संस्मरण
10 नवम्बर 2015 को अचानक एक फोन आया-“हैलो, डॉ॰ अशोक कुमार जी बोल रहे हैं ?“ “जी हाँ, नमस्कार आप…….।”
“मैं रामकुमार आत्रेय बोल रहा हूँ, कुरुक्षेत्र से। आपका दीपावली वाला पत्र मिला। आपने अपने भाव-विचार बहुत ही सुंदर ढ़ंग से लिखे हैं।”
“जी, बहुत-बहुत आभार! आप और आपका परिवार सब कैसे है ?”

“जी, अशोक जी, सब अच्छे हैं। आपको, आपके परिवार को और सभी मित्रों को दीपावली की शुभकामनाएँ।”
“जी, धन्यवाद सर आपको भी हार्दिक शुभकामनाएँ।”
“हाँ, अशोक कुमार जी तुमने मिलने का समय माँगा है। कभी भी फोन करके आ जाओ। मैं अक्सर घर पर ही रहता हूँ।”
“जी, बहुत-बहुत धन्यवाद। प्रणाम करता हूँ।”
“खुश रहो, भगवान सब भला करें।”
“ये थी रामकुमार आत्रेय जी से पहली बातचीत।” जैसे ही फोन कटा मन खुशी से नाच उठा कि आज एक और साहित्यकार से संवाद हुआ और मिलने का सुअवसर भी। यहीं से बातों-मुलाकातों का सिलसिला निकल पड़ा।
25 दिसम्बर 2015 को मिलने की अनुमति माँगी तो उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी। साथ ही कौन-सी गाड़ी कब चलेगी और कब तक कुरुक्षेत्र पहुँचेगी ,यह सब बड़ी सहजता से समझाया और हिदायत दी कि यूनिवर्सिटी के तीसरे गेट पर उतर कर मुझे फोन कर लेना। मैं आपको वहीं मिल जाऊँगा। अगले दिन मैं तय समय पर रेलगाड़ी द्वारा कुरुक्षेत्र स्टेशन से ऑटो रिक्शा लेकर यूनिवर्सिटी के तीसरे गेट-बस स्टॉप पर पहुँच गया। मेरे मन में अब तरह-तरह के प्रश्न, जिज्ञासाएँ और कुछ आशंकाएँ भी निरन्तर उठ-बैठ रही थी। न जाने कैसा व्यक्ति होगा ? कैसे मेरे प्रश्नों के उत्तर देगा ? कहीं मुझसे ही कोई ऐसा अप्रत्याशित प्रश्न ही न पूछ ले ? कहीं ज्यादा गुस्सैल या बौद्धिक हुआ तो………? मैं वहाँ से गुजरने वाले रोबदार और कुलीन से हर आदमी में रामकुमार आत्रेय को ढ़ूँढ़ रहा था। अगले ही क्षण मन के बनी उनकी छवि से मिलान करता, पीछे हट जाता और पास से गुजरने वाला वह आदमी आगे निकल जाता। पर मैं, दृढ़ निश्चय के साथ अपने पथ पर उनकी राह में खड़ा था। कुछ ही देर में सामने एक लम्बे -चौड़े और तगड़े-से बुजुर्ग को देखा ,जो धीरे-धीरे कदमों को जँचा- जँचाकर टेकते और हाथों में पोस्ट करने के लिए सफेद लिफाफा पकड़े हुए आ रहे थे। मन कहने लगा ,हों न हों यहीं रामकुमार आत्रेय जी हैं। तुरन्त उनकी तरफ बढ़कर चरण स्पर्श करके प्रणाम किया। “खुश रहो, भगवान भला करे।…….अरे! पहचान लिया ?”
