-सुनो। आओ धूप में बैठें।
-चलो। कुर्सियाँ लगा दी हैं। आओ।
– आ गई। आज कुछ यादें आ रही हैं।
-कैसी?
– शादी की और शादी के बाद की।
-कैसी यादें?
-वो जब मेरी डोली उतरी थी और वो रास्ता, वो गली कितनी तंग थी।
-हाँ। वह गली बहुत मशहूर थी सारे शहर में भीड़ी गली के नाम से।
-आज सोचती हूँ कि वह गली हमारी शादी जैसी रही होगी।
-कैसे?
-किसी अनजान शख्स से शादी, जीवन की शुरुआत किसी ऐसी गली जैसी, जिसका कुछ अता-पता न हो कि क्या होगा आगे?
-हाँ! यह तो है कि आगे क्या हुआ फिर बताओ ?
– वैसे तो सबकुछ ठीक रहा, पर आपकी फितरत न बदली।
-कौन-सी?
-दूसरी महिलाओं के पीछे भागने की ।
-अरे! ऐसा कहाँ और कब हुआ ?
-आज तो सच मान लो कि आप कभी किसी, तो कभी किसी के पीछे दीवाने होने में देर नहीं लगाते थे ।
– नहीं यार। ऐसा कुछ नहीं था।
– तो क्या था?
– क्या कहूँ उस फितरत को? थी वह?
– बस। कुछ बात पसंद आ जाती थी। इतनी ही ।
– बस। इतनी ही?
-तो और क्या?
-यदि मुझे भी किसी पर-पुरुष की इतनी-सी बात पसंद आ जाती, तो बच्चों का क्या होता?
– अरे आप ऐसा कर ही नहीं सकती थीं।
-क्यों? सारी पावनता का ठेका मैंने ही ले रखा था? आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी?
-छोड़ो यार। धूप का मज़ा लो न। अब तो हम पुरानी बातें छोड़ें।
-मैं तो आपको पकड़ ही न सकी। बस, भागते ही रहे इधर से उधर। संकरी गली में। क्यों?
-छोड़ो न।
-तभी तो जिंदगी यहाँ तक आई कि मैं छोड़ती ही गई और इतने में बच्चे हो गए। मेरी जिम्मेदारी पूरी हो गई।
-मैंने भी तो जिम्मेदारी निभाई ।
-ऐसे निभाते हैं?
बड़ी तीखी नज़र से पूछा तो वह कोई जवाब न दे पाया।
धूप अब एकदम बहुत चुभने लगी थी।
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