लघुकथा साहित्य की वह विधा है जो किसी संवेदना को एक सूत्र में पिरोकर उसे चिंतन की बहुआयामी समझ देती है। लघुकथा जीवन के प्रति व्यक्ति की उद्दाम ललक को गहरी आत्मीयता के साथ अंकित करती है। किसी घटना या स्थिति को केन्द्र में रखकर किसी भी विसंगति को फोकस करना ही लघुकथा की मूल प्रवृत्ति है। आकार की लघुता के बावजूद उसकी बेधकता ही उसकी सफलता का निकष है। जिस प्रकार गजल का एक शेर अपने छोटे आकार में भी गहरी चोट करने की क्षमता रखता है, वही क्षमता लघुकथा में भी होती है। आशय यह है कि लघुकथा किसी ‘एक’ और ‘प्रत्यक्ष’ संवेदना के धरातल पर सामाजिक विसंगति को रेखांकित करने का सशक्त माध्यम है।
लघुकथा को प्रभावशाली बनाने के लिए उसमें सारगर्भित संवाद–योजना महत्त्वपूर्ण है। भाषिक संरचना के लिए लघुकथा में अपरिहार्य शब्द अपेक्षित परन्तु अनावश्यक ब्यौरा वर्जित है। अनुभव की टीस और कचोट को बहुत सीधे–सादे ढंग से उदघाटित करने वाली लघुकथा की सफलता के लिए उसमें किसी घटना को चित्रित करने के पीछे निहित चरित्र को उजागर करने की अवधारणा ही सक्रिय होनी चाहिए, क्योंकि जीवन के यथार्थ को विश्वसनीय ढ़ग से अंकित करने पर ही लघुकथा दीर्घजीवी हो सकती है। निषकर्षता संक्षिप्ति,व्यंग्य और मार्मिक संवाद लघुकथा के प्राणतत्व है।
विगत कई दशक से लघुकथा का रचना कर्म उल्लेखनीय रहा है। सारिका सहित अधिसंख्य पत्रिकाओं के लघुकथा –विशेषांक और अनेक लघुकथा –संकलन साहित्य की धरोहर है। बलराम द्वारा सम्पादित ‘विश्व लघुकथा कोश’ भी एक अप्रतिम और अनूठा प्रयास है। आज भी अधिसंख्य रचनाकार बहुत अच्छी लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनमें से शंकर पुणतांबेकर, बलराम, चित्रा मुद्गल, रामेश्वर काम्बोज हिंमाशु, दामोदर दत्त दीक्षित , सुकेश साहनी,रमेश गौतम, बलराम अग्रवाल,अशोक भाटिया आदि कथाकार मुझे अधिक प्रिय है।
यहाँ चित्रा मुद्गल की लघुकथा ‘बोहनी’ का उल्लेख करना चाहता हूँ । इसमें एक भिखारी की दयनीय स्थिति और उसे रोजाना भिक्षा देने वाली महिला की उदारता पर केन्द्रित प्रसंग में बोहनी से जुड़ी आत्मीयता और एक दिन के भाग्य को रेखांकित किया गया हैं। तीन दिन तक लगातार भिक्षा न देने के फलस्वरूप भिखारी रिरियाता है, ‘‘मेरी माँ……तुम देता तो सब देता…….तुम नहीं देता तो कोई नई देता……..तीन दिन से तुम नई दिया माँ…….भुक्का है,मेरा माँ ।’’प्रस्तुत लघुकथा में स्थितियों का सहज विकास और एक भिखारी का भरोसा सम्बन्धित महिला की संवेदनशीलता पर टिका हुआ है। कथा के अंत में ट्रेन का छूट जाना भी वज्रपात की तरह है। इस लघुकथा में गरीबी की प्रत्यक्ष संवेदना का अभाव और कथ्य के अनुरूप भाषा का प्रस्तुतीकरण दोनों ही पाठक के मस्तिष्क को झकझोेरने में सफल है।
रामेश्वर काम्बोज जी की एक श्रेष्ठ लघुकथा फिसलन’ कलियुगी चरित्र के दोहरे मुखौटे को बेनकाब करती है। आज का दोमुँहा व्यक्ति कहता कुछ ओर है करता कुछ ओर है। शराबबंदी पर भाषण देने वाले सम्माननीय है महेश तिवारी जब स्वंय शराब पीकर सड़क पर लोटते है तो भाषण से प्रभावित होने वाला भौचक्का रह जाता है। ऐसी स्थिति में श्रद्धा के महल ढह जाते है।