“जी, बिल्कुल पहचान लिया।”
“आज ठण्ड भी ज्यादा है, आने में कोई मुश्किल तो नहीं हुई। चलो पहले, यूनिवर्सिटी के पोस्ट ऑफिस चलते हैं। वहां कुछ काम है फिर घर चलेंगे।”
आत्रेय जी सरल होकर खुलते चले गए सारी औपचारिकताएँ ढ़ह गई। मैंने थोड़ा सकुचाते हुए से उनकी आँखों की रोशनी के बारे में जानना चाहा ,तो वे बिल्कुल अपने जानकार की तरह बताने लगे – “भाई शुरू में मैंने सन् 1963 में जे.बी.टी. (प्राथमिक अध्यापक) के रूप में ज्वॉइन किया। ज्वॉइनिंग से पूर्व मेडिकल जांच अधिकारी ने अयोग्य घोषित कर दिया। फिर में बड़े अधिकारी से मिला। उसने कहा कि कोई बात नहीं यहाँ तो एक आँख वाला भी पढ़ा सकता है। फिर तुम्हें तो जरा-सी दिक्कत है और फिर रिटायरमैंट तक सब ठीक रहा।” आत्रेय जी बोलते-बोलते रुक गए और एक लम्बी साँस छोड़ते हुए कहा, “अशोक भाई, यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना रही है। मैं आँखों की इस परेशानी को जीवन का ‘काला अध्याय’ मानता हूँ। सन् 82-83 में मैं हरियाणा-दिल्ली की सामूहिक काव्य गोष्ठी में आमंत्रित था। वहाँ बड़े हाल में टीवी पर सीधा प्रसारण चल रहा था, जो रोशनी सीधी आँखों पर गिर रही थी वो बहुत तेज थी। मुझे वहाँ बहुत परेशानी हुई। कविता -पाठ करते समय मेरा एक हाथ बार-बार आँखों से गिरते पानी को पोंछ रहा था। वहीं से मेरी आँखें खराब हुई। बाद में एक आँख तो बिल्कुल ही निकलवानी पड़ी। सुधा जैन, जो एक साहित्यकार थी उनके पति आँखों के विशेषज्ञ थे। उन्होंने बहुत प्रयास किया। लेकिन रोशनी दिन-प्रतिदिन घटती चली गई। फिर दो-तीन महीने एम्स में रहा। वहाँ डॉ॰ जैन के परिचित डॉक्टर थे। उन्होंने 15-16 ऑपरेशन किए। आखिर उन्होंने “फंगल इन्फेक्शन” घोषित करके जवाब दे दिया कि आपकी इस प्रॉब्लम का इलाज अमेरिका में भी नहीं है। अब एक आँख मे केवल 15 प्रतिशत रोशनी बची है। यहीं-कहीं जाता हूँ तो पोते विकास को लेकर जाता हूँ। कहीं बाहर जाना होता है तो राधेश्याम भारतीय जो मेरे मित्र हैं , वे मेरे साथ जाते है।”
आत्रेय जी ने बड़ी विनम्रता से मेरे बारे में, माता-पिता, खेती-बाड़ी, नौकरी के बारे में बहुत सी बातें पूछी और फिर अपनी ही लय में बताने लगे, “अशोक भाई, मेरे पिताजी बचपन में ही गुजर गए थे। माँ ने ही मुझे पाल पोसकर इस लायक बनाया। मेरी माँ बड़ी धार्मिक और दयालु थी। घर के कुत्ते-बिल्ली की रक्षा के लिए रातों जागती थी, बाहर के अन्य कुत्तों से बचाने के लिए। मेरी माँ जातिप्रथा में विश्वास तो करती थी ; लेकिन भी फिर निम्न समझे जाने वालों को कुर्सी-पीढ़ा देकर बैठाती थी। उन्हें चाय आदि खाने-पीने का सामान भी देती थी। हाँ, फिर उन बर्तनों को आग से