अस्पताल में रक्तदान कमरे के सामने लंबी लाइन लगी हुई थी। गरीब असहाय लोग अपने शरीर का खून बेचकर पैसा कमाते हैं और अपना पेट पालते हैं।
एकाएक मेरी नजर उस लाइन में खड़ी फटी–मैली सलवार कमीज पहनी चौदह पंह साल की लड़की की ओर गयी। मैंने पास आकर उस लड़की से पूछा, ‘‘तुम यहाँ क्यों आई हो?’’
लड़की सहमी हुई सी अपनी नजरें झुकाकर बोली, ‘‘खून बेचने के लिए।’’
‘‘और उस पैसे से तुम क्या करोगी?’’
‘‘बापू के लिए दवाई खरीदूँगी।’’
‘‘तुम्हारे बापू बीमार हैं?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘वो क्या करते हैं?’’
‘‘खून बेचते हैं।’’
मैंने उस लड़की को गौर से देखा। उसकी आँखों में एक चमक थी, किसी नंगे सच की तरह।