जून 2026

पाठकीयसंवेदनाओं का डिजिटल गुलदस्ता     Posted: June 1, 2025

डॉ. सुषमा गुप्ता के बारे में मैं क्या ही कहूँ….अनेक पुरस्कार अपने नाम करने वाली सुषमा जी किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है। वह तो साहित्य जगत का जाना पहचाना नाम है। इनकी लेखन- शैली इन्हें समकालीन लेखकों में विशिष्ट बनाती है। इन सबसे ऊपर इनका सरल सहज व्यक्तित्व बहुत प्रभावित करता है।

निसंदेह लेखन एक सामाजिक जिम्मेदारी होती है, जिसमें सजगता जरूरी है। लेखक भले ही ‘स्वांत सुखाय’ के लिए ही क्यों न लिखता हो, पर यह भी पूर्णतः सत्य है कि उसका लेखन प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से समाज  पर सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव डालता है या यूँ कहें कि प्रभावित करता है।

लेखक का संवेदनशील होना बेहद जरूरी है; क्योंकि संवेदनशील लेखक ही अपने आस -पास घटित घटनाओं से प्रभावित होकर जो महसूस करता और लिखता है। निसंदेह वह पाठक के संवेदनाओं के तंतुओं को गहरे तक छूता है। उद्वेलित करता है। मानस पटल पर लंबे समय तक बना रहता है।

सुषमा जी उन्हीं संवेदनशील रचनाकारों की श्रेणी में आतीं हैं। इनका लेखन मन को ही सुकून नहीं देता; बल्कि आत्मा को तृप्त करता है।  एक पाठक की किसी पुस्तक से बौद्धिक क्षुधा की पूर्ति की उम्मीद रहती है, जिसने मुझे निराश नहीं किया है। बल्कि आनंदित और आश्चर्य चकित भी किया है।

इनके लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये महज लेखन नहीं करतीं हैं, बल्कि शब्दों के मोतियों को, भावनाओं के धागे में पिरोकर तिलिस्म रचतीं हैं, जिसे पढ़ने वाला पाठक आदि या अंत की परवाह किए बिना सम्मोहित- सा बस इसमें बहता चला जाता है।

इस संग्रह में संकलित लघुकथाएँ इन्द्रधनुष के रंगों की तरह अनेक विषयों से सजीं हैं।

कुछ लघुकथाएँ तो मन पर इतना गहरा असर करतीं हैं कि मन स्तब्ध- सा रह जाता है पढ़कर। इनकी लघुकथाओं ने समाज की नब्ज़  भली भांति थामी हुई है, जो लेखिका की समाज के प्रमुख मुद्दों के प्रति सजगता दर्शाती है।

इनकी लघुकथाएँ पाठक को सुकून के झूले पर झुलातीं हैं, तो कभी, चिंता के  भँवर में डुबो देतीं है,  कभी अचानक चेहरे पर मुस्कान ला देतीं,  तो कभी आँखों में आँसू भर जाती हैं। एक पाठक के लिए महज पुस्तक नहीं , बल्कि  हमारी प्रिय लेखिका द्वारा हमें दिया  संवेदनाओं का गुलदस्ता है,  जो नौ रसों से भरा है।

वैसे तो संग्रह की सभी लघुकथाएँ अच्छी हैं, पर कुछ विशेष लघुकथाएँ हैं, जिन्होंने मुझे आकर्षित किया है।

‘अतीत में खोई वर्तमान की चिट्ठियाँ’ में एक चार वर्षीय लड़की के माध्यम से प्रेम की मासूमियत के साथ, पहली बार दिल टूटने से उपजे दर्द को कोमल तरीके से प्रस्तुत किया है। सच में प्रेम होने और दिल टूटने में दर्द की गहनता समान होती, चाहे उम्र का कोई भी पड़ाव क्यों न हो।

‘हीरोइन’ लघुकथा के माध्यम से उस लंपट पुरुष के चरित्र को उजागर किया है। जिसके हृदय में प्रेम, सद्भावना, सम्मान तो छोड़िए मानवता भी नहीं है, जिसके लिए एक सुन्दर स्त्री का साथ केवल अपने दंभ की पुष्टि के लिए चाहिए ।