निकालना नहीं भूलती। पर, उनके प्रति भेदभाव या दुर्व्यवहार को कतई सहन नहीं करती थी। जब आकाशवाणी से मेरा कविता पाठ प्रसारित होता था ,तब मेरी माँ बहुत खुश होती और गली में रेडियो लेकर बैठ जाती थी। अपनी पड़ोसिनों-साथिनों को गर्व से बताती थी कि देखो, मेरा बेटा रेडियों में बोल रहा है।” (हँसते-हँसते बात पूरी की।) रास्ते चलते-चलते वे विभिन्न विभागों और कैन्टीन के विषयों में भी बताते रहें। मैंने जब उनकी पत्नी के बारे में पूछा तो गंभीर होकर बताने लगे कि पत्नी से भी सहयोग मिलता था पर वे शादी के 13-14 सालों में ही गुजर गयी। सन् 1962 में मेरी शादी हुई थी। वे भी सीधी-सादी अनपढ़ थी और मेरी माँ से उनकी पटरी नहीं बैठती थी। घर के कलेश से मुझे बड़ा ही आघात होता था। पहले उन्हें टीबी हो गई फिर टाइफाइड होने से चल बसी। काफी इलाज के बाद भी बच न सकी। वास्तव में मेरे जीवन में एक रागात्मक लय न पहले बन पाई न ही बाद में।”
तब तक पोस्ट ऑफिस आ गया था। आत्रेय जी ने कुछ पैसे निकाले, दो चिट्ठियाँ पोस्ट की और आजकल पत्रिका का ‘प्रवासी विशेषांक’ प्राप्त करके हम वापिस घर की ओर चल पड़े। उन्होंने इशारे से कहा, “वहाँ चाय की दुकान खुली होगी ,आपको चाय पिलाते हैं। सुबह के चले हुए हो।” मेरी इच्छा भी थी। मैंने कहा-“ठीक है सर चलो।” मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा, “भाई, चाय के साथ क्या लोगे ब्रेड़, समोसा या फिर बिस्किट ?” मैंने कहा-“सर, कुछ नहीं। मैं खाना साथ लाया हूँ।” फिर चाय वाले को कहा-“भाई जी दो चाय और एक बढ़िया- सा बिस्किट दे देना।” चाय के पैसे उन्होंने ही चुकाए। चलते हुए रास्ते में उन्होंने बताया -मैंने प्राथमिक अध्यापक के रूप में ज्वॉइन किया था लेकिन अध्यापकों की कमी होने के कारण मुझे बड़ी क्लासों में हिन्दी पढ़ानी पड़ी। मैंने कई वर्ष करहंस मनाना (समालखा, जिला पानीपत) में भी पढ़ाया फिर फतेहपुर-पुण्डरी में पढ़ाया। मैं बी.एड नहीं करना चाहता था ;लेकिन मेरे मित्र ने आग्रहपूर्वक हिमाचल यूनिवर्सिटी से फार्म लाकर मुझे दे दिया। जैसे ही मैंने बी. एड़. किया मुझे प्रमोशन मिल गया। मैं प्रिंसिपल के पद तक पहुँचा और वहीं से रिटायर हुआ।” फिर वे अचानक रुककर कहने लगे-“यह राणा आटा चक्की है। इसकी पहचान कर लो। यहाँ आकर किसी से भी पूछ लो।” राणा आटा चक्की से मुड़ते ही थोड़ी दूरी पर घर आ गया। फिर उसी गर्मजोशी से स्वागत किया, चाय बनवाई और खाना बनवाया। अपने पुत्र पवन व उनकी पत्नी को बुलाकर परिचय कराया, अपने पोते विकास से मिलवाया और बताया कि मेरे अधिकतर कार्य विकास के सहारे ही होते हैं।
थोड़े रुककर-“अशोक जी, आप नाम के साथ क्या लिखते हो ?”
