कृषि विश्वविद्यालय के स्नातकों का एक दल क्रियात्मक प्रशिक्षण के लिए गाँव में आया हुआ था। खेतों की मेंड़ पर लम्बे बालों वाले चश्मे लगाए और बैल बॉटम पहने अपटुडेट युवकों को देखकर गाँव के कुछ लोग भी उनके आसपास एकत्र हो गए थे। प्रशिक्षण के हाथ में पाँच–छह किस्म की गेहूँ की बालिया थीं और वो बता रहे थे।
ये तीन सौ साावन किस्म का गेहूँ है। ये कल्याण हैं ये देसी…इसके गुण….अवगुण…..इतना बीज….इतना पानी,खाद…बोने का समय…काटने का समय आदि। नवयुवक बहुत ध्यान से देख–सुन रहे थे। भीड़ में फुसफुसाहट सी होने लगी थी,‘‘अरे, यो पढ़ावै सै, यो तो म्हारा नत्थू भी जानै सै जो गूंठा भी न टेकणा जाणै।’’ तभी प्रशिक्षक ने प्रश्न उछाला, यह सब कुछ जान लेने के बाद…..कौन–सी गेहूँ को आप सबसे अच्छी गेहूँ मानेंगे?
प्रशिक्षार्थियों में कानाफूसी शुरू हो गई। वो तय नहीं कर पा रहे थे। सभी में कुछ गुण थे तो कुछ कमियां भी थीं। काफी देर हो गई, तभी एक बूढ़ा खेतिहर मजदूर फटे चिथड़ों में लिपटा एकाएक आगे बढ़ा और चिल्लाता हुआ–सा बोला, ‘‘मैं काऊँ साब?’’ सभी निगाहें उसकी ओर उठ गई थीं। संयत होता हुआ वह बोला, ‘‘बोई (गेहूँ) सबतै बडि़या होवै जिस तई दो जून पेट भरजै।’’ और बिना किसी को ओर देखे बोझिल कदमों को उठाता वह एक ओर बढ़ गया।
-0-