कुछ तो लोग कहेंगे लघुकथा आज के वातावरण में हर माँ के मन में अपने बेटों को लेकर उपजी चिंता पर मरहम का काम कर रही है। माँ और बेटी हर विषय पर एक दूसरे से खुलकर बात करती हैं। पर बेटा न ही अपने पिता और न ही माँ से बात कर पाता है।

इस कथा ने उस संकोच की दीवार को तोड़कर माँ- बेटे को करीब लाया है। साथ ही लड़कों पर मर्दानिगी नाम के उस छद्म बोझ को भी उतारा है, जिसके बोझ तले दबा किशोर अपने आत्मसम्मान के लिए, न चाहते हुए भी गलत करने मजबूर होता है। ऐसी लघुकथाएँ बड़ी तादाद में लिखनी चाहिए ; क्योंकि ऐसी कथाएँ ही समाज को नयी दिशा देतीं हैं।

फ़्रॉक लघुकथा में स्त्री शोषण की उस समस्या को उभारा है, जिसमें उम्र कोई मायने नहीं रखती….जो सदियों से अनवरत ज्यों की त्यों चली आ रही है। समय चाहे कितना बदल गया हो, आज लम्पटता की भी स्थिति जस की तस है।

शादीशुदा स्त्री की दुखती रग को छूती लघुकथा है। जिसे स्त्री चाहकर भी किसी से नहीं बता पाती है। कथा का अंतिम वाक्य –‘समाज में ज्यादातर औरतों का गणित यही है।….. मर्जी तो मेरी भी नहीं पूछी जाती।’ स्त्री के जीवन के उस कड़वे सच को दिखाती है। जिसे हर स्त्री ने कभी न कभी भोगा है।

संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण लघुकथा आईना है, मानव मन से संवेदनाओं के मरने का…. हृदय के धड़कन  विहीन होने का… आभाषी दुनिया में प्रसिद्ध पाने की भयावहता का।

ब्रेकिंग न्यूज़ भी इंसानियत के खत्म होने की ओर ध्यान दिलाती कथा है। यहाँ भी वही सोशल मीडिया में प्रसिद्धि पाने कुछ रोमांचकारी पोस्ट करने की ललक, जिसके लिए आग में जलते इंसान को को बचाने से कहीं ज्यादा जरूरी वीडियो बनाना है।

लघुकथा जात के माध्यम से इंसानियत के चेहरे पर तमाचा मारा है। सोचने वाली बात है कि आज का आदमी कुत्तों से भी गया बीता हो गया है। एक बारगी कुत्ते से तो वफादारी की उम्मीद की जा सकती है; लेकिन आदमी से नहीं।

मन का मीत लघुकथा के माध्यम से विदेश से लौटे बेटा, जो पिता के साथ खुलकर बातें भले न करता हो; पर उनकी खुशी का पूरा ख्याल रखता है। इस कथा ने कहीं न कहीं बेटों की नकारात्मक होती छवि को एक सही दिशा दी  है।

इस पुस्तक में से अगर मुझे अपनी सबसे पसंदीदा लघुकथा को चुनना होगा तो मैं इस चुनाव में संयुक्त रूप से दो लघुकथाओं को एक साथ चुनाव करूँगी।  जिन्होंने मन को झकझोरा  भी और  सहलाया भी है। जिन लघुकथाओं की बात कर रही हूँ, अगर उन्हें ध्यान से देखा जाए, तो दोनों लघुकथाएँ एक ही सिक्के के दोनों पहलुओं की तरह एक दूसरी से पूरी तरह जुड़ी  भी हैंऔर पूरी तरह से जुदा भी हैं। मैं बात कर रही हूँ। लघुकथा खूबसूरत और दूसरी लघुकथा  डकराते प्रेम बिंदु । ये दोनों लघुकथाएँ हैं जो प्रेम के दोनों रूपों (सकारात्मक और नकारात्मक ) को दिखातीं हैं….बेहद पसंद आई हैं।