“जी, हमारा गौत्र तो मलिक है पर मैं सीधा नाम अशोक कुमार ही लिखता हूँ।”
“देखो! अशोक कुमार नाम से लिखने वाले बहुत से लोग मिलेंगे। उस भीड़ में अपने आप को कैसे ढूँढ़ोगे ? वैसे तो साहित्यकार का काम ही उसकी पहचान होता है यह तो सही परन्तु नाम भी तो एकदम पहचान वाला होना चाहिए। आप ‘अशोक बैरागी’ के नाम से लिखा करो। मैं तुम्हें यह नया नाम देता हूँ।”
“सर, मैं यह जातिसूचक शब्द साथ लेकर घूमना नहीं चाहता।”
“अरे! हिन्दी साहित्य के कितने बड़े कवि है बालकवि बैरागी जी वो भी तो ‘बैरागी’ लिखते हैं। यह जातिसूचक नहीं तुम्हारा विशेषण है। अब तुम ऐसा ही लिखा करो और लो मेरे फोन में भी इसी नाम से अपना नम्बर सेव कर दो। अगर मैं आत्रेय नहीं लिखता तो बैरागी ही लिखता। यह मुझे अच्छा लगता है। ठीक है, आज से तुम ‘अशोक बैरागी’ हो गए।” तब से मैं इसी नाम से लेखन-सृजन करने लगा। मैंने जो भी प्रश्न उनसे पूछे उन्हें बहुत सरलता व सौम्यता से मुझे बताए नहीं बल्कि समझाए थे। समाज का विभिन्न जातियों से बंटकर आपसी रंजिश रखना और झगड़ा करना, महिलाओं के साथ भेदभाव व अत्याचार का होना, साहित्य का विभिन्न विमर्शों में बंटना, सहिष्णुता के मुद्दे पर पुरस्कार लौटाना, हिन्दी भाषा और लोकसाहित्य की उपेक्षा करना आदि विषयों को लेकर आत्रेय जी गंभीर थे और मानसिक पीड़ा से गुजरते थे।
साक्षात्कार हो जाने के बाद बड़े ही स्नेह से खाना खाने का आग्रह किया। हम दोनों एक ही जगह बैठ गए। मैंने अपने बैग से दही और मेथी के पराँठे निकाले तब तक विकास हमारे लिए रोटी, मटर-पनीर, आचार और लस्सी के गिलास ले आया। उस समय लगभग डाँटते हुए ही कहा -“यहाँ आओं तो कभी खाना लेकर मत आना।” मैंने मेथी के पराँठे और दही उन्हें खिलाई। खाते हुए कहने लगे-“गाँव के खाने की सुगंध और स्वाद कुछ अलग ही होता है।” वे सब्जी-रोटी-लस्सी के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे। उनके इस आतिथेय से मन तृप्त और हृदय गद्गद् हो गया। उनके आग्रह में औपचारिकता नहीं बल्कि आत्मीयता और अपनेपन का भाव संचित था।
खाना खाकर हम बाहर धूप में बैठ गए और उन्होंने पूछा-“कोई रचना लाए हो तो सुनाओ। उसके विषय में चर्चा करेंगे।” तब मैंने उन्हें ‘पास-फेल’, ‘गुलाबी कार्ड’ और ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित ‘अपने-अपने धर्म’ लघुकथाएँ सुनाई। कुछ देर चुप रहे। फिर…….“तुमने लिखी तो अच्छी हैं ;पर तीनों रचनाओं में ‘मैं’ उपस्थित है। यानी हर रचना में ‘मैं’ को ही रखने से रचना का स्तर गिरता है और वे आत्मकथा जैसी हो जाती हैं। ’मैं’ की जगह किसी चरित्र को नाम देकर खड़ा कर दो। जैसे विनोद, राम आदि। कोई भी हो सकता है। शब्द- चयन घटना व पात्र के अनुकूल और सरल होना चाहिए। बात स्वयं न कहकर अगर कहानी का पात्र उसे कहे तो कहानी ज्यादा रोचक बनती है। हर घटना लघुकथा