प्रस्तुत लघुकथा में दोहरे मुखौटे के चरित्र पर भरपूर प्रहार किया गया है। शराब का प्रसंग एक प्रतीक है ,जो वर्तमान परिवेश में सर्वत्र पाए जाने वाले दोमुँहें चरित्रहीन लोगों की भर्तस्ना करता है। इस कथा में भी स्थितियों का सहज विकास और पात्रों की विश्वसनीयता आश्वस्त करती है। इसमें कथाकार का रचनाधर्मी विवेक और युग–बोध को उभारने का आग्रह सराहनीय है।
उसे चिंतन की बहुआयामी समझ देता है।
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1-चित्रा मुद्गल: बोहनी
उस पुल पर से गुजरते हुए कुछ आदत–सी हो गई। छुट्टे पैसों में से हाथ में जो भी सबसे छोटा सिक्का आता, उस अपंग बौने भिखारी के बिछे हुए चीकट अंगोछे पर उछाल देती। आठ बीस की वी0टी0 लोकल मुझे पकड़नी होती और अक्सर ट्रेन पकड़ने की हड़बड़ाहट में ही रहती, मगर हाथयंत्रवत् अपना काम कर जाता। दुआएँ उसके मुंह से रिरियायी–सी झरती….आठ–दस डग तक पीछा करतीं।
उस रोज इत्तिफाक से पर्स टटोलने के बाद भी कोई सिक्का हाथ न लगा। टे्रन पकड़ने की जल्दबाजी में बिना भीख दिए गुजर गई।
दूसरे दिन छुट्टे थे, मगर एक लापरवाही का भाव उभरा, रोज ही तो देती हूँ। फिर कोई जबरदस्ती तो है नहीं! और बगैर दिए ही निकल गई।
तीसरे दिन भी वही हुआ। उसके बिछे हुए अंगोछे के करीब से गुजर रही थी कि पीछे से उसकी गिड़गिड़ाती पुकार ने ठिठका दिया–‘‘माँ ….मेरी माँ …..पैसा नई दिया न? दस पैसा फकत….’’
ट्रेन छूट जाने के अंदेशे ने ठहरने नहीं दिया, किन्तु उस दिन शायद उसने भी तय कर लिया था कि वह बगैर पैसे लिए मुझे जाने नहीं देगा। उसने दुबारा ऊँची आवाज में मुझे संबोधित कर पुकार लगाई। एकाएक मैं खीज उठी। भला यह क्या बदतमीजी है? लगातार पुकारे जा रहा है, ‘माँ ….मेरी माँ …’ मैं पलटी और बिफरती हुई बरसी, ‘‘क्यों चिल्ला रहे हो? तुम्हारी देनदार हूँ क्या?’’
‘‘नई, मेरी माँ !’’वह दयनीय हो रिरियाया, ‘‘तुम देता तो सब देता….तुम नई देता तो कोई नई देता….तुम्हारे हाथ से बौनी होता तो पेट भरने भर को मिल जाता….तीन दिन से तुम नई दिया माँ …..भुक्का है, मेरी माँ !’’
भीख में भी बोहनी! स्हसा गुस्सा भरभरा गया। करुण दृष्टि से उसे देखा, फिर एक रुपया का एक सिक्का आहिस्ता से उसके अंगोछे पर उछालकर दुआओं से नख–शिख भीगती जैसे ही मैं प्लेटफार्म पर पहुँची,
मेरी आठ बस की गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ चुकी थी। आँखों के सामने ‘मस्टर’ घूम गया……अब….?
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2-रामेश्वर काम्बोज- फिसलन
शाम का धुँधलका। सड़क के निकट पड़ा कोई शराबी लड़खड़ाती आवाज़ में बड़बड़ा रहा था– ””मेरा…. चारों तरफ नाम हो गया। अब मेरे आगे कोई नहीं टिक सकता।”” बस्ती के बच्चे उसके ऊपर ढेले फेंक–फेंककर तालियाँ बजा रहे थे। रोज़ यहाँ यही तमाशा रहता है।
मैं भी कौतूहलवश वहाँ जाकर रुक गया। शराबी का चेहरा मिट्टी से सना था। मुझे वहाँ ठिठके देखकर घीसा काका बोले– ””जावो बाबूजी! काहे को हियाँ खड़े मन मैला कर रहे हो। हियाँ तो रोज जेही लफड़ा रहता है। बस्ती वालों ने इसे ठोक–पीटकर हियाँ पटक दिया। पीके लौंडिया छेड़ रिहा था।”” मैं शराबबन्दी पर दिए गए महेश के आज के भाषण के बारे में सोच
रहा था। यह शराबी उनका भाषण सुने तो शराब को कभी हाथ न लगाए। भगवान ने जैसे जिह्वा पर सरस्वती बिठा दी हो।
मैंने उसको झकझोरा– ””कौन है बे! उठ। चल यहाँ से। कोई ट्रक कुचल देगा।”” दुर्गन्ध का एक भभका मेरे मन में मितली भर गया।
नज़दीक से देखकर मैं चौंका– वह शराबी महेश था।