सुषमा जी की कथाओं को पढ़कर मैंने यही जाना कि उनके अंदर प्रेम की अनुभूति सबसे अधिक और अगाध है। इसी वजह से प्रेम पर आधारित दोनों लघुकथाओं की बानगी देखिए…. प्रेम को पूरी तरह समझने वाला ही उसके सकारात्मक और नकारात्मक रूप को समान रूप से न केवल महसूस करता है, बल्कि अभिव्यक्त भी कर सकता है।

जहाँ एक ओर खूबसूरत में लेखिका ने प्रेम के निश्छल रूप का कितनी खूबसूरती से उकेरा है! लघुकथा में हर एक पंक्ति का अर्थ कथा को प्रेममय मजबूती दे रही है।

प्रेम की गहनता समझने वाला इंसान ही इस कथा के छोटे छोटे प्रतीकों को समझ पाएगा। इन चंद लाइनों को तो देखिए-

उसके स्लीपर और मेरे सैंडल साथ रखे थे, पर कुछ इस तरह कि लहर बार- बार आती और उन्हें चूमकर चली जाती। यही खेल लहर कभी- कभी हमारी देह के साथ करती ।

वाह… कहने के लिए शब्द नहीं मिल रहे कि किस तरह इसे अभिव्यक्त किया जाए।

प्रेम का इतना निर्मल रूप….

और पढिए… अगर ध्यान से महसूस करो तो वह सुनाई भी देती है। तुम इस समय ना सिर्फ रोशनी को देख सकते हो; बल्कि सुन भी सकते हो कि कैसे घुँघरू घुँघरू बजती चाँदनी, लहरों पर नृत्य कर रही है।

क्या इससे बेहतर कुछ लिखा जा सकता है? नहीं न…

सच में प्रेम है ही इतना खूबसूरत कि इसमें डूबने पर ही दुनिया का अलौकिक रूप नजर आता है। सब कुछ प्रेममय जिसमें हर मूक चीज भी संगीतमय हो जाती है।

प्रेम पर लिखी अब तक पढ़ी बेहतरीन लघुकथाओं में से एक है यह।

और इसी प्रेम का दूसरा वीभत्स रूप दिखाती दूसरी लघुकथा है-  डकराते प्रेम बिंदु

  डकराना शब्द पढकर ही दिल अजीब से भय से आतंकित हो जाता है। डकराना मानो किसी  अथाह दर्द में किसी पशु का हृदय भेदी आर्त्तनाद। इस लघुकथा को फेंटेसी लघुकथा की उत्कृष्ट लघुकथा कहना गलत नहीं होगा।

लघुकथा में चित्रण महानगर की आम जीवन- शैली के बीच घटित आम सी ही घटना है,  जिसका आज के आधुनिक समाज में घटित होना सामान्य आम बात है। लेखिका ने अपनी  सशक्त लेखनी और  शैली  से  इसको विशिष्ट खास बना दिया  है।

कोमल स्पर्श से शुरू हुआ प्रेम कैसे वासना की आग से यकायक धधककर खत्म हो जाता है,  देखिए-

दो जिस्म एक दूसरे के बेहद करीब थे। इतने कि अलग करते तो एकदूसरे के रेशे आपस में उलझ, जुदा होने से मना कर देते।

अचानक  प्रेम पर पुरुष की वासना सवार हो जाती है, तब स्त्री का न केवल प्रेम लुप्त होता है, बल्कि विश्वास भी तार- तार हो जाता है।

सदियों से इस खेल में….पुरुष द्वारा छली स्त्री ने अकेले ही इसकी परिणिति  भोगी  है।  अपनी अस्मिता खोकर… अपने वजूद को खोकर….अपना विश्वास खोकर….

इस बेहतरीन लघुकथा-सृजन  के लिए सुषमा जी को बहुत बधाइयाँ। आपकी लेखनी अनवरत ऐसे ही चलती रहे, यही शुभकामना है।

-0-संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण (लघुकथा- संग्रह) पृष्ठ:120, मूल्य: 260 रुपये, ISBN: 978-81-972367-0-9, प्रथम संस्करण: 2024, प्रकाशक: प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, भारत, 3/186 राजेंद्र नगर, सेक्टर- 2, साहिबाबाद, गाजियाबाद- 201005

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