नहीं होती, लघुकथा बनती है साहित्यकार के तराशे हुए शब्दों और भाव-संवेदन के संयोजन से।” मैं जब भी उनसे मिलने गया या फोन पर लम्बी बातचीत हुई। हर बार मेरी रचनाओं पर बात होती थी। वे उन्हें सुनते थे। मेरी अनेक लघुकथाओं और कविताओं को उन्होंने नए सिरे से लिखवाया, उनकी वाक्य- संरचना ठीक करवाई और शीर्षक सुझाए। उन्होंने कभी भी रचना सुनने से मना नहीं किया, न ही कभी टाल-मटोल की और न ही औपचारिकता बरती बल्कि आग्रहपूर्वक सुनते थे। आत्रेय जी पूरी तन्मयता से रचना सुनते, आवश्यक सुझाव देते और अच्छी रचना की खूब प्रशंसा भी करते थे। एक बार जब मैंने उनके कहानी संग्रह-‘अनोखा घुड़सवार’ की समीक्षा की और वह ‘बालवाटिका’ में छपकर आई तो बहुत खुश होकर बोले, “बैरागी जी, तुम्हारी समीक्षा से यह बात तो स्पष्ट होती है कि तुमने पुस्तक गहनता से पढ़ी है और इतनी बारीकी से चीजों को खोजना बहुत कम लोग कर पाते हैं।”
उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से मन-मयूर गर्व और प्रसन्नता से नाच उठा। एक बार जब मैं जम्मू-कश्मीर साहित्य अकादमी में गया, तो वहां आत्रेय जी ने अपने मित्र नरेश कुमार ‘उदास’ को मेरी सहायता के लिए तैयार किया। जब मेरा तबादला असंध (करनाल) नए स्कूल में हुआ तो वहां अपनी जान-पहचान के लोगों से सम्पर्क सधवाया। मतलब, कह नहीं सकता कितनी बार उन्होंने मेरी मदद की होगी। वे अकसर कहा करते थे कि-“अच्छा लिखने के लिए बड़े लेखकों को खूब अच्छी तरह पढ़ना चाहिए।”
किसी भी कार्यक्रम मे आत्रेय जी की उपस्थिति घर के किसी अपने बड़े और आत्मीय संरक्षक जैसी महसूस होती थी। वे जिनसे रिश्ता बना लेते थे उसे अंत तक निभाते थे। हर तरह का सहयोग, सहायता और मार्गदर्शन देने को तत्पर रहते थे। हर नए काम या कार्यक्रम को पूछते थे फिर बड़े ही उपयोगी और सरल सुझाव या उपाय भी बताते थे। मैंने गोहाना में एक प्लॉट लिया, तब कहने लगें “बैरागी जी, इसमें मकान की नींव मैं रखूँगा और अगर बेचने का विचार बने तो कुरुक्षेत्र में किसी परिचित से पूछकर अच्छी जगह प्लॉट दिलवा दूँगा।” लेकिन मेरा दुर्भाग्य, ऐसा नहीं हो पाया। हर 15-20 दिन में फोन पर बात होती रहती थी। अधिक दिन होने पर कहते, “क्यों बैरागी जी, नाराज हो क्या?” उनका पहला वाक्य होता था “हैलो…हाँ….कौन? और फिर नमस्ते होते ही पहचान जाते थे, सरल हो जाते थे। कई बार फोन पर नम्बर दिखाई न देने की पीड़ा भी व्यक्त करते थे। आत्रेय जी ने एक बात बड़ी सुन्दर मुझे समझाई कि जहां सब लोग लाइन में खड़े हों, तो मुझे भी अपने ही नम्बर पर खड़ा होना अच्छा लगता है। कवि-कथाकार के रूप में मुझे अतिरिक्त सुविधा की कामना नहीं है। लेकिन लाइन में खड़ा होने पर भी मेरा हक नहीं मिलता तो मुझे दर्द होता है तब मैं एक मानसिक यंत्रणा से गुजरता हूँ।”
