्धांतों को अमल में लाने के लिए मैं अतीत की सुखद इमारत पर हथौड़ा नहीं चला सकता।
2-समाज का दर्पण/ उर्मि कृष्ण
उसके पिता एक दुकान पर नौकर थे। घर में शादी के लायक दो जवान बहनें थी और दो छोटे भाई। उसने बी.ए. किया, फिर टाइप और शार्टहैण्ड सीखी। सेवायोजन कार्यालय के फेरे लगाने, आवेदनपत्रों के साथ पोस्टल ऑर्डर भेजने और इण्टरव्यू पर जाने का क्रम आरम्भ हुआ। महीनों पर महीने गुजरते गए, पर नौकरी नहीं मिली। उसकी आँखे बुझी-बुझी रहने लगीं और चेहरे पर निराशा की लकीरें मकड़ी के जाले की तरह छा गई।
एक दिन वह एक लेखक के पास गया और उसने कहा कि वह उस पर कहानी लिखे। लेखक ने उसे सिर से पैर तक देखकर पूछा, “तुम सन्त्रास महसूसते हो?”
युवक ने कहा, “सन्त्रास! यह क्या होता है?”
लेखन ने नाक बिचकायी, “अच्छा, अपनी कुण्ठाओं का विवरण दो।” युवक ने घुटे हुए स्वर में कहा, “हम बहुत तंगी से जी रहे हैं, मुझे नौकरी नहीं मिल रही। बहने हैं…”
लेखक ने मुस्कुराते हुए उसकी बात बीच में ही काट दी, “यह ग़रीबी है, कुण्ठा नही। खैर, अजनबीपन, मृत्युबोध, मानसिक ग्रन्थियाँ … ये समस्याएँ हो तो बताओ।”
युवक बोला, “यह सब मैं नहीं समझता। मैं तो एक आम आदमी हूँ। मेरी समस्या कपड़ों की, बहनों के ब्याह की, महँगाई की।”
“बन्धु, माफ़ करना, इन छोटी-छोटी बातों पर हम कहानीं नहीं लिखते। ये कोई बड़ी समस्याएँ नहीं हैं। क्लर्क, मजदूर, किसान, छोटे दुकानदार, मास्टर, सभी की यही समस्याएँ हैं। कीड़े मकोड़ों की तरह भरे पड़े हैं ऎसे लोग। इन पर लिखा ही क्या जा सकता है। वास्तविक समस्याएँ आन्तरिक और मनोवैज्ञानिक होती हैं। बुद्धिजीवी की, चिन्तक की, अधिकारी की…” लेखक ने कहा।
कई साल बीत गए। उस युवक को नौकरी मिल गई। शादी हुई और दो बच्चे। वह प्रतिभावान था। अत: उन्नति करते-करते शीघ्र ही ऊंचे पद पर पहुँच गया। अब उसे कम्पनी की ओर से बंगला और कार भी मिली हुई थी, लेकिन उसके जीवन में शान्ति नहीं थी। वह हर समय तनावग्रस्त और उद्विग्न रहता था। पत्नी से उसके सम्बन्ध बिगड़ते जा रहे थे। नौकरी में स्पर्धा, ईर्ष्या और अधिकारियों का दबाव उसे हरदम खाए डालता था। अब वह समझ गया था कि कुण्ठा क्या है, सन्त्रास किसे कहते हैं और अजनबीपन कैसा होता है।
एक दिन वह उसी लेखक के यहाँ पहुँचा और उसे अपनी कथा सुनाकर कहानी लिखने की विनती की। लेखक बोला, “भैए, तुम एक दशक देर से आए। अब मैं कुण्ठा, सन्त्रास और ग्रन्थियों पर कहानी नहीं लिखता… तुम नहीं जानते, यह सब पूँजीपतियों के चोंचले हैं, दिमागी अय्याशी है। इतनी भूख, ग़रीबी और बेकारी के होते हुए कुण्ठा और सन्त्रास की बात बेमानी है। अब मैं आम आदमी की कहानी लिखता हूँ। आसपास की कहानी, समान्तर कहानी। माफ़ करना।”
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