सविता इन्द्र गुप्ता
रिटायर्ड मास्टर जी हर शाम घर के बाहर सिट-आउट में बैठे-बैठे छोटे बच्चों को खेलते हुए देखते थे। यह उनके उबाऊ समय को ऊर्जा से भर देता था। कई दिनों से सर्वेंट क्वार्टर का एक बच्चा डरा-सहमा-सा सब बच्चों को रंग-बिरंगी साइकिल चलाते हुए ललचाई निगाहों से देखा करता था। वह हिम्मत करके एक बच्चे की तिपहिया साइकिल के पास गया। रंग-बिरंगी चमचमाती नई साइकिल छूने को हाथ बढ़ाया ही था कि उस बच्चे ने डपट दिया। बेचारा मन मसोस कर रह गया। पास ही किसी बच्चे की एक साइकिल देखी, तो इधर- उधर देखा फिर उस साइकिल को छू-छूकर खुश होने लगा। उसके चेहरे की चमक और लालच बढ़ता गए। उसने साइकिल की घंटी बजाई, ट्रिन ट्रिन … ट्रिन। घंटी की मधुर आवाज सुन वह रोमांचित हो गया। ताली बजाकर एक बार उछला और फिर अपने को उस साइकिल की सीट पर बैठने से रोक न पाया। चेहरे पर किसी राजा के सिंहासन पर बैठने जैसे भाव थे। तभी एक तंदरुस्त सा बच्चा आया और उसे धक्का दे कर गिरा दिया-‘‘यह मेरी साइकिल है। इस पर क्यों बैठा?’’
उसे चोट लग गई, चेहरे पर दर्द की रेखाएँ खिंची थीं। रुँआसा हो कर घर जाने लगा। तभी मास्टर जी ने उसे पास बुलाया, ‘‘साइकिल चलाना अच्छा लगता है ?’’
‘‘हाँ, लेकिन मेरे बापू लाकर नई दे सकते। हम ग़रीब हैं … साइकिल बहोत सारे रूपों की आती है।’’ उसने अपने हाथों को पूरा फैलाते हुए कहा।
‘‘एक मिनट रुको।’’ उन्होंने भीतर जा कर टाँड पर वर्षों से धूल खा रही, बेटे की ट्राइसाइकिल को उतारा। जल्दी-जल्दी धूल साफ़ की और बच्चे को दे दी- ‘‘लो, आज से यह तुम्हारी। घर ले जाना।’’
बच्चे को तो जैसे पंख लग गए। साइकिल पर बैठकर खूब दौड़ाने लगा। घर में अंदर जाते हुए मास्टर चौंके, ‘‘ओह, आज की संध्या-बाती करना भूल ही गया।’’
तभी बाहर से उस बच्चे का मंदिर की घंटियों जैसा स्वर सुनाई पड़ा,‘‘थेंकु अंकल जी।’’