मैंनें एक प्रश्न उनकी रचनाओं के विषय में पूछा तो कहने लगें-“बैरागी जी, शुरू में मैंने छंदोबद्ध लिखना शुरु किया था; लेकिन मैं अधिक लय नहीं बना पाता था। अतः मैंने शीघ्र ही मुक्तछंद में लिखना शुरु कर दिया। वास्तव में मेरी जिंदगी में कभी रागात्मक लय पहले भी नहीं थी और अब भी नहीं है।” आत्रेय जी लोक से जुड़े कथाकार थे। साधारण लोगों के सम्पर्क में रहना, अपनी लोकभाषा से जुड़े रहना, लोकसाहित्य पर लिखना-पढ़ना उन्हें बड़ा अच्छा लगता था। उन्हें स्वयं को गाँव का ‘गंवार’ कहलाना अच्छा लगता था। वे कहते थे कि-“गँवार ग्रामीण का ही पर्यायवाची है और मैं स्वयं का गँवार ही मानता हूँ।” हीर-रांझा और सोहणी-महिवाल जैसी लोककथाएँ और पंडित लखमीचंद, बाजे भगत, मांगेराम जैसे लोकगायक उनके प्राणों में बसते थे। वे इस बात को लेकर बड़े चिंतित होते थे कि आधुनिक पीढ़ी लोकभाषा और साहित्य को उपेक्षा की दृष्टि से देखती है उनके लिए गाँव गँवारों का स्थान हैं। इस लोकसाहित्य व परम्परा को नष्ट करने में इलैक्ट्रोनिक मीड़िया ने भी कसर नहीं छोड़ी, जब तक लोकभाषा और साहित्य का प्रचार-प्रसार नहीं होगा तो नई पीढ़ी अपने गाँव कैसे थे, पूर्वज कैसे थे, क्या थे, उनकी भाषा, संस्कृति, परम्पराओं और साहित्य को कैसे जानेगी ? हमारी सभ्यता, संस्कृति, हमारी जीवनशैली हमारे संस्कारों का जीवंत प्रमाण है। इनसे कटना अपनी जड़ों से कटने जैसा है।” बतरस और उनके स्नेह आशीर्वाद से सरोबार होकर जब चलने लगा तो ‘नींद में एक घरेलू स्त्री’ कविता संग्रह और ’आग, फूल और पानी’ कहानी संग्रह मुझे आशीर्वाद सहित भेंट किए।
आत्रेय जी सीधे-सादे, सरल स्वभाव के एक ग्रामीण साहित्यकार थे। वे हर प्रकार के दिखावे, छल, प्रपंच और तिकड़मबाजी से हमेशा दूर रहे, परिश्रम करना और सच बोलना उन्हें प्रिय था। मैंने उनसे पूछा-“आत्रेय जी, सफलता का रहस्य क्या है ?” तब उन्होंने कहा-“बैरागी जी, सफलता के मायने सभी के लिए अलग-अलग होते हैं फिर भी परिश्रम और ईमानादारी के अलावा आज के युग में तकनीकी ज्ञान और व्यवहार कुशलता से ही सफलता मिलती है। वैसे सफलता का कोई ‘शार्टकट’ नहीं होता। अगर आपने ईमानदारी से परिश्रम किया है तो परिश्रम का फल आपको जरूर मिलेगा। थोड़ी बहुत देर भले ही हो जाए।”
आत्रेय जी का पत्रकारिता से सीधा जुड़ाव भले ही न रहा हो, फिर भी वे एक पत्रकार की तरह सजग और अति संवेदनशील मानव थे। वे अपने आसपास की प्रत्येक गतिविधि पर नजर रखते थे। ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में ‘खरी-खोटी’ कॉलम इसका जीवंत प्रमाण है। ट्रिब्यून के संपादक श्री सहगल जी को ‘खरी-खोटी’ कॉलम शुरू करने का सुझाव आत्रेय जी ने ही दिया था और लगातार तीन वर्षों तक इसको सफलतापूर्वक चलाना आत्रेय जी का ही कौशल और सजगता थी। इस कॉलम में साहित्य, संस्कृति, भाषा, समाज, धर्म और राजनीति लेकर बड़ी सटीक और सार्थक टिप्पणी की जाती थी। इनकी उपेक्षा या अव्यवस्था को लेकर आत्रेय जी बड़ी गंभीरता से विचार करते थे। कई बार यह टिप्पणी तीखी एवं व्यंग्यात्मक होती थी। लेख के अंत में आने वाले चुटकला सारी कटुता और व्यंग्य में हास्य रस घोल देता था। सच पूछिये तो, मेरा आत्रेय जी से मिलने और संबंध होने का मूल कारण उनका ‘खरी-खोटी’ कॉलम का आकर्षण ही था। उन्हीं को पढ़कर मेरे मन में आत्रेय जी से मिलने और उनको जानने की तीव्र इच्छा हुई थी।
आत्रेय जी का प्रारम्भिक जीवन भले ही गरीबी में बीता हो, लेकिन खाने-पीने के ही लाले पड़े हो ऐसा भी नहीं था। उन्होंने अपने स्वाभिमान को कभी आहत नहीं होने दिया। जब कौशल जी ‘ट्रिब्यून’ के संपादक बने ,तो आत्रेय जी को उनके व्यवहार से लगा कि वे उनके लेख को उचित महत्त्व नहीं दे रहे हैं , तो उन्होंने कॉलम लिखना ही बंद कर दिया और फिर कौशल जी सहित अनेक मित्रों के आग्रह करने पर भी नहीं लिखा। वे हमेशा सच्ची बात कहने वाले सामाजिक साहित्यकार थे। घर-परिवार और गाँव गवांड के आदमी उन्हें पंचायती तौर पर फैसले करवाने और सलाह मशविरा के लिए बुलाकर ले जाते थे। 29 सितम्बर 2019 को आदरणीय आत्रेय जी का हम सब के बीच से चले जाना बहुत ही पीड़ादायक है। आज के इस आपाधापी, भागमभाग और स्वार्थ भरे दौर में आखिर आत्रेय जी जैसे सुलझे हुए सामाजिक, मार्गदर्शक, स्नेही और निच्छल हृदयी आखिर हैं ही कितने। संघर्षों और पीड़ाओं की भट्टी में तपकर ही आत्रेय जी कुन्दन बने थे। सरलता, सौम्यता, सादगी, परिश्रम, सत्यवादी और सरल हृदयी आत्रेयी जी भुलाए नहीं भूलते। वे मेरे जैसे न जाने कितने नौसीखिये बंधुओं के लिए प्रेरणापुंज रहे होंगे।
कई बार ऐसा लगता था कि उनके भीतर बहुत कुछ अभी शेष है, जो भीतर ही भीतर तच रहा है, पक रहा है, खदबदा रहा है, जिसे वे कह नहीं पाए। वह बाहर आना चाह रहा था। कारण उनके जीवन का आँखों की रोशनी वाला ‘काला अध्याय’। परवश होने और स्वयं को असहाय होने की पीड़ा को भी व्यक्त करते थे। जीवन के जिन ऊबड़-खाबड़ रास्तों से वे निकलकर आए थे इतना आसान नहीं था। उनके लिए यहां तक पहुँचना। कई बार फोन पर बात होती तो कहते थे-“बैरागी जी, करने को तो मेरे पास अनेक काम हैं पर क्या करूँ परमात्मा ने मेरी आँखों की रोशनी छीन ली। मुझे असमर्थ और परवश बना दिया है।” अगर वे और जीवित रहते व आँखें भी ठीक रहती तो वे और भी बहुत सारा कह-लिख पाते जो उनके अंदर उमड़-घुमड़ रहा था; लेकिन जीवन के कृष्णपक्ष ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। मेरे जीवन में आत्रेय जी के साहित्य की सुवास और स्मृतियों में वे स्वयं बने रहेंगे और मैं हमेशा उनका कृत्तज्ञ रहूँगा। सादर नमन।
-0-डॉ.अशोक बैरागी,हिन्दी प्राध्यापक,राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, हाबड़ी (कैथल) हरियाणा
मो॰ 94665-49394